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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

( २२ )
का विभीषण की योग्यता राम को समझाना—२६७, १७ विभीषण की स्तुति—२६८;
१८ त्रिकूट पर्वत की उत्पत्ति की कथा—२६६, १६ विभीषण का राम को रावण के
वैभव का परिचय देना—२६६, २० राम का विभीषण को लका का राजा बनाना—
२७१, २१ शुक का सन्देश—२७१, २२ गम का दर्भ-शयन—२७२, २३ राम का
समुद्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना—२७३, २४ समुद्र का राम से प्रार्थना करना—
२७५, २५ सेतु-बन्धन के लिए राम का सुग्रीव को आज्ञा देना—२७६, २६ सेतु-
बन्धन—२७७, २७ चन्द्रोदय का वर्णन—२७७, २८ गिलहरी की भक्ति—२७६,
२६ सेतु को देखकर राम का हर्षित होना—२८०, ३० राघवो का सुवेलाद्रि पर
पहुँचना—२८१, ३१ कैकसी का हितोपदेश—२८२, ३२ शुक तथा सारण का राम की
सैन्य-शक्ति का परिचय पाना—२८४, ३३ सारण का रावण को कपियों का परिचय
देना—२८५, ३४ शुक का रावण को राम का पराक्रम सुनाना—२८७, ३५ राम के
माया-धनुष तथा सिर दिखाकर सीता को भयभीत करना—२८८, ३६ माल्यवान् का
हितोपदेश—२६०, ३७ सुवेलाद्रि पर से राम-लक्ष्मण का लका को देखना—२६२,
३८ रावण तथा सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध—२६३, ३६ अंगद का दौत्य—२६५, ४० रावण
का अपना वैभव प्रदर्शित करना—२६७, ४१ रामका रावणके छत्र-चामरो पर अस्त्र
चलाना—२६८; ४२ रावण का राम की धनुर्विद्या का प्रशसा करना—२६६, ४३
वानरोका लका ध्वंस करना—२६६, ४४ राक्षसो तथा वानरो का भीषण संग्राम—
३००, ४५ युद्धभूमि का वर्णन—३०२, ४६ इन्द्रजीत का माया-युद्ध—३०४, ४७
नाग-पाशबद्ध दाशरथियो को देख सीता का दु खी होना—३०६, ४८ लक्ष्मण के लिए
राम का विलाप करना—३०८, ४६ विभीषण तथा अंगद का वानरो को धैर्य देना—
३०६, ५० नारद का आगमन—३१०, ५१ राघवो का नाग-पाश से मुक्त होना—
३१०, ५२ धूम्राक्ष का युद्ध—३१२, ५३ अकपन का युद्ध—३१३, ५४ महाकाय
का युद्ध—३१५, ५५ अंगद के द्वारा महाकाय का सहार—३१६, ५६ प्रहस्त का
युद्ध—३२०, ५७ नील के द्वारा प्रहस्त का वध—३२२, ५८ मदोदरी के हित-वचन—
३२३, ५६ मंदोदरी की मंत्रणा की उपेक्षा करना—३२४, ६० रावण का प्रथम
युद्ध—३२४, ६१ विभीषण का राम को राक्षस-वीरो का परिचय देना, ६२ हनुमान्
का रावण से युद्ध करके मूच्छित होना—३२७, ६३ नील का रावण से युद्ध करना—
३२८, ६४ रावण का ब्रह्मशक्ति से लक्ष्मण को गिराना—३२६, ६५ राम-रावण
का प्रथम युद्ध—३३०, ६६ रावण का खिन्न होकर लका लौट जाना—३३१;
६७ राक्षसो का कुंभकर्ण को जगाना—३३१, ६८ राघवो की युद्ध-यात्रा पर कुंभकर्ण का
क्रुद्ध होना—३३३, ६६ कुंभकर्ण का शाप-वृत्तान्त—३३५, ७० कुंभकर्ण का हितोपदेश—
३३६, ७१ रावण का कुंभकर्ण के उपदेश का तिरस्कार करना—३३८, ७२ कुंभ-
कर्ण की गर्वोक्तियाँ—३३६, ७३ कुंभकर्ण का युद्ध के लिए जाना—३४०, ७४ वानर-
कुंभकर्ण का युद्ध—३४१; ७५ कुंभकर्ण और हनुमान् का युद्ध—३४४, ७६ सुग्रीव
तथा कुंभकर्ण का युद्ध—३४५, ७७ कुंभकर्ण का मूर्च्छित सुग्रीव को लका ले जाना—३४५,
७८ कुंभकर्ण का वानर-सेना को तहस-नहस करना—३४६, ७६ विभीषण कुंभकर्ण और का

( २३ )
वार्त्तालाप—३४८, ८० श्रीराम के द्वारा कुभकर्ण का सहार—३५०; ८१ कुभकण की
मृत्यु पर रावण का शोक—३५१, ८२ अतिकाय तथा महोदर आदि राक्षसो की युद्ध-
यात्रा--३५२, ८३ अगद तथा नरातक का द्वद्व-युद्ध--३५५, ८४ देवांतक तथा त्रिशिर
का अंगद पर आक्रमण करना--३५६, ८५ हनुमान् आदि वीरो के द्वारा त्रिशिर आदि
राक्षसो का वध--३५६, ८६ अतिकाय का युद्ध--३५७, ८७ लक्ष्मण तथा अतिकाय
का द्वन्द्व-युद्ध—३६०, ८८ अतिकाय का वध—३६१, ८६ इद्रजीत का द्वितीय युद्ध—
३६२, ६० ब्रह्मास्त्र से इन्द्रजीत का राम-लक्ष्मण आदि को मूर्च्छित करना—३६४;
६१ हनमान् का ओषधी-शैल लाकर वानरो की मूर्च्छा दूर करना—३६६, ६२ वानरो
का लका जलाना--३६८, ६३ कुभ-निकुभ का युद्ध के लिए प्रस्थान--३६६, ६४
सुग्रीव के द्वारा कुभ का वध--३७२, ६५ मकराक्ष का युद्ध--३७३, ६६ इन्द्रजीत
का तृतीय युद्ध--३७४, ६७ इन्द्रजीत का होम करना तथा कृति नामक शक्ति प्राप्त
करना—३७५, ६८ रामका आग्नेय अस्त्र से इन्द्रजीत की मायाको दूर करना—
३७६, ६६ इन्द्रजीत का यज्ञ करके रथ प्राप्त करना—३७८, १०० इन्द्रजीत का
माया-सीता का सिर काटना—३८१, १०१ इन्द्रजीत का निकुभिल-यज्ञ करना—३८२,
१०२ लक्ष्मण का शोक—३८३, १०३ इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवो
को समझाना—३८४, १०४ लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान--३८५, १०५ निकुभिल-
होम में विघ्न--३८५, १०६ लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के
वचन कहना—३८६, १०७ इन्द्रजीत तथा लक्ष्मण का युद्ध—३८७, १०८ इन्द्रजीत
का वध—३६०, १०६ इन्द्रजीत की मृत्यु पर रावण का शोक—३६३, ११० रावण
का सीता का वध करने के लिए जाना--३६४, १११ इन्द्रजीत की स्त्री सुलोचना
का शोक—३६५, ११२ सुलोचना का राम की स्तुति करना--३६७, ११३ सुलोचना
का सहगमन--३६६, ११४ रावण का अपनी प्रधान सेना को युद्ध के लिए भेजना--
४००, ११५ वानर-सेना को हनुमान् आदि का प्रोत्साहन देना--४०२, ११६ राक्षस-
स्त्रियो का रावण की निन्दा करना—४०३, ११७ रावण का द्वितीय युद्ध—४०५,
११८ सुग्रीव के द्वारा विरूपाक्ष आदि राक्षसो का वध--४०७, ११९ रावण का राघवौं
पर आक्रमण करना--४०६, १२० रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूर्च्छित होना—
४११, १२१ रावण का चितित होना—४१२, १२२ लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम का
शोक—४१४, १२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान् का द्रोणाद्रि को जाना—४१५,
१२४ कालनेमि का वृत्तात—४१६, १२५ मकरी का हनुमान् को निगल जाना--४१८,
१२६ धान्यमालिनी का वृत्तात—४१६, १२७ कालनेमि का वध—४२१, १२८ भरत
का स्वप्न--४२२, १२६ हनुमान् का माल्यवान् से युद्ध करना—४२३, १३० लक्ष्मण
के लिए राघव का शोक—४२४, १३१ हनुमान् का द्रोण-पर्वत ले आना—४२६,
१३२ सजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर होना—४२७, १३३ रावण का शुक्राचार्य
से परामर्श करना—४२६, १३४ पाताल-होम--४२६, १३५ अगद का मदोदरी को
रावण के पास घसीटकर लाना—४३१, १३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की

