रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
बालकांड ५९
उन ऋषियो को अतुल धन देकर उनका सम्मान किया और वे विदा हुए । मातृहीन
वह शिशु भूख से व्याकुल होकर जब रोने लगा, तब इन्द्र वहाँ आया और उसकी भूख
मिटाने के लिए अपना अंगूठा उस शिशु के मुंह में दे दिया । शिशु उससे अमृत-पान करने लगा ।
सुधा-पान करने के कारण इन्द्र ने बुधजनो के द्वारा उस शुभलक्षण का नाम
मान्धाता रखवाया और इन्द्र-लोक को लौट गया ।
“मान्धाता पूर्ण-चन्द्रप्रभा-सम दीप्तिमान् होकर बढने लगा । यौवन के आते ही वह
अत्यन्त शौर्य-सपन्न हुआ और रावण आदि (बलशाली) राजाओ को कई युद्धो में परास्त कर
समस्त भूमडल का शासक बन बैठा । विष्णु की भक्ति करते हुए इन्द्र का वल प्राप्त करके
उसने बहुत-से यज्ञ किये । उस राजा के विमलागी नामक स्त्री से अत्यन्त तेजस्वी मुचुकुद
और सुसंधि नामक दो पुत्र और पचास पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं । कन्याओ के युवावस्था को
प्राप्त होते ही राजा ने उनका विवाह सौभरि नामक मुनि के साथ कर दिया । उन कन्याओ का
अग्रज हरि-भक्ति में जीवन व्यतीत करते हुए स्वर्ग सिधारा । उसके भाई सुसंधि ने पुण्य-
कार्य करते हुए (चिर काल तक) राज्य का पालन किया । उस सुसंधि के ध्रुवसंधि नामक
पुत्र उत्पन्न हुआ । उसके पुत्र प्रसेनजित् के भरत नामक पुत्र हुआ और भरत के असित
नामक पुत्र हुआ ।
“असित के राज्य-काल में अत्यत पराक्रमी हैहय-वश में भयंकर आकारवाला ताल-
जघ नामक वीर उत्पन्न हुआ । उसने असित के साथ घोर युद्ध किया और युद्ध में पराजित
करके उसका वध कर डाला । राजा की दोनो रानियो ने अत्यन्त दुःखी होकर
राज-काज का सारा भार मन्त्रियो को सौंप दिया और शान्ति से जीवन विताने लगी । उन दोनो
रानियो में कालिंदी नामक रानी गर्भवती थी । सौतिया डाह के कारण दूसरी रानी से
यह सहा नही गया और उसने उस गर्भ को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से विष का प्रयोग किया ।
विष-प्रयोग से गर्भ-पात तो नही हुआ, किन्तु उसके प्रभाव से वह कड़ी वेदना का
अनुभव करने लगी । तब कालिंदी हिमालय में च्यवन ऋषि के यहाँ गई और वडी
भक्ति से उन्हें प्रणाम करके अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया । मुनि ने उसके दुःख की कथा
सुनकर कहा-'बेटी, तुम मेरी पुत्री के समान हो, डरने की कोई बात नही है ।' उन्होने
उसे स्नेह से उठाया और अपनी दिव्य-दृष्टि से सारी स्थिति को समझकर कहा-‘हे
कालिंदी, तुम्हारे अत्यत धार्मिक, अतुल तेजस्वी, महान् चेता, कीर्त्तिवान्, वंशोद्धारक, रूपवान्
तथा शत्रुदमन पुत्र उत्पन्न होगा ।' इस प्रकार मुनि का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात्
वह रमणी मुनि को प्रणाम करके अपने घर लौटकर प्रसन्न-चित्त रहने लगी ।
“निदान शुभ मुहूर्त्त में उस शुभागी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कालिंदी अत्यन्त हर्षित हुई। वह
अपने शत्रुओ का दमन करके वडे आनन्द से राज करने लगा । उसका नाम सगर था। उसका पुत्र
असमंजस था। असमंजस का पुत्र अंशुमान था, जिसका पुत्र राजा दिलीप था। दिलीप के पुत्र पुण्यात्मा
भगीरथ थे, जिन्हें ककुत्स्थ नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्र रघु महाराज के पुरुषादक नामक पुत्र हुआ ।
उसके उज्ज्वल कीर्त्तिमान् नामक पुत्र हुआ । उसके पुत्र शश्वण था, जिसके पुत्र सुदर्शन के अग्निवर्ण नामक
पुत्र हुआ, जिसका पुत्र ऋतुपर्ण था। ऋतुपर्ण का पुत्र मरु था और उसका पुत्र शीघ्रग था। शीघ्रग के
६० रंगनाथ रामायण
पुत्र मनु के अवरीष नामक पुत्र हुआ । अवरीष का पुत्र जनवदित नहुष था, जिसका पुत्र
ययाति नामक वीर था । ययाति के पुत्र नाभाग था और उसका पुत्र अज था । अज के
पुत्र ही ये दशरथ हैं, जो पुण्यात्मा तथा सफल मनोरथ हैं । इन्ही दशरथ के पुत्र राम हैं ।
इनके विषय में अधिक क्या कहूँ ? इनके पुत्र को ही तुमने अपनी पुत्री देने का
निश्चय किया है । तुम कृतकृत्य हो । तुम्हारा वंश (इससे) मंगलमय हुआ ।
इस प्रकार वसिष्ठ को रघुवंश की प्रशंसा करते हुए सुनकर पवित्रात्मा शतानन्द जनक
की अनुमति लेकर बड़े हर्ष से सभी सभासदों के सुनते हुए यों कहने लगे—'हे मुनीन्द्र,
हमने बड़े हर्ष से अनघात्मा दशरथ के वंश-क्रम का वर्णन आपसे सुना । मैं अब आपको
प्रशंसनीय जनक की वंशावली सुनाऊँगा ।"
३५ राजा जनक की वंशावली
“द्विजो तथा परमहंसो के जन्मदाता अद्वितीय ब्रह्म अच्युत के नाभि-कमल में ब्रह्मा का जन्म हुआ
और उनका पुत्र हुआ मरीचि । मरीचि का पुत्र कश्यप था । कश्यप के सूर्य उत्पन्न हुआ ।
उनका पुत्र था मतिमान्, जिसके मनु नामक पुत्र हुआ । मनु ने ध्यान-मग्न अवस्था में कभी छींका,
तो (उस छींक से) वैवस्वत का जन्म हुआ । उस वैवस्वत का पुत्र निमि था, जो निर्मल
आचारवान्, नीतिकोविद, धर्मनिरत, विमल मूर्तिमान् तथा यशस्वी था । उसका पुत्र मिथि था,
जिसके जनक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । जनक के उदावसु नामक पुत्र हुआ, जिसका
पुत्र नन्दिवर्द्धन था । नन्दिवर्द्धन का पुत्र सुकेतु था, जिसका पुत्र देवरात था । देव-
रात के वृहद्रथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके महाविभु नामक पुत्र था । महाविभु का पुत्र
सुवृति था, सुधृति का पुत्र धृष्टकेतु और उसका पुत्र हर्यश्व था । हर्यश्व के मरु नामक
पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके प्रतीक्षक नामक पुत्र हुआ । प्रतीक्षक का पुत्र कीर्तिरथ था, जिसके
देवमीढ नामक पुत्र हुआ । देवमीढ का पुत्र विबुध और विबुध का पुत्र महाध्रक था ।
महाध्रक के कीर्तिरात नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र महारोम था । महारोम के स्वर्ण-
