सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३१
रचना का उल्लेख नही मिलता । यह बात अवश्य है कि इस काल की रचना में ब्रज-
भाषा के अंकुर दिखाई पड़ने लगे थे। यह तथ्य उल्लेखनीय है कि नामदेव ने चौदहवी
शताब्दी के पूर्वार्ध में ही ब्रजभाषा में पदों की रचना की है। नामदेव के पदों में यह
स्पष्ट है कि उनमें मराठी और खड़ी बोली के तत्त्व हैं किन्तु यह बिलकुल स्वाभाविक
है। ब्रजभाषा और खड़ी बोली पास-पास की भाषाएँ थी और इनका विकास भी साथ-
साथ हो रहा था । सामान्य लोग दोनों भाषाओं के मिले जुले रूप का प्रयोग करते थे ।
सन्त नामदेव ने भी उसी में अपने पदों को रचा है। मराठी उनकी मातृभाषा थी,
जिसके कई शब्द और रूप उनके हिंदी पदों में सहज ही आ गये हैं। नामदेव के सम-
कालीन अन्य कवियों की भाषा उतनी विकसित ब्रजभाषा नही है जितनी नामदेव के
पदो की । अन्य रचनाओं में अपभ्रन्श के तत्त्व काफी मात्रा में विद्यमान हैं। अतः नाम-
देव को ब्रजभाषा का प्रथम कवि कहा जा सकता है।
अब हम नामदेव की हिन्दी पदावली की भाषा की निम्नलिखित विशेषताओं
पर विचार करेंगे :—
वाक्य रचना
नामदेव की हिन्दी में अधिकांश संज्ञाएँ वाक्य के अन्य शब्दों से अपना सम्बन्ध
बिना कारक-चिह्नों तथा परसर्गों के दिखाती हैं। जिन संज्ञाओ का कर्म के जैसा प्रयोग
हुआ है वे बिना कारक चिन्हो के प्रयुक्त हुई है—
(१) पाखंड भगति राम नहि रीझे । पद २१—पंक्ति ४ (करण कारक)
(२) दहूँ घोड़ा न चढ़ाइ हो कान्हा । पद ३६—पंक्ति ६ (अधिकरण कारक)
(३) जैसे कनकतुला चित राखिला । पद १६—पंक्ति १ (संबंध, अधिकरण)
(४) पावक दार जतन करि काढ़यो । पद ८२—पंक्ति ४ (अपादान कारक)
यद्यपि कुछ वाक्यो मे कर्म अध्याहृत (Understood) होता है फिर भी
संदर्भ से उसका अर्थ समझ में आ सकता है—
'अब मोरी छूटि परी ।' ८-२
इस वाक्याश में कर्म 'बंधन' अध्याहृत है।
कुछ संज्ञाओ के साथ गलत कारक-चिह्नो का प्रयोग किया गया है। जैसे—
(१) गुरु को सबद वैकुंठ—निसरनी । (२६-३)
सम्बन्ध कारक के कारक चिह्न 'का' के स्थान पर यहाँ संप्रदान कारक के
'को' का प्रयोग किया गया है।
निम्नलिखित उदाहरण में इसके ठीक विपरीत कारक का प्रयोग हुआ है—
(२) भाव भगति नाना विधि कीन्ही, फल का कौन करी । ८-३
- )
'प्रवाल' और 'जल' एक दूसरे से दूर रखे गये है । यद्यपि दोनों एक सामासिक
शब्द हैं—'प्रवाल जल'
(क) सामासिक पद के शब्द स्थानान्तर कर रखे गये हैं । जैसे 'सलिल मोह'
(६-२) 'मोह का सलिल' ।
Wait, let's review:
In L8: "बड़ो" or "बडो"?
The book uses "बडो" without nuqta (very typical for older Hindi press, like "बैकुठनाथा", "स्थानो").
In L15: "स्थलों" or "स्थलो"? It is "स्थलो".
In L25: is it (५) or (२)?
