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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

बालकांड ६५
पराक्रमी परशुराम कंधे पर परशु धारण किये आते दिखाई पडे, जिन्होंने इक्कीस बार इस
पृथ्वी को निक्षत्रिय कर दिया था । उनकी आँखें ऐसी लाल थी, मानो अपने जटा-जूट में
स्थित गगा की आर्द्रता से ललाट को आर्द्र बनाये हुए, अत्यत भयंकर रूप से जलनेवाले
तथा अपने कठ के विष को क्रोध से दैत्यो के ऊपर उगलनेवाले परम शिव के ललाट-
नेत्र की प्रज्वलित वह्नि को (परशुराम) अपनी दोनो आँखों में लिये हुए आ रहे हो ।
उनकी बिखरी हुई लाल-लाल जटाएँ ऐसी दीख रही थी, मानो उनके भीतर की क्रोधाग्नि प्रज्वलित
होकर बाहर तक अपनी लाल-लाल ज्वालाएँ फैला रही हो । उनके कंधे पर रहने-
वाला परशु ऐसा शोभा दे रहा था, मानो उनकी भुजा रूपी लक्ष्मी ने नाल-युक्त विकसित
कमल हाथ में धारण किया हो । ऐसे भयंकर रूप में आनेवाले परशुराम को देखकर
राजा दशरथ तथा मुनिगण भयभीत होकर भय-निवारक मंत्रो का जप करते हुए अर्घ्य-
पाद्य के साथ परशुराम के सामने आये ।
३७ परशुराम का गर्व-भंग
परशुराम ने अर्घ्य-पाद्य ग्रहण नही किया और राजा दशरथ को डरा-धमकाकर राम
के आगे आकर खडे हुए । भार्गव राम (परशुराम) को देखकर राम ने बडी भक्ति से
प्रणाम किया और हाथ जोडे बडे विनय से खडे रहे । उन्हें देखकर परशुराम ने कहा—
'हे राजन्, तुम कितना भी विनय दिखाओ, तो भी मैं तुम्हें क्षमा नही करूँगा । तुम मुझसे
युद्ध करो ।' तब राम ने कहा—"हे भूसुरोत्तम, आपने कश्यप आदि ब्राह्मणो को सारी
पृथ्वी दान कर दी है और महान् जितेन्द्रिय हो वनो में रहकर घोर तपस्या में संलग्न
रहते हैं । अत आपकी वदना करना उचित है । हे मुनीश्वर, यही विचार करके मैंने
आपको प्रणाम किया है, आपसे भीत होकर नही । क्या यह उचित है कि आप व्यर्थ
ही मेरी निंदा करें ? "
परशुराम बोले—"तुम मुझे तपस्वी कहते हो ? जानते हो, मैने युद्ध में सहस्रबाहु
को मार डाला और इक्कीस बार पृथ्वी पर के सभी क्षत्रियो का नाश कर डाला है तथा
(उनके) रक्त से अपने पितरो की तिलोदक-क्रिया की है । हमारे पितर राजाओ के शवो
का सोपान बनाकर स्वर्ग में चले गये हैं। हे अनघ, ऐसे भार्गव राम को बिना जाने तुम
इस ससार में राम होकर कैसे जन्मे ? क्षत्रिय के नाम से जो जन्म लेता है, मैं उसका
नाश करूँगा । (ऐसी दशा में) राम का नाम धारण करनेवाले क्षत्रिय को क्या मैं कभी
छोड सकता हूँ ? राज-वश में जन्म लेकर 'राम का नाम धारण करनेवाले तुम्हें मैं कदापि
क्षमा नही करूँगा । राजा होने के कारण तुम्हारे पिता को युद्ध में मार डालने के उद्देश्य
से मैं आया था, लेकिन स्त्रियो की आड में शरण लेने के कारण मैने उसे छोड दिया था ।
इसीलिए वह गर्वांध हो यहाँ फूला-फूला विचर रहा है । आज भले ही वह कही
छिप जाय, पर मैं उसे जीवित नही रहने दूँगा ।"
तब दशरथ अत्यन्त भीत होकर बडे विनय से भार्गव से बोले—"हे भार्गव, आप
ब्राह्मण हैं, आपको इतना रोष क्यो ? मेरे पुत्र बालक हैं । उनपर क्रोध करना आपको
शोभा नही देता । मैं जानता हूँ कि आप समस्त शास्त्रो एव पुराणो में पारंगत हैं । ऐसा
६

६६ रंगनाथ 'रामायण
कौन धर्म है, जिसे आप नहीं जानते । आपका सामना करके आपसे युद्ध करने की क्षमता
शिवजी में भी नहीं है । ऐसी दशा में दूसरो की शक्ति की वात कौन कहे ? हे परम-
पावन, देवेन्द्र भी आपकी कठोर प्रतिज्ञा को व्यर्थ नही कर सकता । आप हम सबको
क्षमा करके प्रसन्नता से गमन कीजिए ।"
दशरथ ने इस प्रकार कहकर प्रणाम किया और सिर झुकाकर चुपचाप खडे हो गये । फिर
भी परशुराम की आँखें क्रोध से लाल ही रहीं । उन्होंने अपनी प्रशसा में कहे हुए वचनो
को अनसुनी कर दिया और मन-ही-मन उन सबका दमन करने का विचार करके
अत्यंत क्रोध के साथ बोले—"जिस समय मे शिव के साथ धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था,
उस समय कार्तिकेय ने मुझसे युद्ध आरभ किया, पर वह मुझसे हार गया । तब शिव ने
भी मेरी शक्ति की प्रशसा की थी । उस शिव के धनुप का तोडना मै कैसे सहन कर
सकता हूँ ?"
तब रघुराम ने हँसते हुए कहा—"मैने विनोदार्य उस धनुप का सधान किया, तो
वह टूट गया । इतना ही नही, मेरे सधान करने

बालकांड ६७
देवताओ का मनोभाव जानकर शिव ने अपना धनुष देवरात को दिया । उन्होने वह धनुष
जनक को दिया । `विष्णु ने अपना धनुष रुचिक को दिया, रुचिक ने जमदग्नि को दिया
और जमदग्नि ने कृपा करके मुझे यह धनुष दिया । शिव का धनुष पहले ही थोड़ा-सा
टूटा हुआ था, इसलिए तुमने उसे तोडा होगा । हे राजन्, मेरे हाथ का यह धनुष उसी
धनुष के जोड का है । इसपर बाण-संधान करके अपनी शक्ति का परिचय दिये बिना
मैं तुम्हें यहाँ से हटने नही दूंगा ।”
इन वचनो को सुनकर दशरथात्मज अत्यत क्रुद्ध हुए । उनकी आँखो से अग्नि-कण
निकलने लगे । राम ने भार्गव राम से, जो उनकी शक्ति से अनभिज्ञ थे, कहा—“मै जानता
हूँ कि आपमें अतुल बल है । मै यह भी जानता हूँ कि आपने क्षत्रियो को परास्त करके
उनका वध किया है । किन्तु, आप मुझे भी दूसरो की तरह समझकर, निर्भय होकर डीग
मार रहे है । आपको मेरे भुज-बल का ज्ञान नही है । भला, आपकी शक्ति ही कितनी है ?
आपका यह धनुष क्या चीज है ? लाइए, देखूँ तो सही ।
इस प्रकार कहकर उन्होने (परशुराम के हाथ से) धनुष लेकर, उसकी प्रत्यचा
चढा दी और एक उग्र बाण-संधान करके कहा—“मै आपके पैर काटकर आपका गर्व-
भग करते हुए आपका क्रोध दूर करूँगा ।”
परशुराम भयभीत हो गये । उनका घमड चूर-चूर हो गया । उनकी हेंकडी जाती रही ।
तुरन्त बडी नम्रता से प्रार्थनापूर्वक कहने लगे—“हे राजेन्द्र, हे राम, मानवाधीश
मुझे क्षमा करो । मेरी रक्षा करो । मैने सारी पृथ्वी कश्यप को दान में दे दी है । अत.
में रात के समय इस पृथ्वी पर ठहर नही सकता । मुझे रात तक महेन्द्राचल पर पहुँच
जाना चाहिए । इसलिए तुम मेरे पैर मत काटो । (तुम चाहे तो) मेरे समस्त सचित
पुण्य पर यह बाण छोड़ दो ।”
तब राम ने वह बाण परशुराम के (सचित) पुण्य पर छोड़ दिया । देवता, सिद्ध,
खेचर आदि जड़वत् खडे भार्गव राम तथा क्रुद्ध काकुत्स्थ राम को देखते रहे । तब पुष्प-
वृष्टि हुई । स्वर्ग में रहनेवाले ब्रह्मादि देवता आनन्दित होकर राम की प्रशसा करने लगे ।
भार्गव राम राम को देखकर मन-ही-मन उनकी महिमा का विचार करके बोले—
“हे अनघ, मैंने तुम्हारी शक्ति को देख, मन-ही-मन विचार करके जान लिया है कि तुम
विष्णु हो । हे काकुत्स्थ, इसलिए युद्ध में हार जाना मेरे लिए स्वाभाविक ही है । तुम
मेरे बल हो, मेरी आत्मा हो, मेरे बधु-बाधव सब तुम ही हो । हे रामचन्द्र, तुम मेरे
कुवचनो का ख्याल मत करो । हे रघुकुलाधीश राम, तुम मेरी रक्षा करो ।”
इस प्रकार उन्होने राम की स्तुति की, मन-ही-मन रघुराम की महिमा गुनते हुए
उनकी परिक्रमा की और भक्ति से हाथ जोडकर, अत्यन्त विनय से राम की कृपा प्राप्त
करने के उद्देश्य से बोले—“हे राघव, हे जानकीनाथ, अब मुझे जाने की आज्ञा दो । मेरी
त्रुटियो का ध्यान न करके उन्हें क्षमा कर दो, मेरी रक्षा करो और स्नेह से मुझे जाने की
अनुमति प्रदान करो । में एकनिष्ठ होकर, अविचल रीति से नेत्र बद करके तुम्हारे प्रति
तपस्या करूँगा और ज्ञान प्राप्त करूँगा, जिससे सभी मुनि-समाज हर्षित हो जाय ।”

