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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 286 में से

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पृष्ठ 116

११८ रसिकप्रिया
कान्ह-तिहारियै आन कियें कहौं लाज सों नीको ह्वै नातोई टूट्यो ।
छाँड्यो सबै हम हेरि तुम्हें तुम पै तनकौ कपटौ नहिं छूट्यो ।२१।
शब्दार्थ—जाति भई = नष्ट हो गई । खूट्यो = कम हो गया , पुन्य =
पुन्य का घड़ा । आन = शपथ । नीके ह्वै = भली भाँति । हेरि = देखकर ।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति) मेरी कीर्ति (आपके प्रेम के कारण)
गई (नष्ट हो गई) और अपने साथ ही मेरी जाति भी लेती गई (जात-बिरा-
दरी से भी पृथक् कर दी गई, अपकीर्ति हुई सो तो हुई ही) । कुल (कुटुंब)
से प्रेम कम हो गया, क्षीण हो गया । गुण, सौंदर्य और यौवन का भी गर्व
चला गया (मैंने इनका तो गर्व भी नहीं किया) । क्षणक्षण पुण्य का घड़ा
भी फूटता ही गया अर्थात् सुख नहीं रहा । हे कान्ह, आपकी शपथ करके
कहती हूँ कि लज्जा से तो बना बनाया नाता ही टूट गया (मैंने लज्जा भी
छोड़ी) । क्या कहूँ, तुम्हें देखकर (तुम पर मुग्ध होकर) मैंने तो सब कुछ
छोड़ दिया, पर तुमसे कुछ भी छोड़ा नहीं गया, यहाँ तक कि थोड़ा सा भी
कपट तुमने नहीं छोड़ा (आप अब भी अन्य स्त्रियों के यहाँ जाते हैं और
मुझसे कपट करके) ।
(दोहा)
(१६१) अधिक अनूढ़ा लाज तें, पिय पै जाइ न आप ।
क्योंहूँ करि सखियै कहै, ताके उर की ताप ।२२।
शब्दार्थ—आप = स्वयम् । क्योंहूँ करि = किसी प्रकार । सखियै = सखी
ही । ताप = गरमी, संताप ।
यथा—(सवैया)
(१६२) जानै को केसव कौने कह्यो कब कान्ह हमारे हिंडोरनि भूलै ।
पान न खाइ, न पान्यो पियै तब तें भरि लोचन लेत समूलै ।
जाहु नहीं चलि बेगि बलाइ ल्यौं लेहु सकेलि कहा यह भूलै ।
जानत हौ वह काम-कली कुँ भिलाई गएँ बहुरयौ फिरि फूलै ?२३।
भावार्थ—(सखी-वचन नायक से) हे कान्ह, न जाने कब किसने उससे
कह दिया है कि कान्ह हमारे भूले पर भूलते हैं । (तभी से) न वह पान
खाती है न पानी पीती है। वह लोचनों को समूल (जड़ से, भली भाँति आँसू
से) भर लेती है। मैं आपकी बला लेती हूँ आप शीघ्र ही उसके पास चले
क्यों नहीं जाते ? उसके निकट जाने में देर करना आपकी भूल है, ऐसा करके
२१—सों-मों । खूट्यो-फूट्यो, झुट्यो । गुन-पुनि । पुन्य०-सो तो सबै ।
फुट्यो-खूट्यो। निहारियै-तिहारि ही । कहौं--कहूँ । नीको-नीके, नीक । ह्वै-ही ।
२२—क्यों हूँ०-कैहूँ करि । उर-तन । २३—पान्यो-पानी । लोचन०—
अखियो लेति । लेउ-लैहो ।