रोम नामक पुत्र हुआ, जिसके ह्रस्वरोम नामक गुणवान् पुत्र हुआ । ह्रस्वरोम के दो पुत्र हुए
—महाराज जनक और कुशध्वज । ये दोनों सौजन्य की मूर्ति हैं । जब जनक महाराज राज्य
करते थे, तब सांकाश्य का पराक्रमी राजा सुधन्वा अपनी सेना के साथ आया और मिथिला
तथा सीता-समेत शिव का धनुष माँगते हुए एक दूत भेजा । जब उसकी माँग की उपेक्षा
कर दी गई, तब उसने शिव-धनुष तथा सीता को प्राप्त करने के लिए घोर युद्ध किया ।
जनक ने युद्ध-भूमि में उसका संहार किया और अपने अनुज को उस राज्य का राजा बनाया ।
जनक से लेकर उस वंश में उत्पन्न सभी राजाओं के नाम जनक के कारण प्रशस्त हो गये हैं ।
निमि-वंश में जन्म लेनेवाले सभी नरेश योग-ज्ञान-सम्पन्न तथा चिरजीवी
होते हैं ।”
इस प्रकार, जनक के वंश के सदाचरण तथा सीता के सद्गुणों की प्रशंसा करने के
पश्चात्, अत्यंत प्रतापी तथा विमल-भाषी दशरथ को संबोधित करके (शतानन्द ने) कहा—
'हे महाराज आप अपने नित्य अभिराम पुत्र राम का विवाह सीता के साथ संपन्न करके
चिर-कीर्ति प्राप्त कीजिए।'
दशरथ ने इन बातो को सुनकर वडे उत्साह से वसिष्ठ तथा गाधि-पुत्र को देखकर
कहा—'आप जनक महाराज से कहिए कि वे उर्मिला का विवाह सौमित्र से तथा राजा
कुशध्वज की कन्याओ का विवाह उत्तम गुण-सपन्न भरत तथा शत्रुघ्न के साथ कर दें ।'
तब उन्होने राजा जनक को सारी बातें कह सुनाई और उनकी सम्मति प्राप्त करके वडे
हर्ष से राजा दशरथ को जनक की स्वीकृति कह सुनाई ।
दूसरे दिन विवाह के लिए अनुकूल शुभ लग्न था । अत जनक ने उत्तर फाल्गुनी
नक्षत्र में विवाह का शुभ-मुहूर्त्त ठहराया और नगर तथा अत पुर को सजाने के लिए परि-
चारको को भेजा । उन्होने चदन-कस्तूरी-मिश्रित जल से (नगर के) मार्गों पर छिडकाव
करके उन्हें सुगधमय बनाया । चीनाशुको (रेशमी वस्त्र) के वितान सजाये, मणि-तोरण-
ध्वजाओ से सारा नगर अलकृत किया, फलो के भार से अवनत कदली के पेडों तथा सुपारी
के पत्तो से प्रत्येक घर तथा कक्षो के द्वारो को सजाया और विशाल चबूतरो को जवादि
से लीपकर उनपर चौक पूरे । मणिकचन-कलशो से युक्त सौधो के गोपुरो का समूह
अगणित सूर्यो का भ्रम उत्पन्न कर रहा था । सारा नगर मणि-दीपो, वारभी (धूप) के
धुएँ तथा पुष्प-कलापो का भार वहन कर रहा था । इस प्रकार नगर को अलंकृत करने
के पश्चात् उन्होने अत पुर को बडी निपुणता से सजाया । फिर उन्होने शिल्पकारो द्वारा
विवाह-वेदी का निर्माण कराने का आदेश दिया । शिल्पकारो ने मरकत की भूमि पर सोने
के स्तम्भ स्थापित किये, उनपर नीलमणि के कार्निस लगाये और उनपर माणिक्य की धरन
(शहतीर) बैठाई । सुदर ढंग से नक्काशी करके बनाये गोमेदक के छज्जे बनाये और
ऊपर वज्र (हीरे) का गारा किया । (उस मडप के) चार विशाल किवाड बनाये गये, जो
मणि तथा स्वर्ण के बने थे । (मण्डप में) सोने के सुन्दर चित्र बनाये गये । नीलमणि
के हाथी तथा स्फटिक के सिंहो से सुसज्जित सोपान रचे गये । उशीर (खस) का विशाल शामियाना
बनाया गया, जिसके मध्य में फूलो की लडियाँ लटकाई गईं । विवाह के लिए
मरकत की वेदी बनाई गई। उसे कस्तूरी से लीपकर उसपर मोतियो के चौक पूरे गये ।
इस प्रकार सुसज्जित वह विवाह-मण्डप दर्शको को नेत्रोत्सव प्रदान कर रहा था ।
तब वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा अन्य पुण्यात्माओ को देखकर जनक ने कहा—'आप
लोग ही मिथिला तथा अयोध्या के कर्त्ता (विधाता) हैं । अब आगे जो कार्य करना
उचित हो, उन्हें कराइए ।'
निरतर बजनेवाले मगल-वाद्यों के कलनाद तथा सुमगली स्त्रियो के मधुर गीतो
के बीच महाराजा दशरथ तथा उनके चारो पुत्र मणिपीठो पर बैठे । उन्हें तैल तथा उवटन
लगाकर उनका मगल-स्नान कराया गया । उसके उपरात माथे पर तिलक देकर उन्हें
चीनांशुक (रेशमी वस्त्र) तथा आभूषणो से अलकृत किया गया । (उन्हें देखकर) दशरथ
तथा उनकी पत्नियां आनन्द से फूली नही समाती थी । इसके पश्चात् उन्होंने पवित्र मन से
अपने पुत्रो के शुभ अभ्युदय के निमित्त गो-दान देने का निश्चय किया । प्रत्येक पुत्र के
हितार्थ उन्होने वेद-विधि के अनुसार सोलह हजार गायें श्रेष्ठ ब्राह्मणो को दान दी । वे
गायें धौत-खुर, कनक-श्रृंग, ताम्र-पुच्छ से अलकृत थी और सुन्दर दीखती थी । उनके साथ
६२ रंगनाथ रामायण
उनके बछडे भी थे । ये गायें श्रेष्ठ वस्त्रो से सज्जित थी । गायो के साथ उनको दूहने
के लिए काँसे की दोहनी भी राजा ने दान में दी । इनके अतिरिक्त राजा ने स्वर्ण, भूमि
तथा रत्नादि दक्षिणा के साथ अलग-अलग (पुत्रो के हितार्थ अलग-अलग ब्राह्मणो को) दिये ।
इसी समय भरत का मामा युधाजित् वहाँ आ पहुँचा । वह अपने पिता कैकय-
नरेश की आज्ञा से भरत को ले जाने के लिए अयोध्या आया था। किन्तु पुत्रो के विवाहार्थ
दशरथ को मिथिला गये हुए जानकर वह सीधे मिथिला आ गया । दशरथ ने बडे
प्रेम से उसका आदर-सत्कार किया और कुशल-समाचार पूछे ।
दूसरे दिन स्नातक आदि विधियो को पूर्ण करने के पश्चात् (राम) अपने भाइयो
के साथ दशरथ के सम्मुख उपस्थित हुए । दशरथ ने उनका अलकार करने का आदेश दिया ।
(परिचारक राम का अलकार करने लगे) उनके सिर पर मुकुट, उदयाद्रि के शृग
के समान शोभा दे रहा था । उन्होने हाथो में ककण धारण किये, मानो वे भक्तो की
रक्षा के लिए बद्ध-ककण (कृत-सकल्प) हो रहे हो ।
उनके वक्ष पर हार ऐसे शोभ रहे थे, मानो उनके वक्षःस्थल से उत्पन्न चन्द्रकिरणें
चारो ओर छिटक रही हो । कटि-प्रदेश में कनक-वस्त्र ऐसे गोभित हो रहे थे, मानो पृथ्वी ने
उनके कनकावरण को धारण कर लिया हो । उनके कानो में कुडल ऐसे शोभ रहे थे,
मानो रावण के अत्याचार से पीडित अष्ट-दिक्पालो का यश दोनो ओर मोतियो के बहाने
अपनी विनती (श्रीराम को) सुना रहे हो । ऐसे सौदर्य से सपन्न उनके मुख की कान्ति
