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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 558 में से

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पृष्ठ 188

एव मनसि अनिन्द्रियशब्दस्य वृत्तिः । ईषदर्थस्य नञः प्रयोगात् । ईषद्विन्द्रियमनिन्द्रियमिति । यथा
अनु¹दरा कन्या इति । कथमीषदर्थः । इमानीन्द्रियाणि² प्रतिनियतदेशविषयाणि कालान्तरावस्था-
यीनि च । न तथा मनः इन्द्रस्य लिङ्गमपि सत्प्रतिनियतदेशविषयं कालान्तरावस्थायि च ।
§ १८७. तदन्तःकरणमिति चोच्यते । गुणदोषविचारस्मरणादिव्यापारे इन्द्रियानपेक्षत्वा-
च्चक्षुरादिवद् बहिरनुपलब्धेश्च अन्तर्गतं³ करणमन्तःकरणमित्युच्यते ।
§ १८८. तदिति किमर्थम् । मतिज्ञाननिर्देशार्थम् । ननु च तदनन्तरं 'अनन्तरस्य विधिर्वा
भवति प्रतिषेधो वा' इति तस्यैव ग्रहणं भवति । इहार्थमुत्तरार्थं च तदित्युच्यते । यन्मत्यादिपर्याय-
शब्दवाच्यं ज्ञानं तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं तदेवावग्रहेहावायाधारणा इति । इतरथा हि प्रथमं
मत्यादिशब्दवाच्यं ज्ञानमित्युक्त्वा इन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तं श्रुतम् । तदेवावग्रहेहावायाधारणा इत्य-
निष्टमभिसंबध्येत ।

शब्दका व्यापार कैसे हो सकता है ? समाधान—यहाँ नञ्का प्रयोग 'ईषद्' अर्थमें किया है ईषत्
इन्द्रिय अनिन्द्रिय । यथा अनुदरा कन्या । इस प्रयोगमें जो अनुदरा शब्द है उससे उदरका अभाव
रूप अर्थ न लेकर ईषद् अर्थ लिया गया है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए । शंका—अनिन्द्रिय
में नञ्का निषेध रूप अर्थ न लेकर 'ईषद्' अर्थ क्यों लिया गया है ? समाधान—ये इन्द्रियाँ
नियत देशमें स्थित पदार्थों को विषय करती हैं और कालान्तरमें अवस्थित रहती हैं। किन्तु
मन इन्द्रका लिंग होता हुआ भी प्रतिनियत देशमें स्थित पदार्थको विषय नहीं करता और
कालान्तरमें अवस्थित नहीं रहता ।
§ १८७. यह अन्तःकरण कहा जाता है । इसे गुग और दोषोंके विचार और स्मरण करने
आदि कार्योंमें इन्द्रियोंकी अपेक्षा नहीं लेनी पड़ती तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके समान इसकी
बाहर उपलब्धि भी नहीं होती इसलिए यह अन्तर्गत करण होनेसे अन्तःकरण कहलाता है ।
इसलिए अनिन्द्रिय में नञ्का निषेध रूप अर्थ न लेकर ईषद् अर्थ लिया गया है ।
§ १८८. शंका—सूत्रमें 'तत्' पद किसलिए दिया है ? समाधान—सूत्रमें 'तत्' पद मति-
ज्ञानका निर्देश करनेके लिए दिया है । शंका—मतिज्ञानका निर्देश अनन्तर किया ही है और ऐसा
नियम है कि 'विधान या निषेध अनन्तरवर्ती पदार्थका हो होता है' अतः यदि सूत्रमें 'तत्' पद
न दिया जाय तो भी मतिज्ञानका ग्रहण प्राप्त होता है ? समाधान—इस सूत्रके लिए और अगले
सूत्रके लिए 'तत्' पदका निर्देश किया है। मति आदि पर्यायवाची शब्दोंके द्वारा जो ज्ञान कहा
गया है वह इन्द्रिय और अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है और उसीके अवग्रह, ईहा, अवाय और
धारणा ये चार भेद हैं, इसलिए पूर्वोक्त दोष नहीं प्राप्त होता । यदि 'तत्' पद न दिया जाय तो
मति आदि पर्यायवाची नाम प्रथम ज्ञानके हो जायेंगे और इन्द्रिय-अनिन्द्रियके निमित्त होनेवाला
ज्ञान श्रुतज्ञान कहलायेगा और इसीके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार भेद प्राप्त होंगे
इस प्रकार अनिष्ट अर्थके सम्बन्धकी प्राप्ति होगी अतः इस अनिष्ट अर्थके सम्बन्धके निराकरण
करनेके लिए सूत्रमें 'तत्' पदका निर्देश करना आवश्यक है ।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मतिज्ञानकी उत्पत्तिके निमित्तोंकी चर्चा करते हुए वे इन्द्रिय और
मनके भेदसे दो प्रकारके बतलाये हैं । यद्यपि इस ज्ञानकी उत्पत्तिमें अर्थ और आलोक आदि भी

१. 'अनुदरा कन्येति ।' पा० म० भा० ६।३।२।४२ । २. 'इन्द्रस्य वै सतो मनस इन्द्रियेभ्यः पृथगुपदेशो
धर्मभेदात् । भौतिकानीन्द्रियाणि नियतविषयाणि, सगुणानां चैषामिन्द्रियभाव इति । मनस्त्वभौतिकं
सर्वविषयं च....।' न्या० भा० १।१।४ । 'सर्वविषयमन्तःकरणं मनः ।'—न्या० भा० १।१।९ । ३. —र्गतं
करणमित्यु मु० ।