रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकाण्ड ७६
की भाँति, केशो को फैलाये फर्श पर पडी हुई कमलमुखी कैकेयी को देखकर राजा सन्न
रह गये । उन्हें बडी वेदना का अनुभव हुआ । बडे दीन भाव से वे उसके निकट पहुँचे,
उसके शरीर का स्पर्श करके देखा और काम-पीडित होकर उससे प्रार्थना करने लगे—
“हे कमलाक्षी, हे चन्द्रवदनी, हे भ्रमरो के-से केशवाली, इतना कोप क्यो ? अत्यत मृदु
पर्यंक पर लेटनेवाली, तुम्हें लेटने के लिए यह कडी भूमि क्यो ? कोमल दुकूलो के रहते,
तुमने ऐसे मैले वस्त्र क्यो पहने हैं ? कनकशलाका-सी अपनी देह पर तुमने आभूषण धारण
क्यो नही किये ? उदधि-सुत चन्द्रमा की चाँदनी के समान उज्ज्वल तुम्हारे ललाट पर यह
लेप क्यो ? तुम्हारे मन में ऐसा विचार क्यो उत्पन्न हुआ ? प्रतिदिन की भाँति तुम अपने घने
तथा नीले केशो में माँग काढकर उन्हें सजाती क्यो नही ? पद्मराग मणि की लालिमा
को परास्त करनेवाले अपने अरुणाधरो को तांबूल-चवण स अलकृत क्यो नही करती ?
तुम्हारे मुख-चन्द्र में स्वर्ण-पुष्पो के समान प्रफुल्लित होनेवाली मुस्कान क्यो नही दीखती ?
हे प्रिये, किसलिए तुम मन छोटा किये हुए हो ? इतनी सतप्त क्यो हो ? क्रिसने तुम्हें
कटुवचन कहे ? किसने तुम्हारी बातो का विरोध किया ? हे कमलनयनी । उनके नाम
बताओ । चाहे वे कोई भा हो, में उन्हें दण्ड दूंगा ।” इस प्रकार कहते हुए आँखो में
उमडनेवाले आँसुओ को पोछते हुए वे बोले—“हे सुन्दरी, एक अनाथ की तरह तुम इस
प्रकार भूमि पर क्यो लोट रही हो ? बताओ कि यह काम-पीडा है अथवा किसी भयकर
रोग का प्रकोप है ? क्यो सकोच कर रही हो। कहो तो वैद्य आकर तुरत तुम्हें स्वस्थ करेंगे ।
हे ललितागी ! तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो, मैं उसे पूरा करूँगा । तुम्हारे
लिए मै अवध्य पुण्यात्माओ का भी वध करूँगा । वध्य दुर्जनो को दण्ड देकर तुम्हारी
बात रखूँगा । यदि तुम चाहो, तो रक को राजा बनाऊँगा । तुम्हारे क्रोध का पात्र धनी को भी
दरिद्र बनाऊँगा । जब मैं और मेरे परिवार के अन्य लोग तुम्हारी इच्छा के अनुसार चलने
के लिए तैयार है, तब इस प्रकार क्यो रहती हो ? हे सुन्दरी ! मेरी बात सुनो, किंचित्
मुँह उठाकर मेरी ओर देखो, ताकि मुझे शांति मिल जाय । तुम चाहो तो मे अपने प्राण
भी देने को प्रस्तुत हूँ ।”
दशरथ की ये बातें सुनकर कैकेयी प्रसन्न हुई । वह अपने पति का प्रेम जानती
ही थी इसलिए उसने क्षीण स्वर में राजा से कहा—‘हे देव ! यदि मुझे यह वचन दें
कि आप मेरे कथन के अनुसार कार्य करेंगे, तो मैं अपने मन की इच्छा कहूँगी ।’
राजा ने कहा—‘जो धनुर्विद्या में असमान है, जो धर्म का पालन करता है, जिसे
बिना देखे मैं एक क्षण भी जी नही सकता और जिसको मैं निरंतर भक्ति से भजता
रहता हूँ, उस राघव की सौगंध खाकर कहता हूँ कि मै तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा ।’
कैकेयी ने पवन, अग्नि, शशि तथा नभ को साक्षी के रूप में मानते हुए दशरथ
के मन की आतुरता का ज्ञान रखते हुए निष्ठुर होकर कहा—‘हे राजन् ! आपने देवासुर-
युद्ध में मुझे दो वर दिये थे । कदाचित् आप उन्हें भूल गये हैं । मैं अब उन दोनो वरो
को माँगना चाहती हूँ ।’