को बढाते हुए कस्तूरी-तिलक शोभित हो रहा था । उदित होनेवाले भानु के तेज के समान
विलसित, एव कुडल केयूर, मुकुट तथा हारो से मडित लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के बीच
राम ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो दिक्पालको के मध्य इन्द्र विराज रहा हो ।
वहाँ (जनक के अत पुर में) जनक ने (अपनी) चारो कन्याओ को सुसज्जित करने
के लिए दासियो को आदेश दिया । उन्होने उन कन्याओ को दीप्तिमान् मणिपीठ
पर बिठाया, सुमगलियो के मगल-गीतो और गारिका तथा कीरो के कलरव के बीच प्रत्येक को
कुकुम, कस्तूरी, गोरोचन तथा जवादि की सुगधि से सुवासित उबटन लगाया । ककणो
की मृदु ध्वनियो से मुखरित कर-पल्लवो से उनके केशो में चपा का तेल लगाया, हरिचदन
का लेप किया और घनसार की सुगधि से युक्त कुनकुने जल से उन कन्याओ का
स्नान कराया, महीन कपडो से (उनके शरीर को) पोछा और गुलाबी रग के लहगो पर सुनहली
जरीदार अचलवाले वस्त्र पहनाये । (उसके बाद) उन्होने उनके जूडे ऐसे सुदर ढग से बाँधे
मानो समस्त शृगारो की राशि एकत्र कर दी हो । उन जूडो में जूही की कलियाँ
सजाई । कर्पूर तथा गुलाब-जल में कस्तूरी घोलकर (सारे शरीर पर) लेप किया, सुनहली
जरीदार कचुकी पहनाई तथा उनके वक्ष पर मरकत-मोतियो के हार पहनाये । फिर
उनके (कन्याओ) के कमनीय मुखो के सौंदर्य की वृद्धि करते हुए तिलक लगाये, कपोलो पर
मकरिका-पत्रो को रचा, नाक में बेसर पहनाये, रत्नो के कर्णफूल, मोतियो की वालियाँ
और माणिक्य के कुण्डल सजाये । सके पश्चात् (उनके पैरो में) मरकत के कड़े, पद्म-
राग जडे नूपुर तथा गोमेदक-जडे पाजेव पहनाये ।
इस प्रकार, हारो तथा आभूषणो से अलकृत होने पर उन्हें देख सब स्त्रियाँ आश्चर्य
करने लगी कि ये दुल्हनें शरत्-पूर्णिमा के चन्द्र है, वसत-काल की पुष्प-लताएँ है या
खराद पर चढे हुए श्रेष्ठ रत्न हैं, श्री-समन्वित कुदन की शलाकाएँ हैं, धौत मुक्ताएँ है,
अथवा सुगन्ध से परिपूर्ण चदन की प्रतिमाएँ है। उनमें सीता तो स्वय लावण्य की मूर्ति,
श्रेष्ठ गुणवती, जगन्माता, आदिलक्ष्मी का अवतार थी, उस देवी के सौंदर्य का वर्णन करना
किसके लिए सभव है ? वे भूषणो के लिए आभूषण थी, भूदेवी के समान थी, रत्नाकर
की मेखला थी, गधवती (पृथ्वी) थी और वसुमती थी ।
शुभ मुहूर्त्त निकट आते देखकर वसिष्ठ जनक से परामर्श करके आये और दशरथ
को इसकी सूचना दी । तब महाराज दशरथ कौशिक, वसिष्ठ आदि गुरुओ को साथ लेकर
अमरेन्द्र के वैभव से युक्त हो, उचित वाहनो पर सवार होकर जनक के अत पुर की ओर
चले । उनके पीछे-पीछे उनके पुत्र तथा सुसज्जित हो रमणियाँ चलने लगी । उनके पीछे
राजा के सामन्त, मगलप्रद द्रव्यो को लिये हुई पुण्यवती स्त्रियाँ, याचक, अलकृत अश्व तथा
गज, मन्त्री, वेद-पाठ करते हुए विप्र तथा प्रसन्न-चित्त मुनिगण चलने लगे ।
३६ सीता और राम का विवाह
बरात को आते देख जनक ने अत्यन्त उत्साह से उनकी अगवानी की थी । कमल-
लोचनी सुहागिनो ने उनकी आरती उतारी । जनक ने उन्हें विवाह-मडप में नवरत्न-खचित
पीठो पर आसीन कराया । उसके पश्चात् उन्होने अविलब अपने पुरोहित के द्वारा स्वर्ण-
वेदी में अग्नि की प्रतिष्ठा कराई और वेदोक्त विधि से हवन-कार्य सपन्न किया । उसके
उपरान्त उन्होने देव-कन्याओ की-सी दीखनेवाली, लावण्यवती अपनी कन्याओ को बडे स्नेह
से बुलवाया । उन्होने मधुपर्क की विधि पूरी की और अपनी प्रिय पुत्री विद्युत् अगवाली,
स्त्री-रत्न, कमललोचनी सीता को परदे के पीछे खडा किया । फिर उन्होने वाछित फल
की सिद्धि के हेतु सकल्प-पूर्वक राम से कहा—'हे राम, मेरी पुत्री, सद्धर्मचारिणी सीता को अग्नि
के समक्ष ग्रहण करो ।' इस प्रकार कहते हुए उन्होने (राम के हाथो में) सीता को सौंपा ।
(उस समय) अजस्र पुष्प-वृष्टि हुई तथा देव-दुदुभियाँ बजने लगी । सुदर रमणियाँ दीपो
की थालियाँ लिये खडी थी, स्वर्ण के थालो में मगलाक्षत लिये सुमगलालियाँ पार्श्व-भाग
में खडी थी । गुड तथा जीरा मिलाकर वधु-वरो के सिर पर रखा गया ।१
तब सुमुहूर्त्त जानकर (मुनि ने) परदा हटाया । सीता का भव्य मुख सामने
देखकर राम की आँखें पूर्णिमा के चन्द्र के प्रकाश में विकसित कुमुद-पुष्प के समान प्रफुल्लित
हो गई । सीता की दृष्टि पति के चरण-कमलो पर इस प्रकार स्थित हुई, जैसे पद्म पर
भ्रमर बैठे हो ।
रामचन्द्र की दृष्टि इस प्रकार दीखने लगी, मानो वह उस परम सुन्दरी के लावण्य-
रूपी सागर में तैर रही हो । वधू की दृष्टि वर के शरीर के कान्ति-रूपी प्रवाह के मध्य
विकसित पद्म (कमलो) के सदृश शोभायमान हो रही थी । पत्नी तथा पति की आँखें थोडी
१ आंध्र-देश में विवाह के समय शुभ मुहूर्त्त में वर-कन्या के सिरो पर गुड़ तथा जीरा
मिलाकर रखने की प्रथा है। यह शुभ माना जाता है।
६४ रंगनाथ रामायण
देर के लिए आपस में इस प्रकार मिली, जैसे रति तथा मन्मथ के सुन्दर रूप वडी शोभा-
युक्त गति से परस्पर मिले हों । उसके पश्चात् रघुवीर ने सीता के लाल कमल के समान
कर को अपने हाथ में लिया और पुलकित गात्रो से दोनो एक ही पीठ पर आसीन होकर
वडी प्रीति से हवन का कार्य सपन्न करने लगे । जनक ने वडी प्रीति से श्रेष्ठ युवती
उर्मिला का हाथ लक्ष्मण के हाथ में दिया, कुशध्वज की पुत्रियो में से कमल के-से विशाल
नेत्रोवाली माडवी का कर भरत के हाथ में सौपा और चन्द्रमुखी श्रुतकीर्त्ति का हाथ
शत्रुघ्न को दिया ।
इस प्रकार वेद-विधि से पाणिग्रहण-सस्कार समाप्त करके दशरथ के पुत्रो ने अक्षता-
रोपण-विधि पूरी की और लाज-होम (धान का लावा अग्नि में डालने की क्रिया) सपन्न
करके मुनियो के आशीर्वाद प्राप्त किये । स्वर्ग के देवो ने दुंदुभियाँ वजाई, पुष्प-वृष्टि की,
देवता सतुष्ट हुए, मुनि प्रसन्न हुए, गधर्व अत्यन्त हर्षित होकर गाने लगे तथा आनन्द से