इस प्रकार राम की स्तुति करके, बड़े प्रेम से वे वहाँ से प्रस्थान करते हुए बोले-
'राम, तुम्हारी शक्ति अनुपम है।' उसके पश्चात् वे महेन्द्राचल पर चले गये। वरुण की
प्रार्थना मानकर रघुराम ने उसी क्षण परशुराम का धनुष उन्हें दे दिया।
तब अनुकूल पवन चलने लगा। सेना में फिर से उत्साह छा गया। नर तथा सुरों
की प्रशंसा प्राप्त करते हुए विजय-श्री से युक्त हो राघव ने अपने पिता महाराज दशरथ
तथा पुण्यात्मा वसिष्ठ को प्रणाम किया। राजा ने बड़े आनन्द से उन्हें गले से लगाकर
आशीर्वाद दिया और बोले-“मेरा पुनर्जन्म-जैसा हुआ है। तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करके
इस पृथ्वी पर मैं देवराज इन्द्र के समान बन गया। परम पावन परशुराम जब शिव की
तरह (भयंकर रूप लेकर) यहाँ आये, तब भय से मेरा सारा शरीर काँपने लगा और मैंने सोचा
कि अब कोई उपाय नहीं है। इसलिए मैंने उनसे विनती की। जब उन्होंने मेरे विनीत
वचनों को ठुकरा दिया, तब पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर मैं चुप हो रहा। (तुम्हारा) उनको
जीतना मेरे लिए बड़े आश्चर्य का विषय है। मैंने आज अतुल वैभव प्राप्त किया है।
तुम्हारे प्रताप के फलस्वरूप सारा भय दूर हो गया है। मैं इस संसार में यशस्वी हुआ।”
इस प्रकार, राम का अभिनंदन करने के उपरान्त राजा ने वसिष्ठादि मुनियों और सभी
सेनाओं को साथ लिये हुए बड़े आनन्द से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।
३८ अयोध्या में प्रवेश
मंगल-चिह्नों तथा पुण्यात्माओं के साथ, मंगल-वाद्यों की ध्वनि होते हुए, दशरथ ने
अपने पुत्रों-सहित बड़ी प्रसन्नता से अयोध्या में प्रवेश किया। अलंकृत राजमार्ग में, राज-
कुल के लोग तथा अन्य मित्र-वर्ग, सौधों पर से उन सुन्दर राजकुमारों को देखकर उनपर
पुष्प-वृष्टि करने लगे। भूसुर आशीर्वाद देने लगे। तब राजा ने अत्यन्त सुन्दर ढंग से
अलंकृत अंतःपुर में प्रवेश किया। कौसल्या कैकेयी तथा सुमित्रा आदि रनवास की सभी
स्त्रियाँ अत्यन्त हर्ष से उनके स्वागतार्थ आईं। उन्होंने उनपर फूलों की वर्षा की और उनकी
आरती उतारी। पुत्र तथा पुत्र-वधुओं ने उनके पैर छुए, तो उन्होंने उन्हें गले लगाकर
आशीर्वाद दिये। सीता आदि पुत्र-वधुओं का मधुर स्वभाव एवं कुशलता देखकर सभी संतुष्ट हुए।
दशरथ अपने चारों पुत्रों की सेवाएँ प्राप्त करते हुए, चतुर्भुज विष्णु के समान,
चार शृंगोंवाले स्वर्ग के हाथी (ऐरावत) के समान विलसित होते थे और बड़े आनन्द से
पुण्य की रक्षा करते हुए राज्य करने लगे। एक दिन दशरथ ने उचित समय देखकर
शुभ लक्षणों से संपन्न अपने पुत्र भरत को बुलाकर कहा-“हे वत्स, तुम्हारे मामा कैकय
तुम्हें अपने यहाँ ले जाना चाहते हैं, अतः तुम शत्रुघ्न के साथ उनके यहाँ जाओ और
उनकी इच्छा पूर्ण करो। हे वत्स, (वहाँ) अपने नाना, नानी, मामा तथा ब्राह्मणों के प्रति
भक्ति-युक्त विनय दरसाते रहना। उनकी परिचर्या करते हुए उनसे रथ चलाना, शस्त्र
चलाना, वेद-शास्त्र, नीति-शास्त्र तथा अन्य सभी कलाओं को सीखने में सतत तत्पर रहना।
एक क्षण भी व्यर्थ न बिताना और (समय-समय पर) अपना कुशल-समाचार भेजते रहना।”
राजा का आदेश पाते ही भरत ने माता-पिता तथा रघुराम को विनय से प्रणाम
किया और शत्रुघ्न को साथ लेकर अपने मामा के साथ राजगृह की राजधानी के लिए रवाना हुए।

बालकांड ६९
राजकुमारो ने अपने आगमन का समाचार अपने नाना को भेज दिया । उस राजा ने
अपने नगर को फूल-मालाओ, तोरणो तथा पताकाओ से सुदर ढग से सजाया । सुगंधित
जल से मार्गों का सिंचन करवाया तथा पुष्प एव धूप आदि से राजमार्ग को सुगधित किया ।
(फिर) मत्रियो, स्त्रियो तथा परिचारको को साथ लेकर तरह-तरह के वाद्य,
नृत्य, गीतो से युक्त हो राजा ने उनकी अगवानी की और वदी, सूत तथा मागध-जन की
स्तुति-वचनो के साथ अपने नाती को बडे स्नेह से अत पुर में ले आये । भरत ने अपने
नाना से लेकर क्रमश सभी गुरुजनो को प्रणाम किया और उनके आशीर्वाद प्राप्त किये ।
युवराज राम बडी कुशलता तथा एकाग्रता से, अपने पिता की सेवा करते हुए,
भी प्रजा को एक समान मानते हुए धर्म-निरत हो, सीता के साथ नव-वैवाहिक जीवन का
आनन्द प्राप्त करने लगे । वे अट्टालिकाओ पर, क्रीडा-सौधो में, चन्द्रकान्त शिलाओ पर, शीश-
महलो में, सोने के शयनागारो में, जूही की पुष्प-शय्याओ पर, चपक, पूग, नारियल, रसाल,
नारगी आदि वृक्षो से युक्त उपवनो में, क्रीडा-पर्वतो पर, सरोवरों में, लतागृहो में, धवल
वितानो में, बालुकामय भूमि पर, आमोद-प्रमोद के साथ रहते हुए, समस्त सुख-भोगो का
अनुभव करते रहे ।
इस प्रकार, आन्ध्र के भाषा-सम्राट्, काव्य तथा आगमो के ज्ञाता, आचारवान्, अपार
ज्ञान-समुद्र, भूलोक के लिए निधि-सम दीखनेवाले गोनबुद्ध राजाने अपने पिताश्रेष्ठ, धैर्यवा,न्
शत्रुओ के लिए काल-स्वरूप, महापुरुष, श्रेष्ठ शूर, दयालु, गुणवान् विट्ठलराजा के
नाम, आचन्द्रार्क विलसित होनेवाली, समस्त भूमडल में अत्यत पूज्य, अनुपम, ललित शब्दार्थों
से युक्त रस-सिद्ध रामायण के कला एव भावो से परिपूर्ण बालकाड की रचना की ।
आर्षग्रन्थ, आदि काव्य, रसिको को आनद देनेवाले तथा शाश्वत, इस पुण्यचरित्र
को जो कोई पढेंगे या सुनेंगे, वे सामादि वेद-समूहों का निवास-स्थान, रामनाम चिंता-
मणि, समस्त भोग, परहित आचरण, ऊँचे विचार, पूर्ण शक्ति, राज-सुख, विमल यश, चिर
सुख, धर्म-निष्ठा, दान में आसक्ति, चिरायु, स्वास्थ्य, समृद्धि आदि अवश्य ही प्राप्त करेंगे ।
उनके पापो का नाश होगा, पुत्र की प्राप्ति होगी, शत्रुओ का नाश होगा और धन-धान्य की
वृद्धि होगी । विना किसी प्रकार के विघ्न-बाधाओ के, उन्हें लावण्यवती धर्म-पत्नी का सह-
वास प्राप्त होगा । उनके भाई भी उन्नति प्राप्त करते हुए बडे स्नेह से हिल-मिलकर रहेंगे ।
देवता तथा पितर सदा तृप्त रहेंगे । यह रामायण मोक्ष-साधक है, पापहारी है,
दिव्य तथा भव्य है । शुभप्रद है । इस रामायण की पूजा नियम-पूर्वक करने से पुण्य प्राप्त होगा,
इसकी रचना करनेवालो की शुभ उन्नति होगी और स्वर्ग-लोक का निवास प्राप्त होगा ।
जबतक कुल पर्वत, समुद्र, रवि-चन्द्र, नक्षत्र, वेद, दिशाएँ तथा ससार शोभायमान रहेंगे,
तबतक यह कथा शाश्वत आनद-समूह का निवास-स्थान बनी रहेगी ।
. बालकांड समाप्त :