Let's look at (५). In print, it really is (५). But as a number, it's obviously item 2. What should I put? I can put (५) or (२). Usually, faithful transcription represents the character on the page, but let's see if (२) is better. Wait, if a human reads it, they might think it's a 5 or a 2. Let's look closely at it: could it be a deformed २? Yes, in some Devanagari fonts, २ looks very similar to ५ if the bottom loop doesn
नामदेव की रचनाओ का साहित्यिक मूल्यांकन २३३
शैली
कुछ स्थलों पर समानार्थी शब्दो की पुनरावृत्ति हुई है—
(अ) 'आन देव फोकट बेकामा' (३०-८)
'फोकट' और 'बेकाम' समानार्थी शब्द है ।
(ब) 'नामा कहे मेरे बंध न भाई ।' (पद ५७-पंक्ति ८)
बंध (बंधु)—भाई, भाई-भाई
(क) घड़ी मूहूरति पल नाही टाई । (३७-३)
घड़ी-क्षण, मुहूर्त-क्षण
(ङ) अमृत सुधानिधि अंत न जाइला । (४५-५)
अमृत, सुधा-निधि-अमृत का खजाना
बल (emphasis) के लिए संबंधित शब्द के साथ 'ही' का प्रयोग किया गया
है। जैसे—
(१) 'आपै पवन आप ही पाणी ।' (११०-४)
(वह स्वयं पवन तथा पानी है ।)
(२) 'घट ही भीतरि न्हाउँगा । (६६-४)
(गुरु ने मेरे शरीर के भीतर मुझे अडसठ तीर्थ दिखाये उन्ही में मैं
नहाऊँगा ।)
कहो-कहीं 'पुनि' का भी प्रयोग मिलता है—
'आपै पुरिष, नारि पुनि आपै ।' (११०-५)
(वह स्वयं पुरुष तथा स्त्री है ।)
नामदेव की हिन्दी के कुछ विशिष्ट प्रयोग
नामदेव की हिन्दी में कुछ प्रयोग ऐसे है जो रूप और अर्थ दोनो में विशिष्ट है ।
कई शब्दो का ऐसे अर्थो में प्रयोग हुआ है जिनमें वे सामान्यतः प्रयुक्त नहीं होते । इसी
प्रकार कुछ प्रयोग व्याकरण और रचना को दृष्टि से विशिष्ट है ।
शब्द संग्रह : संज्ञाएँ
अधिकाई (२-३) विशेषता पयाना (११-१) लक्ष्य
कविलास (६५-१) कैलाश पालिक (१४१-४) पालना
करवा (६३-१) शरीर पूठि (६८-५) पीठ
कापट (५२-५) कपट पैज (१३१-६) दरवाजा
कालकुष्ट (२७-३) कालकूट विष वीठो (३६-१) विट्ठल
२३४ नामदेव की हिन्दी कविता
गोठि (२५-२) मित्रता, (गोष्ठि) भजन (६-२) शरीर
जलहरि (१०३-६) जलघर, तालाब मनिषा (१२-५) मनुष्य
जिरो (१२०-७) घाव मायण (५६-३) दूध
नाठा (१५-३) गांठ डिंभ (४३-६) बालक
रजबत (११-४) राज्य बल रैनी (३६-२) रहनी
साइर (४६-४) सागर
क्रियाएँ
थहता (६३-६) रहते हुए लागो (८८-१) प्राप्त करना
घोषता (६०-३) देखना बूठा (१०१-२) डूबना
यावा (१०१-३) जाना पबनी (१३-३) बिताना
बले (१०७-६) जलना घेने व्यवहार करना
विशेषण
वरतणी आज्ञाकारी सोवनी (१४०-७) स्वर्णिम
एकल (६-२) एक भगरा (२३-४) पागल
कृतम (२०-३) कृत्रिम सरजीव (४७-३) सजीव
पेटाबलू (२४-४) पेटू
क्रिया विशेषण
अनत्र (८६-१) अन्यत्र पिछोकडि (४७-४) पीछे
परहा (१२७-५) दूर
विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग
नामदेव की हिंदी में कुछ विशिष्ट व्याकरणिक रूपों का प्रयोग भी मिलता है।
कई हिंदी मूल शब्दों में मराठी का प्रत्यय जोड़ा गया है।
मराठी का 'ला' प्रत्यय भूतकालीन क्रिया का प्रत्यय है। किन्तु नामदेव की हिंदी
में इसे 'ले' बनाकर जोड़ा गया है। उदाहरणार्थ—
अनिले (१६-२) लाना भराइले (६१-२) भरना
गूँथिले (६१-६) गूँथना लागिले (५६-२) अनुभव करना
जोइले (६१-८) तैयार करना मेलिहै (५६-४) रखना
मूँदिले (६७-५) मूँदना चोधिले (६७-५) देखना
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३५
कुछ स्थानो पर तो भूतकाल को प्रकट करने के लिए हिंदी और मराठी दोनों
प्रत्यय एक साथ लगाये गये हैं। जैसे—
आईला (३१-१) (आई + ला) आया या आयी
कटीला (४७-२) (काटी + ला) काटा या काटी
समाईला (३१-५) (समाई + ला) समाया या समायी
लाईला (२३-१) (लाई + ला) लाया या लायी
पाईला (३१-१) (पाई + ला) पाया या पायी
मराठी का 'ला' प्रत्यय जो भूतकाल का प्रत्यय है नामदेव की हिंदी में भविष्यत्