( २४ )

महिमा बताना-४३३; १३७ रावण का तृतीय युद्ध के लिए प्रस्थान-४३५; १३८
वानरो के द्वारा खडगरोम आदि राक्षसो का वध-४३७, १३६ इन्द्र का मातलि के
द्वारा राम को रथ भेजना-४३८, १४० राम का रावण के बाणो का प्रतिवाण चलाना-
४४०, १४१ रावण का राम पर शूल चलाना-४४०, १४२ अगस्त्य के द्वारा
राम को आदित्यहृदय का उपदेश-४४१, १४३ राम-रावण का परस्पर दोषारोपण-
४४२; १४४ रावण की मूर्च्छा-४४३, १४५ रामका रावण के कर चरणो को खडित
करना-४४५, १४६ आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से रामका रावण को शक्तिहीन कर
देना-४४७, १४७ ब्रह्मास्त्र से रावण का वध-४४८, १४८ विभीषण का शोक-
४४६, १४६ मृत रावण के निकट मदोदरी का आना-४४६, १५० मदोदरी का
विलाप-४५१; १५१ राम का विभीषण के द्वारा रावण की अंत्येष्टि कराना-४५३;
१५२ विभीषण का राजतिलक-४५४, १५३ हनुमान् का सीता को राम की विजय
का समाचार देना-४५४; १५४ राम के आदेश से विभीषण का सीता को लिवा
लाना-४५५; १५६ सीता का अग्नि-प्रवेश-४५७, १५७ सीता-परिग्रहण — ४५८;
१५८ दशरथ के दर्शन-४५६, १५६ देवताओ का अभिनन्दन-४६०, १६० पुष्पक-
आरोहण-४६१; १६१ श्रीराम का सीता को विभिन्न दृश्यो को दिखाकर समझाना-
४६२; १६२ राम के द्वारा शिवलिंग का प्रतिष्ठापन-४६३, १६३ श्रीराम का
सेतु की महिमा बताना-४६५; १६४ भरद्वाज मुनिका आतिथ्य-४६७, १६५ हनुमान्
का भरत को राघवो का कुशल-समाचार सुनाना-४६६, १६६ भरत-मिलाप-४७१,
१६७ अयोध्या में प्रवेश-४७३; १६८ राजतिलक-४७४; १६६ मित्रो को प्रीतिभोज
देना-४७५ ।

रंगनाथ रामायण

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बालकाण्ड एवं अयोध्याकाण्ड (दक्षिण भारतीय प्रसंग सहित)

श्रीरंगनाथ रामायण
(बालकांड)

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१. देव-स्तुति
चरित रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तर ।
एकैकमक्षर प्रोक्त महापातकनाशनम् ॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे,
रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नम ॥
श्रीलक्ष्मीनाथ, दैत्य-विजयी, लोक-रक्षक, नित्य, सदानंद, मोक्षदायक, कर्म-रहित, सृष्टि
के स्वयंभूत आधार, हृदय-कमल में स्थित भक्ति-रूपी आनन्द को व्यक्त करने के साधन-क्रम में
तत्पर भूमर-रूपी भगवान्, गजराज को मोक्ष प्रदान करनेवाले, अपने आश्रित-लोक के वंधु,
मसार के बंधनो से मुक्ति देनेवाले, वलि को बाँधने का दृढ़ सकल्प करनेवाले, प्रणव-रूप,
गोपिकाओ के हृदय में विहार करनेवाले, अबोध-गम्य आकारवाले, निराकार, योगियो के
हृदय में ओंकार-रूप में वर्त्तमान, योगिसदर्शित, मोक्ष-प्रचारक, श्रुतियो के शिरोमणि, विशुद्ध-चैतन्य
स्वरूप, अतिलोकवासी, समस्त लोको का आश्रय, ब्रह्माण्डरूपी मुक्ता का आयतन, नित्याधार,
अखिल तत्त्वातीत, आदि-अन्त-रहित, पवित्रात्मा, अविनाशी, वेद-रूपी कमल के लिए सूर्य,
अक्षीण कल्याणो का आधार, निश्शंक मन से सद्भक्ति तथा सेवा करनेवाले भक्तो के लिए
दया-सिंधु, करुणा-सिंधु, बोधक, बोध्य तथा बोध—इन तीनो में व्यक्त होनेवाले पूर्ण-रूप,

४ रंगनाथ रामायण
आदितत्त्व, 'तत्त्वमसि' आदि कथनानुसार भेदातीत, अभेद, प्रतापी परमेश्वर का (भक्ति-युक्त
ध्यान करने के निमित्त) मैने अत्यंत धैर्य के साथ नियमो का पालन किया, कर्म के बंधनो
को ठुकराया, एकांत में रहते हुए इन्द्रिय-व्यापारो को भुला दिया, सुस्थिर होकर सुलभ-
साध्य तथा परिचित आसन (सुखासन) पर उपविष्ट हुआ, मन को भक्ति-रस-परिपूर्ण
बनाया, (शरीर के भीतर रहनेवाली) बहत्तर नाडियो का विचार करके उनका परिमार्जन किया,
एकचित्त तथा निर्मल मन से नाडियो में अत्यंत सूक्ष्म रूप से व्याप्त पवन को रोका,
मन को निश्चल बनाकर निरुद्ध प्राण-वायु को मूलाधार-चक्र में प्रविष्ट कराया और उसे
क्रमशः छह कमलो को पार कराते हुए चंद्रमंडल में पहुँचाया । वहाँ योगीन्द्रो के हृदय का
भेद परखने के लिए परम-व्योम के रूप में स्थित अनादि ब्रह्म-स्वरूपा, अत्यंत सूक्ष्म तथा
निर्मल नाडी को यूप, अविचल मन को यज्ञ-पशु, निष्ठानुरक्ति को वेदी, समस्त इन्द्रियो को
काष्ठ, ज्ञान को अखंड अग्नि तथा आनंद-योग को यज्ञ-फल के रूप में मानते हुए इच्छित-
आनंद-प्राप्ति के हेतु, कर्म के द्वारा प्राप्त होनेवाले मोक्ष रूपी परमेश्वर, अगोचर, कर्म-रहित,
हमारे देव, कमलनेत्रवाले, हमारे पालनहार, आदि नारायण तथा अखिल लोकार्थेश की
भक्ति, स्तुति, प्रार्थना एवं वंदना की । अपने मन की इच्छा पूर्ण करने के निमित्त हार,
कर्पूर, नीहार, गोक्षीर तथा तारको के सदृश उज्ज्वल शारदा देवी की उपासना की; चारु
रामायण-रूपी चंद्र के जन्म-स्थान के रूप में विलसित होनेवाले वाल्मीकि का स्मरण किया,
भारत-रूपी मंजरी के पारिजात, तत्त्ववेत्ता पराशर-पुत्र का स्मरण किया और उनके पुत्र
शुकदेव की बडी भक्ति से स्तुति करने के पश्चात् मैं अपने मन में एक ऐसे ग्रन्थ की रचना
करने का विचार करने लगा, जिसकी कथा के कथन से सभी सज्जन मेरा कीर्त्ति-गान करेंगे,
जिसकी कथा का वर्णन करने से मेरे इह-लोक और पर-लोक दोनो सफल होगे और जिस
कथा के कथन से ईप्सितार्थ सिद्ध होगे और साथ-ही-साथ पुण्य की प्राप्ति होगी ।
२. ग्रन्थ-रचना का कारण
सृष्टि के समस्त प्राणी, जिस पुण्यात्मा की प्रशंसा बडे आदर से करते हैं, जो सदा-
चार के पुण्य-फलस्वरूप सूर्य के समान उदित होकर कलिकाल का अंधकार दूर करते थे,
जो श्रेष्ठ धर्म-पथ का महत्त्व जानते थे, जिनके पवित्र तेज के समान शत्रु-रूपी नक्षत्रों के
प्रकाश मंद पड जाते थे, जिन्होंने अपने खड्ग की दीप्ति-रूपी गंगा-प्रवाह में अन्य राजाओ
के ललाट में लगे गर्व-पंक को धो दिया था, असमान बलशाली, सत्यनिष्ठ, शरणार्थी
राजा-रूपी भ्रमरो के लिए (जिनका कर-कमल) आधार था, ऐसे कोनकाट भूपति के वंश
की कीर्त्ति बढाने हुए नय, विनय, दया के आगार महाराजा के पुत्र गोनरुद्र नरेन्द्र महान
प्रतापी तथा पवित्रात्मा थे । उनके पौत्र बुद्ध भूपाल अभंग, अप्रतिम विक्रमी, कुल-गोत्र के
संवर्द्धक, देवेन्द्र के समान वैभवशाली, वीर और विख्यात थे । उनके पुत्र अक्षीण दाक्षिण्य-
वनी (अर्थात् अक्षीण कृपावाले), धन-धान्य में कुवेर, मर्म में धर्मराज (युधिष्ठिर) के समान
अति-पुण्य सौजन्य-शील, शत्रुओ के लिए अति शौर्यवान् वामदेव कार्त्तिकेय, शुभजन्मा,
कामिनियों के लिए कामदेव, अखंड विक्रमी और रण-विशारद थे । वे चंदन, मदार-चंद्रिका-
हार, कदली, कुंद, इंदु सम उज्ज्वल कीर्तिमान्, गोनवंश-रूपी पारिजात के फल-स्वरूप

