रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
( १२ )
ये स्थायीभाव नौ हैं—रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, घृणा, विस्मय और
निर्वेद । इनके कारण को विभाव कहते हैं, जिसके दो भेद हैं—आलम्बन और
उद्दीपन । यथा—शृङ्गार रस में शकुन्तलादि आलम्बन और एकान्तस्थानादि उद्दीपन
हैं । यद्यपि विभाव स्थायिभाव के उत्पादक नहीं होते हैं, वे ( स्थायी ) तो सहृदयहृदय
में वासनारूप से सूक्ष्म आकार में पहले ही से रहते हैं । विभाव तो उनका विकास
मात्र करता है, तथापि लौकिक विभाव के उत्पादक रहने के कारण अलौकिक
( शास्त्रनिष्ठ ) विभाव को भी वैसा कहना अनुचित न होगा, क्योंकि अविकसित
वस्तु प्रतितियोग्य न रहने के कारण अनुत्पन्न कोटि में ही रहती है ।
सच तो यह है कि लौकिक रत्यादि स्थायीभावों का शकुन्तलादि विभाव
उत्पादक होते हैं, पर काव्यारूढ़ होने पर वे ही अलौकिक विभाव बनकर रसास्वाद के
अवसर पर रस से एकीभाव को प्राप्त करते हैं । यह भी ज्ञातव्य है कि स्थायीभाव
और रस में तादात्म्य रहने के कारण स्थायीभाव के आलम्बन और उद्दीपन ही रम के
भी आलम्बन एवं उद्दीपन होते हैं ।
स्थायीभाव के कार्य को अनुभाव कहते हैं, जो आलम्बन पर आश्रित बाह्य रूप
से प्रकटित होता रहे । जैसे अग्नि धूम को प्रकाशित करता है । यह काव्य में निबद्ध
रहने के कारण अलौकिक होता है । सात्त्विक भाव भी अनुभाव के ही अन्तर्गत आते
हैं । जो विभाव से भी विलक्षणरूप से जल में बुद्बुद के समान प्रकाशित हो तथा कभी
स्थायीभाव में ही विलीन हो जाय—ऐसे रसोपकारक क्षणिक भाव को व्यभिचारीभाव
कहते हैं । निर्वेदादि ३३ व्यभिचारीभाव कहे गये हैं । स्थायीभाव भी अपरिपुष्ट रहने
पर रसान्तर के उपकारक होकर व्यभिचारीभाव कहलाते हैं । सभी भावों में स्थायी-
भाव प्रधान होता है । उक्त नौ स्थायीभाव शृङ्गारादि नौ रसों में परिणत होते हैं ।
रसानुभूति के विषय में सर्वप्राचीन उल्लेख भरतनाट्यशास्त्र का रससूत्र है—
“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः”—उपर्युक्त दोनों विभाव, अनुभाव
और व्यभिचारिभाव के संयोग से रस की प्रतीति होती है । इस सूत्र की व्याख्या चार
प्रकार की उपलब्ध होती हैं, जो रसस्वरूप के चार सिद्धान्त बने हुए हैं—लोल्लट का
उत्पत्तिवाद, शङ्कुक का अनुमितिवाद, भट्टनायक का भुक्तिवाद और अभिनवगुप्त का
अभिव्यक्तिवाद । इसके अतिरिक्त रस के विषय में पण्डितराज जगन्नाथ ने सात मतों
को प्रस्तुत किया है—( १ ) नव्यमत ( अनिर्वचनीयतावाद ), ( २ ) भावना के
माहात्म्य से मानस बोध ( भ्रमवाद ), ( ३ ) भाव्यमान विभाव ही रस है, ( ४ ) वैसा
अनुभाव, ( ५ ) वैसा व्यभिचारीभाव, ( ६ ) वैसे विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी-
भाव मिलितरूप में और ( ७ ) इनमें से जिस पर चमत्कार रहे वही ।
( १३ )
इनमें जिस लक्षण में विभावादि तीनों नहीं ( केवल एक ही ) हैं, वह भरत के
रससूत्र से विरुद्ध होने से परम्परा-विरुद्ध है । वे हैं केवल विभाव, केवल अनुभाव और
केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने वाले लक्षण । परन्तु इनमें भी अन्य का आक्षेप-
लभ्य रहना तो निश्चित ही है । अतः आक्षेपलभ्य के द्वारा ही रससूत्र का संगमन
कर लेते हैं ।
आचार्य मदनमोहन झा ने विकासवादी क्रम से इन वादों को कालक्रम
( प्राचीनतानुसार ) इस प्रकार वर्णित किया है—( १ ) विभाव ही रस है, ( २ )
अनुभाव, ( ३ ) व्यभिचारिभाव, ( ४ ) तीनों के रहने पर जिसमें चमत्कार हो वही
रस है, ( ५ ) तीनों ही रस हैं, ( ६ ) रससूत्र के अनुसार उत्पत्तिवाद, ( ७ )
अनुमितिवाद, ( ८ ) भुक्तिवाद, ( ९ ) अभिव्यक्तिवाद, ( १० ) नव्यमत ( अनिर्वच-
नीयता ) और ( ११ ) भ्रमवाद ।
परन्तु यह मत उपयुक्त तब होता, यदि किसी प्राचीन ग्रन्थ में इनका उल्लेख
होता । भरत से पहले पाँच मत थे, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसका उल्लेख सर्वप्रथम
जगन्नाथ ने ही किया है । अतः ये मत या तो उनके स्वयं उद्भावित हैं या उनके समय
में चल पड़े थे ।
पण्डितराज ने जो इन मतों का क्रम रखा है, उसमें सर्वप्रथम अपना मत, जो
मान्य आचार्य अभिनवगुप्त का है, को रखा है; उसके बाद अन्य मतों का प्रतिपादन भर
उन्हें अभिप्रेत है, खण्डन नहीं, क्योंकि सिद्धान्त से पृथक् अन्य मत स्वतः उपेक्षणीय हो
जाते हैं । जो कोई “नव्यास्तु”¹ से कथित मत को इनका अपना मत कहते हैं, उन्हें
समझना चाहिए कि सिद्धान्त आदि या अन्त में ही रखा जाता है । आदि में सिद्धान्त
देकर उस पर आचार्य अभिनवगुप्त की सम्मति दिखाने से ही उसे निर्णय की पदवी
मिल जाती है ।
यह भी ज्ञातव्य है कि रसनिरूपण के प्रथम पक्ष में ही पण्डितराज ने जो
“भावना-विशेषमहिम्ना” विशेषण दिया है, वह किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में न होने
१. शकुन्तलाविषयिणी रति का सम्बन्ध सहृदय से न रहने के कारण उन्हें
आस्वाद कैसे हो, इस हेतु 'साधारणीकरण' व्यापार मानकर सहृदय के
हृदय में उस रति को प्रविष्ट कराते हैं । पण्डितराज का कथन है कि ये
