रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें६० रंगनाथ रामायण
४. दशरथ से कैकेयी का वर माँगना
'आप रविकुल में उत्पन्न महाराज हैं । उस कुल के प्रथम राजाओ की अपेक्षा आप
अधिक पुण्यात्मा है। आप असत्य नही कहेंगे और अपना वचन भी नही छोड़ेंगे । अत,
मुझे वे दोनो वर दीजिए । पहले वर से आप भरत का राज-तिलक कर दीजिए, और
दूसरे वर से आप राम को चौदह वर्ष तक तपस्वी के रूप में वन में निवास करने के लिए
भेज दीजिए ।'
इन वचनो को सुनते ही राजा स्तम्भित रह गये । दुख से वे तुरत मूर्च्छित
हो गये । बहुत समय के वाद उनकी चेतना लौटी तो वे बोले- "हे कोमलांगी, कैकय-वश
में जन्म लेकर इस प्रकार के वचन तुम्हारे मुंह से कैसे निकले ? राम ने तुम्हें क्या हानि
पहुँचाई है कि तुम राम को अरण्य-वास देना चाहती हो ? वह कौसल्या की अपेक्षा तुम्हें
अधिक मानता है, तुम्हारी सेवा करता है और तुम्हारा आदेश मानता है । ऐसे सद्गुण-
सपन्न राम को निष्ठुर होकर वन जाने का आदेश कैसे देती हो ? तुम्ही कहो, मै उसे वन
जाने का आदेश कैसे दे सकता हूँ ? ऐसे महापुरुष राम को जगल भेजने के वाद मेरे प्राण कैसे
टिके रहेंगे ? तुम राजपुत्री हो, ऐसा समझकर मैने तुम्हारा पाणिग्रहण किया था । किंतु
तुम काली नागिन सिद्ध हो रही हो । तुम चाहो, तो मैं अपना सारा राज्य और अपने
प्राण दे दूंगा, किंतु राम को वन जाने का आदेश न दे सकूंगा । इस वृद्ध, दीन, अनाथ
तथा दुर्बल को दुःख से बचाओ । मै तुम्हारे चरणो को प्रणाम करता हूँ। मैं राम के वियोग
में जीवित नही रहूँगा । इसलिए इस पाप-कल्पना को छोड़ दो ।"
तब कैकेयी क्रोध में आकर कहने लगी - "हे राजन् ! आप सत्यनिष्ठ, पराक्रमी
और ओजस्वी है । ऐसे आपको असत्य कहना क्या शोभा देता है ? आपने इतने सारे
देवताओ के समक्ष सौगध खाई है । आप कैसे राजा है ? एक कबूतर के लिए शिवि ने
अपने शरीर का सारा मास काटकर वाज को दे दिया था । क्या आप इसे नही जानते ?
क्या अलर्क नामक राजा ने वडे प्रेम से क्षोणिदेव को अपने नेत्र नही दिये थे ? क्या
उत्तुग लहरो से युक्त समुद्र, वेला की मर्यादा के भीतर आवद्ध नही हुआ ? उनको छोड़
दीजिए । आपके पूर्वज कौतुक के लिए भी, स्वप्न में भी, कभी झूठ नही बोले । आप
इक्ष्वाकु-वश के होते हुए भी कौसल्या के भय से असत्य-भाषण करते है । असत्यभाषी
कही पुरुष कहलाने योग्य है ? आपने असत्य कहा । अब आप मुझे पा नही सकते । मै
अब स्वतंत्र होकर विष-पान करूँगी और मर जाऊँगी । उसके पश्चात् आप भरत का वध
करा दीजिए और राम का तिलक करके कौसल्या के साथ सुख से रहिए ।"
इस प्रकार के कैकेयी के कटुवचनो से राजा अत्यत सतप्त हो गये । उनके मुख
की काति जाती रही, उनका विवेक जाता रहा । वे कैकेयी से बोले- "हे कैकेयी ! तुम्हारे
मन में ऐसी पाप-कल्पना और ऐसी मन्द बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई । ज्येष्ठ के रहते हुए कही
कनिष्ठ अविनीत होकर पृथ्वी का पालन करेगा ? इतना क्यो, तुम्हारा धर्म-निरत भरत
तुम्हारे इस पाप-पूर्ण वचन को कैसे स्वीकार करेगा ? हमारे कुल की रीति का विचार करो ।
शोक-पीड़ित मुझे निष्ठुर होकर मत मारो । सतत गृहिणी-धर्म का पालन करते हुए,