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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 558 में से

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पृष्ठ 189
  • ११५ § १९० ] प्रथमोऽध्यायः ७७

§ १८९. एवं निर्ज्ञातोत्पत्तिनिमित्तमनिर्णीतभेदमिति तद्भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
अवग्रहेहावायधारणाः ॥१५॥
§ १९०. विषयविषयिसंनिपातसमनन्तरमाद्यं¹ ग्रहणमवग्रहः । विषयविषयिसंनिपाते सति
दर्शनं भवति । तदनन्तरमर्थ²ग्रहणमवग्रहः । यथा—चक्षुषा शुक्लं रूपमिति ग्रहणमवग्रहः । अवग्रह-
गृहीतेऽर्थे तद्विशेषाकाङ्क्षणमीहा । यथा—शुक्लं रूपं किं बलाका पताका³ वेति । विशेषनिर्ज्ञानाद्या- ५
थात्म्यावगमनमवायः । उत्पतननिपतनपक्षविक्षेपादिविर्बलाकैवेयं न पताकेति । अवेतस्य कालान्त-
रेऽविस्मरणकारणं धारणा⁶ । यथा—सैवेयं वलाका पूर्वाह्णे यामहमद्राक्षमिति । ⁷एषामवग्रहादीना-
मुपन्यासक्रम उत्पत्तिक्रमकृतः ।
निमित्त होते हैं पर वे अव्यभिचारी कारण न होनेसे उनका यहाँ निर्देश नहीं किया है । इसकी
टीकामें इन्द्रिय-अनिन्द्रिय शब्दका क्या अर्थ है इस पर प्रकाश डालते हुए इन्द्रियोंको जो प्रतिनियत १०
देशको विषय करनेवाला और कालान्तरमें अवस्थित रहनेवाला तथा मनको अनियत देशको
विषय करनेवाला और कालान्तरमें अवस्थित नहीं रहनेवाला बतलाया है सो इसका तात्पर्य यह
है कि जिस प्रकार इन्द्रियाँ देश और काल दोनोंकी अपेक्षा नियत विषयको ग्रहण करती हैं वैसा
मन नहीं है । इस प्रकार मनका विषय नियत नहीं है । उसकी इन्द्रियगम्य और अतीन्द्रिय सब
विषयोंमें प्रवृत्ति होती है । इसका दूसरा नाम अन्तःकरण क्यों है इसका स्पष्टार्थ टीका में किया १५
ही है । शेष कथन सुगम है ।
§ १८९. इस प्रकार मतिज्ञानकी उत्पत्तिके निमित्त जान लिये, किन्तु अभी उसके भेदोंका
निर्णय नहीं किया अतः उसके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए अगला सूत्र कहते हैं—
अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये मतिज्ञानके चार भेद हैं ॥१५॥
§ १९०. विषय और विषयीके सम्बन्धके बाद होनेवाले प्रथम ग्रहणको अवग्रह कहते हैं । २०
विषय और विषयीका सन्निपात होनेपर दर्शन होता है उसके पश्चात् जो पदार्थका ग्रहण होता
है वह अवग्रह कहलाता है । जैसे चक्षु इन्द्रियके द्वारा 'यह शुक्ल रूप है' ऐसा ग्रहण करना
अवग्रह है । अवग्रहके द्वारा ग्रहण किये गये पदार्थोंमें उसके विशेषके जाननेकी इच्छा ईहा कह-
लाती है । जैसे, जो शुक्ल रूप देखा है 'वह क्या वकपंक्ति है' इस प्रकार विशेष जाननेकी इच्छा
या 'वह क्या पताका है' इस प्रकार जाननेकी इच्छा ईहा है । विशेषके निर्णय-द्वारा जो यथार्थ २५
ज्ञान होता है उसे अवाय कहते हैं । जैसे उत्पतन, निपतन और पक्षविक्षेप आदिके द्वारा 'यह
वकपंक्ति ही है ध्वजा नहीं है' ऐसा निश्चय होना अवाय है । जानी हुई वस्तुका जिस कारण
कालान्तरमें विस्मरण नहीं होता उसे धारणा कहते हैं । जैसे यह वही वकपंक्ति है जिसे प्रातःकाल
मैंने देखा था ऐसा जानना धारणा है । सूत्रमें इन अवग्रहादिकका उपन्यासक्रम इनके उत्पत्ति-
क्रमकी अपेक्षा किया है । तात्पर्य यह है कि जिस क्रमसे ये ज्ञान उत्पन्न होते हैं उसी क्रमसे इनका ३०
सूत्रमें निर्देश किया है ।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मतिज्ञानके चार भेद किये हैं सो ये भेद मतिज्ञानकी उपयोग रूप
अवस्थाकी प्रधानतासे किये गये हैं । इससे इसका क्षयोपशम भी इतने प्रकारका मान लिया गया
है । पदार्थको जानते समय किस क्रमसे वह उसे जानता है यह इन भेदों-द्वारा बतलाया गया है
१. -माद्यग्रह-मु० । २. -मर्थस्य ग्रह-मु० । ३. पताकेति । मु० । ४. उत्पतनपक्ष आ०, दि० १, दि० २ । ३५
५. अथैतस्य मु० । ६. 'तयणंतरं तयत्थाविच्चवणं जो य वासणाजोगो । कालंतेरे य जं पुणरणुसरणं धारणा
सा उ ।' —वि० भा० गा० २९१ । ७. ईहिज्जइ नागहियं नज्जइ नाणीहियं न यावायं । धारिज्जइ जं वत्थुं
तेण कमोऽवग्गहाईओ ॥' —वि० भा० गा० २९६ ।