सब काव्यार्थभावना की ही महिमा से होते हैं, तो फिर हम केवल उसी
'भावना' से शकुन्तलारति को साक्षात् ही सामाजिक में आरोपित कर
क्यों न काम चला लें ? इस हेतु साधारणीकरण व्यापार क्यों मानें ? यही
इनके मत का बीज है ।
२ भू०
( १४ )
से इनके मस्तिष्क की उपज है और यह विशेषण इनके द्वारा प्रथमतः प्रतिपादित अन्य
सातों मतों में भी निविष्ट है। इस नवीन उद्भावना को इन्होंने अपने काव्यलक्षण के
परिष्कार में भी दिया है—"कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः पुनः पुनरनु-
सन्धानात्मा", "चमत्कारजनकभावनाविषयार्थप्रतिपादकशब्दत्वम्"। इस तरह रस-
स्वरूपनिरूपण में "भावनाविशेष" पण्डितराज की अपनी चीज है, जैसा कि इसकी
व्याख्या करते हुए महावैयाकरण दीनबन्धु झा ने लिखा है१—"भावनाविशेषमहिम्ना =
ज्ञानविशेष-सामर्थ्येन, एतेन साधारणीकरणाय व्यापारान्तरकरणमनावश्यकमिति सूचितं
भवति । इदमेव ग्रन्थकृन्मते रसस्वरूपं प्रकाशाद् विशेषश्च"—"पुनः पुनः अनुसन्धानात्मक
ज्ञानविशेष के सामर्थ्य से' इसी विशेषण से सूचित होता है कि साधारणीकरण के लिए
व्यञ्जना या भावकत्व-भोजकत्वव्यापार आदि मानना अनावश्यक हो जाता है और यही
ग्रन्थकार जगन्नाथ के मत से रस का स्वरूप है तथा काव्यप्रकाश से विलक्षण है।
अतः विद्वानों का मत है कि अपनी प्रतिभा से पण्डितराज ने ही सभी मतों की
उद्भावना की है। इनमें कतिपय तो रससूत्र के विरुद्ध होने से और शेष कल्पनामात्र
सिद्ध२ ( अव्यावहारिक ) होने से साहित्यशास्त्रीय विद्वानों को ग्राह्य नहीं हैं। केवल
दार्शनिक दृष्टि से चिन्तित 'नव्यास्तु' मत किसी साहित्यिक के लिए उपयुक्त नहीं हो
सकता। अतः समालोचक इन मतों की उपेक्षा करते आये हैं और स्वयं ग्रन्थकार ने भी
नवीन प्रकार प्रदर्शित करने के कौतूहल से ही इन्हें ग्रन्थ में निविष्ट किया है, सिद्धान्त
नहीं माना है।
रस-विषयक सिद्धान्त मत—
सहृदय के हृदय में वासणारूपेण सदा से स्थित ( नित्य ) रत्यादि स्थायीभाव
ही बाह्य विभावानुभावव्यभिचारिभावों के व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव सम्बन्ध से साधारणरूप
में अनुभूयमान होते हुए अलौकिक आस्वादपदवी को प्राप्त कर रस कहलाता है—यह
परमाचार्य अभिनवगुप्त के मत का सारांश है। पण्डितराज का प्रथम सिद्धान्त इसी की
व्याख्या है। वे व्याख्या द्वारा निम्नांकित कथ्य को व्यक्त करते हैं—
(१) जब विभावादि अनुकूल वर्णों से युक्त चमत्कृत काव्य में निविष्ट रहता है।
(२) यह काव्य सहृदय के हृदय में प्रविष्ट कर गया होता है।
(३) सहृदय बार-बार अनुसन्धान करते हुए विभावादिकों को साधारणीकृत
कर लेते हैं।
१. रसगङ्गाधरीय-रसस्वरूपनिरूपणव्याख्या—'रसिकमनोरञ्जिनी' ग्रन्थ के
परिशिष्ट में—नाग प्रकाशक, दिल्ली—१९९५ ई० ।
२. मैथिलीकाव्यविवेक, पृ० ६४।
( १५ )
(४) साधारणीकृत विभावादि मिलकर अलौकिक व्यापार ( भावना ) से
आनन्द, जो सहृदय के हृदय में आवरण से ढँका रहता है, उसके उस
आवरण ( पर्दा ) को हटा देते हैं ।
(५) इस अज्ञाननाश से रसानुभूति करने वाला ( प्रमाता ) अपने अन्तःकरण
के परिमितत्व प्रभाव एवं अपने प्रमातृत्व धर्म को त्याग कर साक्षीरूप से
व्यापक हो जाता है, स्वयंप्रकाश हो जाता है और अपने वास्तविक
आनन्दस्वरूप का साक्षात्कार करता है और यही तो रससाक्षात्कार है ।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पण्डितराज की व्याख्या अभिनवगुप्त का
समर्थन साहित्यिक दृष्टि से करती है। अन्तर केवल दार्शनिक विचार में है। दोनों
आचार्य रस को स्वयंप्रकाश एवं नित्य मानते हैं। फर्क तो इतना ही है कि अभिनव-
गुप्त के मत में चैतन्य विशेषण और स्थायिभाव विशेष्य है, पर पण्डितराज के मत में
स्थायिभाव ही विशेषण और चैतन्य विशेष्य है । अभिनव ने शैवागम दर्शन के अनुसार
प्रकृति के अंश रत्यादि स्थायीभाव में भी चैतन्यप्रतिभास के कारण आनन्द की
स्थिति मानी है। पर पण्डितराज शाङ्करवेदान्त के अनुसार केवल चैतन्य को ही
आनन्दमय मानकर रससिद्धान्त व्यवस्थापित करते हैं और अभिनव के मत में वेदान्ता-
नुसार संशोधन कर देते हैं ।
आगे इसकी विवेचना करते हुए पण्डितराज इसे स्पष्ट ही कर देते हैं। अभि-
नव के मत में व्यंजनाजन्य ज्ञानविषय रत्यादि ही रस है, पर पण्डितराज के मत में—
“रसो वै सः” इत्यादि श्रुति से आत्मा और रस में तादात्म्य ( अभेद ) सिद्ध रहने
के कारण तथा वेदान्तसिद्धान्तानुसार आत्मा के नित्यज्ञानरूप और अन्य के संस्कार
रूप रहने के कारण आत्मा और रस में अभेद उपपन्न नहीं हो सकता है। अतः ज्ञान-
विषयीभूत रत्यादि को रस न मानकर¹ रत्यादिविषयक ज्ञान को ही रस मानना
समुचित है ।
यहाँ ज्ञातव्य है कि रसस्वरूप का सर्वप्रथम विवेचन अग्निपुराण² में हुआ है
१. “भग्नावरणचिद्विशिष्टो रत्यादिः स्थायीभावो रस इति स्थितम्, वस्तुतस्तु
वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्येन रत्याद्यवच्छिन्ना चिदेव रसः” । ( रसगङ्गाधरः—
रसस्वरूपनिरूपणे )
२. आग्नेयपुराणे—
अक्षरं ब्रह्म परमं सनातनमजं विभुम् ।
वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम् ॥
आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन ।
व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचमत्काररसाश्रया ॥
( १६ )
और वेदान्त दर्शन के अनुसार ही हुआ है, भले ही उसके प्रतिपादन का ढंग भिन्न हो,
पर यह रसस्वरूप वहाँ से चलकर नानारूप में वर्णित-विवेचित होता हुआ अन्त में
पण्डितराज के द्वारा पुनः अपने यथोचित पूर्वस्थान पर आ गया ।
(५) गुणादिनिरूपण—पूर्वविवेचित विषयों के अतिरिक्त रसगङ्गाधर के इस
प्रथम आनन में गुणनिरूपण, भावध्वनिनिरूपण, रसाभासादि और अलक्ष्यक्रमध्वनि के
सम्बन्ध में विशेष विचार—ये विषय सूक्ष्म विवेचन के साथ निरूपित हुए हैं और इस
प्रकार प्रथम आनन असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य काव्य के तथा तत्सम्बद्ध विषयों के निरूपण में
समाप्त हो जाता है । इनका विवेचन पाठक ग्रन्थ में ही देखेंगे । यहाँ इन्हीं शब्दों के
साथ विरत होता हूं ।
पण्डितराज जगन्नाथ
आचार्य जगन्नाथ नैसर्गिक कवित्वसम्पन्न काव्यशास्त्रीय आचार्य थे । आन्ध्रप्रदेश
इनकी जन्मभूमि थी । ये तैलङ्ग ब्राह्मण थे१ । इनके पिता पेरुभट्ट२ महान् विद्वान् थे,
जिन्होंने ज्ञानेन्द्रभिक्षु से वेदान्त, माहेन्द्र पण्डित से न्याय-वैशेषिक, खण्डदेव उपाध्याय से
मीमांसा और शेष वीरेश्वर से व्याकरण का अध्ययन किया था और सर्वविद्याधर थे३ ।
जगन्नाथ ने अपने पिता से अध्ययन किया था और उनके गुरुशेष वीरेश्वर से भी
पढ़ा था४ । ये व्याकरण, दर्शन और साहित्यशास्त्र के उच्च कोटि के विद्वान् थे । ये
प्रतिभाशाली, प्रत्युत्पन्नमति, समयपरीक्षक ( युगद्रष्टा ) और प्रभावशाली पण्डित थे ।
तरुण होते५ ही ये विद्वान् हो गये और विद्वान् होते ही दिल्लीश्वर शाहजहाँ
( १६२८-१६६६ ई० ) के कृपापात्र होकर पण्डितराज की पदवी प्राप्त कर ली—
"मूर्त्तिमतेव नवाबासफखानमनःप्रसादेन द्विजकुलसेवा-हेवाकि-वाङ्मनःकायेन
माथुरकुलसमुद्रेन्दुना६ रायमुकुन्देनादिष्टेन श्रीसार्वभौमसाहिजहान-प्रसादाधिगत-
'पण्डितराय'-पदवीविराजितेन तैलङ्गकुलावतंसेन पण्डितजगन्नाथेन आसफ-
विलासाख्येयमाख्यायिका निरमीयत" । ( 'आसफविलास' के आरम्भ में )
१. आसफविलास—जगन्नाथकृत के आरम्भ में—"तैलङ्गकुलावतंसेन पण्डित-
जगन्नाथेन" ।
२. इनका नाम पेरम भट्ट भी था; द्रष्टव्य—प्राणाभरण एवं रसगङ्गाधर के
आदि में—"श्रीमत्पेरमभट्टसूरितनयः" । ( प्राणाभरण )
३. रसगङ्गाधर का आदि भाग ।
४. अस्मद्गुरु-पण्डितवीरेश्वराणाम्—ममोरमाकुचमर्दन के प्रारम्भ में ।
५. भामिनीविलास में—"दिल्लीवल्लभपाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः" ।
६. मुकुन्दराय माथुर नामक कायस्थ के द्वारा दरबार में इनका प्रवेश हुआ
था, जो वहाँ के दीवान थे ।
( १७ )
वहाँ कुछ दिन शाहजहाँ तथा उसके पुत्र दाराशिकोह के आश्रय में अपना
नवीनवयः' ( युवावस्था का पूर्वार्ध, ३० वर्ष तक ) सुखपूर्वक बिताया था—
“दिल्लीवल्लभ-पाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः” ( भामिनीविलास ) । जगदाभरण
में जगन्नाथ ने दाराशिकोह का वर्णन किया है। इस हिसाब से जान पड़ता है कि
१६४० ई० के बाद ये दिल्ली से निकल पड़े, उस समय यदि इनकी आयु ३० वर्ष
मानें तो इनका जन्मसमय १६१० ई० अनुमानित होता है।
ये अप्पयदीक्षित और भट्टोजिदीक्षित के उत्तरसम-सामयिक विरोधी थे तथा
इनके ग्रन्थों पर स्वतन्त्र रूप से खण्डन-ग्रन्थ लिखे थे। अप्पयदीक्षित के भ्रातृपौत्र
एवं शिष्य नीलकण्ठ दीक्षित ने 'कलिगताब्द ४७३८= ( १६३८ ई० ) में नीलकण्ठ-
विजय काव्य की रचना की थी, जिस समय दीक्षितजी परम वृद्ध रहे होंगे। सिद्धान्त-
कौमुदीकार भट्टोजिदीक्षित के गुरु शेषकृष्ण के पुत्र शेषवीरेश्वर पण्डितराज के एवं
उनके पिता पेरुभट्ट के गुरु थे।
बादशाह शाहजहाँ के साथ पण्डितराज ने काश्मीर की यात्रा की थी और वहाँ
के नवाब आसफखान द्वारा बादशाह के सत्कारादि का वर्णन इन्होंने 'आसफविलास' में
किया है।
विद्वान् होते ही जगन्नाथ राजाश्रय को प्राप्त करने बीकानेर गये । वहाँ के
राजा जगत्सिंह की प्रशंसा में इन्होंने जगदाभरण काव्य ( ५३ पद्यमात्र ) की रचना
की। इन्हीं जगत्सिंह के पिता कर्णसिंह के आदेश से मैथिल गङ्गानन्द कवीन्द्र ने
कर्णभूषण ( रसनिरूपण ) ग्रन्थ की रचना की थी।
किंवदन्ती है कि वहाँ से ये जयपुरनरेश जयसिंह की सभा में पधारे। वहाँ
मुल्लाओं के दो आक्षेपों के निराकरण हेतु पण्डितसभा हुई थी, पर समाधान नहीं
हो रहा था। पण्डितराज ने समाधान का वचन दिया और कहा कि 'एक आक्षेप का
उत्तर मैं तुरंत दे सकता हूँ और दूसरे का उत्तर अरबी-फारसी पढ़कर दूंगा' ।
वहाँ इन्हें फारसी पढ़ाने की व्यवस्था की गयी और कुछ ही दिनों में ये उस भाषा के
पारङ्गत हो गये। उक्त आक्षेपों का उत्तर देने हेतु इन्हें दिल्ली बादशाह के दरबार
में भेजा गया। इनके समाधान से सभी प्रसन्न हो गये—
आक्षेप—( १ ) राजा जयसिंह आदि वास्तविक क्षत्रिय नहीं हैं, क्योंकि
परशुराम ने जब २१ बार पृथिवी को निःक्षत्रिय कर दिया तो क्षत्रिय आये कहाँ से ?