[बालकांड] [५]

दीखनेवाले, गोनवंश-रूपी उदयाद्रि पर भानु-सम दीप्त होनेवाले, गोनवंश-रूपी क्षीरसागर
के (उत्पन्न) चंद्र सम सुशोभित, अपनी कीर्त्ति को दिग्-दिगंतों में व्याप्त करनेवाले, अपने
दान-धर्म के द्वारा सबकी प्रशंसा प्राप्त करनेवाले, अपने असमान पौरुष से बड़ी आसानी से
शत्रुओं का नाश करनेवाले, महा बलशाली एवं प्रतापी राजाओं के लिए वज्रपाणि सम
दीखनेवाले, (शत्रु) नृप-वन के लिए साक्षात् अग्निदेव, सत्यनिष्ठ, महाबलशाली शत्रु-सेनाओं
को मथने में मयर पर्वत की भाँति प्रचंड रूप धारण करनेवाले, अपने खड्ग-रूपी सूर्य-बिम्ब
की प्रभा से प्रतापी राजा-रूपी अंधकार का नाश करके अमर-वधुओं के मुख-कमलों को
वीर-भ्रमरों से अलंकृत करनेवाले, शत्रुओं के प्राण-रूपी अनिल का सेवन करनेवाले श्रेष्ठ
भुज-भुजंगों (सर्प-रूपी भुजाओं) पर राज्य-भार वहन करनेवाले थे, वे कुरु, केरल, अवंती,
कुंतल, द्रविड़, मरु, मत्स्य, करुष, मगध, पुलिंद, सरस, पाण्ड्य, कोसल और बर्बर की राज-
सभाओं में प्रशंसा प्राप्त करनेवाले, साम-दाम-भेद आदि नीतियों में निपुण, प्राचीन राजाओं
के समान समस्त वैभवों से युक्त तथा नय, विनय आदि उपायों से सुस्थिर विजय
प्राप्त किये हुए, यशस्वी विट्ठलनरेश, राजाओं में सर्वज्ञ, नरेशों से पूजित, सफल जगद्धित-
चातुर्य-धुरी, एक दिन अपनी राज-सभा में बैठे हुए थे। उस समय पुराणवेत्ता, शास्त्रज्ञ,
काव्य-नाटक-शिरोमणि, मित्र, मंत्री, पुरोहित, आश्रित, पुत्र, सामंत राजा और बहुश्रुत उनकी
सेवा में उपस्थित थे। राजा भूलोक के देवेन्द्र के समान बड़े उत्साह से रसिकजनों द्वारा
भारत, रामायण आदि का पाठ सुनकर बहुत प्रसन्न हुए।
तत्पश्चात् वे रसिक-शेखर (राजा) राम-कथा-सुधा से अनुरक्त हो, सभा में यों बोले—
'तेलुगु में रामायण को सुंदर ढंग से कहने की कविता-शक्ति रखनेवाले कवि इस संसार
में कौन हैं?' तब पंडितों ने उस उदात्त, यशस्वी विट्ठलनरेश से कहा--
(महाराज) आपके सुपुत्र, निपुण, पापरहित, नीति-निष्ठ, सर्वज्ञ, अनघ, शिष्ट-संपन्न,
सर्वपुराणवेत्ता, सुंदर कलाओं के मर्मज्ञ, सज्जनों को आश्रय देने में ही सुख का अनुभव
करनेवाले, कविसार्वभौम, कवि-कल्पतरु, कवि-कुल-भोज, कवीन्द्र, शत्रु-राजाओं के लिए वज्र-
पाणि, शत्रु राजा-रूपी वन के लिए प्रचण्ड पावक के समान दीखनेवाले, जिनके भयंकर
खड्ग में स्वर्गलोक तक प्रतिबिंबित है, त्रिलोक-दुर्दम, श्रेष्ठ-साधु-जन-रूपी कमलों के लिए
सूर्य, पुरुषश्रेष्ठ, आपके परम भक्त, निखिल शब्द, अर्थ, गुण आदि के ज्ञाता, महापंडित,
रामायण के मर्मज्ञ बुद्ध-नरेश (रामायण की कथा तेलुगु में कहने की) कविता-शक्ति
रखते हैं। (काव्य रचने के लिए) आप उन्हें आदेश दें।"
यह सुनकर उदात्त चरित्रवाले मेरे जनक ने मुझे बड़े स्नेह से बुलाकर यह आदेश
दिया—'रामायण की कथा पुराणों के ढंग पर तेलुगु भाषा में मेरे नाम पर लिखो कि
संसार के कवि और पंडित उसकी प्रशंसा करें।' उनके मृदु वचनों से अत्यंत हर्षित होकर
उनकी आज्ञा का पालन करने के हेतु शत्रुओं के लिए भयंकर मूर्ति, महान्, ललितसद्गुणा-
लंकारवाले, निश्चल दयालु, धन्यात्मा तथा पुण्यात्मा मेरे पिता विट्ठलनरेश के नाम पर
श्रीरामचन्द्र का चरित्र, इस ढंग से लिखूँगा कि राजा, पंडित, रसिक, सुकवि श्रेष्ठ,
गोष्ठियों में (उसे सुनकर) हर्षित होकर उसकी प्रशंसा करेंगे और जिसमें, शब्द, अर्थ, भाव,

