रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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प्रस्तुत संस्करण होने में ( छपने में ) बहुत विलम्ब हो गया । दुःसंयोग की
बात हुई कि डॉ० श्रीनारायण मिश्रजी की व्याख्या कुछ अंश छपने के बाद प्रेस में
नष्ट हो गयी । इससे मिश्रमहोदय बहुत खिन्न हुए और छपी हुई व्याख्या के बाद संक्षिप्त
व्याख्या से प्रथमानन को पूर्ण किया । पर दुर्भाग्य की बात ! फिर कुछ अंश छपने के
बाद पाण्डुलिपि नष्ट हो गयी और डॉ० मिश्र ने यह काम छोड़ दिया । प्रकाशक
महोदय ने मुझे प्रेरित किया और मैंने यथामति भावध्वनिप्रकरण के धृतिभाव से आगे
प्रथमानन पर्यन्त संस्कृत-हिन्दी व्याख्या कर दी । इसमें मुझे अधिक आयास नहीं करना
पड़ा, क्योंकि अध्ययन एवं अध्यापन के क्रम में रसगङ्गाधर पुस्तक के हाशिये पर मैंने
टिप्पणी कर ली थी, जिसमें ग्रन्थ के गूढ़ाशय, मतमतान्तर एवं पूर्व व्याख्याकार से
मतभेद अंकित थे और वही मेरी व्याख्या का आधार बन गया ।
यह व्याख्या कहाँ तक सफल हो सकी है, इसकी क्या विशेषताएँ हैं—इस विषय
के विवेचन का भार पाठकों पर ही छोड़ना उचित समझ कर विरत होता हूँ ।
संस्कृत-दिवस १९९६ ई०
स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग डॉ० शशिनाथ झाः
का० सिं० द० संस्कृत विश्वविद्यालय विद्यावाचस्पति
दरभङ्गा