१. अष्टात्रिंशदुपस्कृतसप्तशताधिकचतुःसहस्रेषु ।
कलिवर्षेषु गतेषु प्रथितः किल नीलकण्ठविजयोऽयम् ॥
( १८ )
समाधान — परशुराम ने जब पहली बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया,
तो दूसरी बार के लिए क्षत्रिय कहाँ से आये ? यह २१ बार कहना ही प्रमाणित
करता है कि संहार के बाद भी बहुत क्षत्रिय बचे रहे, जो इन राजाओं के पूर्वज थे ।
आक्षेप ( २ ) अरबी भाषा संस्कृत से प्राचीन है ।
समाधान — मुसलमानों के 'हदास' (धर्मग्रन्थ) में लिखा है कि—'मुसलमान
हिन्दुओं से विपरीत आचरण करें, यही उनका धर्म है' । इस वाक्य से सिद्ध है कि
हिन्दू धर्म मुसलमानों के धर्म से प्राचीन है और यह भी स्वतः सिद्ध है कि उन हिन्दुओं
की भाषा भी अरबी से प्राचीन है ।
दिल्ली दरबार में रहकर पण्डितराज ने एक परम रमणीय यवनी से प्रेम
किया और बादशाह की कृपा १ से वह इन्हें प्राप्त हो गयी । यह समाचार देशभर में
फैल गया और इन्हें पण्डितों ने जातिच्युत घोषित कर दिया । इन पण्डितों में अप्पय-
दीक्षित और भट्टोजिदीक्षित प्रमुख थे । अतः इनसे पण्डितराज का वैरभाव हो गया ।
कुछ दिन बाद वह यवनी, जिसका नाम 'लवङ्गी' था, असमय में ही दिवङ्गता हो
हो गयी और पण्डितराज ने विरक्तभाव से दिल्ली को छोड़ दिया । ये यवनीसम्पर्क से
अपने को स्वयं पापी समझने लगे—
सुरधुनिमुनिकन्ये ! तारयेः पुण्यवन्तं
स तरति निजपुण्यैस्तत्र किं ते महत्त्वम् ।
यदि हि यवनकन्या-पापिनं मां पुनीहि
तदिह तव महत्त्वं, तन्महत्त्वं महत्त्वम् ॥ ( गङ्गालहरी )
कुछ समय पण्डितराज ने नेपाल के समीप कूचविहार ( कामरूप ) के राजा
प्राणनारायण ( १६३३-६६ ई० ) के आश्रय में भी रहे, जहाँ 'प्राणाभरण' की रचना
की । यह ग्रन्थ वही है जिसे पूर्व में 'जगदाभरण' कहा गया है, फर्क इतना ही है कि
यहाँ जगत्सिंह के स्थान में 'प्राणनारायण' रख दिया गया है। इस राजा का वंश इस
प्रकार है—विश्वसिंह—मल्लदेव ( नरनारायण )—लक्ष्मीनारायण—वीरनारायण—
प्राणनारायण । इनमें मल्लदेव के आश्रित काव्यकौमुदीकार देवनाथ ठक्कुर ( काव्य-
प्रदीपकार गोविन्द ठक्कुर के पुत्र ) थे ।
वहाँ से लौटकर ये काशी में रहने लगे । अन्य राजाओं का आश्रय इन्हें तुच्छ
दीखने लगा । ये लिखते हैं—
१. न याचे गजालिं न वा वाजिराजं न वित्तेषु चित्तं मदीयं कदापि ।
इयं सुस्तनी मस्तकन्यस्तहस्ता, 'लवङ्गी'कुरङ्गीदृगङ्गीकरोतु ॥
( १९ )
दिल्लिश्वरो वा जगदीश्वरो वा मनोरथान् पूरयितुं समर्थः ।
अन्यैर्नृपालैः परिदीयमानं शाकाय वा स्याल्लवणाय वा स्यात् ॥
रसगङ्गाधर के मंगलाचरण आदि से ज्ञात होता है कि पण्डितराज वैष्णव थे,
हालांकि अन्य देवताओं की स्तुति भी इनकी प्राप्त हैं। इनका जीवन यद्यपि उल्लासमय
रहा, पर इन पर बड़े-बड़े अनर्थपात हुए—युवावस्था में ही पाणिगृहीती¹ ( स्वजातीया
पत्नी ) और पाणिगृहीता ( यवनी प्रेयसी ) का देहान्त हो गया । युवक पुत्र स्वर्ग-
वासी हो गया² । यवनीसम्पर्क-दोष से पण्डितों द्वारा अपमानित हुए और अन्त में
विरक्त होकर गङ्गा के शरण में गङ्गालहरी की रचना करते हुए गङ्गालाभ कर लिया ।
ये ब्रह्मतेज से युक्त थे । किंवदन्ती है कि जब यवनी इनके शयनकक्ष में आयी
तो उसे हुआ कि मैं जल जाऊँगी और वह लौट गयी । बादशाह के दरबार में पण्डित-
राज के इस ब्रह्मतेज को कम करने का प्रश्न उठ गया । किसी पण्डित के कहने से
इन्हें हुक्के के पानी से नहलाया गया और तब यवनी इनके पास जा सकी ।
पण्डितराज बहुत गर्विले स्वभाव के थे और यह गर्व उनका यथार्थ था, परन्तु
विद्वत्समाज इन्हें शास्त्रोद्धत कहता है। वे न केवल "अलङ्कारान् सर्वान् अपि मलित-
गर्वान् रचयतु" जैसी उक्ति रखते हैं, अपितु अपनी कविता की स्वयं ही अत्यधिक
प्रशंसा करते हैं—
धुर्यैरपि माधुर्यैर्द्राक्षा-क्षीरेक्षु-माक्षिक-सुधानाम् ।
वन्द्यैव माधुरीयं पण्डितराजस्य कवितायाः ॥ ३१ ॥
ये न केवल अप्पयदीक्षित या भट्टोजिदीक्षित का खण्डन दर्पपूर्ण वाणी से करते
हैं, वरन् आनन्दवर्धन, मम्मट आदि की तीखी आलोचना में भी ये पीछे नहीं रहे। परन्तु
अन्तिम अवस्था में इन्हें अपने कृत्यों पर पश्चात्ताप हुआ कि क्यों हमने विद्वानों का
अनादर किया ? क्यों यवनीसम्पर्क किया ? और इस विरक्ति के साथ संसार से ऊब
कर भगवती भागीरथी गङ्गा के शरण में पहुँचे । पर उस समय में भी अपनी प्रकृति
( स्वभाव ) ने इन्हें नहीं छोड़ा और ये गर्व से गङ्गा नदी की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर
१. द्रष्टव्य—पण्डितराज का करुणविलास—
धृत्वा पदस्खलनभीतिवशात् करं मे
या रूढवत्यसि शिलाशकलं विवाहे ।
सा मां विहाय कथमद्य विलासिनी ! द्याम्
आरोहसीति हृदयं शतधा प्रयाति ॥
२. रसगङ्गाधर—प्रत्यनीक अलङ्कार के उदाहरण में पुत्रशोक का वर्णन ।
१. काव्य-लक्षण (रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्) एवं काव्य-हेतु प्रतिभा विचार
( २० )
बैठ गये और बोले— 'माता गङ्गा के लिए मैं इतनी दूर से आया हूँ तो यह माता पुत्र
के लिए थोड़ी दूर भी ऊपर नहीं होंगी ?' पण्डितराज गङ्गालहरी के एक-एक पद्य
रचते सुनाते थे और गङ्गा एक-एक सीढ़ी ऊपर आ रही थी और अन्तिम पद्य समाप्त
होते ही एक ऐसा तरङ्ग आया जो पण्डितराज को समेटे हुए प्रवाह में विलीन कर
लिया, माता ने पुत्र को गोद में ले लिया ।
पण्डितराज जगन्नाथ की रचनाएँ
१. शृङ्गारविलास — १८० पद्य ।
२. आसफविलास — गद्याख्यान, शाहजहाँ की कश्मीरयात्रा एवं वहाँ के नवाब
आसफखान से मुलाकात ।
३. करुणविलास ( पत्नीवियोग में विलाप ) — १९ पद्य ।
४. प्रास्ताविक विलास — १२२ पद्य ।
५. शान्तिविलास — निर्वेद पद्य-४४ ।
६. जगदाभरण'— ५३ पद्य—बीकानेर के राजा जगत्सिंह की प्रशंसा ।
७. प्राणाभरण — ५३ पद्य—कामरूप (कूचबिहार) के राजा प्राणनारायण की प्रशंसा ।'
यह 'जगदाभरण' में ही नामपरिवर्तन करके प्रस्तुत किया गया है ।
८. यमुनावर्णन — गद्य, अनुपलब्ध, रसगङ्गाधर के मध्यम काव्य के उदाहरण में
इसकी पंक्ति उद्धृत है ।
९. लहरी-पञ्चक—
( १ ) गङ्गालहरी — ५३ पद्य, इसे ही पीयूषलहरी भी कहते हैं— “इमां पीयूष-
लहरीं जगन्नाथेन निर्मिताम्” !
