सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।१३ § १८१ -
§ १८१. अभिहितोभयप्रकारस्य प्रमाणस्य आदिप्रकारविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम् ॥१३॥
§ १८२. आदौ उद्दिष्टं यज्ज्ञानं तस्य पर्यायशब्दा एते वेदितव्याः; मतिज्ञानावरणक्षयोप-
शमान्तरङ्गनिमित्तजनितोपयोगविषयत्वादेतेषां श्रुतादिष्वप्रवृत्तेश्च । मननं मतिः, स्मरणं स्मृतिः,
५ संज्ञानं संज्ञा, चिन्तनं चिन्ता, अभिनिबोधनमभिनिबोध इति । यथासंभवं विग्रहान्तरं विज्ञेयम् ।
§ १८३. सत्यपि प्रकृतिभेदे रूढिबलाद्भवतु पर्यायशब्दत्वम् । यथा इन्द्रः२ शक्रः पुरन्दर
इति इन्धनादिक्रियाभेदेऽपि शचीपतेरेकस्यैव संज्ञा३ । समभिरूढनयापेक्षया तेषामर्थान्तरकल्पनायां
मत्यादिष्वपि स क्रमो विद्यत एव । किं तु मतिज्ञानावरणक्षयोपशमनिमित्तोपयोगं ४नातिवर्तन्त
इति अयमत्रार्थो विवक्षितः । ‘इति'शब्दः ५प्रकारार्थः । एवंप्रकारा अस्य पर्यायशब्दा इति ।
१० अभिधेयार्थो वा । मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ता अभिनिबोध इत्येतैर्योऽर्थोऽभिधीयते स एक एव इति ।
अर्थोंका ज्ञान करानेमें समर्थ है । इसीसे सकल पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है । इसलिए इन्द्रियजन्य
ज्ञान और मनोजन्य ज्ञानको प्रत्यक्ष माननेमें कोई आपत्ति नहीं है । ऐसा मीमांसक मानते हैं ।
परन्तु उनका ऐसा मानना समीचीन नहीं है, क्योंकि सर्वज्ञता प्रत्यक्ष ज्ञानके बिना नहीं बन सकती
है । यह बात चौथी विशेषता-द्वारा बतलायी गयी है । बौद्ध भी अक्षका अर्थ इन्द्रिय करके इन्द्रिय-
१५ जन्य ज्ञानको प्रत्यक्ष मानते हैं परन्तु उनका ऐसा मानना क्यों समीचीन नहीं है यह पाँचवीं
विशेषता-द्वारा बतलाया गया है । शेष कथन सुगम है ।
§ १८१. प्रमाणके प्रत्यक्ष और परोक्ष ये दो भेद कहे । अब प्रथम प्रकारके प्रमाणके विशेष-
का ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता और अभिनिबोध ये पर्यायवाची नाम हैं ॥१३॥
२० § १८२. आदिमें जो ज्ञान कहा है उसके ये पर्यायवाची शब्द जानने चाहिए, क्योंकि ये
मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमरूप अन्तरंग निमित्तसे उत्पन्न हुए उपयोगको विषय करते हैं
और इनकी श्रुतादिकमें प्रवृत्ति नहीं होती । ‘मननं मतिः, स्मरणं स्मृतिः, संज्ञानं संज्ञा, चिन्तनं
चिन्ता और अभिनिबोधनमभिनिबोधः’ यह इनकी व्युत्पत्ति है । यथा सम्भव इनका दूसरा विग्रह
जानना चाहिए ।
२५ § १८३. यद्यपि इन शब्दोंकी प्रकृति अलग-अलग है अर्थात् यद्यपि ये शब्द अलग-अलग
धातुसे बने हैं तो भी रूढ़िसे पर्यायवाची हैं । जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर । इनमें यद्यपि इन्दन
आदि क्रियाकी अपेक्षा भेद है तो भी ये सब एक शचीपतिकी वाचक संज्ञाएँ हैं । अब यदि सम-
भिरूढ नयकी अपेक्षा इन शब्दोंका अलग-अलग अर्थ लिया जाता है तो वह क्रम मति आदि
शब्दोंमें भी पाया जाता है । किन्तु ये मति आदि मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमरूप निमित्तसे
३० उत्पन्न हुए उपयोगको उल्लंघन नहीं करते हैं यह अर्थ यहांपर विवक्षित है । प्रकृतमें ‘इति’ शब्द
प्रकारवाची है जिससे यह अर्थ होता है कि इस प्रकार ये मति आदि मतिज्ञानके पर्यायवाची शब्द
हैं । अथवा प्रकृतमें मति शब्द अभिधेयवाची है । जिसके अनुसार यह अर्थ होता है कि मति,
स्मृति, संज्ञा, चिन्ता और अभिनिबोध इनके द्वारा जो अर्थ कहा जाता है वह एक ही है ।
१. आदौ यदुद्दिष्टं ज्ञानं मु० । २. ‘बहवो हि शब्दाः एकार्था भवन्ति । तद्यथा—'इन्द्रः शक्रः पुरुहूतः
३५ पुरन्दरः ।'—पा० म० भा० १।१।२।४५ । ३. संज्ञाः । सम-मु० । ४. नातिवर्तत इति मु० । ५. –कारार्थे ।
एवं—आ०, दि० १, दि० २ । ‘हेतावेवं प्रकारे च व्यवच्छेदे विपर्यये । प्रादुर्भावे समाप्तौ च इति-
शब्दः प्रकीर्तितः ।' — अने० ना० श्लो० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri