रतिरहस्य: असली कोकशास्त्र (पण्डित कोक्कोक - कामकला, दाम्पत्य-जीवन एवं सम्पूर्ण रति-विज्ञान)
Rati Rahasya or Asli Koka Shastra of Kokkoka with Hindi Commentary
पण्डित कोक्कोक (भाषा टीकाकार: पण्डित कन्हैयालाल) द्वारा
८० असली कोकशास्त्र
यक्ष पुरुष
दयालु, गुणों की खान, दीन रक्षक, स्थूलोदर, मजबूत शरीर
वाला, जिसके जंघा और कण्ठ लाल हों, दृढ़मती, धनी, लाल वर्ण
नेत्र वाला, रज तम गुण से युक्त यक्ष पुरुष कहाता है ।
—०—
राक्षस पुरुष
भयङ्कर बड़ी-बड़ी आँखों वाला, लाल और श्याम वर्ण युक्त
कामी, क्रोधी, निर्दयी, लम्बे स्थूल अंग वाला, दुष्ट बुद्धि बिल्ली की
सी आँखों वाला, शराबी, अच्छे पुरुषों से द्वेष करने वाला तमो-
गुणी पुरुष राक्षस कहाता है ।
—०—
पिशाच पुरुष
क्रोधी, दयाहीन, पापकर्म करने वाला, क्रूर स्वभाव, बहुभोजी,
बकरी की गन्ध वाला, अतिशय मैला, कडुआ खट्टा पदार्थ चाहने
वाला, कौवे के समान शब्द करने वाला, विश्वासघाती, मन-मलीन
पुरुष, पिशाच-पुरुष कहाता है ।
—०—
६ असली कोकशास्त्र ८१
स्त्री भेद
पद्मिनी चित्रिणी चैव शंखिनी हस्तिनी तथा ।
चतस्रो जातयो नार्या रतौ ज्ञेया विशेषतः ॥
पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी और हस्तिनी ये चार जाति की
स्त्रियाँ होती हैं ।
पद्मिनी स्त्री
तिलकुसुमसमानां विभ्रती नासिकांच ।
द्विज-गुरुसुर-पूजां श्रद्दधानां सदैव ॥
कुवलयदलकान्तिः कापि चाम्पेयगौरी ।
विकचकमलकोशाकारकामातपत्रा ॥
तिल के फूल सदृश्य सुडौल तथा सुन्दर जिसकी नाक हो,
ब्राह्मण, गुरु, और देवताओं में जो हमेशा श्रद्धा रखती हो, कमल
के समान जिसकी शरीर-कान्ति हो, तथा चम्पा के फूल के समान
जिसका शुभ्र-वर्ण हो, वह पद्मिनी कहाती है ।
व्रजति मृदु सलीलं राजहंसी वतन्वी ।
त्रिवलिवलितमध्या हंस-वाणी सुवेशा ॥
८२ असली कोकशास्त्र
मृदुशुचिलघु भुङ्क्ते मानिनी गाढ़-लज्जा ।
धवल-कुसुम-वासा वल्लभा पद्मिनीस्यात् ॥
राज हंस के समान गति वाली, पतली कमर वाली, त्रिवली
युक्त हंस के तुल्य जिसकी वाणी हो, मुलायम, पवित्र, और स्वतंत्र
भोजन करने वाली, सफेद पुष्प और वस्त्रों को प्यार करने वाली
पद्मिनी कहाती है ।
अमल मुकुल मृद्वी फुल्लराजीवगन्धः ।
सुरतपयसि यस्या सौरभं दिव्यमङ्गे ॥
चकित-मृगदृशाभे प्रान्तरक्ते च नेत्रे ।
स्तनयुगलमनर्घ्यं श्रीफल श्रीविडम्बि ॥
कमल के समान कोमल अन्तःकरण वाली, पद्म गन्ध सदृश
गन्ध वाली हिरणी के समान सचकित नेत्र वाली, और जिसकी
दोनों आँखों के कोने लाल हों, तथा जिसके कुच-द्वय विल्व फल के
समान गोल और कठोर हों, ऐसे लक्षण युक्त स्त्री पद्मिनी होती है ।
कमल-नयन-युक्ता क्षुद्ररन्ध्रा च नासा ।
कृशतनु मृदुवाणी दीर्घ-केशी सुभाङ्गी ॥
परहित-मतियुक्ता पद्मगन्धा सुवेषा ।
अविरल कुचयुग्मा कीर्त्तिता पद्मिनी सा ॥
कमल सदृश विशाल नेत्र वाली, जिसके नाक के छेद छोटे
हों, केश लम्बे लम्बे, पतला शरीर, कोमल मृदुवाणी, सुन्दर सुडौल
असली कोकशास्त्र ८१
अंग वाली, परहित बुद्धि रखने वाली, पद्म गन्धा स्त्री पद्मिनी
कहाती है।
———❖———
चित्रिणी स्त्री
यस्या मनो न चलति कर्हिचित्त प्रलोभनैः ।
सत्यं प्रियञ्च वदति सर्वदा मिष्टभाषिणी ॥
दया क्षमावती या हि देवपूजा परायणा ।
पत्यौ परायणा या हि नेक्षते परपूरुषम् ॥
विप्रभक्ता च या नारी प्रीतास्यात् स्वल्प-मैथुने ।
सदा धर्मे मतिः यस्याश्चित्रिणी सा प्रकीर्त्तिता ॥
जिसका मन कभी प्रलोभनों में न फँसने वाला हो, जो हमेशा
प्रिय, मधुर, सत्य बोलने वाली हो, दया ओर क्षमा की साक्षात्
मूर्ति हो, देव और पति पूजा में तत्पर रहने वाली, परपुरुष को न
देखने वाली थोड़े मैथुन में तृप्त हो जाने वाली, हमेशा धर्म में मति
रखने वाली स्त्री चित्रिणी कहलाती है ।
मदनसदनमस्या वर्तूं लोच्छूनमन्त-
मृदुमदनजलाढ्यं रोमभिर्नातिसान्द्रैः ॥
प्रकृति चपलदृष्टिर्वाह्य सम्भोगरक्ता ।
रसयतिमधुराल्पं चित्रिणी चित्ररक्ता ॥
८४ असली कोकशास्त्र
दृष्टि चपला, आलिंगन, चुम्बनादि बाह्य सम्भोग रत, रंगीन
चित्र विचित्र वस्त्रों को धारण करने वाली, पुष्पमाला, आभूषणादि
विशेष चाहने वाली स्त्री चित्रणी कहलाती है ।
सुगतिरनतिदीर्घा नातिखर्वा कृशाङ्गी ।
स्तनजघन-विशाला काकजङ्घोन्नतोष्ठी ॥
मधु सुरभिरताम्बुः कम्बु-कण्ठी चकोर-
स्वरवचन विभागा नृत्यगीतादि विज्ञा ॥
समान कद वाली, जिसके कुच बड़े और जंघाएँ बड़ी होती हैं,
कौए के समान लम्बी जाँघ वाली, ऊँचे ओठ, कम्बु ग्रीवा, गायन
कलाओं के जानने वाली, सुन्दरी चित्रणी कहलाती है ।
कठिन घन कुचाढया नातिदीर्घा मनोज्ञा ।
रतिरस-गुणयुक्ता सुन्दरी नातिखर्वा ॥
कमलनयन युग्मा लोभहीना सुशीला ।
तिलकुसुम समानां नासिका चित्रिणी सा ॥
जिसके स्तन द्वय कठिन और मिले हुए हों, शरीर की लम्बाई
सामान्य हो, कमल सदृश नेत्र, लोभ रहित, तिल पुष्प के समान
नासिका, सुशील, रति गुण युक्त, नारी चित्रणी कहाती है ।
असली कोकशास्त्र ८५
शंखिनी स्त्री
दीर्घा सुदीर्घनयना वरसुन्दरी या कामोप-
भोगरसिका गुणशीलयुक्ता ।
रेखात्रयेण च विभूषितकण्ठदेशा सम्भोग-
केलिचतुरा किल शंखिनी सा ॥
विशाल नेत्रा, शारीरिक सब अंगों से सुन्दर, काम और उप-
भोग की महिमा को जानने वाली, शील गुण युक्त कण्ठ में तीन