( २ ) यमुनालहरी — १९ पद्य, इसे ही अमृतलहरी कहते हैं ।
( ३ ) करुणालहरी — ५५ पद्य, कृष्ण की स्तुति ।
( ४ ) लक्ष्मीलहरी — ४१ पद्य ।
( ५ ) सुधालहरी — ३० पद्य, सूर्यस्तुति ।
१०. भामिनीविलास — ५८८ पद्य ।
११. चित्रमीमांसाखण्डन — अप्पयदीक्षितकृत चित्रमीमांसा अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थ का
खण्डन ।
१२. मनोरमाकुचमर्दन — भट्टोजिदीक्षितकृत प्रौढमनोरमा ( व्याकरणशास्त्रीय व्याख्या-
ग्रन्थ ) का खण्डन ।
( २१ )
१३. रसगङ्गाधर—अलङ्कारशास्त्रीय महान् ग्रन्थ ।
१. पण्डितराज-ग्रन्थावली में इनके सभी ग्रन्थों का आकर्षक प्रकाशन संस्कृत
परिषत्, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से हुआ है ।
अन्य जगन्नाथ
संस्कृत वाङ्मय में जगन्नाथ नाम के अनेक ग्रन्थकार हो चुके हैं । उनके ग्रन्थ
हैं—सिद्धान्तसम्राट् ( ज्योतिष )—सम्राट् जगन्नाथकृत, सिद्धान्तकौस्तुभ, रेखागणित,
विवादार्णवभङ्ग, रतिमन्मथनाटक, अतन्द्रचन्द्रिकनाटक—मैथिल जगन्नाथकृत, अनङ्ग-
विजयभाण, सभातरङ्ग, अद्वैतामृत, शरभगजविलास, ज्ञानविलास, समुदायप्रकरण
आदि । परन्तु इनमें कोई भी पण्डितराज उपाधि वाले नहीं थे । मिथिला में रघुनन्दन
उपाध्याय पण्डितराज थे, जिन्होंने वादशाह अकबर से तिरहुत राज्य प्राप्त कर अपने
गुरु म० म० महेश ठक्कुर को दे दिया था तथा काव्यप्रकाश की टीका लिखी थी, जो
दरभङ्गा में हस्तलिखित रूप में है ।
रसगङ्गाधर की व्याख्या-सम्पत्ति
रसगङ्गाधर पर निम्नांकित व्याख्याएँ उपलब्ध हैं—
( १ ) गुरुमर्मप्रकाश—म० म० नागेशभट्ट (१७५० ई०) कृत । यह रसगङ्गाधर
पर सर्वप्राचीन टिप्पणी उपलब्ध है, जो इसके खण्डन के उद्देश्य से ही लिखी गयी थी ।
नागेशभट्ट प्रख्यात वैयाकरण थे । ये भट्टोजिदीक्षित के पौत्र हरिदीक्षित के शिष्य होने
के कारण पण्डितराज के विरोधी हुए, क्योंकि भट्टोजि से पण्डितराज का वैरभाव
प्रसिद्ध ही है । नागेश ने अपनी गुरुपरम्परा के समर्थन में ही पण्डितराज का खण्डन
किया है । बहुत स्थलों पर ग्रन्थ के आशय को भी स्फुटित किया है । इसका प्रकाशन
१९३९ ई० में भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की सरला टीका के साथ जयपुर से हुआ उत्तरा-
लंकार पर्यन्त और आज तक इतना ही मूल ग्रन्थ भी मिलता है । नागेश की टीका भी
यहीं तक है ।
( २ ) म० म० गङ्गाधर शास्त्री की क्वचित्-क्वचित् टिप्पणी सहित रसगंगाधर
काशी से प्रकाशित हुआ था । इससे पहले यह ग्रन्थ काव्यमाला में मुद्रित हो चुका
था । तृतीय बार रसगङ्गाधर का प्रकाशन भट्ट मथुरानाथ शास्त्री द्वारा जयपुर से हुआ ।
( ३ ) सरला—भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की ग्रन्थलापिनी एवं गूढार्थबोधिनी
संक्षिप्त व्याख्या है। यह गुरुमर्मप्रकाश के साथ १९३९ ई० में प्रकाशित हुई और १९४५
तक इसके छः संस्करण निकल गये, इसी से इसकी उपादेयता सिद्ध है ।
( ४ ) हिन्दी अनुवाद—पं० श्रीपुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, नागरी प्रचारिणी
सभा, काशी ।
( २२ )
( ५ ) 'चन्द्रिका'—कविशेखर बदरीनाथ झा—प्रथमानन भाग, शेष भाग पर
पं० मदनमोहन झा—रसगङ्गाधर की आज तक सर्वोत्कृष्ट व्याख्या यही है । ग्रन्थ को
स्पष्ट करते हुए उसका सारभाग पाठकों के समक्ष रख देना, छात्रों एवं विद्वानों के
उपयुक्त सन्तुलित विचार उपस्थित करना एवं साहित्यिक दृष्टि से ग्रन्थ को देखना
इत्यादि कतिपय विशेषताएँ इसे लोकप्रिय बनाती हैं । चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
से १९५५ ई० में प्रकाशित ।
( ६ ) 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या—पं० मदनमोहन झा—यह व्याख्या उपर्युक्त
'चन्द्रिका' संस्कृत व्याख्या के साथ प्रकाशित है । यह सूक्ष्म विवेचना के क्रम में बहुत
स्थलों पर विस्तृत हो गयी है ।
( ७ ) मधुसूदनीप्रकाश संस्कृत-हिन्दी व्याख्या—आचार्य मधुसूदन मिश्र—काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ।
( ८ ) रसचन्द्रिका—पं० श्रीकेदारनाथ ओझा—यह व्याख्या सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १९७७ ई० में प्रकाशित हुई । इसमें ग्रन्थ का
अवतरण, शब्दार्थस्फोरण एवं दार्शनिक दृष्टि से विषय का निरूपण किया गया है ।
कुछ स्थलों में यह शास्त्रान्तर विचार में अतिविशद हो गयी है, जब कि बहुत स्थलों
पर टिप्पणी बन के रह गई है । इसकी भूमिका केवल टीकाकारों की भर्त्सना में
कृतश्रमा है, जैसा वर्णन विद्वान् के लिए अशोभनीय है । काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ की
व्याख्या में एक भी तच्छास्त्रीय त्रुटि नहीं दिखाई गई है, केवल न्यायशास्त्रीय त्रुटि और
वह त्रुटि भी कहाँ तक समीचीन है इसका निर्णय तो परवर्ती आलोचकों, व्याख्याकारों
के विचार में देखे जा सकते हैं । पर उनकी इस भूमिका से स्पष्ट हो जाता है कि
'चन्द्रिका' व्याख्या की दोषगवेषणा को ही यह श्रेय है कि 'रसचन्द्रिका' व्याख्या का
