रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकांड ७५
पूजा तथा उपहारो से नगर-देवताओ की अर्चना करो । नगर के सभी निवासी तथा वेश्याएँ,
नगर के दूसरे फाटक के पास ढग से आकर खडे रहें । नगर के सभी सेवको को सेवा के
लिए उपस्थित रहने की सूचना दो ।' परिचारको ने वसिष्ठ के आदेशो का पालन करके
उसकी सूचना वसिष्ठ को दी ।
राजा ने सुमत्र आदि उत्तम सचिवो तथा सगे-सवधियो को अलग-अलग बुलाकर
उन्हें सकल्प कह सुनाया । उन्होने भी राजा के निश्चय का अनुमोदन किया । तब उन्होने
शीघ्र रघुराम को बुला भेजा और अपनी आंखो से स्नेह-सुधा की वृष्टि करते हुए कहा—
‘हे वत्स, प्रजा की प्रशसा प्राप्त करते हुए मैने दीर्घ काल तक राज्य किया । दान, धर्म
तथा यज्ञादि बडी निष्ठा से मैने पूरे किये और अत में तुम जैसे सद्गुण-सपन्न को पुत्र के
रूप में प्राप्त किया । अब मै राज का भार संभालने में असमर्थ हो रहा हूँ । इसलिए
मै तुम्हारा राज-तिलक कर दूंगा । परसो ही राज्याभिषेक के लिए उपयुक्त शुभ मुहूर्त्त है ।
सलिए तुम और सीता भक्ति के साथ उपवास करो ।’
तब राम ने राजा को देखकर विनय तथा साहस के साथ कहा—‘हे महाराज, मेरे
लिए आपके चरण-कमलो की सेवा से बढकर कोई दूसरा राज्य इस ससार में हो नही
सकता । आप अपने इन विचारो को त्याग दीजिए ।' तब राजा ने कहा—‘हे वत्स, तुम
पुण्य-चरित्र हो, पुण्य-धनी हो, सूर्यकुल के रत्न हो । तुम्हारे सिवा इस पृथ्वी का पालन
करने के लिए योग्य और कौन हो सकता है ? अत, हे अद्वितीय वीर । तुम इस राज्य-
भार को अवश्य संभालो ।'
राम ने उनकी आज्ञा के सामने सिर झुकाया और अपने महल में चले गये । राजा
भी सामन्त राजाओ, नागरिको तथा अन्य नातेदारो को विदा करके अपने महल में गये ।
(वहाँ पहुँचकर) उन्होने सुमत्र के द्वारा श्रीराम को बुलवाया, उन्हें अपने पास
बिठाकर, आनन्दाश्रु बहाते हुए बोले—‘हे मेरे भाग्य-निधि, हे मेरे पुण्य-स्वरूप, मेरे तप के
फल, हे मेरे पुत्र, मैने कुछ बुरे स्वप्न देखे है । मैने दुष्ट ग्रहो को तथा उल्का-
पात होते देखा है । अत मेरा मन बहुत व्याकुल हो रहा है । अभी तुम इस ‘पुण्य-योग’
में ही राज-तिलक कर लो । इससे मेरी इच्छा पूर्ण होगी । विलव क्यो ? तुम्हारी उन्नति
का समस्त ससार इच्छुक है ।'
रामचन्द्र ने पिता की आज्ञा शिरोधारण करके, उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा
लेकर वहाँ से विदा हुए । उन्होने अपनी माता, सुमित्रा तथा जानकी तथा लक्ष्मण को यह
समाचार सुनाकर उन्हें आनद-सागर में डुबो दिया । उसके पश्चात् पूर्ण-चन्द्रसदृश राम,
सीता के साथ प्रफुल्लचित्त से अपने महल में गये ।
इसके पश्चात् राजा ने वसिष्ठ से कहा कि आप राम के उपवास के लिए विधिवत्
सकल्प कराइए । तब वसिष्ठ ब्रह्मा-रथ पर आरूढ हो रामचन्द्र के महल के लिए रवाना हुए
और अपने आगमन का समाचार देने के लिए एक शिष्य को पहले ही भेज दिया ।
उनके तीसरे फाटक तक पहुँचते-पहुँचते राम उनके स्वागतार्थ आ पहुँचे और वडी भक्ति
से उस पुण्यात्मा को प्रणाम किया और बड़े हर्ष से उन्हें अत पुर में ले गये । वहाँ उन्होने