रेखा वाली, लम्बी, सम्भोग में चतुरा स्त्री शंखिनी कहलाती है।
भवति कमलनेत्रा शीलयुक्ता च दीर्घा ।
कठिन घन कुचाढ्या शांखिनी क्षारगन्धा ॥
मधुर वचनयुक्ता कण्ठदेशे त्रिरेखाम्-
कथितमिदमशेषं लक्षणं शास्त्रयुक्तम् ॥
कमल के समान दोनों नेत्र वाली, लम्बी देह वाली, कठोर स्तन
वाली, मधुर भाषिणी, शील स्वभाव युक्ता, जिसकी देह से क्षार
गन्ध आती हो, तथा जिसके कण्ठ देश में तीन रेखायें पड़ी हों,
वह शंखिनी कहाती है।
तनुरतनुरपि स्याद्दीर्घ देहाऽङ्घ्रिमध्या ।
ह्यरुण कुसुमवासः काङ्क्षिणीकोपशीला ॥
अनिभृत शिरमंगे, दीर्घ निम्नंवहन्ती ।
स्मरगृहमतिलोम क्षारगन्धि स्मराम्बु ॥
८६ असली कोकशास्त्र
जिसके हाथ, पैर और शरीर के प्रत्येक अंग लम्बे मोटे और
पतले भी हों, लाल रंग के पुष्प और वस्त्र चाहती हो। क्रोधी स्वभाव
वाली, तथा असमान अंग वाली स्त्री शंखिनी कहलाती है ।
सृजति बहुनखांकं संप्रयोगे लघीयः ।
स्मरसलिलपृषत्का किंचिदुत्तप्तगात्री ॥
न लघु न बहु भोक्त्री प्रायशः पित्तलास्यात् ।
पिशुन मलिन चित्ता शङ्खिनी रासभोक्तिः ॥
जिसका शरीर कुछ गर्म हो, सामान्य खाने वाली, चुगलखोर
गर्दभ स्वर वाली, रति के समय बहुत नख गड़ाने वाली, स्वल्प
रज त्यागिनी, पित्त प्रकृति वाली स्त्री शंखिनी कहलाती है ।
—:*:—
हस्तिनी स्त्री
भवति मदन-दग्धा हस्तिनी स्थूल देहा ।
नयन-दहन-रक्ता मद्य गन्धाल्पकेशी ॥
कठिनन-कुचाढ्या नासिका स्थूल रन्ध्रा ।
पुलकित सकलांगी सर्वदा काम दग्धा ॥
हाथी के समान स्थूल देह वाली, मदमती, अग्नि सदृश रक्त
नेत्र वाली स्वल्प केशा, घन सदृश कठिन स्तन द्वय वाली, नाक
के स्थूल छिद्र वाली हमेशा मद गन्ध वाली, सदैव काम ताप से
पुलकित अंग वाली स्त्री हस्तिनी कहलाती है ।
ऽ)
Wait, Vasantatilaka begins with ऽ ऽ । ऽ.
Here:
"गलदतिविपुलोष्ठी दुःखसाध्या प्रयोगे"
ग-ल-द-ति (। । । ।) -> Aparavaktra?
No, it's:
न न र र?
Wait, whatever the meter, we are transcribing the exact printed text, not reconstructing the original meter!
Let's read line 17-21 carefully again:
Line 17:
"द्विगुण-कटुकषायप्रायभुग् वीतलज्जा ।"
Wait, notice the space between भुग् and वीतलज्जा: yes, there is a space.
Notice the hyphen after द्विगुण: "द्विगुण-".
Wait, look at भुग्: 'भु' followed by 'ग्' with halant/virama.
Line 18:
"ललदतिविपुलोष्ठी दुःखसाध्या प्रयोगे ॥"
Wait, is it "दुःखसाध्या" or "दुःख साध्या"?
There is a space: "दुःख साध्या" or "दुःखसाध्या"?
Look at 'दुःख' and 'साध्या': they are joined or spaced?