काल के लिए प्रयुक्त होता है। जैसे—
(१) जा दिन भगता आईला । (३१-१) आईला—आयेगा ।
(२) परहरि धंधाकार सबेला ।
चेरी चिंता राम करेला ॥ (३३-२) करेला—करेगा ।
विशिष्ट पद रचना
नामदेव की हिंदी में कुछ विशिष्ट पद-रचनाएँ (word formations) मिलती
है। जैसे—
(अ) अनंत अमर फल देली । (६७-८)
हिंदी की 'देना' क्रिया का रूप दिया है। मराठी की 'देणे' क्रिया का भूतकाल
का रूप 'दिला' है परन्तु नामदेव 'देली' का प्रयोग करते है जो न हिंदी का है न
मराठी का ।
(आ) 'करीया' (५४-४) करना
'कथिया' (७६-१) कहना
उधरीया (५४-४) उद्धार करना
प्राचीन हिंदी पद्य में भूतकाल का प्रत्यय 'आ' अथवा 'या' पाया जाता है परंतु
यहाँ 'इया' का प्रयोग हुआ है ।
संयुक्त क्रिया का प्रयोग
नामदेव की भाषा में संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग बहुत अधिक संख्या में हुआ
है। इनमें मुख्य क्रिया पूर्वकालिक क्रिया के रूप में या कृदन्त के रूप में है। जिन
संयुक्त क्रियाओं में पूर्व कालिक क्रिया मुख्य क्रिया या क्रियार्थक संज्ञा है इसमें पूर्वकालिक
क्रिया में कोई परिवर्तन नही होता। वचन, लिंग और काल का निर्देश गौण क्रिया द्वारा
होता है—
२३६ नामदेव की हिन्दी कविता
(१) पूर्वकालिक क्रिया मुख्य क्रिया है—
फिरि आवै, समझि परी, करि आई
उतरि गेला, मिलि रहिया, करि जानौ ।
(२) कियार्थक संज्ञा मुख्य क्रिया है—
खान लागो, सोवन लागा, सारन लागो । ऐस रूप केवल 'लगना' गौण क्रिया
के साथ ही मिलते हैं ।
(३) कृदन्तीय रूप मुख्य क्रिया है
घूमत आया, आवता देखी, सरज्यो जाई, लहरश जाई ।
नामदेव की हिंदी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव
नामदेव की हिंदी अन्य भाषाओं जैसे मराठी, गुजराती, पंजाबी, अरबी तथा
फारसी से प्रभावित है । यह उनकी घुमक्कड़ी वृत्ति का ही परिणाम है ।
मराठी उनकी मातृभाषा होने के कारण उसका प्रभाव उपरिलिखित अन्य
भाषाओं की अपेक्षा अधिक है । नामदेव की शब्द-संपत्ति तथा रचना विधान मराठी से
प्रभावित है ।
सबध कारक के कारक-चिन्हों तथा सर्वनामों के प्रयोग में गुजराती का प्रभाव
देखा जा सकता है ।
पंजाबी के प्रभाव के केवल दो ही उदाहरण मिलते हैं ।
[L
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २६७
अधिकरण कारक
अंतरि (१०२-३)—हृदय में
घरि (२६०-८)—घर में
जलि (१०१-२) जल मे
मुषि (६२-२)—मुख मे
हाथि (५७-४) हाथ में
(ब) भूतकालीन क्रियाओ पर मराठी का अधिक प्रभाव दिखाई देता है। मराठी
का भूतकालीन क्रिया का 'ला' प्रत्यय हिंदी की क्रिया को जोड़ दिया गया है—
अघाइला (४५-६) अघाना—तृप्त होना
आईला (३१-१) आना
उगिला (४६-६) उगना
गाइला (४५-१) गाना
घालिला (१६-६) जाना
छूटिला (५६-३) छूट जाना
जागीला (३१-२) जगाना
पोढिला (१६-८) लेटना
(क) पुरुष वाचक सर्वनामो पर भी मराठी का प्रभाव है। कुछ उदाहरण—
हमचो (६१-२) हमारी
तुमचो (६०-५) तुम्हारी
मुझा (५६-१०) मेरा
तुझा (५६-१०) तेरा
शब्द संपत्ति
नामदेव के हिंदी पदो में मराठी के शब्द पर्याप्त मात्रा मे पाये जाते हैं। कभी
अपने मूल रूप में तो कभी अपभ्रष्ट रूप मे। नामदेव की हिंदी पदावली में प्रयुक्त कुछ
मराठी शब्द यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं—
(१) बिरदु (१५५-१) ( <ब्रीद)
(२) मसीत (२०८-६) ( <म. मशीद, अ. मसजिद)
(३) जादवराइआ (२१६-३) (<यादवराय)
(४) कापरु (२१७-७) (<कापड) (कपडा)
(५) सगलकी (२२२-५) (<सगळ्यांची) (सबकी)
२३८ नामदेव की हिन्दी कविता
(६) सबदु (१६२-२) (<शब्द)
(७) सरब (१६२-२) (<सर्व)
(८) विखु (२१७-५) (<विष)
(६) छीपा (१५१-५) (<शिंपी (दर्जी) )
(१०) जनु (२००-६) (<जणु (मानो, गोया)
(११) मंजारी (४३-४) (<मांजर-बिल्ली)
(१२) आंब (६२-२) (<आंबा, आम आम्र)
(१३) कातो (१८-२) (<कात्री = कैंची)
(१४) गोवलि (१२०-३) (<गवली = ग्वाला)
(१५) ढाका (७२-२) (<डंका = डंका)