अप्सराएँ नृत्य करने लगी । तब वसि
बालकांड ६५
पराक्रमी परशुराम कंधे पर परशु धारण किये आते दिखाई पडे, जिन्होंने इक्कीस बार इस
पृथ्वी को निक्षत्रिय कर दिया था । उनकी आँखें ऐसी लाल थी, मानो अपने जटा-जूट में
स्थित गगा की आर्द्रता से ललाट को आर्द्र बनाये हुए, अत्यत भयंकर रूप से जलनेवाले
तथा अपने कठ के विष को क्रोध से दैत्यो के ऊपर उगलनेवाले परम शिव के ललाट-
नेत्र की प्रज्वलित वह्नि को (परशुराम) अपनी दोनो आँखों में लिये हुए आ रहे हो ।
उनकी बिखरी हुई लाल-लाल जटाएँ ऐसी दीख रही थी, मानो उनके भीतर की क्रोधाग्नि प्रज्वलित
होकर बाहर तक अपनी लाल-लाल ज्वालाएँ फैला रही हो । उनके कंधे पर रहने-
वाला परशु ऐसा शोभा दे रहा था, मानो उनकी भुजा रूपी लक्ष्मी ने नाल-युक्त विकसित
कमल हाथ में धारण किया हो । ऐसे भयंकर रूप में आनेवाले परशुराम को देखकर
राजा दशरथ तथा मुनिगण भयभीत होकर भय-निवारक मंत्रो का जप करते हुए अर्घ्य-
पाद्य के साथ परशुराम के सामने आये ।
३७ परशुराम का गर्व-भंग
परशुराम ने अर्घ्य-पाद्य ग्रहण नही किया और राजा दशरथ को डरा-धमकाकर राम
के आगे आकर खडे हुए । भार्गव राम (परशुराम) को देखकर राम ने बडी भक्ति से
प्रणाम किया और हाथ जोडे बडे विनय से खडे रहे । उन्हें देखकर परशुराम ने कहा—
'हे राजन्, तुम कितना भी विनय दिखाओ, तो भी मैं तुम्हें क्षमा नही करूँगा । तुम मुझसे
युद्ध करो ।' तब राम ने कहा—"हे भूसुरोत्तम, आपने कश्यप आदि ब्राह्मणो को सारी
पृथ्वी दान कर दी है और महान् जितेन्द्रिय हो वनो में रहकर घोर तपस्या में संलग्न
रहते हैं । अत आपकी वदना करना उचित है । हे मुनीश्वर, यही विचार करके मैंने
आपको प्रणाम किया है, आपसे भीत होकर नही । क्या यह उचित है कि आप व्यर्थ
ही मेरी निंदा करें ? "
परशुराम बोले—"तुम मुझे तपस्वी कहते हो ? जानते हो, मैने युद्ध में सहस्रबाहु
को मार डाला और इक्कीस बार पृथ्वी पर के सभी क्षत्रियो का नाश कर डाला है तथा
(उनके) रक्त से अपने पितरो की तिलोदक-क्रिया की है । हमारे पितर राजाओ के शवो
का सोपान बनाकर स्वर्ग में चले गये हैं। हे अनघ, ऐसे भार्गव राम को बिना जाने तुम
इस ससार में राम होकर कैसे जन्मे ? क्षत्रिय के नाम से जो जन्म लेता है, मैं उसका
नाश करूँगा । (ऐसी दशा में) राम का नाम धारण करनेवाले क्षत्रिय को क्या मैं कभी
छोड सकता हूँ ? राज-वश में जन्म लेकर 'राम का नाम धारण करनेवाले तुम्हें मैं कदापि
क्षमा नही करूँगा । राजा होने के कारण तुम्हारे पिता को युद्ध में मार डालने के उद्देश्य
से मैं आया था, लेकिन स्त्रियो की आड में शरण लेने के कारण मैने उसे छोड दिया था ।
इसीलिए वह गर्वांध हो यहाँ फूला-फूला विचर रहा है । आज भले ही वह कही
छिप जाय, पर मैं उसे जीवित नही रहने दूँगा ।"
तब दशरथ अत्यन्त भीत होकर बडे विनय से भार्गव से बोले—"हे भार्गव, आप
ब्राह्मण हैं, आपको इतना रोष क्यो ? मेरे पुत्र बालक हैं । उनपर क्रोध करना आपको
शोभा नही देता । मैं जानता हूँ कि आप समस्त शास्त्रो एव पुराणो में पारंगत हैं । ऐसा
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६६ रंगनाथ 'रामायण
कौन धर्म है, जिसे आप नहीं जानते । आपका सामना करके आपसे युद्ध करने की क्षमता
शिवजी में भी नहीं है । ऐसी दशा में दूसरो की शक्ति की वात कौन कहे ? हे परम-
पावन, देवेन्द्र भी आपकी कठोर प्रतिज्ञा को व्यर्थ नही कर सकता । आप हम सबको
क्षमा करके प्रसन्नता से गमन कीजिए ।"
दशरथ ने इस प्रकार कहकर प्रणाम किया और सिर झुकाकर चुपचाप खडे हो गये । फिर
भी परशुराम की आँखें क्रोध से लाल ही रहीं । उन्होंने अपनी प्रशसा में कहे हुए वचनो
को अनसुनी कर दिया और मन-ही-मन उन सबका दमन करने का विचार करके
अत्यंत क्रोध के साथ बोले—"जिस समय मे शिव के साथ धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था,
उस समय कार्तिकेय ने मुझसे युद्ध आरभ किया, पर वह मुझसे हार गया । तब शिव ने
भी मेरी शक्ति की प्रशसा की थी । उस शिव के धनुप का तोडना मै कैसे सहन कर
सकता हूँ ?"
तब रघुराम ने हँसते हुए कहा—"मैने विनोदार्य उस धनुप का सधान किया, तो
वह टूट गया । इतना ही नही, मेरे सधान करने
बालकांड ६७
देवताओ का मनोभाव जानकर शिव ने अपना धनुष देवरात को दिया । उन्होने वह धनुष
जनक को दिया । `विष्णु ने अपना धनुष रुचिक को दिया, रुचिक ने जमदग्नि को दिया
और जमदग्नि ने कृपा करके मुझे यह धनुष दिया । शिव का धनुष पहले ही थोड़ा-सा
टूटा हुआ था, इसलिए तुमने उसे तोडा होगा । हे राजन्, मेरे हाथ का यह धनुष उसी
धनुष के जोड का है । इसपर बाण-संधान करके अपनी शक्ति का परिचय दिये बिना
मैं तुम्हें यहाँ से हटने नही दूंगा ।”
इन वचनो को सुनकर दशरथात्मज अत्यत क्रुद्ध हुए । उनकी आँखो से अग्नि-कण
निकलने लगे । राम ने भार्गव राम से, जो उनकी शक्ति से अनभिज्ञ थे, कहा—“मै जानता
हूँ कि आपमें अतुल बल है । मै यह भी जानता हूँ कि आपने क्षत्रियो को परास्त करके
उनका वध किया है । किन्तु, आप मुझे भी दूसरो की तरह समझकर, निर्भय होकर डीग
मार रहे है । आपको मेरे भुज-बल का ज्ञान नही है । भला, आपकी शक्ति ही कितनी है ?
आपका यह धनुष क्या चीज है ? लाइए, देखूँ तो सही ।
इस प्रकार कहकर उन्होने (परशुराम के हाथ से) धनुष लेकर, उसकी प्रत्यचा
चढा दी और एक उग्र बाण-संधान करके कहा—“मै आपके पैर काटकर आपका गर्व-
भग करते हुए आपका क्रोध दूर करूँगा ।”
परशुराम भयभीत हो गये । उनका घमड चूर-चूर हो गया । उनकी हेंकडी जाती रही ।
तुरन्त बडी नम्रता से प्रार्थनापूर्वक कहने लगे—“हे राजेन्द्र, हे राम, मानवाधीश
मुझे क्षमा करो । मेरी रक्षा करो । मैने सारी पृथ्वी कश्यप को दान में दे दी है । अत.