उसने ही निर्माण करा लिया । माननीय व्याख्याकार के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य
नहीं है—साहित्यशास्त्रीय विषय-विवेचन में भी बहुत स्थलों पर शास्त्रवैपरीत्य इनकी
व्याख्या में है जिनकी गणना हम यहाँ नहीं करना चाहते । पाठक इस रसतरङ्गिणी
व्याख्या में उन्हें ढूँढ़ सकते हैं । चन्द्रिका के बाद रचित होने पर भी 'रसचन्द्रिका'
उसका स्थान नहीं ले सकी, न ही लोकप्रिय हो सकी—यह भी ज्ञातव्य है ।
( ९ ) रसतरङ्गिणी—डॉ० श्रीनारायण मिश्र एवं डॉ० शशिनाथ झा—यह
प्रस्तुत संस्करण संस्कृत-हिन्दी व्याख्यात्मक है । यह छात्रोपयोगी के साथ-साथ गम्भीर
विचारों का प्रतिपादक, जटिल स्थलों का परिचायक, पूर्वव्याख्याताओं द्वारा विषय को
प्रकृत शास्त्र से शास्त्रान्तर की ओर बहकाव का नियन्त्रक और कुव्याख्यान का विखण्डक
के रूप में प्रस्तुत हो रहा है ।
( २३ )
प्रस्तुत संस्करण होने में ( छपने में ) बहुत विलम्ब हो गया । दुःसंयोग की
बात हुई कि डॉ० श्रीनारायण मिश्रजी की व्याख्या कुछ अंश छपने के बाद प्रेस में
नष्ट हो गयी । इससे मिश्रमहोदय बहुत खिन्न हुए और छपी हुई व्याख्या के बाद संक्षिप्त
व्याख्या से प्रथमानन को पूर्ण किया । पर दुर्भाग्य की बात ! फिर कुछ अंश छपने के
बाद पाण्डुलिपि नष्ट हो गयी और डॉ० मिश्र ने यह काम छोड़ दिया । प्रकाशक
महोदय ने मुझे प्रेरित किया और मैंने यथामति भावध्वनिप्रकरण के धृतिभाव से आगे
प्रथमानन पर्यन्त संस्कृत-हिन्दी व्याख्या कर दी । इसमें मुझे अधिक आयास नहीं करना
पड़ा, क्योंकि अध्ययन एवं अध्यापन के क्रम में रसगङ्गाधर पुस्तक के हाशिये पर मैंने
टिप्पणी कर ली थी, जिसमें ग्रन्थ के गूढ़ाशय, मतमतान्तर एवं पूर्व व्याख्याकार से
मतभेद अंकित थे और वही मेरी व्याख्या का आधार बन गया ।
यह व्याख्या कहाँ तक सफल हो सकी है, इसकी क्या विशेषताएँ हैं—इस विषय
के विवेचन का भार पाठकों पर ही छोड़ना उचित समझ कर विरत होता हूँ ।
संस्कृत-दिवस १९९६ ई०
स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग डॉ० शशिनाथ झाः
का० सिं० द० संस्कृत विश्वविद्यालय विद्यावाचस्पति
दरभङ्गा
इस पृष्ठ पर कोई प्रत्यक्ष मुद्रित पाठ (printed text) उपस्थित नहीं है। यह पृष्ठ वस्तुतः रिक्त (blank page) है तथा इस पर केवल पृष्ठ के दूसरी ओर (reverse side) का धुंधला प्रतिछाया/स्याही का रिसाव (bleed-through/show-through) ही हल्का दिखाई दे रहा है, जो अपठनीय है। अतः यहाँ लिप्यंतरण योग्य पाठ उपलब्ध नहीं है।
विषय-सूची
विषयः पृष्ठम् | विषयः पृष्ठम्
भूमिका १–२१ | विस्मयः १२६
मङ्गलाचरणादि १ | हासः १२७
काव्यलक्षणम् ८ | भयम् १२७
हेमचन्द्रोक्तलक्षणे आक्षेपः १२ | विभावः, अनुभावः,
साहित्यदर्पणोक्तलक्षणे आक्षेपः २० | व्यभिचारिभावः १२८
प्रतिभाकाव्यकारणम् २१ | रसभेदनिरूपणम् १३१
काव्यं चतुर्विधम् ३० | शृङ्गारः १३१
उत्तमोत्तमकाव्यस्य लक्षणम् ३० | करुणः १३५
उत्तमकाव्यस्य लक्षणम् ५४ | शान्तः १३६
मध्यमं काव्यम् ६२ | रौद्रः १३८
अधमं काव्यम् ६५ | वीरः १४३
प्रकाशकृत्कृतभेदेषु कटाक्षः ६७ | अद्भुतः १५८
ध्वनेर्भेदाः ७० | हास्यः १६१
रसस्वरूपम् ७१ | भयानकः १६४
( १ ) अभिनवगुप्तमते ७८ | बीभत्सः १७५
जगन्नाथेन मतभेदः ७९ | रसानां संख्यानियमः १७८
( २ ) भट्टनायकमते ८२ | रसानां परस्परविरोधः १७९
( ३ ) नव्यमते ९४ | रसदोषाः १८३
( ४ ) भ्रमवादिमते १०४ | गुणनिरूपणम् १९३
( ५ ) लोल्लटमते १०८ | गुणविषये स्वमतम् १९५
( ६ ) शङ्कुकमते ११० | गुणविषये वामनादिमतम् २०१
( ७ ) इतराणि पञ्चमतानि १११ | शब्दगुणाः २०२
भरतकृतरससूत्रस्याष्टधाव्याख्यानम् ११२ | श्लेषः २०२
रस
( २ )
विषयः पृष्ठम् विषयः पृष्ठम्
समाधिः २१० व्याधिः ३०४
अर्थगुणाः २१२ त्रासः ३०५
श्लेषः २१२ सुप्तम् ३०७
प्रसादः २१४ विबोधः ३०८
समता २१४ अमर्षः ३११
माधुर्यं २१७ अवहित्थम् ३१२
सुकुमारता २१७ उग्रता ३१४
अर्थव्यक्तिः २१९ उन्मादः ३१५
उदारता २१९ मरणम् ३१६
ओजः २२४ वितर्कः ३१८
कान्तिः २२५ विषादः ३१९
समाधिः २२६ औत्सुक्यम् ३२२
अर्थे तेषु त्रिष्वेवान्तर्भावः २३० आवेगः ३२३
गुणव्यञ्जकरचना २३७ जड़ता ३२४
रचनायां वर्जनीयता २४८ आलस्यम् ३२५
भावध्वनिः २६६ असूया ३२७
भावलक्षणम् २६७ अपस्मारः ३३०
हर्षः २७९ चपलता ३३१
स्मृतिः २८० निर्वेदः ३३३
व्रीडा २८५ देवादिविषयरतिः ३३४
मोहः २८७ व्यभिचारिभावानां संख्यानियमः ३३६
धृतिः २८८ रसाभासः ३३८
शङ्का २८९ भावाभासः ३४८
ग्लानिः २९० भावशान्तिः ३५०
दैन्यं २९२ भावोदयः ३५१
चिन्ता २९४ भावसन्धिः ३५२
मदः २९६ भावशबलता ३५३
श्रमः २९८ अलक्ष्यक्रमध्वनिः ३६२
गर्वः ३०० वर्णरचनादीनांरसभिव्यञ्जकता ३६८
निद्रा ३०२ उदाहृतश्लोकानुक्रमणी ३७५
मतिः ३०३ रसगङ्गाधरेचर्चिताग्रन्था
ग्रन्थकाराश्च ३७९
――――****――――
: त र्का या स - wait, between या and प:
Is it स? Yes, तर्कायासपरिश्रान्तस्वान्तविश्रान्तिदायिनीम्!
