रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार कहने के उपरान्त प्रफुल्ल-मुखचन्द्र से राम ने कैकेयी की परिक्रमा की
और कहा—'मै अपनी माता, माता सुमित्रा तथा जानकी को यह समाचार सुनाऊँगा और
उन्हें सान्त्वना देकर अवश्य वन में चला जाऊँगा । आप मन में संदेह न कीजिए ।' यो
कहकर उन्होने राजा तथा कैकेयी को प्रणाम किया और लक्ष्मण के साथ वहाँ से
चल पड़े ।
राम ने राज-तिलक के लिए संचित सभी मंगल-द्रव्यो की परिक्रमा करके उनको
प्रणाम किया । अचल तथा विकार-रहित चित्त से वे अपनी माता को यह समाचार सुनाने
के लिए चले । तबतक अन्त पुर में यह समाचार फैल गया कि लोकवद्य राम राज-पाट
छोड़कर वन जा रहे हैं । दशरथ की अन्य स्त्रियाँ आपस में कहने लगी—'राम अपनी
माता कौसल्या के प्रति जो भक्ति दिखाते हैं, वही भक्ति हमारे प्रति भी रखते हैं । ऐसे
सद्गुणालकार, महान् उदार-चेता, हिमाचल के समान धीर, उस महान् वीर पुत्र-रत्न को
हाय ! राजा ने वनवास की आज्ञा कैसे दी ? पागल की तरह राम को वनवास के दुखो
में भेजना कहाँ तक उचित है ।' इस प्रकार, महाराजा की निंदा करते हुए सभी स्त्रियाँ
शोक करने लगी ।
उसी समय राम ने कौसल्या के अत.पुर में प्रवेश किया । उससे पूर्व कौसल्या ने
अभिषेक के निर्विघ्न संपन्न होने के निमित्त जप, शांति, हवन आदि को एकनिष्ठ होकर पूरा
किया था और भक्ति-युक्त हो जनार्दन से प्रार्थना कर रही थी । राम के आगमन से वे
अत्यंत प्रसन्न हुईं । सुमगलियो के साथ फूल लिये हुए वे सामने आईं और विधिवत्
मंगलाचार आदि पूरे किये । रामचंद्र ने उनके चरण छुए । उन्होने राम को उठाकर गले से
लगा लिया और आशीर्वाद दिया—'हे पुत्र, तुम चिरायु, सुयश एव राज्य-लाभ करो ।'
६. कौसल्या का दुःख
अपनी माता कौसल्या को देखकर राम अत्यंत दीन होकर बोले—'हे माता, आपको,
माता सुमित्रा को तथा मैथिली को भय उत्पन्न करनेवाली एक घटना घटी है । मै उसे
आपको सुनाऊँगा । आप धैर्य के साथ सुनिए । किसी समय युद्ध में माता कैकेयी ने
महाराज से दो वर प्राप्त किये थे । उन्होने अभी वे दोनो वर राजा से माँगे हैं । एक वर
से उन्होने अपने पुत्र का राज-तिलक माँगा और दूसरे से मेरा वन-वास चाहा है । इस पर
महाराजा अत्यंत शोक-संतप्त हो गये हैं । पिता के वचनो की रक्षा के लिए मैने चौदह
वर्षों तक वन में रहने का निश्चय किया है ।'
इन बातो को सुनकर कौसल्या मन-ही-मन दुखी होकर, स्तंभित हो गईं । उनके
मुख की कान्ति उतर गई और गला रुँध गया । वे काष्ठ की तरह चेष्टाहिन हो गईं
और चीत्कार करती हुई जड़ से उखाडी हुई लता के समान मूर्च्छित होकर गिर पडी ।
राम ने घबड़ाकर बड़ी भक्ति से उन्हें उठाया, उनके शरीर पर लगी हुई धूल पोछी और
उन्हें एक सुन्दर आसन पर बिठाया । इसके पश्चात् लक्ष्मण और राम ने उनका उचित
उपचार किया । जब उनकी चेतना लौट आई, तब वे अपने ओठो को आर्द्र करती हुई
कहने लगी—"हे अनघ राघव ! तुम्हें वन में रहने का आदेश देना, मेरे कानो को अत्यंत