रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ रंगनाथ रामायण
आदि लोगों को राजसभा में बुला भेजा । उनके समक्ष राजा घन-गंभीर स्वर में बोले—
'हमारे पूर्वज इक्ष्वाकु-वंश के राजाओं ने बड़ी उत्तम रीति से इस पृथ्वी पर शासन किया था ।
उनके समान मैंने भी इस राज्य-भार को बड़ी क्षमता से वहन किया और आपके
सहयोग से निजकुल-धर्म में निरत होकर मैंने इसका पालन किया । यह विषय तो आपको
ज्ञात ही है । मैं आपसे और एक बात कहना चाहता हूँ । साठ हजार वर्ष तक मैंने इस
राज्य का पालन किया, सुंदर श्वेत छत्र की छाया में रहते हुए वृद्ध हो गया हूँ । भूमि-
भार की अपेक्षा वृद्धावस्था का भार मुझपर अधिक हो गया है । विकसित कमल के सदृश
मेरा शरीर कौमुदी के समान (पांडुर) हो गया है । केवल प्रताप बचा हुआ है । अतः,
प्रजा का पालन करने के लिए मैं अपने पुत्रकल्याण राम, देवता-हितकांक्षी धीमान्, इंदीवर-
श्याम, कोटिसूर्यप्रभावान्, सौंदर्य में मन्मथ को भी जीतनेवाले, जगदभिराम, राम का
राजतिलक कर देना चाहता हूँ और राज-भार से अवकाश लेना चाहता हूँ । क्या आप
इसको स्वीकार करेंगे ?'
घन-गर्जन को सुनकर हर्षित होनेवाले वन-मयूरों की भाँति सभासदों में अत्यधिक
उत्साह छा गया । कल-कल ध्वनि होने लगी । प्रजा में प्रमुख भूसुरों ने परस्पर परामर्श
करके सूर्यवंशी राजा से कहा—'हे राजन्, आपके श्रेष्ठवचन सब लोगों के लिए हितकर,
हृदयरंजक तथा अभीष्टदायक हैं । वे सब लोगों के लिए आनंददायक हैं । राजनीतिज्ञ,
निर्मल-धर्मनिपुण, जगत् के बंधु, दीनों के लिए कृपा-सिंधु, शांति-संपन्न, सत्यव्रती, सतत
विप्र-पूजा-निरत, सच्चरित्रवान्, नीति, प्रीति, निपुणता, क्षमा, ख्याति, ऐश्वर्य, कांति, दांति,
शांति आदि कितने ही सद्गुणों से आपसे भी श्रेष्ठ, लोकाभिराम राम को राजा बनाना
सर्वथा उचित है । वे तीनों लोकों का शासन करने में समर्थ हैं, फिर इस लोक का शासन
करना इनके लिए कौन बड़ी बात है ? हमारी भी यही इच्छा है कि आप उनका राज-
तिलक कर दें ।'
राजा ने ये बातें सुनीं, तो उनका हर्ष दूना हो गया । हर्षातिरेक से प्रफुल्लित
होकर वे वसिष्ठ तथा वामदेव को देखकर बोले—'हे अनघ, यह मधुमास अभीष्टप्रदायक है ।
अतः, हम इसी मास में राम को समस्त साम्राज्य-लक्ष्मी का राजा बनायेंगे । आप उचित
रीति से उसके लिए आवश्यक वस्तुएँ संचित करावें ।' ये बातें सुनकर ऋषियों ने अभिषेकार्थ
आवश्यक वस्तुओं का संचय करने के लिए आदमी भेजे ।
वसिष्ठ ने राजा की आज्ञा के अनुसार परिचारकों से कहा—'तुम लोग, श्रेष्ठ
स्वर्ण, रत्न, समस्त ओषधियाँ, चंदन, धवल पुष्प, मधु, घृत, खील (धान का लावा), नव
ललित-वस्त्र, राजा के लिए योग्य श्रेष्ठ रथ, स्वर्ण-रत्नजटित आयुध, शुभ लक्षणों से युक्त
भद्रगज, श्वेत अश्व विजन धवल छत्र, चामर, श्रेष्ठ पताके, एक सौ स्वर्ण कलश, स्वर्ण
शृंगों से युक्त श्रेष्ठ वृषभ, व्याघ्र-चर्म और अन्य आवश्यक मंगल-द्रव्य हवन-शाला में
ले आओ । नगर के द्वार, राज-पथ तथा सौध-शिखरों का अलंकार करो । समस्त नगर को
फूल-मालाओं, पताकाओं तथा तोरणों से सजाओ । कम-से-कम एक लाख भूसुरों (ब्राह्मणों)
के भोजन की व्यवस्था करो । दान-दक्षिणा आदि के लिए आवश्यक धन प्रस्तुत रखो ।