में रात के समय इस पृथ्वी पर ठहर नही सकता । मुझे रात तक महेन्द्राचल पर पहुँच
जाना चाहिए । इसलिए तुम मेरे पैर मत काटो । (तुम चाहे तो) मेरे समस्त सचित
पुण्य पर यह बाण छोड़ दो ।”
तब राम ने वह बाण परशुराम के (सचित) पुण्य पर छोड़ दिया । देवता, सिद्ध,
खेचर आदि जड़वत् खडे भार्गव राम तथा क्रुद्ध काकुत्स्थ राम को देखते रहे । तब पुष्प-
वृष्टि हुई । स्वर्ग में रहनेवाले ब्रह्मादि देवता आनन्दित होकर राम की प्रशसा करने लगे ।
भार्गव राम राम को देखकर मन-ही-मन उनकी महिमा का विचार करके बोले—
“हे अनघ, मैंने तुम्हारी शक्ति को देख, मन-ही-मन विचार करके जान लिया है कि तुम
विष्णु हो । हे काकुत्स्थ, इसलिए युद्ध में हार जाना मेरे लिए स्वाभाविक ही है । तुम
मेरे बल हो, मेरी आत्मा हो, मेरे बधु-बाधव सब तुम ही हो । हे रामचन्द्र, तुम मेरे
कुवचनो का ख्याल मत करो । हे रघुकुलाधीश राम, तुम मेरी रक्षा करो ।”
इस प्रकार उन्होने राम की स्तुति की, मन-ही-मन रघुराम की महिमा गुनते हुए
उनकी परिक्रमा की और भक्ति से हाथ जोडकर, अत्यन्त विनय से राम की कृपा प्राप्त
करने के उद्देश्य से बोले—“हे राघव, हे जानकीनाथ, अब मुझे जाने की आज्ञा दो । मेरी
त्रुटियो का ध्यान न करके उन्हें क्षमा कर दो, मेरी रक्षा करो और स्नेह से मुझे जाने की
अनुमति प्रदान करो । में एकनिष्ठ होकर, अविचल रीति से नेत्र बद करके तुम्हारे प्रति
तपस्या करूँगा और ज्ञान प्राप्त करूँगा, जिससे सभी मुनि-समाज हर्षित हो जाय ।”
इस प्रकार राम की स्तुति करके, बड़े प्रेम से वे वहाँ से प्रस्थान करते हुए बोले-
'राम, तुम्हारी शक्ति अनुपम है।' उसके पश्चात् वे महेन्द्राचल पर चले गये। वरुण की
प्रार्थना मानकर रघुराम ने उसी क्षण परशुराम का धनुष उन्हें दे दिया।
तब अनुकूल पवन चलने लगा। सेना में फिर से उत्साह छा गया। नर तथा सुरों
की प्रशंसा प्राप्त करते हुए विजय-श्री से युक्त हो राघव ने अपने पिता महाराज दशरथ
तथा पुण्यात्मा वसिष्ठ को प्रणाम किया। राजा ने बड़े आनन्द से उन्हें गले से लगाकर
आशीर्वाद दिया और बोले-“मेरा पुनर्जन्म-जैसा हुआ है। तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करके
इस पृथ्वी पर मैं देवराज इन्द्र के समान बन गया। परम पावन परशुराम जब शिव की
तरह (भयंकर रूप लेकर) यहाँ आये, तब भय से मेरा सारा शरीर काँपने लगा और मैंने सोचा
कि अब कोई उपाय नहीं है। इसलिए मैंने उनसे विनती की। जब उन्होंने मेरे विनीत
वचनों को ठुकरा दिया, तब पुत्र-स्नेह से विह्वल होकर मैं चुप हो रहा। (तुम्हारा) उनको
जीतना मेरे लिए बड़े आश्चर्य का विषय है। मैंने आज अतुल वैभव प्राप्त किया है।
तुम्हारे प्रताप के फलस्वरूप सारा भय दूर हो गया है। मैं इस संसार में यशस्वी हुआ।”
इस प्रकार, राम का अभिनंदन करने के उपरान्त राजा ने वसिष्ठादि मुनियों और सभी
सेनाओं को साथ लिये हुए बड़े आनन्द से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।
३८ अयोध्या में प्रवेश
मंगल-चिह्नों तथा पुण्यात्माओं के साथ, मंगल-वाद्यों की ध्वनि होते हुए, दशरथ ने
अपने पुत्रों-सहित बड़ी प्रसन्नता से अयोध्या में प्रवेश किया। अलंकृत राजमार्ग में, राज-
कुल के लोग तथा अन्य मित्र-वर्ग, सौधों पर से उन सुन्दर राजकुमारों को देखकर उनपर
पुष्प-वृष्टि करने लगे। भूसुर आशीर्वाद देने लगे। तब राजा ने अत्यन्त सुन्दर ढंग से
अलंकृत अंतःपुर में प्रवेश किया। कौसल्या कैकेयी तथा सुमित्रा आदि रनवास की सभी
स्त्रियाँ अत्यन्त हर्ष से उनके स्वागतार्थ आईं। उन्होंने उनपर फूलों की वर्षा की और उनकी
आरती उतारी। पुत्र तथा पुत्र-वधुओं ने उनके पैर छुए, तो उन्होंने उन्हें गले लगाकर
आशीर्वाद दिये। सीता आदि पुत्र-वधुओं का मधुर स्वभाव एवं कुशलता देखकर सभी संतुष्ट हुए।
दशरथ अपने चारों पुत्रों की सेवाएँ प्राप्त करते हुए, चतुर्भुज विष्णु के समान,
चार शृंगोंवाले स्वर्ग के हाथी (ऐरावत) के समान विलसित होते थे और बड़े आनन्द से
पुण्य की रक्षा करते हुए राज्य करने लगे। एक दिन दशरथ ने उचित समय देखकर
शुभ लक्षणों से संपन्न अपने पुत्र भरत को बुलाकर कहा-“हे वत्स, तुम्हारे मामा कैकय
तुम्हें अपने यहाँ ले जाना चाहते हैं, अतः तुम शत्रुघ्न के साथ उनके यहाँ जाओ और
उनकी इच्छा पूर्ण करो। हे वत्स, (वहाँ) अपने नाना, नानी, मामा तथा ब्राह्मणों के प्रति
भक्ति-युक्त विनय दरसाते रहना। उनकी परिचर्या करते हुए उनसे रथ चलाना, शस्त्र
चलाना, वेद-शास्त्र, नीति-शास्त्र तथा अन्य सभी कलाओं को सीखने में सतत तत्पर रहना।
एक क्षण भी व्यर्थ न बिताना और (समय-समय पर) अपना कुशल-समाचार भेजते रहना।”
राजा का आदेश पाते ही भरत ने माता-पिता तथा रघुराम को विनय से प्रणाम
किया और शत्रुघ्न को साथ लेकर अपने मामा के साथ राजगृह की राजधानी के लिए रवाना हुए।
बालकांड ६९
राजकुमारो ने अपने आगमन का समाचार अपने नाना को भेज दिया । उस राजा ने
अपने नगर को फूल-मालाओ, तोरणो तथा पताकाओ से सुदर ढग से सजाया । सुगंधित
जल से मार्गों का सिंचन करवाया तथा पुष्प एव धूप आदि से राजमार्ग को सुगधित किया ।
(फिर) मत्रियो, स्त्रियो तथा परिचारको को साथ लेकर तरह-तरह के वाद्य,
नृत्य, गीतो से युक्त हो राजा ने उनकी अगवानी की और वदी, सूत तथा मागध-जन की
स्तुति-वचनो के साथ अपने नाती को बडे स्नेह से अत पुर में ले आये । भरत ने अपने
नाना से लेकर क्रमश सभी गुरुजनो को प्रणाम किया और उनके आशीर्वाद प्राप्त किये ।
युवराज राम बडी कुशलता तथा एकाग्रता से, अपने पिता की सेवा करते हुए,
भी प्रजा को एक समान मानते हुए धर्म-निरत हो, सीता के साथ नव-वैवाहिक जीवन का
आनन्द प्राप्त करने लगे । वे अट्टालिकाओ पर, क्रीडा-सौधो में, चन्द्रकान्त शिलाओ पर, शीश-
महलो में, सोने के शयनागारो में, जूही की पुष्प-शय्याओ पर, चपक, पूग, नारियल, रसाल,
नारगी आदि वृक्षो से युक्त उपवनो में, क्रीडा-पर्वतो पर, सरोवरों में, लतागृहो में, धवल
वितानो में, बालुकामय भूमि पर, आमोद-प्रमोद के साथ रहते हुए, समस्त सुख-भोगो का
अनुभव करते रहे ।
इस प्रकार, आन्ध्र के भाषा-सम्राट्, काव्य तथा आगमो के ज्ञाता, आचारवान्, अपार
ज्ञान-समुद्र, भूलोक के लिए निधि-सम दीखनेवाले गोनबुद्ध राजाने अपने पिताश्रेष्ठ, धैर्यवा,न्
शत्रुओ के लिए काल-स्वरूप, महापुरुष, श्रेष्ठ शूर, दयालु, गुणवान् विट्ठलराजा के
नाम, आचन्द्रार्क विलसित होनेवाली, समस्त भूमडल में अत्यत पूज्य, अनुपम, ललित शब्दार्थों
से युक्त रस-सिद्ध रामायण के कला एव भावो से परिपूर्ण बालकाड की रचना की ।
आर्षग्रन्थ, आदि काव्य, रसिको को आनद देनेवाले तथा शाश्वत, इस पुण्यचरित्र