Wait, let me look at स: it's a full स, not स्!
तर्कायासपरिश्रान्तस्वान्तविश्रान्तिदायिनीम्
Wait, let me zoom in on स:
Left part: loop and leg of स. Middle: crossbar. Right: vertical stem.
It's a full स!
So it is: तर्कायासपरिश्रान्तस्वान्तविश्रान्तिदायिनीम्
रसगङ्गाधरव्याख्यां कुर्मो रसतरङ्गिणीम् ॥ २ ॥ग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्या तरङ्गिण्या यथायथम् ।orग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्व्या?- Let's check L12:
ग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्यorग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्वा?
Letter:कृthenत्वा!
Wait, look atकृत्वा:कृthenत्+वा=त्वा.
Yes! `ग्रन्थार्थ
- Let's check L12:
:
Line 1:
Page number and header:
२ रसगङ्गाधरः
Line 2:
कलिन्दगिरिनन्दिनीतटसुरद्रुमालम्बिनी
Line 3:
मदीयमतिचुम्बिनी भवतु कापि कादम्बिनी ॥ १ ॥
Line 4:
अपि च कलिन्दगिरिनन्दिन्या यमुनायास्तटेऽवस्थितं सुरद्रुमं कदम्बवृक्षमालम्बितुं
Line 5:
शीलं यस्यास्तथाविधा सा कापि विलक्षणा कादम्बिनी श्रीकृष्णस्वरूपा मदीयमनि- (wait, मदीयमति- or मदीयमनि-?)
Look at line 5:
"मदीयमनि-" or "मदीयमति-"?
Look at: "म दी य म ति-" -> it's clearly मदीयमति-! Look at "मदबुद्धिविषया" right after it! मति = बुद्धि.
Line 6:
चुम्बिनी मदबुद्धिविषया भवतु—इति मङ्गलपद्यार्थः ।
Line 7:
अत्र स्मृतापीत्यनेन लौकिककादम्बिनीतो व्यतिरेको दर्शितः । अपूर्वेयं काद-
Line 8:
म्बिनी साक्षात्कृता स्मृता वा तरुणमातपं हरति, लौकिकी तु शिरस ऊर्ध्वं नभसि वर्त्त-
प्रथमाननम् ३
श्रीमज्ज्ञानेन्द्रभिक्षोरधिगतसकलब्रह्मविद्याप्रपञ्चः
काणादीराक्षपादीरपि गहनगिरो यो महेन्द्रादवेदीत् ।
नापि स एव । प्रसिद्धाया अव्यापकत्वेन यत्किञ्चिदनुरक्ताननुरक्तनरतापहारकत्वमित-
रेषामनुरक्तानामपि तापाऽहारकत्वं चास्ति, अस्याः पुनरशेषानुरक्तजनमात्रतापहा-
रित्वम्, 'कामाल्लोभाद्भयात्', 'काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते तारणीया नराः'
इत्यादिरीत्या वाऽनुरक्ताननुरक्तमात्रतापहारित्वमिति । अभङ्गुरेत्यादिनापि स एव,
प्रसिद्धकादम्बिनीवलयीभूतविद्युतस्तनुत्विङ्भङ्गुरा, अस्याः पुनरभङ्गुरा सेति हेतोः ।
बहुवचनान्तेन शतशब्देनानन्त्यार्थकेन च विद्युतां कादम्बिनीव्यापकत्वमत एव च
वलयितेत्यस्य वेष्टितेति तात्पर्यम् । प्रसिद्धविद्युतस्तु शतसंख्याकत्वमपि नास्ति युगपत्,
प्रत्यक्षत एव तद्बाधात् । विनष्टाविनष्टयोश्च सह संख्यानाभावादतीतकालिकत्वा-
दिनापि न निर्वाहः । कथञ्चित् सह संख्यानेऽपि व्यापकत्वं तु तस्याः प्रत्यक्षबाधि-
तमेव । अतोऽत्रापि व्यतिरेको निर्बाधः । द्रुमस्य च कादम्बिन्यालम्बनत्वेन चित्त-
द्रवीभवनरूपावस्था सूच्यते । चुम्बनशब्देन च विषयप्रतिपादनाद्विषयिणस्तन्मयत्वं
सूच्यते । तथा च गीता—
'तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः' इति ॥
कादम्बिनीति स्त्रीलिङ्गनिर्देशोऽनुरागातिशयसूचनाय । अन्येप्यर्था यथाप्रज्ञ-
मव्यवसेयाः । को हि नाम ना शक्तः परिमातुमपरिमेयं शब्दब्रह्म ?