There is a small gap, let's look: "दुःख साध्या" - wait, there is a space between 'दुःख' and 'साध्या'. Look at line 18:
"ललदतिविपुलोष्ठी दुःख
८८ असली कोकशास्त्र
सम्भोग में अत्यन्त कठिनता से सन्तुष्ट होने वाली, जिसकी सम्पूर्ण
देह रोमों से भरी हो। गद्गद् सम्भाषिणी स्त्री हस्तिनी कहलाती है।
नारी गन्ध विचार
पद्मिनी पद्मगन्धा च मधुगन्धा च चित्रिणी ।
शङ्खिनी क्षारगन्धा स्यान्मद्यगन्धा च हस्तिनी ॥
पद्मिनी कमल की गन्ध वाली, चित्रणी शहद की गन्ध वाली
शंखिनी क्षार गन्ध वाली तथा मदिरा के समान गन्ध वाली स्त्री
हस्तिनी होती है ।
देव्यादि स्त्री भेद
देवीमप्सरसो यक्षकान्तां राक्षसकामिनीम् ।
कृत्यामिति जगुर्ना रीं युक्तां तैरेव नामभिः ॥
देवी, अप्सरा, यक्षिणी, राक्षसी और कृत्या आदि नारियें
अपने अपने लक्षणों वाली अपने अपने नाम को प्राप्त होती हैं ।
देवी स्त्री
सत्य प्रिय, ज्ञानी, दानी, सत्य और मधुर बोलने वाली, पवित्र
सुन्दर, कोमल अंग वाली, काम-क्रोध रहित, मधुर पदार्थ चाहने
असली कोकशास्त्र
चित्र नं० १
अश्व पुरुष
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असली कोकशास्त्र ८६
वाली, कान्तियुक्त लम्बी भुजा वाली, कमल समान नेत्र वाली,
सतोगुणी देवी स्त्री कहलाती है ।
—:❊:—
अप्सरा स्त्री
सुन्दर रूप, गायन प्रिय, मीठे खट्टे पदार्थों में रुचि रखनेवाली,
मृगनयनी, गन्धर्व-विद्यापरायणा, सत, रज, गुणयुक्ता स्त्री अप्सरा
कहलाती है ।
—:❊:—
यक्षिणी स्त्री
दयालु, गुणों की खान, दीन-रक्षिका, स्थूलोदरा, मजबूत शरीर
वाली, जिसकी जंघा और कण्ठ लाल हों, दृढ़मती, धनी, लाल
आँख वाली, रज, तम गुणों से युक्त स्त्री यक्षिणी कहलाती है ।
—:❊:—
राक्षसी स्त्री
भयंकर बड़ी बड़ी आँखों वाली, लाल और श्याम-वर्ण युक्त,
कामी, क्रोधी, निर्दयी, लम्बे स्थूल अंग वाली, दुष्ट बुद्धि, बिल्ली
की-सी आँखों वाली, शराबी, अच्छे मनुष्यों से द्वेष करने वाली
तमोगुणी स्त्री राक्षसी कहाती है ।
६० असली कोकशास्त्र
कृत्या स्त्री
क्रोधिनी, दयाहीना, पाप-कर्म करने वाली, क्रूर स्वभावा, बहु-
भोजी, बकरी की गन्ध वाली, अतिशय मैली, कडुवा, खट्टा पदार्थ
चाहने वाली, कौवे के समान शब्द करने वाली, विश्वासघातिनी
मन-मलीन स्त्री कृत्या कहाती है ।
—:०:—
स्त्रियों के त्रिगुणात्मक लक्षण
गूढास्थिग्रन्थिगुल्फा मृदुमधुरवचाः
श्लेष्मला पद्मभङ्गी,
व्यक्तास्थिग्रन्थिगुल्फा युवतिरशिशिरै
रङ्गकैः पित्तला स्यात् ।
रूक्षा शीतोष्णगात्री वदति बहुतरं
वातला श्लेष्मलापि,
स्यादुष्णा नव्यसूता शिशिरतरतनु
र्गर्भिणी पित्तलापि ॥
१—जिसके हड्डी में ही ग्रन्थी तथा गुल्मा छिपे हुए हों, सरल
मीठा बोलने वाली, कमल सदृश्य को
असली कोकशास्त्र ६१
२—जिसकी ग्रन्थी, गुल्म, हड्डी से बाहर दिखायी देते हों,
गरम अंग वाली, पित्त प्रकृतिका स्त्री कहलाती है ।
३—रूखे, उष्ण, शीतल, शरीर वाली, बहुभाषिणी स्त्री वात
प्रकृतिका कहाती है ।
—०—
स्त्रियों के त्रिगुणात्मक भेद से
तृप्ति लक्षण