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श्रीरंगनाथ रामायण
(अयोध्या कांड)

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१ राम-राज्याभिषेक का संकल्प
महाराजा दशरथ अत्यन्त शुभप्रद रीति से राज्य का पालन करते थे । एक दिन
उन्होंने विचार किया, 'मेरा पुत्र राम, मेरे चारो पुत्रो में शुभ-गुणसपन्न, अतुल यशस्वी,
सदा दीन-दुखियो की चिन्ता करनेवाला, परहित का विचार करनेवाला, समस्त प्राणियो पर
दया दिखानेवाला, चारो पुरुषार्थो की सिद्धि के लिए यत्न करनेवाला, सतत सन्तुष्ट, प्रशंसा-
के योग्य गुणो से युक्त उचित क्रोध तथा प्रसाद गुणो से पूर्ण, शासन-शक्ति से समन्वित,
गज-तुरग आदि के आरोहण में दक्ष, विजयलक्ष्मी से समन्वित, चतुर, इच्छित कार्यों को
अविलंब सपन्न करनेवाला, दीर्घ कोप से रहित, सेवको पर कृपा रखनेवाला, अतिरथी,
ईर्ष्यारहित, करुणा-सिंधु, दूसरो के अच्छे-गुणो का आदर करनेवाला, बुद्धि में वृहस्पति को
भी परास्त करनेवाला, शुद्ध तेज में सूर्य के सदृश दीखनेवाला, प्रजारंजक, चन्द्र के समान-
शोभायमान, धनुर्वेद तथा वेदशास्त्रो में पारगत, न्याय के मार्ग से ही धनार्जन करने में निपुण,
क्षमा में पृथ्वी के समान ओर सकल-सद्गुण-सपन्न है। उसका राज-तिलक कर देना चाहिए।'
ऐसा विचार करके उन्होंने वसिष्ठादि महामुनि, सुमंत्र आदि सचिव, पास-पडोस के राजा,
मित्र, वधु, नागरिक, जनपद के लोग, आश्रित, बुद्धिमान्, सामत राजा, योद्धा, राजनीतिज्ञ

७४ रंगनाथ रामायण
आदि लोगों को राजसभा में बुला भेजा । उनके समक्ष राजा घन-गंभीर स्वर में बोले—
'हमारे पूर्वज इक्ष्वाकु-वंश के राजाओं ने बड़ी उत्तम रीति से इस पृथ्वी पर शासन किया था ।
उनके समान मैंने भी इस राज्य-भार को बड़ी क्षमता से वहन किया और आपके
सहयोग से निजकुल-धर्म में निरत होकर मैंने इसका पालन किया । यह विषय तो आपको
ज्ञात ही है । मैं आपसे और एक बात कहना चाहता हूँ । साठ हजार वर्ष तक मैंने इस
राज्य का पालन किया, सुंदर श्वेत छत्र की छाया में रहते हुए वृद्ध हो गया हूँ । भूमि-
भार की अपेक्षा वृद्धावस्था का भार मुझपर अधिक हो गया है । विकसित कमल के सदृश
मेरा शरीर कौमुदी के समान (पांडुर) हो गया है । केवल प्रताप बचा हुआ है । अतः,
प्रजा का पालन करने के लिए मैं अपने पुत्रकल्याण राम, देवता-हितकांक्षी धीमान्, इंदीवर-
श्याम, कोटिसूर्यप्रभावान्, सौंदर्य में मन्मथ को भी जीतनेवाले, जगदभिराम, राम का
राजतिलक कर देना चाहता हूँ और राज-भार से अवकाश लेना चाहता हूँ । क्या आप
इसको स्वीकार करेंगे ?'
घन-गर्जन को सुनकर हर्षित होनेवाले वन-मयूरों की भाँति सभासदों में अत्यधिक
उत्साह छा गया । कल-कल ध्वनि होने लगी । प्रजा में प्रमुख भूसुरों ने परस्पर परामर्श
करके सूर्यवंशी राजा से कहा—'हे राजन्, आपके श्रेष्ठवचन सब लोगों के लिए हितकर,
हृदयरंजक तथा अभीष्टदायक हैं । वे सब लोगों के लिए आनंददायक हैं । राजनीतिज्ञ,
निर्मल-धर्मनिपुण, जगत् के बंधु, दीनों के लिए कृपा-सिंधु, शांति-संपन्न, सत्यव्रती, सतत
विप्र-पूजा-निरत, सच्चरित्रवान्, नीति, प्रीति, निपुणता, क्षमा, ख्याति, ऐश्वर्य, कांति, दांति,
शांति आदि कितने ही सद्गुणों से आपसे भी श्रेष्ठ, लोकाभिराम राम को राजा बनाना
सर्वथा उचित है । वे तीनों लोकों का शासन करने में समर्थ हैं, फिर इस लोक का शासन
करना इनके लिए कौन बड़ी बात है ? हमारी भी यही इच्छा है कि आप उनका राज-
तिलक कर दें ।'
राजा ने ये बातें सुनीं, तो उनका हर्ष दूना हो गया । हर्षातिरेक से प्रफुल्लित
होकर वे वसिष्ठ तथा वामदेव को देखकर बोले—'हे अनघ, यह मधुमास अभीष्टप्रदायक है ।
अतः, हम इसी मास में राम को समस्त साम्राज्य-लक्ष्मी का राजा बनायेंगे । आप उचित
रीति से उसके लिए आवश्यक वस्तुएँ संचित करावें ।' ये बातें सुनकर ऋषियों ने अभिषेकार्थ
आवश्यक वस्तुओं का संचय करने के लिए आदमी भेजे ।
वसिष्ठ ने राजा की आज्ञा के अनुसार परिचारकों से कहा—'तुम लोग, श्रेष्ठ
स्वर्ण, रत्न, समस्त ओषधियाँ, चंदन, धवल पुष्प, मधु, घृत, खील (धान का लावा), नव
ललित-वस्त्र, राजा के लिए योग्य श्रेष्ठ रथ, स्वर्ण-रत्नजटित आयुध, शुभ लक्षणों से युक्त
भद्रगज, श्वेत अश्व विजन धवल छत्र, चामर, श्रेष्ठ पताके, एक सौ स्वर्ण कलश, स्वर्ण
शृंगों से युक्त श्रेष्ठ वृषभ, व्याघ्र-चर्म और अन्य आवश्यक मंगल-द्रव्य हवन-शाला में
ले आओ । नगर के द्वार, राज-पथ तथा सौध-शिखरों का अलंकार करो । समस्त नगर को
फूल-मालाओं, पताकाओं तथा तोरणों से सजाओ । कम-से-कम एक लाख भूसुरों (ब्राह्मणों)
के भोजन की व्यवस्था करो । दान-दक्षिणा आदि के लिए आवश्यक धन प्रस्तुत रखो ।