को जो कोई पढेंगे या सुनेंगे, वे सामादि वेद-समूहों का निवास-स्थान, रामनाम चिंता-
मणि, समस्त भोग, परहित आचरण, ऊँचे विचार, पूर्ण शक्ति, राज-सुख, विमल यश, चिर
सुख, धर्म-निष्ठा, दान में आसक्ति, चिरायु, स्वास्थ्य, समृद्धि आदि अवश्य ही प्राप्त करेंगे ।
उनके पापो का नाश होगा, पुत्र की प्राप्ति होगी, शत्रुओ का नाश होगा और धन-धान्य की
वृद्धि होगी । विना किसी प्रकार के विघ्न-बाधाओ के, उन्हें लावण्यवती धर्म-पत्नी का सह-
वास प्राप्त होगा । उनके भाई भी उन्नति प्राप्त करते हुए बडे स्नेह से हिल-मिलकर रहेंगे ।
देवता तथा पितर सदा तृप्त रहेंगे । यह रामायण मोक्ष-साधक है, पापहारी है,
दिव्य तथा भव्य है । शुभप्रद है । इस रामायण की पूजा नियम-पूर्वक करने से पुण्य प्राप्त होगा,
इसकी रचना करनेवालो की शुभ उन्नति होगी और स्वर्ग-लोक का निवास प्राप्त होगा ।
जबतक कुल पर्वत, समुद्र, रवि-चन्द्र, नक्षत्र, वेद, दिशाएँ तथा ससार शोभायमान रहेंगे,
तबतक यह कथा शाश्वत आनद-समूह का निवास-स्थान बनी रहेगी ।
. बालकांड समाप्त :
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श्रीरंगनाथ रामायण
(अयोध्या कांड)
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१ राम-राज्याभिषेक का संकल्प
महाराजा दशरथ अत्यन्त शुभप्रद रीति से राज्य का पालन करते थे । एक दिन
उन्होंने विचार किया, 'मेरा पुत्र राम, मेरे चारो पुत्रो में शुभ-गुणसपन्न, अतुल यशस्वी,
सदा दीन-दुखियो की चिन्ता करनेवाला, परहित का विचार करनेवाला, समस्त प्राणियो पर
दया दिखानेवाला, चारो पुरुषार्थो की सिद्धि के लिए यत्न करनेवाला, सतत सन्तुष्ट, प्रशंसा-
के योग्य गुणो से युक्त उचित क्रोध तथा प्रसाद गुणो से पूर्ण, शासन-शक्ति से समन्वित,
गज-तुरग आदि के आरोहण में दक्ष, विजयलक्ष्मी से समन्वित, चतुर, इच्छित कार्यों को
अविलंब सपन्न करनेवाला, दीर्घ कोप से रहित, सेवको पर कृपा रखनेवाला, अतिरथी,
ईर्ष्यारहित, करुणा-सिंधु, दूसरो के अच्छे-गुणो का आदर करनेवाला, बुद्धि में वृहस्पति को
भी परास्त करनेवाला, शुद्ध तेज में सूर्य के सदृश दीखनेवाला, प्रजारंजक, चन्द्र के समान-
शोभायमान, धनुर्वेद तथा वेदशास्त्रो में पारगत, न्याय के मार्ग से ही धनार्जन करने में निपुण,
क्षमा में पृथ्वी के समान ओर सकल-सद्गुण-सपन्न है। उसका राज-तिलक कर देना चाहिए।'
ऐसा विचार करके उन्होंने वसिष्ठादि महामुनि, सुमंत्र आदि सचिव, पास-पडोस के राजा,
मित्र, वधु, नागरिक, जनपद के लोग, आश्रित, बुद्धिमान्, सामत राजा, योद्धा, राजनीतिज्ञ
७४ रंगनाथ रामायण
आदि लोगों को राजसभा में बुला भेजा । उनके समक्ष राजा घन-गंभीर स्वर में बोले—
'हमारे पूर्वज इक्ष्वाकु-वंश के राजाओं ने बड़ी उत्तम रीति से इस पृथ्वी पर शासन किया था ।
उनके समान मैंने भी इस राज्य-भार को बड़ी क्षमता से वहन किया और आपके
सहयोग से निजकुल-धर्म में निरत होकर मैंने इसका पालन किया । यह विषय तो आपको
ज्ञात ही है । मैं आपसे और एक बात कहना चाहता हूँ । साठ हजार वर्ष तक मैंने इस
राज्य का पालन किया, सुंदर श्वेत छत्र की छाया में रहते हुए वृद्ध हो गया हूँ । भूमि-
भार की अपेक्षा वृद्धावस्था का भार मुझपर अधिक हो गया है । विकसित कमल के सदृश
मेरा शरीर कौमुदी के समान (पांडुर) हो गया है । केवल प्रताप बचा हुआ है । अतः,
प्रजा का पालन करने के लिए मैं अपने पुत्रकल्याण राम, देवता-हितकांक्षी धीमान्, इंदीवर-
श्याम, कोटिसूर्यप्रभावान्, सौंदर्य में मन्मथ को भी जीतनेवाले, जगदभिराम, राम का
राजतिलक कर देना चाहता हूँ और राज-भार से अवकाश लेना चाहता हूँ । क्या आप
इसको स्वीकार करेंगे ?'
घन-गर्जन को सुनकर हर्षित होनेवाले वन-मयूरों की भाँति सभासदों में अत्यधिक
उत्साह छा गया । कल-कल ध्वनि होने लगी । प्रजा में प्रमुख भूसुरों ने परस्पर परामर्श
करके सूर्यवंशी राजा से कहा—'हे राजन्, आपके श्रेष्ठवचन सब लोगों के लिए हितकर,
हृदयरंजक तथा अभीष्टदायक हैं । वे सब लोगों के लिए आनंददायक हैं । राजनीतिज्ञ,
निर्मल-धर्मनिपुण, जगत् के बंधु, दीनों के लिए कृपा-सिंधु, शांति-संपन्न, सत्यव्रती, सतत
विप्र-पूजा-निरत, सच्चरित्रवान्, नीति, प्रीति, निपुणता, क्षमा, ख्याति, ऐश्वर्य, कांति, दांति,
शांति आदि कितने ही सद्गुणों से आपसे भी श्रेष्ठ, लोकाभिराम राम को राजा बनाना
सर्वथा उचित है । वे तीनों लोकों का शासन करने में समर्थ हैं, फिर इस लोक का शासन
करना इनके लिए कौन बड़ी बात है ? हमारी भी यही इच्छा है कि आप उनका राज-
तिलक कर दें ।'
राजा ने ये बातें सुनीं, तो उनका हर्ष दूना हो गया । हर्षातिरेक से प्रफुल्लित
होकर वे वसिष्ठ तथा वामदेव को देखकर बोले—'हे अनघ, यह मधुमास अभीष्टप्रदायक है ।
अतः, हम इसी मास में राम को समस्त साम्राज्य-लक्ष्मी का राजा बनायेंगे । आप उचित
रीति से उसके लिए आवश्यक वस्तुएँ संचित करावें ।' ये बातें सुनकर ऋषियों ने अभिषेकार्थ
आवश्यक वस्तुओं का संचय करने के लिए आदमी भेजे ।
वसिष्ठ ने राजा की आज्ञा के अनुसार परिचारकों से कहा—'तुम लोग, श्रेष्ठ
स्वर्ण, रत्न, समस्त ओषधियाँ, चंदन, धवल पुष्प, मधु, घृत, खील (धान का लावा), नव
ललित-वस्त्र, राजा के लिए योग्य श्रेष्ठ रथ, स्वर्ण-रत्नजटित आयुध, शुभ लक्षणों से युक्त
भद्रगज, श्वेत अश्व विजन धवल छत्र, चामर, श्रेष्ठ पताके, एक सौ स्वर्ण कलश, स्वर्ण
शृंगों से युक्त श्रेष्ठ वृषभ, व्याघ्र-चर्म और अन्य आवश्यक मंगल-द्रव्य हवन-शाला में
ले आओ । नगर के द्वार, राज-पथ तथा सौध-शिखरों का अलंकार करो । समस्त नगर को
फूल-मालाओं, पताकाओं तथा तोरणों से सजाओ । कम-से-कम एक लाख भूसुरों (ब्राह्मणों)
के भोजन की व्यवस्था करो । दान-दक्षिणा आदि के लिए आवश्यक धन प्रस्तुत रखो ।
अयोध्याकांड ७५
पूजा तथा उपहारो से नगर-देवताओ की अर्चना करो । नगर के सभी निवासी तथा वेश्याएँ,
नगर के दूसरे फाटक के पास ढग से आकर खडे रहें । नगर के सभी सेवको को सेवा के
लिए उपस्थित रहने की सूचना दो ।' परिचारको ने वसिष्ठ के आदेशो का पालन करके
उसकी सूचना वसिष्ठ को दी ।
राजा ने सुमत्र आदि उत्तम सचिवो तथा सगे-सवधियो को अलग-अलग बुलाकर
उन्हें सकल्प कह सुनाया । उन्होने भी राजा के निश्चय का अनुमोदन किया । तब उन्होने
शीघ्र रघुराम को बुला भेजा और अपनी आंखो से स्नेह-सुधा की वृष्टि करते हुए कहा—
‘हे वत्स, प्रजा की प्रशसा प्राप्त करते हुए मैने दीर्घ काल तक राज्य किया । दान, धर्म
तथा यज्ञादि बडी निष्ठा से मैने पूरे किये और अत में तुम जैसे सद्गुण-सपन्न को पुत्र के