अचिरलघुचिरोच्चैः कालभावावसानाः,
प्रमददहनगाढद्वारगुह्या क्रमेण ।
सततशिशिरकालोपेतहेमन्त वर्षा-
मधुषु निधुवनेच्छा संप्रदागे प्रदिष्टा ॥
१—कफ प्रकृति वाली नारी जल्दी तृप्त होनेवाली तथा बहुत
रज गिराने वाली होती है ।
२—पित्त प्रकृति वाली स्त्री कफ प्रकृति वाली से अधिक काल
में छूटने वाली तथा उसकी योनि गर्म होती है ।
३—वात प्रकृति वाली स्त्री सिकुड़ी हुई योनि वाली, तथा
बहुत देर में बहने वाली होती है ।
कफ प्रकृति वाली शिशिर और वसन्त में, पित्त प्रकृति वाली
वर्षा और शरद में वात प्रकृति वाली वसन्त और ग्रीष्म में सम्भोग
में हितकर होती हैं ।
६२ असली कोकशास्त्र
देवसत्वा स्त्री
सुरभिशुचिशरीर-सुप्रसन्नानना च ।
प्रचुरधनजनाढ्यां भामिनी देवसत्वा ॥
सुगन्धि से पवित्र देह वाली, सुप्रसन्नमुखी, धन-धान्य सम्पन्ना,
बड़े कुटुम्ब वाली, देव स्वभाव वाली स्त्री देवसत्वा कहलाती है ।
—०—
यक्षसत्वा स्त्री
व्यपगतगुरुलज्जोद्यानपानार्णवाद्रौ ।
स्पृहन्ति रातिसिद्धयै रोक्षणा यक्ष सत्वा ॥
माता, पिता और गुरुजनों के सम्मुख निर्लज्जता पूर्वक बर्तने
वाली, समुद्र, पर्वत और वनादि स्थानों में सम्भोग चाहने वाली,
क्रोधयुक्ता स्त्री यक्षसत्वा कहलाती है ।
—०—
मनुष्य सत्वा स्त्री
भवति सरलचित्ता दक्षिणातिथिषुरक्ता ।
स्फुटमिहनरसत्वा खिद्यते नोपवासैः ॥
सरल स्वभाव वाली, चतुरा, अतिथि-पूजिका, उपवास न
चाहने वाली, स्त्री मनुष्यसत्वा कहलाती है ।
—०—
असली कोकशास्त्र ६३
नागसत्वा स्त्री
श्वसिति बहुतरं या जृम्भते भ्रन्तिशीला ।
स्वापितसततमेव व्याकुला नागसत्वा ॥
सुशीतल श्वास लेने वाली, अधिक घूमने वाली, जम्भाई और
अंगड़ाई लेने वाली, अधिक काल तक सोने वाली, सर्प की भाँति
चंचल स्वभाव वाली स्त्री नागसत्वा कहलाती है ।
गन्धर्वसत्वा स्त्री
अपेतरुषोज्ज्वलदीप्तिवेषांस्रग्गन्धधूपादिषुबद्धरागाम्
सङ्गीतलीलाकुशलां कलज्ञांगन्धर्वसत्वां युवतींवदन्ती
क्रोधयुक्ता, स्वच्छ वस्त्र धारिणी, सुगन्धित पुष्पमाला धारिणी,
वेष-भूषा चाहने वाली, गाने बजाने में कुशल, अनेक तरह की कला
जानने वाली स्त्री गन्धर्व सत्वा कहलाती है ।
पिशाचसत्वा स्त्री
मनोजिह्मनाऽतिब हुभुक् प्रकटोष्णगात्री ।
भुङ्क्ते च मद्य पललादि पिशाच सत्वा ॥
निराभिमानिनी अनेक तरह के बहुत पदार्थ खाने वाली, तथा
गर्म शरीर वाली, मांस और शराब में विशेष रुचि रखनेवाली स्त्री
पिशाच सत्वा कहलाती है ।
६४ असली कोकशास्त्र
काकसत्वा स्त्री
दृष्टिं मुहुर्भ्रमयति प्रबलाशनात्ति ।
रुद्धं गमेति विपुलां किल काक सत्वा ॥
इधर-उधर बार बार देखने वाली, अधिक घूमने वाली, सर्वदा
कौए के समान क्षुधातुर रहने वाली स्त्री काकसत्वा कहलाती है ।
-:०:-
बानरसत्वा स्त्री
उद्भ्रान्तदृक्करजदन्तरणप्रसक्ता ।
स्याद्वानरप्रकृतिरस्थिरचित्तवृत्तिः ॥
जिसकी दृष्टि पागल की भांति चंचल हो, जिसके दाँत और
नख तीखे हों, वह बानर के समान चंचल स्वभाव वाली स्त्री
बानरसत्वा कहलाती है ।
-:०:-
गर्दभसत्वा स्त्री
या दृष्टविप्रियवचोरचना च नारी ।
