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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 508 में से

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पृष्ठ 106

१५६ रंगनाथ रामायण
उस लोकवंद्य का उचित आदर-सत्कार किया। वसिष्ठ ने पुण्याह-वाचन कराया और पुष्य-
संकल्प-पूर्वक उपवास व्रत का प्रारंभ कराया। दक्षिणा के रूप में राम से दस हजार गायें
लेकर वसिष्ठ ने सारा समाचार राजा को कह सुनाया और घर चले गये।
राम ने बड़े प्रसन्नचित्त से सीता के साथ स्नान आदि से निवृत्त होकर विष्णु की
प्रीति के लिए हवन किया, हवन-शेष को ग्रहण किया और वसिष्ठ के आदेश के अनुसार
विष्णुगृह में कुशासन पर एकनिष्ठ हो विष्णु का ध्यान करते हुए उपवास करते रहे।
अयोध्या में लोग बड़े हर्ष से आनंदोत्सव की तैयारी में लग गये। कोई मोतियों
से चौक पूर रहा था, तो कोई अपने घरों का अलकार कर रहा था। कोई मणिमय तोरण
सजा रहा था, तो कोई फूलों से वितान बना रहा था। कुछ लोग झंडे लगा रहे थे।
कुछ जहाँ-तहाँ फूल-मालाएँ लटका रहे थे। कुछ एक दूसरे के अलकरण में मग्न थे। कही
लोग दशरथ की प्रशंसा कर रहे थे, तो कही इष्ट देवताओ की पूजा कर रहे थे। कुछ
दान-पुण्य कर रहे थे और पुण्य कथा-गोष्ठियो में भाग ले रहे थे। जहाँ-तहाँ लोगो की
भीड़ एकत्रित होकर राम के गुणों का गान कर रही थी। लोग उनकी सेवा करने के
लिए आतुरता प्रकट करते थे और भगवान् से राम को ही राजा बनाने की प्रार्थना कर
रहे थे।
२ 'मंथरा की कुमंत्रणा
उसी समय कैकेयी की दासी मथरा ने रनवास की छत पर से नगर का यह
आनंदोत्सव देखा। वह सोचने लगी—'क्या कारण है कि आज नगर अद्भुत साज-सज्जा से
परिपूर्ण है। सभी नगरवासी सजे-धजे तथा प्रफुल्ल दिखाई पड़ रहे हैं। कौसल्या के
अंत पुर की सभी स्त्रियाँ सुसज्जित होकर आनंद-मग्न हो रही हैं। जाने किस कारण से
आज कौसल्या अगणित धन व्यय कर रही है।' उसने आनंद में मग्न राम की धाय से
पूछकर यह जान लिया कि राम के राज-तिलक के लिए ही सारे नगर में उत्सव मनाया
जा रहा है। तब उसने निश्चय किया कि बाल्यावस्था में रामने जो मेरी टाँग तोड़ दी थी,
उसका बदला लेने का यही अच्छा अवसर है। इस प्रकार सोचकर वह रानी कैकेयी
को सारा वृत्तांत सुनाने के लिए उनके महल में गई। उस समय पद्मलोचना कैकेयी
अपने क्रीड़ा-घर में हिंडोले पर लेटी थी। मथरा ने उससे कहा—'उठिए महारानी, आपको
किसी बात की चिंता ही नहीं है।' यो कहते हुए उसने कैकेयी का हाथ पकड़कर उसे
उठाकर बैठाया और त्रिया-चरित्र रचती हुई बोली—'आप तो यह कहते हुए फूली न
समाती थी कि राजा मुझसे ही अधिक प्रेम रखते हैं। वह झूठा सिद्ध हो गया है।
महाराजा ने अपनी बड़ी रानी के भय से आपको भ्रम में डालकर, भरत को परदेश भेज
दिया है और रघुराम का राज-तिलक करने की बात सोच रहे हैं। यदि यही बात हुई, तो
आपका जीवन निरर्थक है। राजाओ का विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। आप फूली-
फूली क्यो फिरती हैं? ऐसा क्रूर, वंचक और कपटी पुरुष मैने कही देखा नहीं है। वे
कैसे आपके पति हैं? वे तो आपके क्रूर शत्रु हैं। यदि आप अपनी सौत के पुत्र को
समस्त पृथ्वी का राजा बनने देंगी, तो आपको, आपके पुत्र को तथा मुझे, दुःख के सिवा