(१६) डाग (८१-४) (डहा = डंडा)
(१७) तंदुल (६१-१२) (<तांदुल = चावल)
(१८) पोते (८१-६) (<पोता-बोरा a sack)
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २३१
कूडै (२६-१) (कूडा=खोटा)
मोठा (४६-१) (मोठा=बड़ा)
शंभर (६४-५) (शंभर=सौ)
इकवीस (१२१-४) (एकवीस = इक्कीस)
क्रिया विशेषण
घाई (२२५-३) (घाई = जल्दबाजी)
कृदंत
ऊभी उभो (१०१-४) (उभी उभो=खड़े-खड़े)
गुजराती
नामदेव की हिंदी पर गुजराती का प्रभाव अपेक्षाकृत कम है। नीचे कुछ उदा-
हरण दिये जाते हैं—
गुजराती के संबंध कारक के कारक-चिन्ह
अंधियारानौ (११२-६) अँधेरे का
नामदेवनौ (१६६-७) नामदेव का
नामदेव ना स्वामी (५१-१०) नामदेव का स्वामी
पदनौ (११२-८) इस पद का
क्रियाएँ
जोइये (११२-६) (देखना द्वि० पु०)
जोवौ (१३६-५) (देखना द्वि० पु०)
सर्वनाम
जेन्है (१३६-२) जिसका
तेन्है (११२-८) उनका
म्हारौ (१३५-५) मेरी
परसर्ग
थाइं (१३६-५) से
नैहरौ (१३६-५) गुजराती का पुराना रूप
२४० नामदेव की हिन्दी कविता
पंजाबी
पंजाबी के केवल ये दो उदाहरण हैं—
मिलसी (१०१-१) 'मिलना' का भविष्यत् काल का रूप
मुनै (१०१ १) मुझे
अरबी और फारसी का प्रभाव
नामदेव की हिंदी में निम्नलिखित अरबी के शब्द मिलते हैं—
कलमा (६४-६) कलमा = प्रार्थना
अलह (६४-१०) अल्हा-परमात्मा
रोजा (६४-६) रोजा = व्रत, उपवास
कूं त मसाहति (२-८) तर्क वितर्क
फारसी के शब्द
आलम (१३१-३) विश्व
दुनी (१३१-३) दुनिया
अवदालव (६४-१) साधु, फकीर जैसा
इजार (६४-५) रस्सी, डोरी, नाड़ा
गुजार (६४-६) गुजारना = बीताना
ताज कुलह (६४-२) मुकुट और टोपी
निवाजी (६४-६) नमाज
पोस (६४-३) पोश = आवरण
मसीती (६४-६) मसजिद
मुलाना (६४-६) उपाध्याय
सहर (६४-८) शहर
सहनक (६०-४) थाली, प्लेट
बाँग (६४-६) बुलावा
खसम (७६-२) खसम = पति
साहिब (४१-१०) स्वामी
स्याही (७७-१) स्याही—
रूप रचना
रूप रचना की दृष्टि से नामदेव की हिंदी ब्रजभाषा के रूपों से बहुत साम्य
रखती है। सभी नव्य भारतीय आर्य भाषाओं की तरह इसमे भी दो वचन हैं। यद्यपि
नामदेव की रचनाओं का साहित्यिक मूल्यांकन २४१
अधिकतर संज्ञाओ का रूप दोनों वचनों में एक ही है किंतु तिर्यक् रूपों में बहुवचन का
निर्देश स्पष्ट रूप से प्राप्त होता है । जैसे—
वन्दहि, आंखिन, स्रवनहि आदि ।
करण कारक के रूपों में भी इसी प्रकार का संकेत है । जैसे—
भुवंगहि, भँवरहि, नैनौ, लोगनि, संवनि आदि ।
कुछ स्थानों पर बहुवचन प्रकट करने के लिए अनेकता सूचक शब्दो का प्रयोग
है । यथा—
अन्धा लोग, योगी जन आदि ।
अ, उ, ऊ, ओ ओर औ से अंत होने वाली संज्ञाएँ प्रायः पुल्लिंग हे तथा आ,
इ, ई से अन्त होने वाली संज्ञाएँ स्त्रीलिंग । इसमें कुछ अपवाद भी है ।
पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए इ या ई प्रत्यय जोड़े गये हैं । जैसे—
बेटा—पु० बेटी—स्त्री०
देव—पु० देवी—स्त्री०
भृङ्ग—पु० भृङ्गी—स्त्री०
कही-कही 'नी' प्रत्यय भी मिलता है—
जैसे नट—पु० नटनी—स्त्री०
[
२४२ नामदेव की हिन्दी कविता
भिक हिंदी की वियोगात्मक प्रवृत्ति का सूचक है। नामदेव की भाषा में निम्नलिखित
परसर्ग प्रयुक्त हुए हैं—
अन्तरि, आगे, आगै, काज, कारणि, तनि, नाई, निकटि, पर, विच, विचि,
बिन, बिना, भांति, भीतरि, मधि, मधै, महि, मझि, मारे, माहि, माही, रहित, रहिता,
लगि, लागि, लाग्यौ, स्वारथ, संगै, संगि, सनमुख, सहित, सहिता, सा, सी, से, सोह, सो,
हो, हेत।
संयुक्त परसर्ग—
के अन्तरि, के आगे, के निकटि, के मारे,
की नाई, कै संगि।
ध्वनि
नामदेव की हिंदी पदावली की भाषा में नव्य भारतीय आर्य भाषा की सभी
ध्वनियों का प्रयोग है, किन्तु अन्य भाषाओं की तरह 'ष' और 'ऋ' ध्वनि का प्रयोग
केवल परंपरागत है। उसका उच्चारण 'स' और 'रि' की तरह होता था। कुछ स्थानो
पर 'ष' के स्थान पर 'स' और 'ऋ' के स्थान पर 'रि' का प्रयोग भी मिलता है।
☐ ☐
षष्ठ अध्याय