अयोध्याकांड ७५
पूजा तथा उपहारो से नगर-देवताओ की अर्चना करो । नगर के सभी निवासी तथा वेश्याएँ,
नगर के दूसरे फाटक के पास ढग से आकर खडे रहें । नगर के सभी सेवको को सेवा के
लिए उपस्थित रहने की सूचना दो ।' परिचारको ने वसिष्ठ के आदेशो का पालन करके
उसकी सूचना वसिष्ठ को दी ।
राजा ने सुमत्र आदि उत्तम सचिवो तथा सगे-सवधियो को अलग-अलग बुलाकर
उन्हें सकल्प कह सुनाया । उन्होने भी राजा के निश्चय का अनुमोदन किया । तब उन्होने
शीघ्र रघुराम को बुला भेजा और अपनी आंखो से स्नेह-सुधा की वृष्टि करते हुए कहा—
‘हे वत्स, प्रजा की प्रशसा प्राप्त करते हुए मैने दीर्घ काल तक राज्य किया । दान, धर्म
तथा यज्ञादि बडी निष्ठा से मैने पूरे किये और अत में तुम जैसे सद्गुण-सपन्न को पुत्र के
रूप में प्राप्त किया । अब मै राज का भार संभालने में असमर्थ हो रहा हूँ । इसलिए
मै तुम्हारा राज-तिलक कर दूंगा । परसो ही राज्याभिषेक के लिए उपयुक्त शुभ मुहूर्त्त है ।
सलिए तुम और सीता भक्ति के साथ उपवास करो ।’
तब राम ने राजा को देखकर विनय तथा साहस के साथ कहा—‘हे महाराज, मेरे
लिए आपके चरण-कमलो की सेवा से बढकर कोई दूसरा राज्य इस ससार में हो नही
सकता । आप अपने इन विचारो को त्याग दीजिए ।' तब राजा ने कहा—‘हे वत्स, तुम
पुण्य-चरित्र हो, पुण्य-धनी हो, सूर्यकुल के रत्न हो । तुम्हारे सिवा इस पृथ्वी का पालन
करने के लिए योग्य और कौन हो सकता है ? अत, हे अद्वितीय वीर । तुम इस राज्य-
भार को अवश्य संभालो ।'
राम ने उनकी आज्ञा के सामने सिर झुकाया और अपने महल में चले गये । राजा
भी सामन्त राजाओ, नागरिको तथा अन्य नातेदारो को विदा करके अपने महल में गये ।
(वहाँ पहुँचकर) उन्होने सुमत्र के द्वारा श्रीराम को बुलवाया, उन्हें अपने पास
बिठाकर, आनन्दाश्रु बहाते हुए बोले—‘हे मेरे भाग्य-निधि, हे मेरे पुण्य-स्वरूप, मेरे तप के
फल, हे मेरे पुत्र, मैने कुछ बुरे स्वप्न देखे है । मैने दुष्ट ग्रहो को तथा उल्का-
पात होते देखा है । अत मेरा मन बहुत व्याकुल हो रहा है । अभी तुम इस ‘पुण्य-योग’
में ही राज-तिलक कर लो । इससे मेरी इच्छा पूर्ण होगी । विलव क्यो ? तुम्हारी उन्नति
का समस्त ससार इच्छुक है ।'
रामचन्द्र ने पिता की आज्ञा शिरोधारण करके, उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा
लेकर वहाँ से विदा हुए । उन्होने अपनी माता, सुमित्रा तथा जानकी तथा लक्ष्मण को यह
समाचार सुनाकर उन्हें आनद-सागर में डुबो दिया । उसके पश्चात् पूर्ण-चन्द्रसदृश राम,
सीता के साथ प्रफुल्लचित्त से अपने महल में गये ।
इसके पश्चात् राजा ने वसिष्ठ से कहा कि आप राम के उपवास के लिए विधिवत्
सकल्प कराइए । तब वसिष्ठ ब्रह्मा-रथ पर आरूढ हो रामचन्द्र के महल के लिए रवाना हुए
और अपने आगमन का समाचार देने के लिए एक शिष्य को पहले ही भेज दिया ।
उनके तीसरे फाटक तक पहुँचते-पहुँचते राम उनके स्वागतार्थ आ पहुँचे और वडी भक्ति
से उस पुण्यात्मा को प्रणाम किया और बड़े हर्ष से उन्हें अत पुर में ले गये । वहाँ उन्होने

१५६ रंगनाथ रामायण
उस लोकवंद्य का उचित आदर-सत्कार किया। वसिष्ठ ने पुण्याह-वाचन कराया और पुष्य-
संकल्प-पूर्वक उपवास व्रत का प्रारंभ कराया। दक्षिणा के रूप में राम से दस हजार गायें
लेकर वसिष्ठ ने सारा समाचार राजा को कह सुनाया और घर चले गये।
राम ने बड़े प्रसन्नचित्त से सीता के साथ स्नान आदि से निवृत्त होकर विष्णु की
प्रीति के लिए हवन किया, हवन-शेष को ग्रहण किया और वसिष्ठ के आदेश के अनुसार
विष्णुगृह में कुशासन पर एकनिष्ठ हो विष्णु का ध्यान करते हुए उपवास करते रहे।
अयोध्या में लोग बड़े हर्ष से आनंदोत्सव की तैयारी में लग गये। कोई मोतियों
से चौक पूर रहा था, तो कोई अपने घरों का अलकार कर रहा था। कोई मणिमय तोरण
सजा रहा था, तो कोई फूलों से वितान बना रहा था। कुछ लोग झंडे लगा रहे थे।
कुछ जहाँ-तहाँ फूल-मालाएँ लटका रहे थे। कुछ एक दूसरे के अलकरण में मग्न थे। कही
लोग दशरथ की प्रशंसा कर रहे थे, तो कही इष्ट देवताओ की पूजा कर रहे थे। कुछ
दान-पुण्य कर रहे थे और पुण्य कथा-गोष्ठियो में भाग ले रहे थे। जहाँ-तहाँ लोगो की
भीड़ एकत्रित होकर राम के गुणों का गान कर रही थी। लोग उनकी सेवा करने के
लिए आतुरता प्रकट करते थे और भगवान् से राम को ही राजा बनाने की प्रार्थना कर
रहे थे।
२ 'मंथरा की कुमंत्रणा
उसी समय कैकेयी की दासी मथरा ने रनवास की छत पर से नगर का यह
आनंदोत्सव देखा। वह सोचने लगी—'क्या कारण है कि आज नगर अद्भुत साज-सज्जा से
परिपूर्ण है। सभी नगरवासी सजे-धजे तथा प्रफुल्ल दिखाई पड़ रहे हैं। कौसल्या के
अंत पुर की सभी स्त्रियाँ सुसज्जित होकर आनंद-मग्न हो रही हैं। जाने किस कारण से
आज कौसल्या अगणित धन व्यय कर रही है।' उसने आनंद में मग्न राम की धाय से
पूछकर यह जान लिया कि राम के राज-तिलक के लिए ही सारे नगर में उत्सव मनाया
जा रहा है। तब उसने निश्चय किया कि बाल्यावस्था में रामने जो मेरी टाँग तोड़ दी थी,
उसका बदला लेने का यही अच्छा अवसर है। इस प्रकार सोचकर वह रानी कैकेयी
को सारा वृत्तांत सुनाने के लिए उनके महल में गई। उस समय पद्मलोचना कैकेयी
अपने क्रीड़ा-घर में हिंडोले पर लेटी थी। मथरा ने उससे कहा—'उठिए महारानी, आपको
किसी बात की चिंता ही नहीं है।' यो कहते हुए उसने कैकेयी का हाथ पकड़कर उसे
उठाकर बैठाया और त्रिया-चरित्र रचती हुई बोली—'आप तो यह कहते हुए फूली न
समाती थी कि राजा मुझसे ही अधिक प्रेम रखते हैं। वह झूठा सिद्ध हो गया है।
महाराजा ने अपनी बड़ी रानी के भय से आपको भ्रम में डालकर, भरत को परदेश भेज
दिया है और रघुराम का राज-तिलक करने की बात सोच रहे हैं। यदि यही बात हुई, तो
आपका जीवन निरर्थक है। राजाओ का विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। आप फूली-
फूली क्यो फिरती हैं? ऐसा क्रूर, वंचक और कपटी पुरुष मैने कही देखा नहीं है। वे
कैसे आपके पति हैं? वे तो आपके क्रूर शत्रु हैं। यदि आप अपनी सौत के पुत्र को
समस्त पृथ्वी का राजा बनने देंगी, तो आपको, आपके पुत्र को तथा मुझे, दुःख के सिवा

