सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185

Here is the complete, line-by-line transcription of the text from the image:

  • ११२ § १८० ] प्रथमोऽध्यायः ७३
    § १७८. योगिप्रत्यक्षमन्यज्ज्ञानं दिव्यमप्यस्तीति चेत् । न तस्य प्रत्यक्षत्वं; इन्द्रियनिमि-
    त्तत्वाभावात्; अक्षेमक्षं प्रति यद्वर्तते तत्प्रत्यक्षमित्यभ्युपगमात् ।
    § १७९. किंच सर्वज्ञत्वाभावः प्रतिज्ञाहानिर्वा । अस्य योगिनो यज्ज्ञानं तत्प्रत्यर्थवशवर्ति वा
    स्याद् अनेकार्थग्राहि वा । यदि प्रत्यर्थवशवर्ति, सर्वज्ञत्वमस्य नास्ति योगिनः, ज्ञेयस्यानन्त्यात् । ५
    अथानेकार्थग्राहि, या प्रतिज्ञा-
    "विजानाति न विज्ञानमेकमर्थद्वयं यथा । एकमर्थं विजानाति न विज्ञानद्वयं तथा ।।"
    सा हीयते ।
    § १८०. अथवा "क्षणिकाः सर्वसंस्काराः" इति प्रतिज्ञा हीयते; अनेकक्षण ४ वृत्त्येकविज्ञानाभ्यु-
    पगमात् । अनेकार्थग्रहणं हि क्रमेणेति । युगपदेवेति चेत् । योऽस्य जन्मक्षणः स आत्मलाभार्थ एव ।
    लब्धात्मलाभं हि किंचित्स्वकार्यं प्रति व्याप्रियते । प्रदीपवदिति चेत् । तस्याप्यनेकक्षणविषयतायां १०
    सत्यामेव प्रकाश्यप्रकाशनाभ्युपगमात् । विकल्पतीतत्वात्तस्य शून्यताप्रसङ्गश्च ।
    § १७८. शंका-योगी प्रत्यक्ष नामका एक अन्य दिव्य ज्ञान है ? समाधान-तो भी उसमें
    प्रत्यक्षता नहीं बनती, क्योंकि वह इन्द्रियोंके निमित्तसे नहीं होता है। जिसकी प्रवृत्ति प्रत्येक
    इन्द्रियसे होती है वह प्रत्यक्ष है ऐसा आपके मतमें स्वीकार भी किया गया है।
    § १७९. दूसरे प्रत्यक्षका उपर्युक्त लक्षण माननेपर सर्वज्ञत्वका अभाव और प्रतिज्ञाहानि ये १५
    दो दोष आते हैं। विशेष इस प्रकार है—इस योगीके जो ज्ञान होता है वह प्रत्येक पदार्थको क्रमसे
    जानता है या अनेक अर्थोंको युगपत् जानता है। यदि प्रत्येक पदार्थको क्रमसे जानता है तो इस
    योगीके सर्वज्ञताका अभाव होता है, क्योंकि ज्ञेय अनन्त हैं। और यदि अनेक अर्थोंको युगपत्
    जानता है तो जो यह प्रतिज्ञा है कि 'जिस प्रकार एक विज्ञान दो अर्थोंको नहीं जानता है उसी
    प्रकार दो विज्ञान एक अर्थ को नहीं जानते हैं।' वह नहीं रहती । २०
    § १८०. अथवा 'सब पदार्थ क्षणिक हैं' यह प्रतिज्ञा नहीं रहती, क्योंकि आपके मतमें क्षण-
    तक रहनेवाला एक विज्ञान स्वीकार किया गया है। अतः अनेक पदार्थोंका ग्रहण क्रमसे ही होता
    है। शंका-अनेक पदार्थोंका ग्रहण एक साथ हो जायगा ? समाधान-जो ज्ञानको उत्पत्तिका
    समय है उस समय तो वह स्वरूप लाभ ही करता है, क्योंकि कोई भी पदार्थ स्वरूपलाभ करने-
    के पश्चात् ही अपने कार्यके प्रति व्यापार करता है। शंका-विज्ञान दीपकके समान है अतः २५
    उसमें दोनों बातें एक साथ बन जायेंगी ? समाधान-नहीं, क्योंकि उसके अनेक क्षण तक रहने-
    पर ही प्रकाश्यभूत पदार्थोंका प्रकाशन करना स्वीकार किया गया है। यदि ज्ञानको विकल्पातीत
    माना जाता है तो शून्यताकी प्राप्ति होती है।
    विशेषार्थ—इस सूत्रमें कौन-कौन ज्ञान प्रत्यक्ष हैं यह बतलाया गया है। प्रसंगसे इसकी
    टीकामें इन विशेषताओंपर प्रकाश डाला गया है- ३०
    १. अक्ष शब्दका अर्थ । २. प्रत्यक्ष शब्दकी व्युत्पत्ति । ३. अक्ष शब्दका अर्थ इन्द्रिय या मन
    करके प्रत्यक्ष शब्दका लक्षण करनेपर क्या दोष आते हैं इनका निर्देश । ४. आगमसे सर्वज्ञता नहीं
    बनती किन्तु वह प्रत्यक्षज्ञानपूर्वक ही प्राप्त होती है इसका निर्देश । ५. बौद्धोंके द्वारा माने गये
    प्रत्यक्षके लक्षणको स्वीकार करनेपर क्या दोष प्राप्त होते हैं इसकी चर्चा । ६. प्रसंगसे बौद्धोंके
    यहाँ सर्वज्ञता कैसे नहीं बनती और प्रतिज्ञाहानि दोष कैसे आता है इसका निर्देश । तीसरी बातको ३५
    स्पष्ट करते हुए जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि प्रत्यक्षज्ञानको इन्द्रियनिमित्तक या मन-
    निमित्तक माननेपर सर्वज्ञता नहीं बनती। वेद ही भूत, भविष्यत्, वर्तमान, दूरवर्ती, सूक्ष्म इत्यादि
    १. निमित्ताभा-मु० । २. 'अक्षमक्षं प्रति वर्तते तत्प्रत्यक्षम् ।'-न्याय बिन्दु० टी० पृ० १४ । ३. 'क्षणिकाः
    सर्वसंस्काराः स्थिराणां कुतः क्रिया । भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैव चोच्यते ।'....। ४. क्षणवत्र्त्येक-मु० ।
    १०