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्य धारा के प्रारम्भकर्त्ता
हिंदी निर्गुण काव्य सम्बन्धी लेखन का परिचय
निर्गुण साहित्य सम्बन्धी आलोचनात्मक ग्रन्थ
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निर्गुण मत सम्बन्धी आलोचनात्मक लेख
संत मत के प्रारम्भकर्ता के रूप मे नामदेव के प्रति संकेत
नामदेव के निर्गुण धारा के प्रारम्भ कर्ता न माने जाने के कारण
(क) नामदेव की रचनाओं का हिंदी में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होना
(ख) कबीर का प्रखर व्यक्तित्व और उनके विचारों का प्रभाव,
कबीर को क्रांतिकारी बनाने वाली परिस्थितियां,
नामदेव और कबीर की रचनाओ की तुलना
(१) कर्म और वैराग्य का समन्वय
(२) भेदभाव विहीनता
(३) ब्रह्म की निर्गुणता
(४) अनन्य प्रेम भावना
(५) सर्वात्मवाद और अद्वैत भावना
(६) निर्गुण भक्ति
(७) नाम साधना
(८) सेव्य सेवक भाव
सन्त नामदेव का निर्गुण भक्ति की ओर झुकाव
आचार्य परशुराम चतुर्वेदीजी की बताई हुई निर्गुण सन्तों की रचनाओ
की विशेषताएं
नामदेव की रचनाओ से इन विशेषताओ के उदाहरण
नामदेव तथा कबीर का काल
डॉ० मोहनसिंह 'दीवाना' का मत
श्योर का काल निर्णय
डॉ० रामप्रसाद त्रिपाठी का मत
डॉ० राजनारायण मौर्य का मत
डॉ० रामकुमार वर्मा का मत
डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी का मत
निर्गुण पथ के प्रवर्त्तक नामदेव
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्य धारा के प्रारंभकर्त्ता
हिंदी निर्गुण काव्य सम्बन्धी लेखन का परिचय—हिंदी निर्गुण काव्य और
उसके रचयिताओं के बारे में लगभग चार सौ वर्षों से कुछ न कुछ लिखा जाता रहा है।
प्रारंभिक लेखन में 'भक्तमाल' और परिचर्या जैसी दूसरी रचनाओं का बहुत अधिक
महत्व है। नाभादास कृत 'भक्तमाल' इस परंपरा का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। इसमें १६ वीं
शताब्दी तक के लगभग सभी संतों और भक्तों के संबंध में कहा गया है। यह बात अवश्य
है कि इसमें संत साहित्य की समीक्षा न करके संतों के महत्व पर ही अधिक बल दिया
गया है। 'भक्तमाल' में लगभग सभी निर्गुण संतों के कार्य और महत्त्व के संबंध में लिखा
गया है। इसी तरह प्रियादास और रूपकला के भक्तमाल भी हैं।
भक्ति काल के संतों के महान् व्यक्तित्व और कल्याणकारी संदेशों से प्रभावित
होकर उनके अनुयायियों ने इनके चरित्र और व्यक्तित्व को जनता के मार्ग दर्शन के लिए
छन्दोबद्ध किया। संतों के जीवन-चरित्र समय-समय पर अनेक बार लिखे गये। ये
जीवन-चरित्र 'परिचर्या' के रूप में लिखे गये हैं। इनमें संतों के जीवन-चरित का परिचय
बड़े विस्तृत रूप में दिया गया है। संत काव्य में निम्नलिखित संतों की परिचर्यायें प्राप्त
होती हैं—
(१) कबीरजी की परचै
(२) नामदेवजी की परचै
(३) पीपाजी की परिचई
(४) त्रिलोचनजी की परचई
(५) रैदासजी की परचई
(६) मलूकदासजी की परचई
(७) जगजीवन साहब की परचई
(८) चरनदासजी की परचई
(६) दादू जनम लीला परची
(१०) रंका बंका की परचई
२४६ नामदेव की हिन्दी कविता
इनमें अनन्तदास कृत नामदेव की परिचयी महत्वपूर्ण है। प्राचीन संत कवियों के
संबंध में नाभादास का 'भक्तमाल' बहुत प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। अनन्तदास की
परिचयी इससे भी पूर्व की है। भक्तमाल के रचनाकाल के संबंध में पूर्ण मतैक्य नहीं
है। डॉ० दीनदयालु गुप्त ने इसका रचनाकाल सं० १६८० वि० माना है।१ अनन्त-
दास कृत नामदेव की परिचयी का रचनाकाल सं० १६४५ वि० है।२
(१) निर्गुण साहित्य सम्बन्धी आलोचनात्मक ग्रंथ—निर्गुण साहित्य संबंधी
विभिन्न भाषाओं में समीक्षात्मक ग्रंथ उपलब्ध होते हैं जिनका आधार लेकर कबीर की
विचार धारा स्पष्ट रूप से समझी जा सकती है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में भी एतद्-