६ रंगनाथ रामायण
गति, पद, शय्या, अर्थ-गौरव, यति, रस, कल्पना, प्रास, असमान रीतियाँ आदि होंगे और
आदि कवि वाल्मीकि की कृपा से सभी सज्जन मेरी प्रशंसा करेंगे । कथा का प्रारंभ यो है—
३. कथा का प्रारंभ
एक दिन श्रेष्ठ तपस्स्वाध्याय-निरत, महान् शीलवान् मुनिश्रेष्ठ नारद से अनघ,
तपोनिधि वाल्मीकि ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया—“हे मुने, आप कृपया बतलाइए कि इस
संसार में, श्रीमान्, क्षमाशील, पुण्यात्मा, उन्नत, नीतिज्ञ, प्राज्ञ, दुर्दम, उत्तम, जितकाय, अजेय,
ईर्ष्याहीन, संपन्न, सुव्रती, उदार और चरित्रवान् कौन है ? जिनके क्रोध से इंद्रादि देवता
डरते रहते हैं ? ऐसा व्यक्ति क्या, कभी हुआ है या आगे चलकर इस पृथ्वी पर जन्म
लेनेवाला है ?”
यह सुनकर लोकज्ञाता नारद मुनि ने अपने मन में बहुत देर तक सोच-विचार कर
कहा—“इस पृथ्वी पर श्रीविष्णु, महाराज दशरथ के यहाँ जन्मे हैं । वे नियतात्मा, अति-
शौर्यनिधि, कृपानिधि, जयी और स्वजनों की रक्षा में विचक्षण हैं । वे कम्बु-कंधर, सुदराकार,
बिम्बारुण ओष्ठ, पीन वक्ष, विशाल-नेत्र, विशाल अवतंस और आजानुबाहु हैं । वे नियतात्मा,
वेदवेदांग-कोविद वेदविद्, विवेकभूषण, सूर्य के समान तेजस्वी, समुद्र के समान गंभीर,
अमराद्रि के समान धीर और पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं । उनकी मूर्त्ति (लोगों को)
अपनी ओर आकृष्ट करती है । वे कौसल्या के आनंद-दाता, श्रीकर, दीप्तिमान्, त्रिलोक-
पावन मूर्त्ति, राम के नाम से अवतरित हुए हैं ।
राजर्षि (विश्वामित्र) के (रामचन्द्र को) माँगने तथा राजा के भेजने पर वे मुनि
के साथ गये । (उन्होंने) यज्ञ की रक्षा की, दानवी का नाश किया, राक्षसों का संहार
किया, शिला को स्त्री बनाया, शिव-धनुष को तोड़ा और सीताजी से विवाह करके बड़ी
ख्याति पाई । सीताजी के साथ अयोध्या जाते समय बड़े क्रोध से विप्र (परशुराम) ने
आकर उन्हें रोका, तो वे उनसे जूझ पड़े और उनका धनुष छीनकर उसे तोड़ डाला ।
उनके बाद सब लोगों के हृदयों को आनंद से भरते हुए वे अयोध्या पहुँचे ।
जब पिता '(राम को) युवराज बनाऊँगा'—ऐसा कहकर अयोध्या का राज देने को
उद्यत हुए, तब ढीठ मंथरा ने कैकेयी के कान भरे । कैकेयी पहले ही युद्ध में दो वर प्राप्त
कर चुकी थी । (राजा ने) राघव को कानन में भेज दिया । पिता के वचन से बँधकर,
वे सीता और लक्ष्मण के साथ वन में गये, जहाँ उन्होंने बड़े उत्साह से वनों में तपस्या
करनेवाले संयमी मुनियों की रक्षा की, खर-दूषणादि राक्षसों के सर धरों से काट डाले,
ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से मित्रता की, एक ही बाण से वालि का संहार किया, (सीता
को पुन प्राप्त करने का) दृढ़ निश्चय करके सेतु को बाँधा तथा पापी दशकंठ के दसों
सिर काट डाले ।
उसके पश्चात् आश्रितों के कल्पवृक्ष रामचंद्र, सीता के साथ, वनचर-समूह तथा
इंद्रादि देवताओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए और सेवा प्राप्त करते हुए, (अयोध्या) आये
और अपनी पूज्य साम्राज्य-लक्ष्मी का पालन करते हुए तथा प्रजा को सुख पहुँचाते हुए कृत-
कृत्य हुए हैं ।”

बालकांड ७
ईस प्रकार श्रीराम का चरित्र अथ से इति तक कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को
चले गये । मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि अत्यत हर्ष से अपने शिष्य भरद्वाज के साथ सज्जनता की
मूर्त्ति, अकलुष जीवन-युक्त, तमसा नदी के तट पर गये और उस नदी के जल से अपने
अनुष्ठान का पालन करते रहे । उस नदी के किनारे (पेड पर) क्रौंच पक्षियो का एक
जोडा बडे प्रेम से मिलकर बैठा था । एक व्याध ने जब उनमें से एक को मार गिराया,
तब क्रौंची शोक से विलाप करने लगी । यह देखकर न्याय और धर्म का विचार करके
मुनि उस व्याध पर क्रोध करते हुए बोले-“हे निषाद, हे पापी, इन्होने तुम्हारा क्या
बिगाडा था ? जब ये क्रौंच बडे प्रेम से मिले, तब तुमने इस प्रकार एक को क्यो मार
गिराया ? इस पाप के कारण तुम बहुत दुख प्राप्त करते हुए अनेक वर्षों तक भटकते
रहोगे ।”
इस प्रकार व्याध को शाप देकर वाल्मीकि ने अपने शिष्य भरद्वाज से छन्दोबद्ध शब्दो
में कहा-“मेरे द्वारा कहे हुए वचनो पर बार-बार विचार करने पर मालूम होता है कि
इन चार समवर्ण पक्तियो में छन्दोबद्धता है । यह बडे आश्चर्य की बात है कि ये शाप के
वाक्य अपने आप एक पद्य के रूप में प्रकट हुए है ।” तब भरद्वाज आदि शिष्य बडी भक्ति
से उस पद्य को (दुहराने) पढने लगे । अनघ वाल्मीकि अपने आश्रम को लौट आये ।
एक दिन ब्रह्मा उनके आश्रम में आये । वाल्मीकि ने उनकी अगवानी की, चरणो
पर झुककर नमस्कार किया, कुशासन पर बिठाकर उनकी पूजा की और हाथ जोडकर अपने
मुँह से निकले छन्दोबद्ध शाप-वचन उन्हें सुनाया । तब ब्रह्मा ने मुस्कुराकर कहा--“हे अनघ,
यह वाणी पद्य के रूप में आपके मुख से व्यक्त हुई है । नारद ने सारा राम-चरित मुझे
सक्षेप में कह सुनाया है । आप उसको विस्तार के साथ सुनाइए । अपने आप वह चरित्र
आपको सूझ जायेगा ।” यो कहकर ब्रह्मा चले गये ।
इस प्रकार बडी कृपापूर्वक कमलासन के वर देकर चले जाने के पश्चात् मुनि ने
निर्मल मति से ध्यान लगाकर सोचा और रघुचरित, दशरथ की कथा, रघुराम का जन्म,
राम का आचरण, ताडका-वध, उद्दण्ड राक्षसो का गर्व-भग, यज्ञ-रक्षा, गगा का महत्त्व,
गौतम की स्त्री का शाप-मोचन, धनुर्भंग, सीता-विवाह, अयोध्या जाते समय परशुराम का
क्रोध, राम के युवराज्याभिषेक की तैयारी, दुष्ट स्त्री कैकेयी के कटुवचन, अभिषेक में विघ्न,
राम-वन-गमन, राजा का शोक, दशरथ की मृत्यु, दाशरथि से गुह की भेंट, गगा पार
करना, तपोनिधि भरद्वाज से (राम की) भेंट, चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना, भरत और राम
की भेंट और उनका पादुका प्राप्त करके लौट जाना, दण्डकवन-गमन, प्रचड विराध का वध,
पुण्यात्मा शरभग के दर्शन, मुनियो को वचन देना, अगस्त्याश्रम में पहुँचना दिव्य अस्त्रो की
प्राप्ति, मुनि के आदेशानुसार पर्ण-कुटी बनाकर निवास करना, (राम पर) मुग्ध होकर
राक्षसी (शूर्पणखा) का आना, उसके साथ वार्त्तालाप, रामानुज के द्वारा उसका नाश, उधर
रावण का बुद्धि-भ्रष्ट होना, कुटिल मारीच की मृत्यु, राक्षसराज (रावण) के द्वारा सीता-
पहरण, राम का विलाप, जटायु की मृत्यु, कबंध से भेंट, पपासरोवर को गमन, ऋष्यमूक पर्वत पर
सुग्रीव से भेंट, उससे मित्रता, वालि-सुग्रीव के वैर का कारण जानना, श्रीराम का एक साथ