सुख नही मिलेगा । आपकी भलाई का विचार करके आपके पिता ने मुझे भेजा, तो स्नेह
के कारण मैं यहाँ आई हूँ । आपकी भलाई मेरी भलाई है, आपका अभाव मेरा अभाव है ।
मैने आपकी भलाई की बात आपसे कह दी । आप ऐसा कोई यत्न कीजिए जिससे कि
आपका पुत्र इस ससार में जीवित रहे ।'
कैकेयी ने ये बातें सुनी तो अत्यन्त हर्ष से उसकी प्रशसा करते हुए उसे गले से
लगा लिया और कहा--'हे सखी ! राम के राज-तिलक का शुभ समाचार देकर तुमने मेरे
कर्णपुटों में सुधावृष्टि-सी कर दी । तुम्हारे साथ मेरी मित्रता आज सफल हुई । अब तुम
अपने वक्र वचनों को छोड़ दो । भरत की अपेक्षा उसका अग्रज मेरे प्रति विशेष श्रद्धा
रखता है । तुमने यह शुभ-समाचार मुझे देकर बहुत अच्छा किया ।' इस प्रकार कहकर
उसने मथरा को नवरत्न-खचित अपने सोने का कडा उपहार के रूप में दिया । किन्तु, उस
कपट स्त्री ने उस कडे को दूर फेंककर अपने पापपूर्ण हृदय का क्रोध एव जलन प्रकट
करते हुए कहा--'हे कैकेयी । आप मन-ही-मन फूली हुई है, मानो कोई उत्तम कार्य
हो रहा है । आपने यह उपहार मुझे किसलिए दिया ? आपकी भलाई के लिए जो परामर्श
मैने दिया, उसके विषय में विचार किये बिना ही आप ऐसा प्रलाप क्यो करती है ? मै आपके
स्वभाव के बारे में क्या कहूँ ? क्या अपना अहित करनेवाला धर्म, कोई धर्म है ?
आँखो को हानि पहुँचानेवाला काजल किस काम का ? कही इस ससार में ऐसे भी लोग है,
जो सौत के पुत्रो के हित की कामना करते हैं ? यदि आपकी सौत का पुत्र साम्राज्य
का स्वामी हुआ, तो सभी राजा, नानेदार, प्रजा तथा मत्री राम की सेवा में लगे रहेंगे ।
गज, तुरग आदि सेना उनके वश में हो जायगी । उसके पश्चात् दशरथ भी स्वतन्त्र नही
रह सकेंगे । तब शशिमुखी कौसल्या समस्त ऐश्वर्य का उपभोग करेगी और आप उनकी सौत
होती हुई एक पगली की तरह कैसे रह पायेंगी । इतना ही नही, आपको उनकी आज्ञा
का पालन करते हुए उनकी दासी बनकर रहना पड़ेगा । भरत को उस रघुपति से भय
खाते हुए एक भृत्य के समान रहना पड़ेगा । आपकी पुत्रवधू को राज-रानी सीता की
सेवा करनी पड़ेगी । यदि यही हुआ, तो आपका जन्म निरर्थक हुआ । इसका उपाय यह है
कि राम को वनवास के लिए भिजवा दीजिए और भरत का राज-तिलक करवाइए ।'
तब कैकेयी बोली--'हाय, महाराज मुझे इतनी स्वतन्त्रता क्यो देने लगे ? मैं उनसे
ऐसी प्रार्थना कैसे करूँ ? करूँ भी तो वे मेरी प्रार्थना क्यो मानेंगे ? यह कैसी बात है ?
तुम जो भी कहो, यह काम नही होने का । मैं राम से कैसे कहूँ कि तुम वन में जाकर
निवास करो ।'
तब मथरा अपनी पाप-बुद्धि को प्रकट करती हुई बोली--'हे सुन्दरी, क्या आप
इस बात को भूल गई कि शवरासुर और इंद्र के युद्ध में इंद्र की सहायता करने के लिए
अपनी सेनाओ के साथ जाते समय राजा आपको भी अपने साथ ले गये थे । महाराजा
दशरथ ने रात्रि के समय उस राक्षस का सामना किया था । राक्षस ने क्रोध में आकर
विभिन्न प्रकार की मायाओ से राजा का वध करने का प्रयत्न किया था, किन्तु आपने
धवलाग नामक मुनि की कृपा से प्राप्त शक्ति की सहायता से उस राक्षस की मायाओ को

७८ रंगनाथ रामायण
दूर कर दिया था और राजा को उस राक्षस के तेज बाणो से आहत होने से बचाया था ।
राजा ने सतुष्ट होकर आपको दो वर दिये थे । आपने ही खुद यह सारा वृत्तात मुझे
सुनाया था । भले ही आप इसे भूल जायें, मैं कैसे भूल सकती हूँ ? अत आप राजा से
दो वर माँगिए—एक तो यह कि कौसल्या का पुत्र राज-पाट छोडकर चौदह वर्ष तक मुनियो
का-सा जीवन व्यतीत करते हुए भयकर वनो में रहे, और दूसरा, आपका पुत्र इस पृथ्त्री
पर शासन करे । आपके वर माँगने पर राजा बहुत गिडगिडायेंगे । फिर भी, आप मूर्ख
के समान मत रहें । सत्य की दुहाई देकर दृढ सकल्प से आप इस कार्य को सिद्ध
कर लीजिए । आपके पति असत्य से डरते हैं, उसपर भी आपसे उनका अत्यधिक प्रेम हैं।
इसलिए वे आपके वचनो का अतिक्रमण नही करेंगे । अवश्य आपकी बात मान लेंगे ।”
इन बातो से प्रसन्न होकर कैकेयी ने मथरा से कहा-'तुम्हारी जैसी सखी, साथिन
और गुणवती को मैंने कही नही देखा है । हे उत्तम नारी, जिन वरो के सबध में मैंने
तुमसे कहा था, उन्हें तो मै भूल ही गई थी । तुमने जैसे सोचा, वैसे मेरा पुत्र यदि इस
समस्त पृथ्दी का राजा बनेगा, तो मै तुम्हारे कूबड़ को शुद्ध स्वर्ण से अच्छी तरह सजाऊँगी,
तुम्हारे मुख-चन्द्र पर कस्तूरी-तिलक करूँगी और तुम्हारे शरीर पर असख्य आभूषण पहनाकर
तुम्हें अलकृत करूँगी । हे सखी ! इस प्रकार सज-धजकर तुम मन्मथ की स्त्री के समान
विचरोगी, तो सभी दासियाँ तुम्हारी आज्ञा का पालन करती रहेंगी । मैं ऐसी व्यवस्था
कर दूंगी ।'
इस प्रकार, मथरा से प्रिय वचन कहने के पश्चात् कैकेयी अपने कक्ष में चली गई ।
उसने अपने समस्त आभूषण उतार दिये, माथे पर कस्तूरी का गाढा लेप लगाया, मलिन
वस्त्र पहने और अत्यन्त क्रोध धारण किये फर्श पर पड़ी रही । अपनी मत्रणा की सफलता
से सतुष्ट होनेवाली मथरा को देखकर कैकेयी बोली—'जबतक राजा राम को बुलाकर
उसे वन में जाने की आज्ञा देकर नही भेजेंगे और भरत का राज-तिलक नही
करेंगे, तबतक मैं अन्न-जल नही ग्रहण करूँगी । जितने भी स्वर्णाभूषण दें, मै उन्हें नही
लूंगी और यहाँ से हटूंगी भी नही ।' यो कहते हुए वह मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध होकर
पडी रही ।
३ कैकेयी के महल में दशरथ का आगमन
राघव के राज-तिलक का समाचार कैकेयी को सुनाने के उद्देश्य से दशरथ उस दिन
रात को वहाँ (कैकेयी के महल में) आये । स्वर्ण-रत्नजटित किवाड़ो तथा कक्षो, कस्तूरी,
चदन, कर्पूर की सुगधि से युक्त तथा नाना रत्नो की कान्ति से सुशोभित सौधो को पार
करके वे रग-महल के निकट पहुँचे । कैकेयी को वहाँ न देखकर दशरथ ने सेवक से पूछा ।
उसने दुःख प्रकट करते हुए हाथ जोडकर कहा—'देव ! देवी न जाने किस कारण से
कोप-भवन में चली गई हैं ।'
ये बातें दशरथ के कानो को धनुष की उग्र टकार की भाति भयकर लगी । उनका
मुँह पीला पड़ गया । कैकेयी के प्रति उनका प्रेम द्विगुण हो उठा । धीरे-धीरे उन्होने
कोप-भवन में प्रवेश किया और स्वर्ग-लोक से पृथ्वी पर उतरकर वहाँ लेटी हुई अप्सरा