रूप में प्राप्त किया । अब मै राज का भार संभालने में असमर्थ हो रहा हूँ । इसलिए
मै तुम्हारा राज-तिलक कर दूंगा । परसो ही राज्याभिषेक के लिए उपयुक्त शुभ मुहूर्त्त है ।
सलिए तुम और सीता भक्ति के साथ उपवास करो ।’
तब राम ने राजा को देखकर विनय तथा साहस के साथ कहा—‘हे महाराज, मेरे
लिए आपके चरण-कमलो की सेवा से बढकर कोई दूसरा राज्य इस ससार में हो नही
सकता । आप अपने इन विचारो को त्याग दीजिए ।' तब राजा ने कहा—‘हे वत्स, तुम
पुण्य-चरित्र हो, पुण्य-धनी हो, सूर्यकुल के रत्न हो । तुम्हारे सिवा इस पृथ्वी का पालन
करने के लिए योग्य और कौन हो सकता है ? अत, हे अद्वितीय वीर । तुम इस राज्य-
भार को अवश्य संभालो ।'
राम ने उनकी आज्ञा के सामने सिर झुकाया और अपने महल में चले गये । राजा
भी सामन्त राजाओ, नागरिको तथा अन्य नातेदारो को विदा करके अपने महल में गये ।
(वहाँ पहुँचकर) उन्होने सुमत्र के द्वारा श्रीराम को बुलवाया, उन्हें अपने पास
बिठाकर, आनन्दाश्रु बहाते हुए बोले—‘हे मेरे भाग्य-निधि, हे मेरे पुण्य-स्वरूप, मेरे तप के
फल, हे मेरे पुत्र, मैने कुछ बुरे स्वप्न देखे है । मैने दुष्ट ग्रहो को तथा उल्का-
पात होते देखा है । अत मेरा मन बहुत व्याकुल हो रहा है । अभी तुम इस ‘पुण्य-योग’
में ही राज-तिलक कर लो । इससे मेरी इच्छा पूर्ण होगी । विलव क्यो ? तुम्हारी उन्नति
का समस्त ससार इच्छुक है ।'
रामचन्द्र ने पिता की आज्ञा शिरोधारण करके, उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा
लेकर वहाँ से विदा हुए । उन्होने अपनी माता, सुमित्रा तथा जानकी तथा लक्ष्मण को यह
समाचार सुनाकर उन्हें आनद-सागर में डुबो दिया । उसके पश्चात् पूर्ण-चन्द्रसदृश राम,
सीता के साथ प्रफुल्लचित्त से अपने महल में गये ।
इसके पश्चात् राजा ने वसिष्ठ से कहा कि आप राम के उपवास के लिए विधिवत्
सकल्प कराइए । तब वसिष्ठ ब्रह्मा-रथ पर आरूढ हो रामचन्द्र के महल के लिए रवाना हुए
और अपने आगमन का समाचार देने के लिए एक शिष्य को पहले ही भेज दिया ।
उनके तीसरे फाटक तक पहुँचते-पहुँचते राम उनके स्वागतार्थ आ पहुँचे और वडी भक्ति
से उस पुण्यात्मा को प्रणाम किया और बड़े हर्ष से उन्हें अत पुर में ले गये । वहाँ उन्होने
१५६ रंगनाथ रामायण
उस लोकवंद्य का उचित आदर-सत्कार किया। वसिष्ठ ने पुण्याह-वाचन कराया और पुष्य-
संकल्प-पूर्वक उपवास व्रत का प्रारंभ कराया। दक्षिणा के रूप में राम से दस हजार गायें
लेकर वसिष्ठ ने सारा समाचार राजा को कह सुनाया और घर चले गये।
राम ने बड़े प्रसन्नचित्त से सीता के साथ स्नान आदि से निवृत्त होकर विष्णु की
प्रीति के लिए हवन किया, हवन-शेष को ग्रहण किया और वसिष्ठ के आदेश के अनुसार
विष्णुगृह में कुशासन पर एकनिष्ठ हो विष्णु का ध्यान करते हुए उपवास करते रहे।
अयोध्या में लोग बड़े हर्ष से आनंदोत्सव की तैयारी में लग गये। कोई मोतियों
से चौक पूर रहा था, तो कोई अपने घरों का अलकार कर रहा था। कोई मणिमय तोरण
सजा रहा था, तो कोई फूलों से वितान बना रहा था। कुछ लोग झंडे लगा रहे थे।
कुछ जहाँ-तहाँ फूल-मालाएँ लटका रहे थे। कुछ एक दूसरे के अलकरण में मग्न थे। कही
लोग दशरथ की प्रशंसा कर रहे थे, तो कही इष्ट देवताओ की पूजा कर रहे थे। कुछ
दान-पुण्य कर रहे थे और पुण्य कथा-गोष्ठियो में भाग ले रहे थे। जहाँ-तहाँ लोगो की
भीड़ एकत्रित होकर राम के गुणों का गान कर रही थी। लोग उनकी सेवा करने के
लिए आतुरता प्रकट करते थे और भगवान् से राम को ही राजा बनाने की प्रार्थना कर
रहे थे।
२ 'मंथरा की कुमंत्रणा
उसी समय कैकेयी की दासी मथरा ने रनवास की छत पर से नगर का यह
आनंदोत्सव देखा। वह सोचने लगी—'क्या कारण है कि आज नगर अद्भुत साज-सज्जा से
परिपूर्ण है। सभी नगरवासी सजे-धजे तथा प्रफुल्ल दिखाई पड़ रहे हैं। कौसल्या के
अंत पुर की सभी स्त्रियाँ सुसज्जित होकर आनंद-मग्न हो रही हैं। जाने किस कारण से
आज कौसल्या अगणित धन व्यय कर रही है।' उसने आनंद में मग्न राम की धाय से
पूछकर यह जान लिया कि राम के राज-तिलक के लिए ही सारे नगर में उत्सव मनाया
जा रहा है। तब उसने निश्चय किया कि बाल्यावस्था में रामने जो मेरी टाँग तोड़ दी थी,
उसका बदला लेने का यही अच्छा अवसर है। इस प्रकार सोचकर वह रानी कैकेयी
को सारा वृत्तांत सुनाने के लिए उनके महल में गई। उस समय पद्मलोचना कैकेयी
अपने क्रीड़ा-घर में हिंडोले पर लेटी थी। मथरा ने उससे कहा—'उठिए महारानी, आपको
किसी बात की चिंता ही नहीं है।' यो कहते हुए उसने कैकेयी का हाथ पकड़कर उसे
उठाकर बैठाया और त्रिया-चरित्र रचती हुई बोली—'आप तो यह कहते हुए फूली न
समाती थी कि राजा मुझसे ही अधिक प्रेम रखते हैं। वह झूठा सिद्ध हो गया है।
महाराजा ने अपनी बड़ी रानी के भय से आपको भ्रम में डालकर, भरत को परदेश भेज
दिया है और रघुराम का राज-तिलक करने की बात सोच रहे हैं। यदि यही बात हुई, तो
आपका जीवन निरर्थक है। राजाओ का विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। आप फूली-
फूली क्यो फिरती हैं? ऐसा क्रूर, वंचक और कपटी पुरुष मैने कही देखा नहीं है। वे
कैसे आपके पति हैं? वे तो आपके क्रूर शत्रु हैं। यदि आप अपनी सौत के पुत्र को
समस्त पृथ्वी का राजा बनने देंगी, तो आपको, आपके पुत्र को तथा मुझे, दुःख के सिवा
सुख नही मिलेगा । आपकी भलाई का विचार करके आपके पिता ने मुझे भेजा, तो स्नेह
के कारण मैं यहाँ आई हूँ । आपकी भलाई मेरी भलाई है, आपका अभाव मेरा अभाव है ।
मैने आपकी भलाई की बात आपसे कह दी । आप ऐसा कोई यत्न कीजिए जिससे कि
आपका पुत्र इस ससार में जीवित रहे ।'
कैकेयी ने ये बातें सुनी तो अत्यन्त हर्ष से उसकी प्रशसा करते हुए उसे गले से
लगा लिया और कहा--'हे सखी ! राम के राज-तिलक का शुभ समाचार देकर तुमने मेरे
कर्णपुटों में सुधावृष्टि-सी कर दी । तुम्हारे साथ मेरी मित्रता आज सफल हुई । अब तुम
अपने वक्र वचनों को छोड़ दो । भरत की अपेक्षा उसका अग्रज मेरे प्रति विशेष श्रद्धा
रखता है । तुमने यह शुभ-समाचार मुझे देकर बहुत अच्छा किया ।' इस प्रकार कहकर
उसने मथरा को नवरत्न-खचित अपने सोने का कडा उपहार के रूप में दिया । किन्तु, उस
कपट स्त्री ने उस कडे को दूर फेंककर अपने पापपूर्ण हृदय का क्रोध एव जलन प्रकट
करते हुए कहा--'हे कैकेयी । आप मन-ही-मन फूली हुई है, मानो कोई उत्तम कार्य
हो रहा है । आपने यह उपहार मुझे किसलिए दिया ? आपकी भलाई के लिए जो परामर्श
मैने दिया, उसके विषय में विचार किये बिना ही आप ऐसा प्रलाप क्यो करती है ? मै आपके
स्वभाव के बारे में क्या कहूँ ? क्या अपना अहित करनेवाला धर्म, कोई धर्म है ?