८ रंगनाथ रामायण
सातो ताड़ के पेड़ो को काट देना, वालि का वध, दारा का विलाप, रविपुत्र (अंगद) का
राज्याभिषेक, माल्यवत में उस पुरुषोत्तम का वर्षा-काल बिताना, काकुत्स्थ (राम) का कोप,
कपियो का आना, अगूठी देकर (उन्हें) भेजना, वानरो के द्वारा सीता का अथक अन्वेषण,
विल का दर्शन, महेन्द्रगिरि का आरोहण, सपाती से भेंट, समुद्र को लाँघते समय बीच में
मैनाक के दर्शन, सिंहिका की वायुपुत्र से मुठभेड़ और उसकी मृत्यु, लका राक्षसी को तग
करना, उस स्त्री से लका का मार्ग जानकर लका में प्रवेश करना, अत पुर में सीता की
खोज, अशोकवन का अवलोकन, वहाँ सीताजी का संदर्शन, विश्वास दिलाने के लिए अगूठी
देकर उन्हें सान्त्वना देना, अशोकवन को उजाडना, उस समय हनुमान् का अक्षयकुमार को
मार डालना, पवनसुत का वधन में पडना, लका नगर को जलाना, मानिनी सीता का चूडा-
मणि देकर श्रीराम तथा हनुमान को उत्साहित करना, सूर्यकुलाधिप (श्रीराम) का लका
पर

बालकाण्ड ६
४. कुश-लव का रामायण-गान
कोसल-देश में सरयू नदी के किनारे, पृथिवी के ऊरु-भाग के समान अयोध्या नगर
सुशोभित था। वह बारह योजन लंबा, पाँच योजन चौड़ा था और शिल्प-निपुण मय द्वारा
निर्मित था। वह शत्रु-राजाओ की आँखो में खटकनेवाला नगर सूर्यवंशी राजाओ की राज-
धानी था। वह रत्नमय गोपुर, मणिमय तोरण, मणिमय कुट्टिम (फर्श), गवाक्ष, क्रीडा-
गृह, कृत्रक शैल (बनावटी पर्वत), पटह-नाद (नगाडे की आवाज), विशालकाय हाथी,
उत्तम घोडे, नाना प्रकार के रथ-समूह, सेना, स्वच्छ सौध, बाजार, कमनीय उपवन, सरोवर,
तालाब, बावडी ऊख के खेत, धान के खेत, गहरी खाई तथा महलों से भरा हुआ संसार-
भर में विख्यात था। उस नगर में दशरथ नामक राजा राज्य करते थे, जो धनुर्विद्या में
निपुण, साम, दाम, भेद आदि चार उपायो के ज्ञाता, (भगवान् के ऐश्वर्य आदि) षड्गुणों के
आगार, (इच्छा, ज्ञान एव क्रिया) शक्तित्रय-संधानकर्त्ता, धर्मनिरत, कृताध्वर (जिसने
यज्ञ किया है), श्रीसपन्न, धर्मशास्त्र, पुराणादि के ज्ञाता, अजनंदन, बाल्यावस्था से, नियमानुकूल
प्रजा का पालन करते रहनेवाले परमपवित्र व्यक्ति, इन्द्र के निमित्त शंबरासुर का गर्व भंग
कर इंद्र से मंदार-पुष्पों को प्राप्त करनेवाले, इन्दुमती के पुत्र और सूर्यवंश में श्रेष्ठ राजा थे ।
वे तेज, कांति, त्याग, चातुर्य, उदारता, साहस, आदि सद्‌गुणो के भाडार थे ।
वे उदित होते हुए सूर्य की भाँति अपने उग्र तेज से सप्त द्वीपो को दीप्त करते हुए शासन
करते थे। उस नरनाथ के तीन सौ पचास रानियाँ थीं, जिनमें विशेष कर अचल शील-
वाली कौसल्या, कुचकुभ-निर्जित परिधानवाली कैकेयी, पुण्यशीला सुमित्रा त्रयी विद्याओ
के समान थीं। इस पृथिवी पर उनके हितैषी पुरोहित वसिष्ठ आदि पुण्य संयमी थे। पुण्यात्मा
धृष्टि, विजय, सिद्धार्थ, अर्थसाधक, जयंत, नीतिवेत्ता अशोक, धीमान् मंत्री सुमंत्र आदि
उनके आठ सचिव थे। सभी सचिव परस्पर मित्र और स्वामिकार्य में विचक्षण और चतुर थे।
वे परम मर्मों के उद्घाटन में निपुण थे और विचार-पूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे।
समस्त कार्यों को सँभालनेवाले ऐसे आठ मंत्रियो से युक्त राजा दशरथ अष्टाक्षर और अष्ट-
भुजाओ से समन्वित नारायण की तरह सुशोभित थे। उनके राज्य में निर्बल, चुगलखोर,
रोगी, दरिद्र, व्यभिचारी, अनाचारी, पापी, क्रूर, नीच, जड, मूर्ख, मद, एक भी व्यक्ति नहीं था।
सारी प्रजा मणि-कुडल आदि से अलकृत, धर्मपरायण, कुलाचार-निरत, सकलशास्त्र-
पारंगत तथा विष्णु-भक्त थीं। इस प्रकार बडी कुशलता से राज्य का पालन करते और
राज्य-सुख भोगते हुए राजा दशरथ एक दिन अपने मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे।
५. पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने के लिए दशरथ का मंत्रियों से परामर्श
राजा दशरथ अपनी निस्संतान अवस्था का तथा अपनी ढलती आयु का विचार
करते हुए बहुत दुःखी हुए। उन्होंने अपने सभी श्रेष्ठ मंत्रियो को बुला भेजा और उन्हें
उचित आसन पर बैठने का आदेश देकर स्वयं भी आसन पर बैठ गये। और, उनसे इस
प्रकार कहने लगे- "मैंने बहुत दान दिये, अनेक धर्म-कार्य किये, कई यज्ञ किये और बहुत

१० रंगनाथ रामायण
सालों से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मैंने बड़ी कीर्त्ति पाई है। तुम्हारे जैसे स्नेही मंत्रियों
के रहते हुए मुझे किसी बात का अभाव नहीं है। पुत्र-हीन होने का एकमात्र दुःख ही
मुझे है। कुल का उद्धार करनेवाले पुत्रों के बिना कोई भी व्यक्ति पुण्य और स्वर्गलोक
की प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए मेरे भी पुत्र उत्पन्न होने चाहिए। समस्त संसार
मेरी प्रशंसा करे, एतदर्थ मैं अश्वमेध यज्ञ करूँगा और उसके बाद पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करूँगा।
इन यज्ञों के कारण मेरा हित होगा और मैं जरूर पुत्र प्राप्त करूँगा। राजा के यों कहने
पर वे सब बड़े संभ्रमचित्त होकर मन में हर्षित हुए। उन्हें प्रसन्न देखकर राजा मन में
विचारकर बोले—
मैं अनुपम रीति से, बड़े विनय के साथ अश्वमेध यज्ञ करूँगा, जिसकी प्रशंसा देवता
भी करेंगे और पुत्रों के लिए पुत्रकामेष्टि-यज्ञ नेत्र-पर्व रीति (दर्शकों की आँखों को तृप्ति
देनेवाली रीति) से करूँगा। ऐसा कहकर उन्होंने आवश्यक प्रबन्ध करने के लिए सब लोगों
को भेजा। उसी समय अनघ वसिष्ठ आदि मुनि वहाँ आये। (राजा ने) दण्डवत की और
बड़ी श्रद्धा से उन्हें लिवा लाये और उनसे बोले—हे महान् संयमी तथा पुण्यवान् वसिष्ठ !
यथाशीघ्र आप मुझसे श्रेष्ठ अश्वमेध यज्ञ करवाइए, जिससे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो।'
इस पर (मुनि बोले)—'तुम्हारे द्वारा संपन्न होनेवाले अश्वमेध यज्ञ का निर्वाह हम करेंगे।
उस श्रेष्ठ यज्ञ की महिमा का वर्णन करना क्या सहज है ? इसके अतिरिक्त पुत्र-कामेष्टि
करने से तुम धन्यात्मा पुत्रों को प्राप्त करोगे।' यह सुनकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ।
उन्होंने सबको विदा किया और रनवास में पहुँचकर सभी रानियों को यह शुभ संवाद
सुनाया। तब से वे प्रसन्नचित्त रहने लगे। एक दिन अनघ सूत (सुमंत्र) राजा के पास
आकर एकान्त में यों कहने लगे—
६. ऋष्यशृंग का वृत्तांत
सुमंत्र ने कहा—“हे महाराज, इसके पहले आपको संतान-प्राप्ति कैसे होगी, इस
सम्बन्ध में मैंने एक कथा सुनी थी। आप उसे सुनें। अंगराज के पुत्र गुणवान् रोमपाद के
राज्य में न जाने उनके किस अपराध से वर्षा नहीं हुई। अपने राज्य में कहीं भी वर्षा
न होते देख राजा बहुत दुःखी हुए। उन्होंने श्रेष्ठ मुनियों से वर्षा के निमित्त बहुत हवन
करवाये, फिर भी वर्षा नहीं हुई। तब राजा को अत्यंत दुःख से पीड़ित देखकर मुनियों ने
कहा—“हे महीपाल ! हे राजचन्द्र ! इस पृथ्वी पर वर्षा होने के लिए हम शुद्ध मन से आपको
एक उपाय बतायेंगे। हे पर्वत के समान वीर ! परहितनिरत विभांडक के पुत्र पुण्यनिधि
ऋष्यशृंग जन्म से नगर-ग्राम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान न रखने के कारण स्त्रियों के नाम
तक से अनभिज्ञ हैं। वे तपस्वी की वृत्ति में जंगलों में रहते हैं। हे वसुधेश ! उनके यहाँ
आते ही अनावृष्टि-दोष तुरन्त दूर हो जायगा। इसपर राजा अपन मन में सोचने लगे कि
उन मुनिश्रेष्ठ को नगर में कैसे ले आ सकूँगा। उन्होंने बुद्धिमान् मंत्रियों तथा मुनियों को
बुलाकर बड़े प्रसन्न चित्त से पूछा। मुनियों तथा मंत्रियों ने भी बड़ी प्रसन्नता से उपाय
बताये, तो राजा मन ही मन बहुत हर्षित हुए। मुनियों ने कहा—“महाराज, अभी
आप कई (प्रकार के) मिष्टान्न तथा सुन्दर वस्तुएँ देकर वेश्याओं को वन में भेजिए।