अयोध्याकाण्ड ७६
की भाँति, केशो को फैलाये फर्श पर पडी हुई कमलमुखी कैकेयी को देखकर राजा सन्न
रह गये । उन्हें बडी वेदना का अनुभव हुआ । बडे दीन भाव से वे उसके निकट पहुँचे,
उसके शरीर का स्पर्श करके देखा और काम-पीडित होकर उससे प्रार्थना करने लगे—
“हे कमलाक्षी, हे चन्द्रवदनी, हे भ्रमरो के-से केशवाली, इतना कोप क्यो ? अत्यत मृदु
पर्यंक पर लेटनेवाली, तुम्हें लेटने के लिए यह कडी भूमि क्यो ? कोमल दुकूलो के रहते,
तुमने ऐसे मैले वस्त्र क्यो पहने हैं ? कनकशलाका-सी अपनी देह पर तुमने आभूषण धारण
क्यो नही किये ? उदधि-सुत चन्द्रमा की चाँदनी के समान उज्ज्वल तुम्हारे ललाट पर यह
लेप क्यो ? तुम्हारे मन में ऐसा विचार क्यो उत्पन्न हुआ ? प्रतिदिन की भाँति तुम अपने घने
तथा नीले केशो में माँग काढकर उन्हें सजाती क्यो नही ? पद्मराग मणि की लालिमा
को परास्त करनेवाले अपने अरुणाधरो को तांबूल-चवण स अलकृत क्यो नही करती ?
तुम्हारे मुख-चन्द्र में स्वर्ण-पुष्पो के समान प्रफुल्लित होनेवाली मुस्कान क्यो नही दीखती ?
हे प्रिये, किसलिए तुम मन छोटा किये हुए हो ? इतनी सतप्त क्यो हो ? क्रिसने तुम्हें
कटुवचन कहे ? किसने तुम्हारी बातो का विरोध किया ? हे कमलनयनी । उनके नाम
बताओ । चाहे वे कोई भा हो, में उन्हें दण्ड दूंगा ।” इस प्रकार कहते हुए आँखो में
उमडनेवाले आँसुओ को पोछते हुए वे बोले—“हे सुन्दरी, एक अनाथ की तरह तुम इस
प्रकार भूमि पर क्यो लोट रही हो ? बताओ कि यह काम-पीडा है अथवा किसी भयकर
रोग का प्रकोप है ? क्यो सकोच कर रही हो। कहो तो वैद्य आकर तुरत तुम्हें स्वस्थ करेंगे ।
हे ललितागी ! तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो, मैं उसे पूरा करूँगा । तुम्हारे
लिए मै अवध्य पुण्यात्माओ का भी वध करूँगा । वध्य दुर्जनो को दण्ड देकर तुम्हारी
बात रखूँगा । यदि तुम चाहो, तो रक को राजा बनाऊँगा । तुम्हारे क्रोध का पात्र धनी को भी
दरिद्र बनाऊँगा । जब मैं और मेरे परिवार के अन्य लोग तुम्हारी इच्छा के अनुसार चलने
के लिए तैयार है, तब इस प्रकार क्यो रहती हो ? हे सुन्दरी ! मेरी बात सुनो, किंचित्
मुँह उठाकर मेरी ओर देखो, ताकि मुझे शांति मिल जाय । तुम चाहो तो मे अपने प्राण
भी देने को प्रस्तुत हूँ ।”
दशरथ की ये बातें सुनकर कैकेयी प्रसन्न हुई । वह अपने पति का प्रेम जानती
ही थी इसलिए उसने क्षीण स्वर में राजा से कहा—‘हे देव ! यदि मुझे यह वचन दें
कि आप मेरे कथन के अनुसार कार्य करेंगे, तो मैं अपने मन की इच्छा कहूँगी ।’
राजा ने कहा—‘जो धनुर्विद्या में असमान है, जो धर्म का पालन करता है, जिसे
बिना देखे मैं एक क्षण भी जी नही सकता और जिसको मैं निरंतर भक्ति से भजता
रहता हूँ, उस राघव की सौगंध खाकर कहता हूँ कि मै तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा ।’
कैकेयी ने पवन, अग्नि, शशि तथा नभ को साक्षी के रूप में मानते हुए दशरथ
के मन की आतुरता का ज्ञान रखते हुए निष्ठुर होकर कहा—‘हे राजन् ! आपने देवासुर-
युद्ध में मुझे दो वर दिये थे । कदाचित् आप उन्हें भूल गये हैं । मैं अब उन दोनो वरो
को माँगना चाहती हूँ ।’

६० रंगनाथ रामायण
४. दशरथ से कैकेयी का वर माँगना
'आप रविकुल में उत्पन्न महाराज हैं । उस कुल के प्रथम राजाओ की अपेक्षा आप
अधिक पुण्यात्मा है। आप असत्य नही कहेंगे और अपना वचन भी नही छोड़ेंगे । अत,
मुझे वे दोनो वर दीजिए । पहले वर से आप भरत का राज-तिलक कर दीजिए, और
दूसरे वर से आप राम को चौदह वर्ष तक तपस्वी के रूप में वन में निवास करने के लिए
भेज दीजिए ।'
इन वचनो को सुनते ही राजा स्तम्भित रह गये । दुख से वे तुरत मूर्च्छित
हो गये । बहुत समय के वाद उनकी चेतना लौटी तो वे बोले- "हे कोमलांगी, कैकय-वश
में जन्म लेकर इस प्रकार के वचन तुम्हारे मुंह से कैसे निकले ? राम ने तुम्हें क्या हानि
पहुँचाई है कि तुम राम को अरण्य-वास देना चाहती हो ? वह कौसल्या की अपेक्षा तुम्हें
अधिक मानता है, तुम्हारी सेवा करता है और तुम्हारा आदेश मानता है । ऐसे सद्गुण-
सपन्न राम को निष्ठुर होकर वन जाने का आदेश कैसे देती हो ? तुम्ही कहो, मै उसे वन
जाने का आदेश कैसे दे सकता हूँ ? ऐसे महापुरुष राम को जगल भेजने के वाद मेरे प्राण कैसे
टिके रहेंगे ? तुम राजपुत्री हो, ऐसा समझकर मैने तुम्हारा पाणिग्रहण किया था । किंतु
तुम काली नागिन सिद्ध हो रही हो । तुम चाहो, तो मैं अपना सारा राज्य और अपने
प्राण दे दूंगा, किंतु राम को वन जाने का आदेश न दे सकूंगा । इस वृद्ध, दीन, अनाथ
तथा दुर्बल को दुःख से बचाओ । मै तुम्हारे चरणो को प्रणाम करता हूँ। मैं राम के वियोग
में जीवित नही रहूँगा । इसलिए इस पाप-कल्पना को छोड़ दो ।"
तब कैकेयी क्रोध में आकर कहने लगी - "हे राजन् ! आप सत्यनिष्ठ, पराक्रमी
और ओजस्वी है । ऐसे आपको असत्य कहना क्या शोभा देता है ? आपने इतने सारे
देवताओ के समक्ष सौगध खाई है । आप कैसे राजा है ? एक कबूतर के लिए शिवि ने
अपने शरीर का सारा मास काटकर वाज को दे दिया था । क्या आप इसे नही जानते ?
क्या अलर्क नामक राजा ने वडे प्रेम से क्षोणिदेव को अपने नेत्र नही दिये थे ? क्या
उत्तुग लहरो से युक्त समुद्र, वेला की मर्यादा के भीतर आवद्ध नही हुआ ? उनको छोड़
दीजिए । आपके पूर्वज कौतुक के लिए भी, स्वप्न में भी, कभी झूठ नही बोले । आप
इक्ष्वाकु-वश के होते हुए भी कौसल्या के भय से असत्य-भाषण करते है । असत्यभाषी
कही पुरुष कहलाने योग्य है ? आपने असत्य कहा । अब आप मुझे पा नही सकते । मै
अब स्वतंत्र होकर विष-पान करूँगी और मर जाऊँगी । उसके पश्चात् आप भरत का वध
करा दीजिए और राम का तिलक करके कौसल्या के साथ सुख से रहिए ।"
इस प्रकार के कैकेयी के कटुवचनो से राजा अत्यत सतप्त हो गये । उनके मुख
की काति जाती रही, उनका विवेक जाता रहा । वे कैकेयी से बोले- "हे कैकेयी ! तुम्हारे
मन में ऐसी पाप-कल्पना और ऐसी मन्द बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई । ज्येष्ठ के रहते हुए कही
कनिष्ठ अविनीत होकर पृथ्वी का पालन करेगा ? इतना क्यो, तुम्हारा धर्म-निरत भरत
तुम्हारे इस पाप-पूर्ण वचन को कैसे स्वीकार करेगा ? हमारे कुल की रीति का विचार करो ।
शोक-पीड़ित मुझे निष्ठुर होकर मत मारो । सतत गृहिणी-धर्म का पालन करते हुए,