विषयक निबन्ध प्रकाशित होते रहे हैं। जिन भाषाओं में निर्गुण साहित्य के ग्रंथ प्राप्त
होते हैं वे निम्नलिखित हैं—
(क) हिंदी में निर्गुण विचारधारा संबंधी आलोचनात्मक ग्रंथ
(ख) अंग्रेजी में निर्गुण विचार धारा संबंधी बालोचनात्मक ग्रंथ
(ग) उर्दू में निर्गुण विचार धारा संबंधी आलोचनात्मक ग्रंथ
(घ) विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निर्गुण मत संबंधी आलोचनात्मक
लेख।
(क) हिंदी आलोचनात्मक ग्रन्थ
अधिकतर ग्रन्थ कबीर पर लिखे गये हैं किन्तु उनके अन्तर्गत निर्गुण साहित्य का
पूरा विवेचन मिलता है। कबीर के अध्ययन का श्रीगणेश सन् १६०० ई० के लगभग
मानना होगा। हिंदी में ऐसी अनेक पुस्तकें प्राप्त होती हैं जिनमें किसी न किसी प्रकार
कबीर तथा निर्गुण पंथ की चर्चा की गई है। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण ग्रन्थों का बहुत ही
संक्षेप में परिचय दिया जा रहा है।
(१) कबीर मंसूर—कबीर पर सबसे पहली पुस्तक 'कबीर मंसूर' ई. स.
१६०२-३ में प्रकाशित हुई। साहित्य की दृष्टि से यह रचना साधारण कोटि की है किन्तु
कबीर पर प्रथम पुस्तक होने के कारण इसका महत्त्व बढ़ जाता है।
इसके पश्चात् 'कबीर ज्ञान' (ई. स. १६०४) 'कबीर साहब का जीवन चरित्र'
(ई. स १६०५) 'कबीर कसौटी' (ई. स. १६०६) आदि ग्रन्थ भी प्रकाशित हुए।
(२) कबीर वचनावली—इसका संपादन पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
१. अष्टछाप और वल्लभ संप्रदाय पृष्ठ १०६।
२. नामदेव की परिचयी (हस्तलिखित ग्रन्थ) क्रमांक ३६८।
—जयकर ग्रन्थालय, पूना विश्वविद्यालय, पूना।
तृतीय भाग: गुरुग्रन्थ साहिब संकलित ६१ पद एवं सन्त नामदेव उपसंहार
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २४७
ने संवत् १९७३ में किया 'हरिऔध' जी ने कबीर को साहित्यिक, सैद्धांतिक और जीवन
संबंधी बातों की चर्चा आलोचनात्मक ढंग से की है।
(३) कबीर ग्रंथावली—इसका संपादन डॉ० श्याम सुंदरदास ने संवत् १९८५
में किया। वे रामानंद को कबीर का मानस गुरु मानते हैं। उन्होंने कबीर के प्रेमतत्त्व
पर सूफियों का प्रभाव स्वीकार किया है। साथ ही यह भी कहा है कि उनमें भारतीयता
का पुट भी कम नहीं है। वे नामदेव के महत्व को स्वीकार करते हुए भी कबीर को
निर्गुण धारा का प्रवर्तक मानते हैं।१
(४) 'मिश्र बंधु 'विनोद'—मिश्र बंधुओं द्वारा लिखित 'मिश्र बंधु विनोद' सन्
१९१३ ई० (सं० १९७०) में प्रकाशित हुआ जिसमें कबीर के सम्बन्ध में विस्तृत
विवेचन किया गया है।
(५) हिंदी साहित्य का इतिहास—आचार्य शुक्ल का यह अद्वितीय ग्रन्थ सन्
१९२९ (संवत् १९८६) में प्रकाशित हुआ। वे मानते हैं कि निर्गुण पंथ के प्रवर्तक
कबीर ही थे।२
(६) कबीर—सन् १९४१ (संवत् १९९८) में डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी का
'कबीर' नामक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। कबीर साहित्य पर पड़े हुए विभिन्न प्रभावों और
कबीर के दार्शनिक विचारों पर प्रकाश डालना ही उनका प्रमुख लक्ष्य रहा है।
(७) उत्तरी भारत की सन्त परम्परा—संत साहित्य के मर्मज्ञ आचार्य पं०
परशुराम चतुर्वेदी का यह ग्रन्थ संवत् २००७ में प्रकाशित हुआ। इसमें लगभग २००
पृष्ठों में कबीर के जीवन, साहित्य, सिद्धांत और साधना के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से
विचार किया गया है। संत मत एवं इससे संबंधित पंथों का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के
लिए इसका अध्ययन महत्त्वपूर्ण है।
(८) हिंदी की निर्गुण काव्य धारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि—डॉ०
गोविंद त्रिगुणायत का यह आगरा युनिवर्सिटी द्वारा डी० लिट्० की उपाधि के लिए
स्वीकृत शोध प्रबन्ध है। इसका प्रथम संस्करण सं० १९६१ ई० में प्रकाशित हुआ।
