रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] श्रीअयोध्याकांड ८१
भक्ति और हित का विचार करते हुए सखी की तरह, माता के समान, दासी की
भाँति, बहन की-सी, भिन्न-भिन्न प्रकार से मेरी सेवा करनेवाली कौसल्या अपने पुत्र के
वियोग में कसे जीवित रह सकेंगी ? सौदामिनी तथा लता-सदृश शरीरवाली वैदेही किस
प्रकार यह दुख सह सकेगी ? सौमित्र तथा उसकी माँ इस दुःखद समाचार को कैसे सहन
कर सकेंगे ? राम के राज-तिलक की अपेक्षा करनेवाले नागरिक जब उत्सव मनाने में
संलग्न हैं, तब यदि मैं राम को वन भेज दूँ, तो क्या वे नागरिक मुझे अपशब्द नहीं कहेंगे ?
अपनी इस प्रार्थना से समस्त लोगो का अहित करते हुए तुम कौन-सा सुख भोगोगी ?
एक बात और है । हे रमणी ! तुम उसे अवश्य सुनो । कमल के-से नेत्रवाले, मधुर
मुस्कान से युक्त मुखवाले, बलिष्ठ, आजानुबाहु, चंद्र-सम सौंदर्यवाले, नीलोत्पल की-
सी शरीर-कान्तिवाले, शीतल दृष्टियो को विकीर्ण करनेवाले, सुधा-सम वचन बोलनेवाले,
सदा बुधजनो का हित ही सोचनेवाले, सतत मेरी सेवा में संलग्न रहनेवाले, धर्म-रूपी,
भार्गव राम को जीतनेवाले, सद्गुण-संपन्न, सौंदर्यवान्, शांतधाम, रवि-सम उज्ज्वल, राम को
छोड़कर मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकूँगा । हे कमलाक्षी ! ऐसे राम को क्या तुम
नहीं जानती ? उस उत्तम पुरुष को वन भेजते ही मेरे प्राण निकल जायेंगे । तुम कितनी
पापिन हो ? कितनी कठोर हो ? कितनी मूर्खा हो ? कितनी भयंकर राक्षसी हो ? हे
क्रूर नारी ! तुम्हारे मन में इतना कल्मष क्यों है ? साध्वी होते हुए मूर्खा की तरह क्यों
ऐसी इच्छा करती हो ? तुम प्राणापहरण करनेवाली काल-रात्रि हो, स्त्री नहीं ।
राम कैसे पैदल वन में जायगा ? सबसे विलग होकर वन में कैसे रहेगा ? सुकोमल
शय्या पर शयन करनेवाला पुरुष तृण-शय्या पर किस प्रकार सो सकेगा ? बंधुओ के साथ
पंक्ति में बैठकर अपना इच्छित भोजन करनेवाला राम, कंद-मूल का आहार कैसे पसंद
करेगा ? हे रमणी ! तुम अपने परम भक्त राम का बुरा मत सोचो । उसे क्षमा करो ।”
इस प्रकार प्रार्थना करते हुए दशरथ बडे दुख के साथ उसके पैरो पर गिर पड़े ।
लेकिन उसने अपने पैर हटाते हुए उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की । तब राजा भूमि पर
गिर पड़े और लोटने लगे । किन्तु कैकेयी ने उसकी भी परवाह किये बिना ही राजा
दशरथ को देखकर कहा—'हे राजन् ! अब इन कपट-वचनों को बंद कीजिए । अब व्यर्थ
के छल-कपट से कोई लाभ नहीं होगा । धर्म को त्यागिए, सत्य को छोड़ दीजिए और
अपने निर्मल यश को मिट्टी में मिलाकर असत्य वचन कहिए कि मैंने तुम्हें वर नहीं दिये ।
उसके बाद आप अपने पुत्र तथा पत्नियों के साथ सुख से रहिए । मैं अपने पुत्र भरत
के साथ प्राण तजूँगी ।'
तब राजा बिना प्रत्युत्तर दिये, मन-ही-मन दुःखी होते हुए, सिर झुकाये बैठे रहे ।
इतने में प्रभात हो गया । मंगल-वाद्य बजने लगे । वन्दी-जन के स्तुति-पाठ होने लगे ।
राम-सीता ने कर्पूर-चन्दन की सुगन्धि से सुवासित जल में स्नान किया, दिव्य वस्त्राभरण
पहने और शची-समेत इन्द्र के समान पूर्ण तेजस्वी दिखाई देने लगे । अभिषेक-मण्डप में
वसिष्ठ आदि मुनि अरुंधती आदि सुमंगलियां, धीमान् मंत्री तथा अन्यान्य चक्रवर्त्ती राजा
विराजमान थे । वसिष्ठ ने पंचपल्लव, पंचवल्कल, पंचामृत, भद्रगज ( राजा का हाथी ),
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