रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम प्रभाव ११६
आप क्या बटोर लेंगे ? (आपके न जाने) मेरी समझ में यदि कहीं वह काम-
देव की कली कुँम्हला गई तो फिर क्या फूलेगी ? ( कदापि नहीं ) ।
अथ प्रथम-मिलनस्थान-वर्णन—( दोहा )
(१६३) जनी सहेली धाइ घर, सूने घर निसि चार ।
अति भय उत्सव व्याधि मिस न्यौते सु बन-बिहार ।२४।
शब्दार्थ—जनी = दासी । चार = चलना, घूमना । निसि०=रात में
भ्रमण । ब्याधि = रोग ।
( दोहा )
(१६४) इन ठौरनि ही होत है, प्रथम मिलन संसार ।
केसव राजा रंक को, रचि राखे करतार ।२५।
जनी के घर को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१६५) बेषु कै कुमारिका को ब्रज की कुमारिकानि,
माँझ साँझ केसौदास त्रास पग पेलिकै ।
काम की लता सी चपला सी प्रेम पासी सी है,
राधिका के बुद्धिबल कंठ भुज मेलिकै ।
दौरि दौरि दुरि दुरि पूरि पूरि अभिलाष,
भाँति भाँति के अनूप-रूप बहु केलि कै ।
जनी के अजिर आज रजनो में सजनी री,
साँची करी स्याम चोरमिहचनी खेलिकै ।२६।
शब्दार्थ—त्रास पग पेलिकै = भय को पैरों से दबाकर, निर्भय होकर ।
चपला = बिजली । प्रेमपासी सी=प्रेम के फंदे की भाँति । मेलिकै = डाल
कर । दुरि दुरि=छिप छिपकर । बहु केलि कै = अनेक क्रीड़ा करके । जनी =
दासी । अजिर = आंगन । चोरमिहचनी खेलिकै = आँखमिचौली खेलकर ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, आज कृष्ण ने स्वयम्
कुमारी का वेश बनाया और संध्या-समय निर्भय होकर ब्रज कुमारियों में जा
मिले । उन्होंने बुद्धि के कौशल द्वारा काम की लता, बिजली एवम् प्रेमपाश
स्वरूप सुंदरी राधिका के गलबाँही डाल दी । आँखमिचौली खेल के बहाने
दौड़ दौड़कर छिप छिपकर और इस प्रकार अभिलाषों की पूति करते हुए
उन्होंने लाखों प्रकार की अद्वितीय कामक्रीड़ा की। (चोर बने हुए) श्रीकृष्णजी
ने, दासी के आंगन में आज रात्रि को ( इस रीति से ) आँखमिचौली के
२४—सूने घर-घरनि संचार । सु बन-बिपिन । २५-इन०-इनहीं
ठौरनि । राखे-राखो । २६—चपला सो०-चल प्रेमपास सी अमल । भाँति
भाँति०-लाख भाँति । करी-कीन्ही ।