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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 508 में से

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पृष्ठ 108

७८ रंगनाथ रामायण
दूर कर दिया था और राजा को उस राक्षस के तेज बाणो से आहत होने से बचाया था ।
राजा ने सतुष्ट होकर आपको दो वर दिये थे । आपने ही खुद यह सारा वृत्तात मुझे
सुनाया था । भले ही आप इसे भूल जायें, मैं कैसे भूल सकती हूँ ? अत आप राजा से
दो वर माँगिए—एक तो यह कि कौसल्या का पुत्र राज-पाट छोडकर चौदह वर्ष तक मुनियो
का-सा जीवन व्यतीत करते हुए भयकर वनो में रहे, और दूसरा, आपका पुत्र इस पृथ्त्री
पर शासन करे । आपके वर माँगने पर राजा बहुत गिडगिडायेंगे । फिर भी, आप मूर्ख
के समान मत रहें । सत्य की दुहाई देकर दृढ सकल्प से आप इस कार्य को सिद्ध
कर लीजिए । आपके पति असत्य से डरते हैं, उसपर भी आपसे उनका अत्यधिक प्रेम हैं।
इसलिए वे आपके वचनो का अतिक्रमण नही करेंगे । अवश्य आपकी बात मान लेंगे ।”
इन बातो से प्रसन्न होकर कैकेयी ने मथरा से कहा-'तुम्हारी जैसी सखी, साथिन
और गुणवती को मैंने कही नही देखा है । हे उत्तम नारी, जिन वरो के सबध में मैंने
तुमसे कहा था, उन्हें तो मै भूल ही गई थी । तुमने जैसे सोचा, वैसे मेरा पुत्र यदि इस
समस्त पृथ्दी का राजा बनेगा, तो मै तुम्हारे कूबड़ को शुद्ध स्वर्ण से अच्छी तरह सजाऊँगी,
तुम्हारे मुख-चन्द्र पर कस्तूरी-तिलक करूँगी और तुम्हारे शरीर पर असख्य आभूषण पहनाकर
तुम्हें अलकृत करूँगी । हे सखी ! इस प्रकार सज-धजकर तुम मन्मथ की स्त्री के समान
विचरोगी, तो सभी दासियाँ तुम्हारी आज्ञा का पालन करती रहेंगी । मैं ऐसी व्यवस्था
कर दूंगी ।'
इस प्रकार, मथरा से प्रिय वचन कहने के पश्चात् कैकेयी अपने कक्ष में चली गई ।
उसने अपने समस्त आभूषण उतार दिये, माथे पर कस्तूरी का गाढा लेप लगाया, मलिन
वस्त्र पहने और अत्यन्त क्रोध धारण किये फर्श पर पड़ी रही । अपनी मत्रणा की सफलता
से सतुष्ट होनेवाली मथरा को देखकर कैकेयी बोली—'जबतक राजा राम को बुलाकर
उसे वन में जाने की आज्ञा देकर नही भेजेंगे और भरत का राज-तिलक नही
करेंगे, तबतक मैं अन्न-जल नही ग्रहण करूँगी । जितने भी स्वर्णाभूषण दें, मै उन्हें नही
लूंगी और यहाँ से हटूंगी भी नही ।' यो कहते हुए वह मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध होकर
पडी रही ।
३ कैकेयी के महल में दशरथ का आगमन
राघव के राज-तिलक का समाचार कैकेयी को सुनाने के उद्देश्य से दशरथ उस दिन
रात को वहाँ (कैकेयी के महल में) आये । स्वर्ण-रत्नजटित किवाड़ो तथा कक्षो, कस्तूरी,
चदन, कर्पूर की सुगधि से युक्त तथा नाना रत्नो की कान्ति से सुशोभित सौधो को पार
करके वे रग-महल के निकट पहुँचे । कैकेयी को वहाँ न देखकर दशरथ ने सेवक से पूछा ।
उसने दुःख प्रकट करते हुए हाथ जोडकर कहा—'देव ! देवी न जाने किस कारण से
कोप-भवन में चली गई हैं ।'
ये बातें दशरथ के कानो को धनुष की उग्र टकार की भाति भयकर लगी । उनका
मुँह पीला पड़ गया । कैकेयी के प्रति उनका प्रेम द्विगुण हो उठा । धीरे-धीरे उन्होने
कोप-भवन में प्रवेश किया और स्वर्ग-लोक से पृथ्वी पर उतरकर वहाँ लेटी हुई अप्सरा