[Header] श्रीअयोध्याकांड ८१

भक्ति और हित का विचार करते हुए सखी की तरह, माता के समान, दासी की
भाँति, बहन की-सी, भिन्न-भिन्न प्रकार से मेरी सेवा करनेवाली कौसल्या अपने पुत्र के
वियोग में कसे जीवित रह सकेंगी ? सौदामिनी तथा लता-सदृश शरीरवाली वैदेही किस
प्रकार यह दुख सह सकेगी ? सौमित्र तथा उसकी माँ इस दुःखद समाचार को कैसे सहन
कर सकेंगे ? राम के राज-तिलक की अपेक्षा करनेवाले नागरिक जब उत्सव मनाने में
संलग्न हैं, तब यदि मैं राम को वन भेज दूँ, तो क्या वे नागरिक मुझे अपशब्द नहीं कहेंगे ?
अपनी इस प्रार्थना से समस्त लोगो का अहित करते हुए तुम कौन-सा सुख भोगोगी ?
एक बात और है । हे रमणी ! तुम उसे अवश्य सुनो । कमल के-से नेत्रवाले, मधुर
मुस्कान से युक्त मुखवाले, बलिष्ठ, आजानुबाहु, चंद्र-सम सौंदर्यवाले, नीलोत्पल की-
सी शरीर-कान्तिवाले, शीतल दृष्टियो को विकीर्ण करनेवाले, सुधा-सम वचन बोलनेवाले,
सदा बुधजनो का हित ही सोचनेवाले, सतत मेरी सेवा में संलग्न रहनेवाले, धर्म-रूपी,
भार्गव राम को जीतनेवाले, सद्गुण-संपन्न, सौंदर्यवान्, शांतधाम, रवि-सम उज्ज्वल, राम को
छोड़कर मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकूँगा । हे कमलाक्षी ! ऐसे राम को क्या तुम
नहीं जानती ? उस उत्तम पुरुष को वन भेजते ही मेरे प्राण निकल जायेंगे । तुम कितनी
पापिन हो ? कितनी कठोर हो ? कितनी मूर्खा हो ? कितनी भयंकर राक्षसी हो ? हे
क्रूर नारी ! तुम्हारे मन में इतना कल्मष क्यों है ? साध्वी होते हुए मूर्खा की तरह क्यों
ऐसी इच्छा करती हो ? तुम प्राणापहरण करनेवाली काल-रात्रि हो, स्त्री नहीं ।
राम कैसे पैदल वन में जायगा ? सबसे विलग होकर वन में कैसे रहेगा ? सुकोमल
शय्या पर शयन करनेवाला पुरुष तृण-शय्या पर किस प्रकार सो सकेगा ? बंधुओ के साथ
पंक्ति में बैठकर अपना इच्छित भोजन करनेवाला राम, कंद-मूल का आहार कैसे पसंद
करेगा ? हे रमणी ! तुम अपने परम भक्त राम का बुरा मत सोचो । उसे क्षमा करो ।”
इस प्रकार प्रार्थना करते हुए दशरथ बडे दुख के साथ उसके पैरो पर गिर पड़े ।
लेकिन उसने अपने पैर हटाते हुए उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की । तब राजा भूमि पर
गिर पड़े और लोटने लगे । किन्तु कैकेयी ने उसकी भी परवाह किये बिना ही राजा
दशरथ को देखकर कहा—'हे राजन् ! अब इन कपट-वचनों को बंद कीजिए । अब व्यर्थ
के छल-कपट से कोई लाभ नहीं होगा । धर्म को त्यागिए, सत्य को छोड़ दीजिए और
अपने निर्मल यश को मिट्टी में मिलाकर असत्य वचन कहिए कि मैंने तुम्हें वर नहीं दिये ।
उसके बाद आप अपने पुत्र तथा पत्नियों के साथ सुख से रहिए । मैं अपने पुत्र भरत
के साथ प्राण तजूँगी ।'
तब राजा बिना प्रत्युत्तर दिये, मन-ही-मन दुःखी होते हुए, सिर झुकाये बैठे रहे ।
इतने में प्रभात हो गया । मंगल-वाद्य बजने लगे । वन्दी-जन के स्तुति-पाठ होने लगे ।
राम-सीता ने कर्पूर-चन्दन की सुगन्धि से सुवासित जल में स्नान किया, दिव्य वस्त्राभरण
पहने और शची-समेत इन्द्र के समान पूर्ण तेजस्वी दिखाई देने लगे । अभिषेक-मण्डप में
वसिष्ठ आदि मुनि अरुंधती आदि सुमंगलियां, धीमान् मंत्री तथा अन्यान्य चक्रवर्त्ती राजा
विराजमान थे । वसिष्ठ ने पंचपल्लव, पंचवल्कल, पंचामृत, भद्रगज ( राजा का हाथी ),
११

८२ रंगनाथ रामायण
आठ कन्याएँ, हेम ऋक्ष, औदुम्बर (गूलर) की पीठिका, गङ्गादि तीर्थों का जल तथा अन्य मंगल-
वस्तुओ को मँगाया, श्रेष्ठ रत्नाभूषणो को वेद-विधि से दान कराया, एक लाख कन्याएँ,
एक लाख गायें, एक लाख ऊँट मँगाये, जप आदि कराया, गाति-पाठ कराया, हवन आदि
सम्पन्न किया और शुभ मुहूर्त को आसन्न देखकर राजा को लिवा लाने के लिए सुमंत्र को
भेजा ।
सुमंत्र कैकेयी के अंतःपुर में गया और शयन-कक्ष के किवाड़ के पास खड़े होकर
निवेदन किया —'हे देव ! सूर्योदय हो रहा है । श्रीराम के राज-तिलक का मुहूर्त निकट
आ रहा है । अतः आप शीघ्र पधारें । हे राजन् ! अभिषेक-मण्डप में मुनि, राजा तथा
अन्य महात्मा उपस्थित हैं । पुरजन विबुध तथा नातेदार आपके आगमन की प्रतीक्षा कर
रहे हैं ।'
इन बातो को सुनकर राजा सोचने लगे—'अब तुम भी मुझे दुःख पहुँचाने के लिए
आये हो, मानो अब तक मुझे कोई दुख ही नही है ।' यो सोचकर वे चुपचाप लेटे रहे ।
तब कैकेयी ने सुमंत्र से कहा—'तुम शीघ्र जाकर राम को यहाँ ले आओ । यह राजा
का आदेश है ।' तुरत सुमंत्र वहाँ से चला गया ।
सुमंत्र कैकेयी के अंतःपुर से उस राज-मार्ग से जाने लगा, जो शीतल चंदन-जल से
सिंचित आँगन, ध्वजाओ से अलंकृत गृहो, चंदन, अगरु तथा धूप से सुगंधित वायु, मंद पवन
से डोलनेवाली पुष्प-मालाओ, प्रत्येक गृहद्वार पर स्थापित कदली-वृक्षो, अतुलित मणि-तोरणो
और उत्साह-पूर्ण पुरजनो से भरा हुआ, दुर्गम दीख रहा था । उस मार्ग से होकर वह
रामचन्द्र के उस अंतःपुर के पास जा पहुँचा, जो इन्द्र-भवन का भी परिहास करता हुआ
कुवेर के महल के समान अतुल वैभव-लक्ष्मी से समन्वित था । वहाँ पहुँचकर उसने राम
को अपने आने का समाचार कहला भेजा और उनकी अनुमति पाकर भीतर गया । वहाँ
उसने तारा से सुशोभित शशि के समान दीखनेवाले, सीता से युक्त रामचंद्र को देखकर
उन्हें प्रणाम किया और कहा—'हे देव ! महाराज दशरथ देवी कैकेयी के गृह में आपको
लिवा लाने के लिए मुझे भेजा है ।'
राम मुस्कुराते हुए जानकी को वही छोड़कर लक्ष्मण के साथ रथ पर आरूढ़ होकर
कैकेयी के महल की ओर रवाना हुए । उनके पीछे चतुरगिणी सेना चली । अतुल वाद्य
बजने लगे, वन्दीजन स्तुति-पाठ करने लगे और सुमङ्गलियाँ पुष्प-वर्षा करने लगीं । नगर-
निवासी जयजयकार करने लगे । इस प्रकार, वे बड़े वेग से राजा के अंत पुर के पास जा
[L3

