रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकांड ५३
मेरी ओर देखते भी नही हैं। मेरा क्या अपराध हैं ? यह खिन्नता, यह चिंता और दुख
राजा को किस कारण से हो रहे हैं ?' तब कैकेयी ने कहा—'हे राम, यदि तुम मानोगे,
तो मैं राजा की इच्छा तुम्हें बतलाऊँ ।' रघुराम ने कहा—'हे माता, आप कृपया विस्तार
से सुनाइए कि वह कौन-सी बात है ? मैं पिता के आदेश से भयंकर अग्नि-ज्वालाओ में
या विष के समुद्र में कूद सकता हूँ या विष भी खा सकता हूँ । इसको सत्य मानें और
बिना संकोच के कहें ।'
तब कैकेयी राम को देखकर किंचित् भी ममता-मोह के बिना बोली—'देवासुर-
संग्राम में राजा ने दया करके मुझे दो वर दिये थे । अब मैंने उन दोनों वरों को देने की
प्रार्थना की । एक वर से मैंने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य माँगा और दूसरे से तुम्हें
चौदह वर्ष तक वन-वास देने की प्रार्थना की । राजा ने वर देना तो स्वीकार किया,
किन्तु तुम्हें अपना आदेश सुनाने में हिचकते हैं । यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे पिता को
असत्य-भाषण का दोष न लगे, तो तुम तुरत राजकुमार का वेष त्याग दो और वल्कल
तथा जटाएँ धारण करके तपस्वी के रूप में वनवास के लिए चले जाओ ।'
इन बातों को सुनकर राम के मुखपर मंद हँसी लास्य करने लगी । उनके वचनों
म किसी भी प्रकार का मालिन्य नहीं आया । दया, त्याग और गरिमा दिखाते हुए परम
पुण्यात्मा रामचंद्र बोले—'हे माता, इस प्रकार की आज्ञा देनेवाले सूर्यवंश के तिलक मेरे
पिता हैं और राज्य का अधिकारी होगा मेरा भाई । फिर, आपकी इच्छा में बाधा क्यों पड़े ?
हाय ! आप कितनी भोली हैं ! इस छोटी-सी बात के लिए सूर्यवंशी राजा को मन
में चिंतित होने की क्या आवश्यकता है ? अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं करने-
वाला कहीं पुत्र कहलाने योग्य है ? वह तो एक जाति-विरोधी है । मेरे और मेरे भाई
में कोई भेद नहीं है । इस पृथ्वी का भार वहन करने के लिए जिस पुण्यात्मा को आपने
नियत किया है, उस भरत के लिए मैं अपने प्राण भी देने के लिए प्रस्तुत हूँ, इस राज्य
की क्या गिनती !'
राम की बातों से अत्यंत हर्षित होकर कैकेयी बोली—'हे राजकुमार, तब मैं भरत
को बुला भेजूँगी । तुम तुरंत वन के लिए रवाना हो जाओ । यहाँ से तुम्हारे जाने तक
महाराज न भोजन करेंगे, न बोलेंगे, न उठेंगे ही । वे इसी प्रकार पड़े रहेंगे ।'
कैकेयी के इस प्रकार कहते ही राजा ने कहा—'हाय, ऐसी कटूक्तियाँ भी क्या
उचित हैं ? और वे तुरंत मूर्च्छित हो गये । तब राम ने तुरंत उन्हें पकड़ लिया और
शैत्योपचारों के उपरान्त, जब उनकी चेतना लौटी, तब उन्हें अच्छी तरह समझाते हुए
कैकेयी की ओर देखकर अत्यंत हर्ष से बोले—'आपको इतनी चिंता क्यों हो रही हैं ?
मेरे लिए यह कौन बड़ा काम है ? आप मन में किसी प्रकार का संदेह मत कीजिए ।
मैं तो विवेक के साथ धर्म का पालन करूँगा, कभी धर्म का उल्लंघन नहीं करूँगा । राजा
की आज्ञा यदि मुझे नहीं मिलेगी, तो मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा । यह सच
मानिए । शीघ्रगामी अश्वारोही दूतों को भेजकर इसी शुभ मुहूर्त में भरत को बुलवाकर
उसका राज-तिलक कर दीजिए । मैं अभी वन के लिए प्रस्थान करता हूँ ।'