इस ग्रन्थ में हिंदी की निर्गुण काव्यधारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का सांग,
१. 'कबीर इस निर्गुण भक्ति प्रवाह के प्रवर्तक हैं परंतु भक्त नामदेव इनसे भी पहले
हो गये थे; ये पहले सगुणोपासक थे परंतु आगे चलकर इनका झुकाव निर्गुण
भक्ति की ओर हो गया।'
—कबीर ग्रंथावली—भूमिका, पृष्ठ १५।
२. 'जहाँ तक पता चलता है निर्गुण मार्ग के निर्दिष्ट प्रवर्तक कबीर ही थे।'
—हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ ७२।
२४८ नामदेव की हिन्दी कविता
व्यवस्थित, पाण्डित्यपूर्ण और अनुसंधानात्मक विवेचन किया गया है। अब तक निर्गुण
विचार धारा और उसके मूल स्रोतों का अध्ययन उपेक्षित रहा। डॉ० त्रिगुणायत ने
प्रस्तुत ग्रंथ द्वारा इस अभाव की पूर्ति की है। इनके अनुसार निर्गुण काव्य धारा के
प्रवर्त्तक कबीर हैं।१
(६) हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास- डॉ० रामकुमार वर्मा का यह
इतिहास सन् १९३८ ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को
अपनी विशेष दृष्टि से देखने का प्रयत्न किया गया है। डॉ० वर्मा ने कबीर को संत मत
का प्रचारक माना है।२
(१०) हिंदी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय-डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल । रचना-
काल सन् १९३६ ई०। इस पुस्तक की मूल प्रति डॉक्टरेट की उपाधि के निमित्त
थीसिस के रूप में लिखी गई थी। इसमें निर्गुण कवियों का व्यवस्थित अध्ययन प्रस्तुत
किया गया है। पुस्तक अपने ढंग की अकेली है। मेरे विचार से निर्गुण काव्य के
सम्बन्ध में यह सर्वाधिक प्रामाणिक और अधिकारपूर्ण रचना है। इसके महत्त्व को
समझकर ही आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने सन् १६५० ई० (संवत् २००७) में मूल
अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद प्रकाशित कराया है।
यद्यपि इसके पूर्व भी हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थो और दूसरो रचनाओ में
निर्गुण साहित्य के बारे में चर्चा की गई है किन्तु जिस गम्भीरता और प्रामाणिकता के
साथ डॉ० बड़थ्वाल ने निर्गुण साहित्य पर लिखा है उतनी गंभीरता और प्रामाणिकता
अन्यत्र नहीं है। डॉ० बड़थ्वाल के पूर्व तक निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्त्तक संत कबीर
माने जाते रहे। यद्यपि आज भी निर्गुण काव्य धारा के प्रवर्त्तक रूप में कबीर को ही
मान्यता है किन्तु सम्भवतः डॉ० बड़थ्वाल पहले विद्वान् थे जिन्होंने निर्गुण काव्य धारा के
प्रवर्त्तक के रूप में नामदेव की ओर संकेत किया है।३ डॉ० बड़थ्वाल के बाद भी कबीर
१. निर्गुण काव्य धारा के प्रमुख प्रवर्त्तक संत कबीर माने जाते हैं।'
—हिन्दी की निर्गुण काव्य धारा और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि, पृ० १४।
२. 'इस मत ( संत मत ) के प्रचारक कबीर थे। उन्होंने उसको एक विशिष्ट रूप
दिया।'
— हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, पृ० ६३
३. 'निर्गुण संत विचार धारा को कबीर के द्वारा पूर्णता प्राप्त हुई।'
—हिन्दी काव्य में निर्गुण सम्प्रदाय, पृ० १४।
नामदेव : हिन्दी निर्गुण काव्यधारा के प्रारम्भकर्ता २४६
तथा निर्गुण काव्य धारा पर विचार करने वाले लोगो ने अधिकतर कबीर को ही
उसका प्रवर्तक माना है ।
कबीर सम्बन्धी उर्दू आलोचनात्मक ग्रन्थ
(१) 'सम्प्रदाय' ( रचना काल सन् १६०६ ई० )
लेखक: प्रोफेसर बी० बी० रॉय ।
(२) 'कबीर और उनकी तालीम' ( रचना काल सन् १६१२ ई० )
(३) 'कबीर पंथ ।'
इन दोनो ग्रन्थों के लेखक महर्षि शिवव्रतलाल हैं ।
(४) 'कबीर साहब' (रचना काल ई० स० १६३०)
लेखक : मनोहरलाल जुत्शी ।
ये सभी साधारण कोटि की पुस्तकें हैं । कबीर संबन्धी प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त
करने के लिए इनका महत्त्व अवश्य है ।
