रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० रसिकप्रिया
खेल को खेल ( आरोपित या असत् व्यापार ) नहीं रहने दिया, वास्तविक
कर दिया ।
अलंकार—द्वितीय पर्यायोक्ति, उपमा ।
सहेली के घर को मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६६) नैनिन के तारनि में राखौ प्यारे पूतरी कै,
मुरली ज्यों लाइ राखौ दसन-बसन में ।
राखौ भुजबीच बनमाली बनमाला करि
चंदन ज्यों चतुर चढ़ाइ राखौ तन में ।
केसौराइ कलकंठ राखौ बलि कठुला कै,
करम करम क्योंहूँ आनी है भवन में ।
चंपक-कली ज्यों कान्ह सूँघि सूँघि देवता ज्यों,
लेहु मेरे लाल, इन्हें मेलि राखौ मन में ।२७।
शब्दार्थ—तारनि = तारों में । पूतरी = आँख की पुतली । ज्यों=तरह ।
लाइ = लाकर । लाइ राखौ = ला रखो, लगा रखो । दसन-बसन = दाँत का
वस्त्र, अधर, ओठ । बनमाली = श्रीकृष्ण । बनमाला = घुटनों तक या
पैरों तक लंबी माला । चतुर = हे चतुर । कलकंठ = सुंदर कंठवाली, मधुर
वाणी बोलनेवाली । कठुला = गले का हार । करम करम = क्रम क्रम से
धीरे धीरे सिखा-पढ़ाकर । आनी है भवन में = इन्हें घर तक ले आई हूँ ।
क्योंहूँ = किसी प्रकार । देवता = देवी । लाल = श्रीकृष्णलाल । मेलि राखौ =
धारण कर लो ।
अलंकार—उपमा ।
धाइ के घर का मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६७) हँसत खेलत खेल मंद भई चंददुति,
कहत कहानी और बूझत पहेली-जाल ।
केसौदास नींदबस अपने अपने घर,
हरैं हरैं उठि गए बालिका सकल बाल ।
घोरि उठे गगन सघन घन चहूँ दिसि,
उठि चले कान्ह धाइ बोलि उठी तिहि काल ।
आधी रात्रि अधिक अँध्यारे माँझ जैहौ कहाँ,
राधिका की आधी सेज सोइ रहौ प्यारे लाल ।२८।
२७—केसौराइ-केसोदास । कलकंठ०--गल मेलि राखो कलकंठी कंठा कल
कठुला कै । बलि-करि, कुल । क्योंहूँ--केहूँ । सूँघि०-सोंधी सूंधी, सोंधी सूची ।
ज्यों-सी । २८-खेलत०-खेलत माँझ । घोर-अरु । बस-सिसु । घर--घरै,। गए--
गई । बालिका-ग्वालिका । अँध्यारे-अँधेरी । सोइ-पौढ़ि । प्यारे लाल-नंदलाल ।