सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ११४ § १८६ ] प्रथमोऽध्यायः ७५
§ १८४. अथस्यात्मलाभे किं निमित्तमित्यत आह—
तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४॥
§ १८५. इन्द्तीति इन्द्र आत्मा । तस्य ज्ञस्वभावस्य तदावरणक्षयोपशमे सति स्वयमर्थान्
ग्रहीतुमसमर्थस्य यदर्थोपलब्धि¹लिङ्गं तदिन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रि²यमित्युच्यते । अथवा लीनमर्थं गमय-
तीति लिङ्गम् । आत्मनः सूक्ष्मस्यास्तित्वाधिगमे लिङ्गमिन्द्रियम् । यथा इह धूमोऽग्नेः । एवमिदं ५
स्पर्शनादि करणं नासति कर्तर्यात्मनि भवितुमर्हतीति ज्ञातुरस्तित्वं गम्यते । अथवा इन्द्र इति
नामकर्मोच्यते । तेन सृष्टमिन्द्रियमिति³ । तत्स्पर्शनादि उत्तरत्र वक्ष्यते ।
§ १८६. अनिन्द्रियं मनः अन्तःकरणमित्यनर्थान्तरम् । कथं पुनरिन्द्रियप्रतिषेधेन इन्द्रलिङ्गे
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मतिज्ञानके पर्यायवाची नाम दिये गये हैं। षट्खण्डागमके प्रकृति
अनुयोगद्वारमें भी मतिज्ञानके ये ही पर्यायवाची नाम आये हैं । अन्तर केवल यह है कि वहाँ मति- १०
ज्ञान नाम न देकर आभिनिबोधिकज्ञान नाम दिया है और फिर इसके संज्ञा, स्मृति, मति और
चिन्ता ये चार पर्यायवाची नाम दिये हैं। इससे जो लोग प्रकृतमें मतिका अर्थ वर्तमान ज्ञान,
स्मृतिका अर्थ स्मरणज्ञान, संज्ञाका अर्थ प्रत्यभिज्ञान, चिन्ताका अर्थ तर्क और अभिनिबोधका
अर्थ अनुमान करते हैं उनके मतका खण्डन हो जाता है। वास्तवमें यहाँ इन नामोंका विविध ज्ञानों
की अपेक्षासे संग्रह नहीं किया गया है किन्तु मतिज्ञानके पर्यायवाची नामोंकी अपेक्षासे ही संग्रह १५
किया गया है। सूत्रकारने इसी अर्थमें इनका अनर्थान्तररूपसे निर्देश किया है। इस सूत्रकी टीकामें
इन विशेषताओंपर प्रकाश डाला गया है। १. मति आदि शब्दोंके पर्यायवाची होनेमें हेतु ।
२. मति आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति । ३. मति आदि शब्दोंमें प्रकृति भेद होनेपर भी उनके पर्याय-
वाचित्वका दृष्टान्त-द्वारा समर्थन । ४. समभिरूढनयकी अपेक्षा इनमें अर्थ भेद होनेपर भी प्रकृतमें
ये पर्यायवाची क्यों हैं इनमें पुनः युक्ति । ५. सूत्रमें आये हुए 'इति' शब्दकी सार्थकता । २०
§ १८४. मतिज्ञानके स्वरूप लाभमें क्या निमित्त है अब यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
वह ( मतिज्ञान ) इन्द्रिय और मनरूप निमित्तसे होता हैं ॥ १४ ॥
§ १८५. इन्द्र शब्दका व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ है 'इन्दतीति इन्द्रः' जो आज्ञा और ऐश्वर्यवाला
है वह इन्द्र । इन्द्र शब्दका अर्थ आत्मा है । वह यद्यपि ज्ञस्वभाव है तो भी मतिज्ञानावरण कर्मके २५
क्षयोपशमके रहते हुए स्वयं पदार्थों को जानने में असमर्थ है अतः उसको पदार्थके जानने में जो लिंग
( निमित्त ) होता है वह इन्द्रका लिंग इन्द्रिय कही जाती है। अथवा जो लीन अर्थात् गूढ़ पदार्थ-
का ज्ञान कराता है उसे लिंग कहते हैं। इसके अनुसार इन्द्रिय शब्दका यह अर्थ हुआ कि जो सूक्ष्म
आत्माके अस्तित्वका ज्ञान करानेमें लिंग अर्थात् कारण है उसे इन्द्रिय कहते हैं। जैसे लोकमें धूम
अग्निका ज्ञान करानेमें कारण होता है। इसी प्रकार ये स्पर्शनादिक करण कर्त्ता आत्माके अभाव में ३०
नहीं हो सकते हैं अतः उनसे ज्ञाताका अस्तित्व जाना जाता है। अथवा इन्द्र शब्द नामकर्मका
वाची है। अतः यह अर्थ हुआ कि उससे रची गयी इन्द्रिय है। वे इन्द्रियाँ स्पर्शनादिक हैं जिनका
कथन आगे करेंगे । अनिन्द्रिय, मन और अन्तःकरण ये एकार्थवाची नाम हैं।
§ १८६. शंका—अनिन्द्रिय शब्द इन्द्रियका निषेधपरक है अतः इन्द्रके लिंग मनमें अनिन्द्रिय
१. –लब्धिनिमित्तं लिङ्गं सु० । २. 'भोगसाधनानीन्द्रियाणि ।' -न्या० भा० १।१।९ । ३. 'भगवा हि ३५
सम्मासंबुद्धो परमिस्सरियभावतो इन्दो, कुसलाकुसलं च कम्मं, कम्मेसु कस्सचि इस्सरियाभावतो । तेनेत्थ
कम्मसञ्जनितानि ताव इंद्रियानि कुसलाकुसलं कम्मं उल्लिंगेन्ति, तेन च सिट्ठानीति इन्दलिंगट्ठेन इन्दसिट्ठट्ठेन
च इंद्रियानि ।'....वि० म० पृ० ३४३ ।