बालकांड ११
वे प्रौढ कामिनियाँ सीधे वहाँ जाकर, अच्छी तरह उस मुनि के दर्शन करेंगी, उनकी महिमा
देखेंगी, उन्हें मिष्टान्न देंगी और बडे प्रेम से उनके मन को विचलित करेंगी । वे कामिनियाँ
अपनी विलास-चेष्टाओ से उनके मन को रसार्द्र बना देंगी और अपने मोहक रूप की माया
का प्रभाव डालकर यहाँ वापस आयेंगी । तब वे भी उनके पीछे-पीछे यहाँ आयेंगे ।
यो कहकर सभी मुनि चले गये । उस दिन रात्रि को राजा बहुत प्रसन्नचित्त रहे ।
सवेरे उठते ही राजा ने मुनियो का स्मरण करते हुए बडी अनुरक्ति के साथ अनुपम यौवन-
रूप-सपन्न, कामदेव के मोहन मत्र के सदृश सुन्दर तथा चतुर वेश्याओ को वन में भेजा ।
वे युवतियाँ उस मुनि के वन में गईं और उनके आश्रम के पास जा पहुँचीं । उन्होने अपनी
नाट्य-कला तथा सगीत-कला का परिचय मुनि को दिया । वे पुण्यनिधि यह न जान सके
कि वे स्त्रियाँ है, और मगीत आदि का रसास्वादन न कर सकने के कारण सोचने लगे कि
ये इस वन में रहनेवाली मदगामिनी कोई अनोखी मृगी है । एक दिन वे रमणियाँ उनके
पास पहुँच गईं । उन्होने कामिनियो को अच्छी तरह देखा, उनके कुचो का नाम पूछा, कुचो
पर डोलनेवाले हारो का उद्देश्य पूछा और कहने लगे—“मेरे सिर पर तो एक ही शृग है,
लेकिन आपके उर पर दो शृग निकल आये हैं । आपके ये वल्कल वस्त्र बडे ही कोमल हैं ।
ये अनुपम दल्कल किस पेड से प्राप्त होते है ? आपके जटाजूट मेरी जटाओ के
समान नही है, वे चमक रहे है । आपके शरीर पर मली हुई राख सुगध दे रही है ।
आपके ये वेद-नाद श्रुतिमधुर है । मैने इस वन में ऐसा दृश्य अबतक नही देखा है,
न सुना है । कही मुनियो की भी ऐसी वेष-भूषा होती है ? आप कहाँ के मुनि है ?”
उस महान् व्यक्ति को अपने जाल में फँसते देख उन स्त्रियो ने हँसते हुए कहा—
“हे मुनि, कर्ण-मधुर साम-गान करते हुए, उसके अनुसार शुद्ध रीति से पदन्यास करके
दिखाना हम जानती है । इस पृथ्वी पर हमारा कौशल जानना आपके लिए कहाँ सभव है ?”
इस तरह अपनी वचन-चातुरी से उस मुनिनाथ को भुलावा देकर उन सुदरियो ने
पूछा:-‘आप कौन है ? किनके पुत्र है ? क्यो इस वन में रहते है, बताइए ।' तब उन्होने
कहा—“मै शुद्ध कीर्त्तिमान्, पुण्यात्मा विभाडक का पुत्र हूँ । मेरा नाम ऋष्यशृग है । तप
में महान् निष्ठा रखते हुए तपस्या करने के लिए ही मै यहाँ रहता हूँ । मेरे पिताजी
भागीरथी में स्नान करने की इच्छा से योगिपुगवो के साथ गये हुए है । वे अन्य देशो में
न जाकर बडी तपस्याएँ करने हुए अमल तथा भक्तियुक्त चित्त से यही पर रहते हैं ।
आप लोगो के यहाँ आने से मै पापरहित हुआ, कृतार्थ हुआ । अपने पिताजी की कृपा से
बहुन अधिक तपश्चर्या में लीन मैं भी यही रहता हूँ । इन वनो में आप जैसे नागर लोगो
को, देखकर मुझे आश्चर्य हुआ । क्या अब हम सब आश्रम में चलें ? ”
यो कहकर उन मुनियो को (उन वार-वनिताओ को) अपने आश्रम में ले जाकर
ऋष्यशृग ने उनका आदर-सत्कार किया । उन युवतियो ने प्रसन्नता मे उन मुनि का आतिथ्य
ग्रहण करने के बाद कहा—‘हे मुनिवर, यह लीजिए, हम अपने वन मे श्रेष्ठ फल लाये हैं ।'
यो कहकर उन्होने स्वादिष्ट एव मनोहर लड्डू, पूडी और तरह-तरह के स्वादिष्ट
मिष्टान्न उन्हें दिये । मुनि उन्हें खाते जाते थे और बीच-बीच में उनके स्वाद की प्रशसा