अत्र व्यतिरेकोऽलङ्कारो मुख्यः, तदङ्गत्वेन चातिशयोक्त्यादयोपीति सङ्करः ॥ १ ॥
स्वविद्योत्कर्षख्यापनाय स्वगुरुविद्योत्कर्षमाह—श्रीमदित्यादि । प्रपञ्चो
'विस्तरः । तस्याधिगतिः सतात्पर्यकस्य तस्य यथार्थबोधः । देवः = खण्डदेवः,
विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वपदलोपात् । शेषाङ्को वीरेश्वरः, शेषोपनामकत्वात् । शेषः =
इस पद्य द्वारा इस कादम्बिनी मे लौकिक कादम्बिनी से विलक्षणता व्यक्त की
गई है । लौ० कादम्बिनी जिसके शिर के ऊपर आकाश में रहती उसी के तरुण
बाह्य आतप को शान्त कर पाती, वह भी सर्वदा और स्मरण मात्र से नहीं; यह
न तो एक काल में असंख्य विद्युल्लताओ से वेष्टित होती और न इस विद्युल्लता
की कान्ति ही अनश्वर होती; यह यमुना तट पर अवस्थित कदम्ब वृक्ष पर आश्रित
भी नहीं होती जब कि प्रकृत कादम्बिनी—जैसा कहा जा चुका है, इन सभी दृष्टियों
से लौ० कादम्बिनी से भिन्न, अत एव उत्कृष्ट, है । इससे लौ० कादम्बिनी से
प्रकृत कादम्बिनी का व्यतिरेक स्पष्ट हो जाता है ॥ १ ॥
जो श्रद्धेय सन्यासी ज्ञानेन्द्र सरस्वती से सम्पूर्ण वेदान्त शास्त्र को प्राप्त करने,
महेन्द्र पण्डित से अतिकठिन कणाददर्शन ( वैशेषिकदर्शन ) और अक्षपाददर्शन
३ र०
रसगङ्गाधरः
देवादेवाद्ध्यगीष्ट स्मरहरनगरे शासनं जैमिनीयं
शेषाङ्कःप्राप्तशेषोऽमलभणितिरभूत्सर्वविद्याधरो यः ॥
पाषाणादपि पीयूषं स्यन्दते यस्य लीलया ।
तं वन्दे पेरुभट्टाख्यं लक्ष्मीकान्तं महागुरुम् ॥ २-३ ॥
निमग्नेन क्लेशैर्मननजलधेरन्तरुदरं
मयोन्नीतो लोके ललितरसगङ्गाधरमणिः ।
हरन्तर्ध्वान्तं हृदयमधिरूढो गुणवता-
मलंकारान्सर्वानपि गलितगर्वान् रचयतु ॥ ४ ॥
शेषावतारभूतो भगवान् पतञ्जलिर्महाभाष्यनिर्माता । तद्वचनप्राप्तिमुखेन पाणिनिकात्या-
यनवचनप्राप्तिरपि सूचिता, महाभाष्यस्य तदारूढत्वात् । सर्वाणि विशेषणानि सर्व-
विद्याधरत्वे हेतुभूतानि । पाषाणादपीत्यादिना स्ववर्णनकौशलेनाचेतनमपि चेतनवत्
करोतीति प्रतिपादनात्स्वपितरि कवित्वकाष्ठा दर्शिता । लीलयेत्यनेन च तथावर्णने
पितुरायासाभावः सूचितः । लक्ष्मीकान्तमित्यनेन स्वमातुर्लक्ष्म्यभिधाया नाम निर्दि-
ष्टमिति कस्यचिद् व्याख्यानम switch अनौचित्यस्पृशि, एवं रूपेण लोके पित्रोर्नामग्रहणस्यात्यन्त-
विगर्हितत्वात् । अतः सारस्वतस्य पितुर्धनवत्त्वं विष्णुसदृशत्वं वा प्रतीयत इत्येव
युक्तम् ॥ २-३ ॥
ग्रन्थप्रशस्तिमाह—निमग्नेनेत्यादिना । मननरूपजलधेरन्तरुदरमन्तस्तलं क्लेशै-
रनल्पायासैर्नितरां मननेन मया जगन्नाथेन ललितो गुणालङ्कारादिभूषितो रसगङ्गाधर-
स्वरूपः काव्यतत्त्वप्रकाशकत्वान्मणिर्लोक उन्नीतः । सोऽयं गुणवतां सहृदयानां हृदय-
मधिरूढोऽन्येषां काव्यतत्त्वजिज्ञासूनामन्तर्ध्वान्तमज्ञानं हरन् सर्वानपि पूर्वाचार्यरचिता-
लङ्कारग्रन्थान् गलितगर्वान् रचयतु । अत्र च अन्तरुदरम् निमग्नेनेत्यादिना प्रतिपाद्य-
विषयस्य सुचिन्तितत्वमपि सूचितं भवति ॥ ४ ॥
(न्यायदर्शन) को जानने, काशी में खण्डदेव से पूर्व मीमांसा शास्त्र का अध्ययन करने
और शेष वीरेश्वर से शेषावतार भगवान् पतञ्जलि की निर्मल वाणी महाभाष्य
का अधिगम करने से सर्वविद्यासम्पन्न हुए और जिनकी नैसर्गिक काव्यकला से
पत्थर से भी अमृत चूने लग जाता उन विष्णुसदृश पितृचरण पेरुभट्ट को मेरा
प्रणाम समर्पित है ॥ २-३ ॥
मननरूपी सागर के अन्तस्तल में आयासपूर्वक गोता
प्रथमाननम् ५
परिष्कुर्वन्त्वर्थान्सहृदयधुरीणाः कतिपये
तथापि क्लेशो मे कथमपि गतार्थो न भविता ।
तिमीन्द्राः संक्षोभं विदधतु पयोधेः पुनरिमे
किमेतेनायासो भवति विफलो मन्दरगिरेः ॥ ५ ॥
निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपं
काव्यं मयात्र निहितं न परस्य किंचित् ।
किं सेव्यते सुमनसां मनसापि गन्धः
कस्तूरिकाजननशक्तिभृता मृगेण ॥ ६ ॥
मननतरीतीर्णविद्यार्णवो जगन्नाथपण्डितनरेन्द्रः ।
रसगङ्गाधरनाम्नीं करोति कुतुकेन काव्यमीमांसाम् ॥ ७ ॥
निमग्नेनेत्यादिसूचितार्थमेव भङ्ग्यन्तरेणाह—परिष्कुर्वन्त्वित्यादिना । कतिपये
सहृदयधुरीणा भामहदण्डिमम्मटादयः पूर्वाचार्याः । तिमिर्नाम मत्स्यविशेषः । तथा च
तिमीन्द्रप्रयासस्याफलतयाऽल्पफलतया वा यथा प्रचुरामृतफलो मन्दरगिरिप्रयासो न
गतार्थस्तथैव ममाप्ययं प्रयासोऽशेषकाव्यतत्त्वप्रमितिजननपरो न गतार्थ इत्याशयः ।
अत्रैकस्यैवार्थस्य पूर्वार्द्धोत्तरार्धयोः प्रकारान्तरेण विधिनिषेधमुखेनोक्तः प्रतिवस्तू-
पमालङ्कारः ॥ ५ ॥
स्वकीयप्रबन्धस्य प्रबन्धान्तरापेक्षयोत्कर्षं दर्शयति-निर्मायेत्यादिना । मयोदाह-
रणानुरूपं नूतनं काव्यं निर्मायात्र ग्रन्थे निहितम्, परस्य तु न किमप्यत्र निक्षिप्तम् ।
अयमेव प्रकृतप्रबन्धस्योत्कर्षः प्रकृतपक्षे विवक्षितः । सुमनसाम् = पुष्पाणाम् । अत्राप्यु-
त्तरार्धे शब्दान्तरेण पूर्वार्थार्थकथनात् प्रतिवस्तूपमा ॥ ६ ॥
भामह, दण्डी, मम्मट आदि सहृदयों मे अग्रगण्य आचार्य काव्यार्थ का परिष्कार
भले हीं कर चुके हों, फिर भी मेरा यह प्रयास व्यर्थ नही हो सकता । तिमि-तिमि-
ङ्गिल आदि मछलियां सागर मे भले ही उथल-पुथल मचाती रहें, फिर भी क्या
इतने से हीं मन्दराचल का समुद्रमन्थन-प्रयास निरर्थक हो सकता ? कथमपि
नहीं ॥ ५ ॥
अपेक्षित उदाहरण के अनुरूप नवीन काव्य की रचना कर उसे मैने इसमें
समाविष्ट किया है, अन्य की रचना का इसमें कहीं भी समावेश नही हुआ है ।
क्या कस्तूरी को उत्पन्न करने की क्षमता रखने वाला गन्धमृग पुष्पों की सुगन्धि
को मम से भी कभी चाहता ? कभी नहीं ॥ ६ ॥
मननरूपी नौका से विद्या-सागर को पार कर चुकने वाला पण्डितराज जगन्नाथ
अनायास ही काव्यतत्त्वविचारपरक रसगङ्गाधरनामक ग्रन्थ की रचना कर रहा
है ॥ ७ ॥