अयोध्याकांड ५३
मेरी ओर देखते भी नही हैं। मेरा क्या अपराध हैं ? यह खिन्नता, यह चिंता और दुख
राजा को किस कारण से हो रहे हैं ?' तब कैकेयी ने कहा—'हे राम, यदि तुम मानोगे,
तो मैं राजा की इच्छा तुम्हें बतलाऊँ ।' रघुराम ने कहा—'हे माता, आप कृपया विस्तार
से सुनाइए कि वह कौन-सी बात है ? मैं पिता के आदेश से भयंकर अग्नि-ज्वालाओ में
या विष के समुद्र में कूद सकता हूँ या विष भी खा सकता हूँ । इसको सत्य मानें और
बिना संकोच के कहें ।'
तब कैकेयी राम को देखकर किंचित् भी ममता-मोह के बिना बोली—'देवासुर-
संग्राम में राजा ने दया करके मुझे दो वर दिये थे । अब मैंने उन दोनों वरों को देने की
प्रार्थना की । एक वर से मैंने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य माँगा और दूसरे से तुम्हें
चौदह वर्ष तक वन-वास देने की प्रार्थना की । राजा ने वर देना तो स्वीकार किया,
किन्तु तुम्हें अपना आदेश सुनाने में हिचकते हैं । यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे पिता को
असत्य-भाषण का दोष न लगे, तो तुम तुरत राजकुमार का वेष त्याग दो और वल्कल
तथा जटाएँ धारण करके तपस्वी के रूप में वनवास के लिए चले जाओ ।'
इन बातों को सुनकर राम के मुखपर मंद हँसी लास्य करने लगी । उनके वचनों
म किसी भी प्रकार का मालिन्य नहीं आया । दया, त्याग और गरिमा दिखाते हुए परम
पुण्यात्मा रामचंद्र बोले—'हे माता, इस प्रकार की आज्ञा देनेवाले सूर्यवंश के तिलक मेरे
पिता हैं और राज्य का अधिकारी होगा मेरा भाई । फिर, आपकी इच्छा में बाधा क्यों पड़े ?
हाय ! आप कितनी भोली हैं ! इस छोटी-सी बात के लिए सूर्यवंशी राजा को मन
में चिंतित होने की क्या आवश्यकता है ? अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं करने-
वाला कहीं पुत्र कहलाने योग्य है ? वह तो एक जाति-विरोधी है । मेरे और मेरे भाई
में कोई भेद नहीं है । इस पृथ्वी का भार वहन करने के लिए जिस पुण्यात्मा को आपने
नियत किया है, उस भरत के लिए मैं अपने प्राण भी देने के लिए प्रस्तुत हूँ, इस राज्य
की क्या गिनती !'
राम की बातों से अत्यंत हर्षित होकर कैकेयी बोली—'हे राजकुमार, तब मैं भरत
को बुला भेजूँगी । तुम तुरंत वन के लिए रवाना हो जाओ । यहाँ से तुम्हारे जाने तक
महाराज न भोजन करेंगे, न बोलेंगे, न उठेंगे ही । वे इसी प्रकार पड़े रहेंगे ।'
कैकेयी के इस प्रकार कहते ही राजा ने कहा—'हाय, ऐसी कटूक्तियाँ भी क्या
उचित हैं ? और वे तुरंत मूर्च्छित हो गये । तब राम ने तुरंत उन्हें पकड़ लिया और
शैत्योपचारों के उपरान्त, जब उनकी चेतना लौटी, तब उन्हें अच्छी तरह समझाते हुए
कैकेयी की ओर देखकर अत्यंत हर्ष से बोले—'आपको इतनी चिंता क्यों हो रही हैं ?
मेरे लिए यह कौन बड़ा काम है ? आप मन में किसी प्रकार का संदेह मत कीजिए ।
मैं तो विवेक के साथ धर्म का पालन करूँगा, कभी धर्म का उल्लंघन नहीं करूँगा । राजा
की आज्ञा यदि मुझे नहीं मिलेगी, तो मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा । यह सच
मानिए । शीघ्रगामी अश्वारोही दूतों को भेजकर इसी शुभ मुहूर्त में भरत को बुलवाकर
उसका राज-तिलक कर दीजिए । मैं अभी वन के लिए प्रस्थान करता हूँ ।'

इस प्रकार कहने के उपरान्त प्रफुल्ल-मुखचन्द्र से राम ने कैकेयी की परिक्रमा की
और कहा—'मै अपनी माता, माता सुमित्रा तथा जानकी को यह समाचार सुनाऊँगा और
उन्हें सान्त्वना देकर अवश्य वन में चला जाऊँगा । आप मन में संदेह न कीजिए ।' यो
कहकर उन्होने राजा तथा कैकेयी को प्रणाम किया और लक्ष्मण के साथ वहाँ से
चल पड़े ।
राम ने राज-तिलक के लिए संचित सभी मंगल-द्रव्यो की परिक्रमा करके उनको
प्रणाम किया । अचल तथा विकार-रहित चित्त से वे अपनी माता को यह समाचार सुनाने
के लिए चले । तबतक अन्त पुर में यह समाचार फैल गया कि लोकवद्य राम राज-पाट
छोड़कर वन जा रहे हैं । दशरथ की अन्य स्त्रियाँ आपस में कहने लगी—'राम अपनी
माता कौसल्या के प्रति जो भक्ति दिखाते हैं, वही भक्ति हमारे प्रति भी रखते हैं । ऐसे
सद्गुणालकार, महान् उदार-चेता, हिमाचल के समान धीर, उस महान् वीर पुत्र-रत्न को
हाय ! राजा ने वनवास की आज्ञा कैसे दी ? पागल की तरह राम को वनवास के दुखो
में भेजना कहाँ तक उचित है ।' इस प्रकार, महाराजा की निंदा करते हुए सभी स्त्रियाँ
शोक करने लगी ।
उसी समय राम ने कौसल्या के अत.पुर में प्रवेश किया । उससे पूर्व कौसल्या ने
अभिषेक के निर्विघ्न संपन्न होने के निमित्त जप, शांति, हवन आदि को एकनिष्ठ होकर पूरा
किया था और भक्ति-युक्त हो जनार्दन से प्रार्थना कर रही थी । राम के आगमन से वे
अत्यंत प्रसन्न हुईं । सुमगलियो के साथ फूल लिये हुए वे सामने आईं और विधिवत्
मंगलाचार आदि पूरे किये । रामचंद्र ने उनके चरण छुए । उन्होने राम को उठाकर गले से
लगा लिया और आशीर्वाद दिया—'हे पुत्र, तुम चिरायु, सुयश एव राज्य-लाभ करो ।'
६. कौसल्या का दुःख
अपनी माता कौसल्या को देखकर राम अत्यंत दीन होकर बोले—'हे माता, आपको,
माता सुमित्रा को तथा मैथिली को भय उत्पन्न करनेवाली एक घटना घटी है । मै उसे
आपको सुनाऊँगा । आप धैर्य के साथ सुनिए । किसी समय युद्ध में माता कैकेयी ने
महाराज से दो वर प्राप्त किये थे । उन्होने अभी वे दोनो वर राजा से माँगे हैं । एक वर
से उन्होने अपने पुत्र का राज-तिलक माँगा और दूसरे से मेरा वन-वास चाहा है । इस पर
महाराजा अत्यंत शोक-संतप्त हो गये हैं । पिता के वचनो की रक्षा के लिए मैने चौदह
वर्षों तक वन में रहने का निश्चय किया है ।'
इन बातो को सुनकर कौसल्या मन-ही-मन दुखी होकर, स्तंभित हो गईं । उनके
मुख की कान्ति उतर गई और गला रुँध गया । वे काष्ठ की तरह चेष्टाहिन हो गईं
और चीत्कार करती हुई जड़ से उखाडी हुई लता के समान मूर्च्छित होकर गिर पडी ।
राम ने घबड़ाकर बड़ी भक्ति से उन्हें उठाया, उनके शरीर पर लगी हुई धूल पोछी और
उन्हें एक सुन्दर आसन पर बिठाया । इसके पश्चात् लक्ष्मण और राम ने उनका उचित
उपचार किया । जब उनकी चेतना लौट आई, तब वे अपने ओठो को आर्द्र करती हुई
कहने लगी—"हे अनघ राघव ! तुम्हें वन में रहने का आदेश देना, मेरे कानो को अत्यंत