१२ रंगनाथ रामायण
करते जाते थे । उन युवतियो की ओर देखकर बार-बार मिठाई माँगते, परवश-से होकर
हाथ फैलाते और कहते—'हे मुनिवर, मैं ने अब तक ऐसे फल कभी नहीं देखे । आपका
ही तप श्रेष्ठ तप है ।'
यह सुनकर उन युवतियो ने मुस्कुराते हुए अपनी तनुलताओ को उनके शरीर से
छुलाकर, अपने सौरभमय उच्छ्वासो से उनके धैर्य को डिगाने हुए हौले-हौले अपने
मुख-कमलो को उनके मुख से सटाया और मीठे वचन, हाव भाव, मधुर संगीत तथा मादक
दृष्टियो से उन्हें मोहित कर उनके हृदय को रसार्द्र करते हुए, अपने कुचो से कसकर
आलिंगन पाश में उन्हें परवश बनाया और फिर कहने लगी—'हे अनघ, अब हमें आज्ञा
दें कि अपने आश्रम को वापस जायँ ।' यो कहते हुए विभाडक के आगमन के भय से
पीडितं वे वहाँ मे रवाना हो गईं और उस वन के निकट ही रहने लगी । उन कमल-
लोचन रमणियो के जाने के पश्चात्, ऋष्यश्रृंग ने यह सोचते हुए कि न जाने वे फिर कब
लौट आयेंगी, सारी रात जागकर ही व्यतीत कर दी और दूसरे दिन वे उस जगह पर जा
पहुँचे, जहाँ पहले दिन उन्होने उन रमणियो को देखा था ।
७. वेश्याओं के साथ ऋष्यशृंग का रोमपाद के घर आना
पायलो का झकार करती हुई, राजहंसो की गति से वे युवतियाँ मुनि के पास आईं
और प्रफुल्ल वदन हो चारो ओर से उन्हें घेरकर कहने लगी—'हे मुनिवर, आप हमारे
वन में पधारें ।' जब उन्होने स्वीकार कर लिया, तब वे उस श्रेष्ठ मुनि के चित्त कोद्रवित
करनेवाली बातें करते हुए, अपने उपायो तथा हाव-भावो से उनको मोह-मुग्ध कर लिया
और उन्हें अग-देश में इस प्रकार ले आई, जैसे शिकारी पक्षी किसी नये शिकार को पकड-
कर ले जाते समय विस्तृत पथ के भय से उसे बचाने के लिए अपने हस्तपल्लव-रूपी
पालकी में (चंगुल में) ले जाता है । उस ऋष्यशृंग के आने ही अग-राज्य में घोर वर्षा
होने लगी और सस्य बढने लगे । राजा सकल सौभाग्य से युक्त हो सतुष्ट हुए । उन्होने
बडी भक्ति मे उस मुनि की पूजा की और अपनी पुत्री शान्ता का विवाह उनके साथ
कर दिया । वे मुनि उसी राजा के यहाँ रहते हैं । यदि दशरथ उस मुनि को अपने यहाँ
ले आकर उनसे पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करायें, तो वे (दशरथ) चार बहुश्रुत तथा महान् पुत्र
तथा समृद्धि प्राप्त करेंगे । इस प्रकार मुझमे पहले सनत्कुमार ने कहा था । इसलिए आप
उस ऋष्यशृंग मे भक्तियुक्त प्रार्थना कर उन्हें यहाँ ले आयें ।"
इस प्रकार कहकर सूत चले गये । उनके जाने के वाट मन में हर्ष तथा भक्ति
का अनुभव करते हुए चतुर दशरथ उस राजा रोमपाद के यहाँ गये और मुनिश्रेष्ठ ऋष्यशृंग
को प्रणाम करके कहा—'हे पवित्र आत्मा मुनिराज, आप मेरी विनती सुनें । मैं अपने, मन
में पुत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर आपके यहाँ आया हूँ । आप मुझे अपनाइए ।' राजा ने
उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस प्रकार उनकी स्तुति की और उनसे यज्ञ का ऋत्विक्
बनने की प्रार्थना की । फिर अनुपम पालकी में उन्हें बिठाकर अयोध्या के लिए
रवाना हुए । उन्होने दूतो के द्वारा अपने नगरनिवासियो को यह आदेश भेज दिया कि नगर
इन्द्रपुरी के समान सुन्दर सजाकर रखा जाय । दूतो ने नगरनिवासियो को यह आदेश

सुनाया । उन्होंने नाना प्रकार से नगर को सजाया और जहाँ-तहाँ दुंदुभि, शंख, आदि का
तुमुल नाद करने लगे । उसी समय राजा ने भी नगर में प्रवेश किया और मंगलवाद्यों के
बजते हुए, विघ्ननाशक (ऋष्यशृंग) को शांता देवी के साथ, बड़ी चतुरता से अयोध्या में लाये ।
राजा ने ऋष्यशृंग को लाकर अन्तःपुर में ठहराया । अर्घ्य-पाद्यादि देकर विधिवत्
उनकी पूजा की और अपने को कृतार्थ मानकर प्रसन्न हुए । उसी समय कौसल्या आदि
रानियों ने राजा की आज्ञा लेकर बड़े हर्ष से शान्ता देवी को श्रेष्ठ भूषण, वस्त्र, माला
आदि देकर बहुविधि से उनका सत्कार किया ।
कुछ दिन के पश्चात् संसार के प्राणियों को आनंदित करने हुए वसन्त ऋतु आई ।
तब राजा बड़े उत्साह से ऋष्यशृंग के पास गये और बड़ी भक्ति से प्रणाम करके विनय
किया—‘हे संयमीप्रवर ! आप मुझसे यज्ञ कराके मेरा उद्धार कीजिए ।’ तब उन्होंने—
‘ऐसा ही हो,’ कहकर रविकुलोत्तम राजा दशरथ से आगे कहा—‘हे राजन्, यज्ञ के लिए
विधिवत् आवश्यक सामग्री शीघ्र मँगवाइए ।’ तब राजा ने योग्य व्यक्तियों को उन सब
वस्तुओं का संचय करने के लिए भेजा और सब सामग्री मँगवाई । (उन्होंने) सुमंत्र को
भेजकर कीर्तिमान् केकयराज, अप्रतिहत तेजस्वी काशिराज, जनक महाराज, अंगराज आदि
पुण्यचरित्र नरेशों को यज्ञ देखने के लिए सविनय आमंत्रित किया । (इसके पश्चात्)
उन्होंने सुमंत्र से कहा—‘तुम शीघ्र जाकर पुण्यवान् वेदवेदांग-पारंगत, गृहस्थ, निपुण एवं
महिमा-समन्वित ब्राह्मणों को तथा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, महात्मा वसिष्ठ तथा वामदेव
आदि (पुरोहितों) को लिवा लाओ ।’
सुमंत्र बड़ी प्रसन्नता से गया और बड़ी श्रद्धा से उन सबको लिवा लाया । (राजा ने)
उन्हें अर्घ्य, पाद्य आदि देकर (उनका स्वागत-सत्कार किया) । वे अपने निर्मल व्रत
की निष्ठा के अनुकूल धर्मसम्मत तथा उचित वचन यों बोले—“हे मुनिश्रेष्ठ, पुत्रहीन होने
से अत्यन्त दुःखी हूँ, पुत्र-प्राप्ति की इच्छा बलवती होने के कारण मित्रों के परामर्श से
अश्वमेध यज्ञ, तथा पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करने के लिए इन ऋष्यशृंगजी
को आमंत्रित किया है । (अब) आपके अनुग्रह का प्रार्थी हूँ ।”
राजा की बातों से प्रसन्न होकर वसिष्ठ आदि तपोधन मुनियों ने कहा—“हे रवि-
कुलोत्तम, लोकहितार्थ पुत्रों को प्राप्त करने की आपकी इच्छा सर्वथा संगत है । अब अश्व
को छोड़िए । इस अश्वमेध से आपके विश्वरक्षक एवं उज्ज्वल पराक्रमी चार पुत्र होंगे ।”
इससे बहुत सन्तुष्ट होकर राजा ने यज्ञ के लिए योग्य जवनाश्व (तेज जानेवाला
घोड़ा) को चुनकर, भुवनपावन मूर्ति की पूजा करके, उस घोड़े के ललाट पर अपना
नामांकित एक पट्ट बाँधकर, एक साल तक उसे अपनी इच्छा से घूमने के लिए
छोड़ दिया । उस अश्व की रक्षा के लिए पराक्रमी सेना तथा सामंत नरेश भी भेजे । उसके
बाद वसिष्ठ आदि मुनियों की अनुमति से अनुपम शिल्पकारों को बुलाकर सरयू नदी की
उत्तर दिशा में वेद-विधि के अनुसार एक यज्ञ-शाला का निर्माण करने के लिए भेजा
और सभी देश के राजाओं तथा उन देशों में निवास करनेवाले विप्र, क्षत्रिय, वैश्य तथा
शूद्रों को भी आमंत्रित किया ।