आँखो को हानि पहुँचानेवाला काजल किस काम का ? कही इस ससार में ऐसे भी लोग है,
जो सौत के पुत्रो के हित की कामना करते हैं ? यदि आपकी सौत का पुत्र साम्राज्य
का स्वामी हुआ, तो सभी राजा, नानेदार, प्रजा तथा मत्री राम की सेवा में लगे रहेंगे ।
गज, तुरग आदि सेना उनके वश में हो जायगी । उसके पश्चात् दशरथ भी स्वतन्त्र नही
रह सकेंगे । तब शशिमुखी कौसल्या समस्त ऐश्वर्य का उपभोग करेगी और आप उनकी सौत
होती हुई एक पगली की तरह कैसे रह पायेंगी । इतना ही नही, आपको उनकी आज्ञा
का पालन करते हुए उनकी दासी बनकर रहना पड़ेगा । भरत को उस रघुपति से भय
खाते हुए एक भृत्य के समान रहना पड़ेगा । आपकी पुत्रवधू को राज-रानी सीता की
सेवा करनी पड़ेगी । यदि यही हुआ, तो आपका जन्म निरर्थक हुआ । इसका उपाय यह है
कि राम को वनवास के लिए भिजवा दीजिए और भरत का राज-तिलक करवाइए ।'
तब कैकेयी बोली--'हाय, महाराज मुझे इतनी स्वतन्त्रता क्यो देने लगे ? मैं उनसे
ऐसी प्रार्थना कैसे करूँ ? करूँ भी तो वे मेरी प्रार्थना क्यो मानेंगे ? यह कैसी बात है ?
तुम जो भी कहो, यह काम नही होने का । मैं राम से कैसे कहूँ कि तुम वन में जाकर
निवास करो ।'
तब मथरा अपनी पाप-बुद्धि को प्रकट करती हुई बोली--'हे सुन्दरी, क्या आप
इस बात को भूल गई कि शवरासुर और इंद्र के युद्ध में इंद्र की सहायता करने के लिए
अपनी सेनाओ के साथ जाते समय राजा आपको भी अपने साथ ले गये थे । महाराजा
दशरथ ने रात्रि के समय उस राक्षस का सामना किया था । राक्षस ने क्रोध में आकर
विभिन्न प्रकार की मायाओ से राजा का वध करने का प्रयत्न किया था, किन्तु आपने
धवलाग नामक मुनि की कृपा से प्राप्त शक्ति की सहायता से उस राक्षस की मायाओ को
७८ रंगनाथ रामायण
दूर कर दिया था और राजा को उस राक्षस के तेज बाणो से आहत होने से बचाया था ।
राजा ने सतुष्ट होकर आपको दो वर दिये थे । आपने ही खुद यह सारा वृत्तात मुझे
सुनाया था । भले ही आप इसे भूल जायें, मैं कैसे भूल सकती हूँ ? अत आप राजा से
दो वर माँगिए—एक तो यह कि कौसल्या का पुत्र राज-पाट छोडकर चौदह वर्ष तक मुनियो
का-सा जीवन व्यतीत करते हुए भयकर वनो में रहे, और दूसरा, आपका पुत्र इस पृथ्त्री
पर शासन करे । आपके वर माँगने पर राजा बहुत गिडगिडायेंगे । फिर भी, आप मूर्ख
के समान मत रहें । सत्य की दुहाई देकर दृढ सकल्प से आप इस कार्य को सिद्ध
कर लीजिए । आपके पति असत्य से डरते हैं, उसपर भी आपसे उनका अत्यधिक प्रेम हैं।
इसलिए वे आपके वचनो का अतिक्रमण नही करेंगे । अवश्य आपकी बात मान लेंगे ।”
इन बातो से प्रसन्न होकर कैकेयी ने मथरा से कहा-'तुम्हारी जैसी सखी, साथिन
और गुणवती को मैंने कही नही देखा है । हे उत्तम नारी, जिन वरो के सबध में मैंने
तुमसे कहा था, उन्हें तो मै भूल ही गई थी । तुमने जैसे सोचा, वैसे मेरा पुत्र यदि इस
समस्त पृथ्दी का राजा बनेगा, तो मै तुम्हारे कूबड़ को शुद्ध स्वर्ण से अच्छी तरह सजाऊँगी,
तुम्हारे मुख-चन्द्र पर कस्तूरी-तिलक करूँगी और तुम्हारे शरीर पर असख्य आभूषण पहनाकर
तुम्हें अलकृत करूँगी । हे सखी ! इस प्रकार सज-धजकर तुम मन्मथ की स्त्री के समान
विचरोगी, तो सभी दासियाँ तुम्हारी आज्ञा का पालन करती रहेंगी । मैं ऐसी व्यवस्था
कर दूंगी ।'
इस प्रकार, मथरा से प्रिय वचन कहने के पश्चात् कैकेयी अपने कक्ष में चली गई ।
उसने अपने समस्त आभूषण उतार दिये, माथे पर कस्तूरी का गाढा लेप लगाया, मलिन
वस्त्र पहने और अत्यन्त क्रोध धारण किये फर्श पर पड़ी रही । अपनी मत्रणा की सफलता
से सतुष्ट होनेवाली मथरा को देखकर कैकेयी बोली—'जबतक राजा राम को बुलाकर
उसे वन में जाने की आज्ञा देकर नही भेजेंगे और भरत का राज-तिलक नही
करेंगे, तबतक मैं अन्न-जल नही ग्रहण करूँगी । जितने भी स्वर्णाभूषण दें, मै उन्हें नही
लूंगी और यहाँ से हटूंगी भी नही ।' यो कहते हुए वह मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध होकर
पडी रही ।
३ कैकेयी के महल में दशरथ का आगमन
राघव के राज-तिलक का समाचार कैकेयी को सुनाने के उद्देश्य से दशरथ उस दिन
रात को वहाँ (कैकेयी के महल में) आये । स्वर्ण-रत्नजटित किवाड़ो तथा कक्षो, कस्तूरी,
चदन, कर्पूर की सुगधि से युक्त तथा नाना रत्नो की कान्ति से सुशोभित सौधो को पार
करके वे रग-महल के निकट पहुँचे । कैकेयी को वहाँ न देखकर दशरथ ने सेवक से पूछा ।
उसने दुःख प्रकट करते हुए हाथ जोडकर कहा—'देव ! देवी न जाने किस कारण से
कोप-भवन में चली गई हैं ।'
ये बातें दशरथ के कानो को धनुष की उग्र टकार की भाति भयकर लगी । उनका
मुँह पीला पड़ गया । कैकेयी के प्रति उनका प्रेम द्विगुण हो उठा । धीरे-धीरे उन्होने
कोप-भवन में प्रवेश किया और स्वर्ग-लोक से पृथ्वी पर उतरकर वहाँ लेटी हुई अप्सरा