रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार राम की स्तुति करके, बड़े प्रेम से वे वहाँ से प्रस्थान करते हुए बोले-
'राम, तुम्हारी शक्ति अनुपम है।' उसके पश्चात् वे महेन्द्राचल पर चले गये। वरुण की
प्रार्थना मानकर रघुराम ने उसी क्षण परशुराम का धनुष उन्हें दे दिया।
तब अनुकूल पवन चलने लगा। सेना में फिर से उत्साह छा गया। नर तथा सुरों
की प्रशंसा प्राप्त करते हुए विजय-श्री से युक्त हो राघव ने अपने पिता महाराज दशरथ
तथा पुण्यात्मा वसिष्ठ को प्रणाम किया। राजा ने बड़े आनन्द से उन्हें गले से लगाकर
आशीर्वाद दिया और बोले-“मेरा पुनर्जन्म-जैसा हुआ है। तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करके
इस पृथ्वी पर मैं देवराज इन्द्र के समान बन गया। परम पावन परशुराम जब शिव की
तरह (भयंकर रूप लेकर) यहाँ आये, तब भय से मेरा सारा शरीर काँपने लगा और मैंने सोचा
कि अब कोई उपाय नहीं है। इसलिए मैंने उनसे विनती की। जब उन्होंने मेरे विनीत
वचनों को ठुकरा दिया, तब पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर मैं चुप हो रहा। (तुम्हारा) उनको
जीतना मेरे लिए बड़े आश्चर्य का विषय है। मैंने आज अतुल वैभव प्राप्त किया है।
तुम्हारे प्रताप के फलस्वरूप सारा भय दूर हो गया है। मैं इस संसार में यशस्वी हुआ।”
इस प्रकार, राम का अभिनंदन करने के उपरान्त राजा ने वसिष्ठादि मुनियों और सभी
सेनाओं को साथ लिये हुए बड़े आनन्द से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।
३८ अयोध्या में प्रवेश
मंगल-चिह्नों तथा पुण्यात्माओं के साथ, मंगल-वाद्यों की ध्वनि होते हुए, दशरथ ने
अपने पुत्रों-सहित बड़ी प्रसन्नता से अयोध्या में प्रवेश किया। अलंकृत राजमार्ग में, राज-
कुल के लोग तथा अन्य मित्र-वर्ग, सौधों पर से उन सुन्दर राजकुमारों को देखकर उनपर
पुष्प-वृष्टि करने लगे। भूसुर आशीर्वाद देने लगे। तब राजा ने अत्यन्त सुन्दर ढंग से
अलंकृत अंतःपुर में प्रवेश किया। कौसल्या कैकेयी तथा सुमित्रा आदि रनवास की सभी
स्त्रियाँ अत्यन्त हर्ष से उनके स्वागतार्थ आईं। उन्होंने उनपर फूलों की वर्षा की और उनकी
आरती उतारी। पुत्र तथा पुत्र-वधुओं ने उनके पैर छुए, तो उन्होंने उन्हें गले लगाकर
आशीर्वाद दिये। सीता आदि पुत्र-वधुओं का मधुर स्वभाव एवं कुशलता देखकर सभी संतुष्ट हुए।
दशरथ अपने चारों पुत्रों की सेवाएँ प्राप्त करते हुए, चतुर्भुज विष्णु के समान,
चार शृंगोंवाले स्वर्ग के हाथी (ऐरावत) के समान विलसित होते थे और बड़े आनन्द से
पुण्य की रक्षा करते हुए राज्य करने लगे। एक दिन दशरथ ने उचित समय देखकर
शुभ लक्षणों से संपन्न अपने पुत्र भरत को बुलाकर कहा-“हे वत्स, तुम्हारे मामा कैकय
तुम्हें अपने यहाँ ले जाना चाहते हैं, अतः तुम शत्रुघ्न के साथ उनके यहाँ जाओ और
उनकी इच्छा पूर्ण करो। हे वत्स, (वहाँ) अपने नाना, नानी, मामा तथा ब्राह्मणों के प्रति
भक्ति-युक्त विनय दरसाते रहना। उनकी परिचर्या करते हुए उनसे रथ चलाना, शस्त्र
चलाना, वेद-शास्त्र, नीति-शास्त्र तथा अन्य सभी कलाओं को सीखने में सतत तत्पर रहना।
एक क्षण भी व्यर्थ न बिताना और (समय-समय पर) अपना कुशल-समाचार भेजते रहना।”
राजा का आदेश पाते ही भरत ने माता-पिता तथा रघुराम को विनय से प्रणाम
किया और शत्रुघ्न को साथ लेकर अपने मामा के साथ राजगृह की राजधानी के लिए रवाना हुए।