१४ रंगनाथ रामायण
इतने में एक वर्ष पूरा हुआ और मधुमास आया। तब राजा ने चिर तपोनिधि
ऋष्यशृंग की अनुमति तथा गुरु की आज्ञा लेकर एक अच्छे मुहूर्त में बड़े उत्साह से शान्ता
तथा ऋष्यशृंग के साथ, यज्ञोपकरणों तथा हवन-कुंड से युक्त, इक्कीस सुन्दर यूपों से
शोभायमान, श्रौतधर्म-क्रियाचार-विहित, मायाप्रवीण, राक्षसों से रहित तथा समस्त पाप-
रहित यज्ञ-शाला में प्रवेश किया।
८. दशरथ का यज्ञ-दीक्षा लेना
यज्ञाश्व के आने ही, यज्ञ-दीक्षा ग्रहण कर, यतिबुद्धि प्राप्त करके, वसिष्ठ आदि
श्रेष्ठ मुनिजनों को ऋत्विकों के रूप में वरण कर, अपनी इच्छा से सवनत्रय को पूरा करके,
विमल यूपकाष्ठों में बँधे हुए जलचर, वनचर, विहग, उरग आदि तीन सौ पशुओं तथा
प्रख्यात यज्ञाश्व का वध करके श्रुतियों में जिन-जिन मंत्रों के साथ, जिन-जिन आहुतियों को
देने की विधि बताई गई है, उन मंत्रों के साथ ऋत्विकों ने उन आहुतियों का हवन
किया। अग्निदेव सप्त-जिह्वाओं से प्रज्वलित हुए। देवता उन आहुतियों से तृप्त हुए।
उस यज्ञ के दिनों में न कोई भूखा रहा, न कोई संतप्त रह गया। सभी मिष्टान्न, वस्त्र
स्वर्ण, मणिभूषण आदि से संतृप्त किये गये।
जब किसी भी विघ्न के बिना यज्ञ समाप्त हुआ, तब ज्योतिष्टोम, विश्वजित् आदि
महान् यज्ञ-क्रियाओं को सांग रूप से पूरा किया और यज्ञ-दक्षिणा के रूप में अध्वर्यु (यज्ञ-
करानेवाले चार ऋत्विकों में से एक) को (अपने राज्य का) दक्षिण का भाग, होता को
पश्चिम का भाग तथा उद्गाता को उत्तर का भाग दिया। अयोध्या को छोड़ बाक़ी सभी
देशों को (दान में) दे दिया, जिससे ऋत्विक् प्रसन्न होकर कहने लगे—"कब हम आपके
दिये हुए राज्य का शासन करें और कब अपने अनुष्ठान का पालन करें। हम कहाँ और
देश का शासन कहाँ ? हे राजन्, आप हमें इस राज्य का मूल्य दे दें।" तब राजा ने
दस करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ, सोने की चौगुनी चाँदी और एक लाख गायें उन्हें दीं। ऋष्यशृंग
आदि ऋत्विक् उस धन को आपस में बाँटकर संतुष्ट हुए। उस विमल यज्ञ-कर्म में
प्रवृत्त परिचारकों को राजा ने एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ दीं। माँगनेवालों को श्रेष्ठ आभूषण दिये।
जिसने जो कुछ माँगा, राजा ने प्रेम से उसे वह दे दिया। उन्होंने सभी ब्राह्मणों
को भक्ति से प्रणाम किया और क्रमशः उनके आशीर्वाद पाते हुए उन्हें दिव्य वस्त्राभरण
देकर अकलंक चित्त से यज्ञांत स्नान किया। (उधर) ऋष्यशृंग के द्वारा कराये गये पुत्र-
कामेष्टि यज्ञ में आकर क्रमशः अपने-अपने यज्ञ-भाग प्राप्त करनेवाले देवता रावण के सम्बन्ध
में अपने मन में विचार करने लगे।
९. रावण के अत्याचारों के बारे में ब्रह्मा से देवताओं की शिकायत
ब्रह्मा के पास पहुँचकर (देवताओं ने) उनको प्रणाम किया और यों विनती की—
"हे प्रभो ! आपके वर की शक्ति से दशकन्धर, पुण्यात्मा आचार्यों ब्रह्मर्षियों, देवताओं तथा
मुनियों को दुःख दे रहा है। हे कमलासन ! हमारा खयाल है कि आपके वर की प्रचण्ड
शक्ति के कारण ही हम उसको जीत नहीं सकते। वह देवताओं के साथ इन्द्र को भी
पकड़कर उनका अपमान करता है और उन्हें दुःख देता रहता है। (अपने) भुजबल के दर्प से

बालकांड १५
वह गंधर्व, यक्ष आदि देवगणो, मुनियो तथा साधुओ को पकड़कर कष्ट दे रहा है ।
सभी कुल-पर्वत उसके नाम से डरते है । सूर्य भी ताप फैलाने से डरता है । वह जिस
नगर में रहता है, वहाँ पवन भी अपनी पूरी शक्ति के साथ चलने से डरता है । उसके
अतिशय प्रताप से डरकर समुद्र अच्छी तरह गर्जन नही कर पाता है । दीख पड़ने पर हमें
भी दुख देता है । ऐसे पापी दशकंधर का अन्त करने का उपाय आपको सोचना चाहिए ।"
तब ब्रह्मा ने उन सारी बातो को हृदयगम करके देवताओ से कहा--" (रावण)
अमरो के हाथ नही मरेगा, राक्षसो से नष्ट नही होगा, गधर्वो से मिटेगा नही, रजनीचरो
से समाप्त नही होगा, भुजगो से मारा नही जायगा, यक्षो से हत नही होगा, पक्षिसमूह से
पराजित नही होगा । मेरे वर देते समय उसने नरो का नाम नही लिया था, इसलिए
वह नरो से ही मरेगा । स्पष्ट सुनो, हिरण्यकशिपु जब सारे संसार को दुख देता था, तब
नारायण ने स्वय नरसिंह का रूप धारण कर उसे चीर डाला था । उसी ने अब विश्रवसु
के यहाँ जन्म लिया है । इसलिए नारायण ही अब इसका नाश करेंगे । अब हमें उस विष्णु
से अभयदान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।"
ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर सभी लोग तुरन्त क्षीर समुद्र के निकट गये और
अच्युत को देखकर पवित्र हृदय से उनकी स्तुति की । हाथ जोडकर बड़ी भक्ति से प्रणाम
किया और विष्णु से इस प्रकार विनती की ।
१०. देवताओं का विष्णु की स्तुति करना
हे त्रिलोकीनाथ, कमलालय-वक्ष, वसुमत्तिरक्षक, वनजाक्ष, आपके अतिरिक्त हमारा
कोई (सहायक) नही, यह सत्य हे । हे गोविन्द, परिपूर्णगुण चिदानन्द, हे देव, जगन्मय,
देवाधिदेव, देवो के रक्षक, दिव्यावतार, अमृतसागर में पहले आपकी शरण में आये हुए हमें
(आपने) अपना अभयदान दिया था । हे दानवदलन, आपके भुजवल-विक्रम से ही समस्त
लोको की रक्षा होती है । हे भक्तवत्सल, भक्तियोग को छोड़ अन्य उपायो से आपको
पहचानना असंभव है । हे मधुसूदन, मन में आपका ध्यान करनेवालो को क्या कभी कोई
विपदा सता सकती है ? जगत् की सृष्टि, स्थिति, लय आदि आपकी लीलामात्र है ।
समस्त लोक आपकी माया का आधार लेकर ही आपका महनीय तनु धारण करते है ।
हे शेषशायी, आपका वैभव तथा आपकी महिमा अवाङ्मानसगोचर है । हे शरणागत
रक्षक, हे लोकेश, हम आपकी शरण में आये है । हम शरणार्थियो की रक्षा आपको करनी
ही चाहिए । आप त्रिलोक-कटक रावण का वध करके हमारी रक्षा कीजिए । हे लोकैक-
स्तुत्य, बिना विलंब हमारा कार्य सपन्न कीजिए और यश पाइए । निर्मलचित्त, निश्चलव्रती,
धर्मात्मा, उत्तमगुण-समन्वित, राजा दशरथ अश्वमेध यज्ञ पूरा करके पवित्र मन से युक्त
हुए है । उस काकुत्स्थ-वंशी (राजा दशरथ) की स्त्रियो का विचार करें, तो कोई भी स्त्री
उनकी बराबरी नही कर सकती । हे कमलगर्भ, आप अपने चारो अंशो के साथ नर के
रूप में जन्म लीजिए । वर के प्रताप से जो देवताओ के लिए अवध्य है, जो लोकत्रासक है
जिस पापी ने गंधर्व एव किन्नरो का वध किया है, हे पुण्डरीक, ऐसे दशकंधर का वध
करके यज्ञ-संपादन कराइए और संयम-धनी पुरुषो की तथा संसार की रक्षा कीजिए ।"