रक्त विटप प्रहरणे खर सात्विका सा ॥
व्यर्थ बकवाद करने वाली, कामुकी, बुद्धिहीना गर्दभ के समान
स्वभाव वाली स्त्री गर्दभसत्वा कहलाती है ।
असली कोकशास्त्र ६५
योग्यायोग्य जोडे
सामान्ये नरनारीणां गर्भाधानं च जायते ।
हीनाधिक्येऽप्रजत्वं च कृशत्वं च परस्पस्परात् ॥
समान बल और क्रिया वाले स्त्री पुरुषों का संयोग उत्तम
सन्तान उत्पन्न कर सकता है। हीन बल क्रिया वालों का संयोग
गुण हीन, बल हीन, रोगी, अल्पायु सन्तान उत्पन्न करने वाला
होता है । इस लिए चाहिए कि शास्त्र मदानुसार जैसे स्त्री पुरुषों
का मिलन कहा गया है, वैसों का ही संयोग मिलाना चाहिए ।
कौन स्त्री किस पुरुष से सन्तुष्ट होकर सुखी होती है अब यह
बतलाया जाता है ।
शशकं पद्मिनी तुष्टा चित्रिणी रमते मृगम् ।
वृषभं शंखिनी तुष्टा हस्तिनी रमते हयम् ॥
शशक लक्षण-युक्त पुरुष पद्मिनी लक्षण वाली स्त्री से सन्तुष्ट
होता है तथा पद्मिनी शशक से । चित्रिणी मृग परस्पर एक दूसरे
से सुखी होते हैं । वृषभ संज्ञक पुरुष शंखिनी और हय-संज्ञक
हस्तिनी से सन्तुष्ट होते हैं । इस लिए इनका जोड़ा बुद्धिमानों को
मिलाना चाहिए । विपरीत योग मिलाने से हानि होती है ।
पद्मिनी मृग योग
मृग संज्ञक पुरुष के साथ यदि पद्मिनी का योग मिला दिया
जाय तो उससे उत्पन्न पुत्र बलवान होगा किन्तु पूर्ण सुखी न
६६ असली कोकशास्त्र
होकर दुखी भी होगा । यदि पुत्री होगी तो धन-हीन और अल्पायु
होगी ।
पद्मिनी वृषभ योग
वृषभ संज्ञक पुरुष से पद्मिनी का संयोग होने पर जो पुत्र पैदा
होगा वह बैल के समान परिश्रमी और दुराचार युक्त होगा, यदि
पुत्री होगी तो कुलटा, व्यभिचारिणी होगी ।
पद्मिनी अश्व योग
यदि पद्मिनी का अश्वसंज्ञक पुरुष से योग होगा तो उनका
पुत्र रोगी या नपुंसक होगा और यदि कन्या होगी तो सती, पति-
परायणा, बुद्धिमती, सुलक्षण होगी ।
चित्रिणी शशक योग
शशक और चित्रिणी के संयोग से उत्पन्न पुत्र सुशील सुन्दर
स्वभाव वाला होते हुए भी अल्पायु होगा । किन्तु पुत्री पर-पुरुष-
गामिनी और दुःख भोगने वाली होगी ।
चित्रिणी वृषभ योग
वृषभ और चित्रिणी के संयोग से उत्पन्न सन्तान बचपन में
ही मरने वाली होती है अथवा गर्भ में ही मर जाती है ।
७ असली कोकशास्त्र ६७
चित्रिणी अश्व योग
अश्व संज्ञक पुरुष के साथ चित्रिणी का संयोग होने से अल्प-
काल जीनेवाला पुत्र उत्पन्न होता है और पुत्री एकाक्षिणी (कानी)
होती है तथा उसका रंग श्वेत होता है ।
शंखिनी शशक योग
शशक संज्ञक पुरुष का शंखिनी के साथ योग होने पर जो पुत्र
पैदा होता है वह धर्मात्मा और सत्य-प्रिय होता है किन्तु कन्या
बड़ी आयु वाली होकर भी क्रोधिनी होती है ।
शंखिनी मृग योग
मृग संज्ञक पुरुष के योग से शंखिनी में उत्पन्न होने वाला पुत्र
दयालु सर्व-प्रिय होता है ओर कन्या भी अति सुन्दरी और कुटुम्ब
वाली होती है ।
शंखिनी अश्व योग
अश्व पुरुष का शंखिनी से योग होने पर पुत्र दुर्बल-बुद्धि
कमजोर और जन्मान्ध होता है। कन्या पति प्राणहारिणी, निर्लज्ज
और व्यभिचारिणी होती है ।