कबीर सम्बन्धी अंग्रेजी आलोचनात्मक ग्रन्थ
(१) प्रॉफिट्स ऑफ इंडिया:—सन् १६०४ ई० में श्री मन्मथनाथ गुप्त की इस
पुस्तक का उर्दू अनुवाद 'रहनुमायाने हिंद' बाबू नारायणप्रसाद वर्मा द्वारा अहमदी प्रेस
अलीगढ़ से प्रकाशित कराया गया है ।
इस ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद अंग्रेजी में कबीर सम्बन्धी जितनी भी पुस्तकें
प्रकाशित हुई है प्रायः सभी में 'प्रॉफिट्स ऑफ इंडिया' का किसी न किसी रूप में उपयोग
अवश्य किया गया है ।
(२) कबीर एण्ड कबीर पंथ—प्रकाशन काल सन् १६०७ ई० । इसके लेखक
रेह्वरंड जी० जी० एच० वेस्टकट है। इस पुस्तक से कबीर की विचार धारा के सम्बन्ध
में बहुत ज्ञात नही होता ।
(३) हंड्रेड पोएम्स ऑफ कबीर—कवीन्द्र रवीन्द्र ने सन् १६१५ में कबीर के
चुने हुए १०० पदों का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया । इसकी भूमिका अंग्रेजी की
प्रसिद्ध विदुषी ईवोलिन अंडरहिल ने लिखी है ।
(४) 'वैष्णविज्म शैविज्म ॲण्ड अदर मायनर रिलीजस सिस्टम्स'—डॉ०
रा० गो० भांडारकर ने अपनी इस पुस्तक में वैष्णव धर्म, शैव धर्म आदि विभिन्न
सम्प्रदायों के उदय और विकास का इतिहास प्रस्तुत किया है और प्रसंगवश रामानन्द
तथा कबीर की भी चर्चा की है । कबीर के जन्म और उनके दार्शनिक विचारों का विशेष
रूप से प्रतिपादन लेखक के मौलिक दृष्टिकोण का परिचायक है ।
२५० नामदेव की हिन्दी कविता
(५) कबीर अंड हिज फॉलोअर्स—डॉ० एफ० ई० की द्वारा लिखित यह शोध
प्रबन्ध ऑक्सफर्ड युनिव्हर्सिटी में डी० लिट्० की थीसिस के रूप में प्रस्तुत किया गया
था और स्वीकृत होकर सन् १६३१ में प्रकाशित हुआ । कबीर सम्बन्धी निर्णय में डॉ०
की ने वेस्टकाट की अपेक्षा उदारता का परिचय दिया है । उन्होंने कबीर के दार्शनिक
सिद्धान्तो एवं विचारो पर अधिक प्रकाश डालकर कबीर के जीवन वृत्त और कबीर पंथ
का ही खोजपूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया है ।
(६) दि निर्गुंण स्कूल ऑफ हिंदी पोएट्री—रचना काल सन् १६३६ ई० ।
लेखक डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल । इस पुस्तक का परिचय हिंदी के आलोचनात्मक
ग्रन्थो में दिया जा चुका है ।
पत्र-पत्रिकाएं
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त कबीर पर समय-समय पर विद्वत्तापूर्ण लेख लिखे गये
हैं । ये प्राय निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं—
(१) नागरी प्रचारिणी—इस पत्रिका के चौदहवें भाग में पंडित चन्द्रबली पाण्डेय
का 'कबीर का जीवन वृत्त' नामक निबन्ध छपा है और भाग १६ में डॉ० पीताम्बरदत्त
बड़थ्वाल ने कबीर का जीवन वृत्त प्रस्तुत किया है । इसी भाग में सूर्यकिरण पारीक का
'राजस्थानी हिंदी और कबीर' शीर्षक निबंध भी प्रकाशित हुआ है ।
(२) हिन्दुस्तानी—'हिन्दुस्तानी' भाग दो (अप्रैल १६३२) में डॉ० रामप्रसाद
त्रिपाठी का 'कबीर जी का समय' शीर्षक निबन्ध विशेष महत्त्वपूर्ण है जिसमें कबीर का
समय निश्चित करने का प्रयास किया गया है ।
इसी त्रैमासिक पत्रिका के भाग २३ अंक १ (जनवरी मार्च १६६२) में
डॉ० राजनारायण मौर्य का 'हिन्दी साहित्य में संत मत के आदि प्रवर्तक : संत नामदेव'
शीर्षक विद्वत्तापूर्ण लेख छपा है ।
(३) सम्मेलन पत्रिका—'सम्मेलन पत्रिका' भाग ५३, संख्या—१, २ (पौष-
ज्येष्ठ शक १८८६) में राममूर्ति त्रिपाठी का 'निर्गुंण मत के प्रवर्तक नामदेव या कबीर'
शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ है । उनके अनुसार निर्गुंण सम्प्रदाय के प्रवर्तन का श्रेय
कबीर को ही दिया जाना चाहिए ।
(४) कल्याण—'कल्याण' के 'योगांक' में आचार्य क्षितिमोहन सेन का 'कबीर
का योग वर्णन' नामक निबन्ध कबीर पर योगिक प्रभाव सिद्ध करने की दिशा में एक
स्तुत्य प्रयास है ।
(५) परिषद् निबन्धावली—इस पत्रिका के भाग २ में डॉ० सोमनाथ गुप्त का