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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 508 में से

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पृष्ठ 37

बालकांड ७
ईस प्रकार श्रीराम का चरित्र अथ से इति तक कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को
चले गये । मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि अत्यत हर्ष से अपने शिष्य भरद्वाज के साथ सज्जनता की
मूर्त्ति, अकलुष जीवन-युक्त, तमसा नदी के तट पर गये और उस नदी के जल से अपने
अनुष्ठान का पालन करते रहे । उस नदी के किनारे (पेड पर) क्रौंच पक्षियो का एक
जोडा बडे प्रेम से मिलकर बैठा था । एक व्याध ने जब उनमें से एक को मार गिराया,
तब क्रौंची शोक से विलाप करने लगी । यह देखकर न्याय और धर्म का विचार करके
मुनि उस व्याध पर क्रोध करते हुए बोले-“हे निषाद, हे पापी, इन्होने तुम्हारा क्या
बिगाडा था ? जब ये क्रौंच बडे प्रेम से मिले, तब तुमने इस प्रकार एक को क्यो मार
गिराया ? इस पाप के कारण तुम बहुत दुख प्राप्त करते हुए अनेक वर्षों तक भटकते
रहोगे ।”
इस प्रकार व्याध को शाप देकर वाल्मीकि ने अपने शिष्य भरद्वाज से छन्दोबद्ध शब्दो
में कहा-“मेरे द्वारा कहे हुए वचनो पर बार-बार विचार करने पर मालूम होता है कि
इन चार समवर्ण पक्तियो में छन्दोबद्धता है । यह बडे आश्चर्य की बात है कि ये शाप के
वाक्य अपने आप एक पद्य के रूप में प्रकट हुए है ।” तब भरद्वाज आदि शिष्य बडी भक्ति
से उस पद्य को (दुहराने) पढने लगे । अनघ वाल्मीकि अपने आश्रम को लौट आये ।
एक दिन ब्रह्मा उनके आश्रम में आये । वाल्मीकि ने उनकी अगवानी की, चरणो
पर झुककर नमस्कार किया, कुशासन पर बिठाकर उनकी पूजा की और हाथ जोडकर अपने
मुँह से निकले छन्दोबद्ध शाप-वचन उन्हें सुनाया । तब ब्रह्मा ने मुस्कुराकर कहा--“हे अनघ,
यह वाणी पद्य के रूप में आपके मुख से व्यक्त हुई है । नारद ने सारा राम-चरित मुझे
सक्षेप में कह सुनाया है । आप उसको विस्तार के साथ सुनाइए । अपने आप वह चरित्र
आपको सूझ जायेगा ।” यो कहकर ब्रह्मा चले गये ।
इस प्रकार बडी कृपापूर्वक कमलासन के वर देकर चले जाने के पश्चात् मुनि ने
निर्मल मति से ध्यान लगाकर सोचा और रघुचरित, दशरथ की कथा, रघुराम का जन्म,
राम का आचरण, ताडका-वध, उद्दण्ड राक्षसो का गर्व-भग, यज्ञ-रक्षा, गगा का महत्त्व,
गौतम की स्त्री का शाप-मोचन, धनुर्भंग, सीता-विवाह, अयोध्या जाते समय परशुराम का
क्रोध, राम के युवराज्याभिषेक की तैयारी, दुष्ट स्त्री कैकेयी के कटुवचन, अभिषेक में विघ्न,
राम-वन-गमन, राजा का शोक, दशरथ की मृत्यु, दाशरथि से गुह की भेंट, गगा पार
करना, तपोनिधि भरद्वाज से (राम की) भेंट, चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना, भरत और राम
की भेंट और उनका पादुका प्राप्त करके लौट जाना, दण्डकवन-गमन, प्रचड विराध का वध,
पुण्यात्मा शरभग के दर्शन, मुनियो को वचन देना, अगस्त्याश्रम में पहुँचना दिव्य अस्त्रो की
प्राप्ति, मुनि के आदेशानुसार पर्ण-कुटी बनाकर निवास करना, (राम पर) मुग्ध होकर
राक्षसी (शूर्पणखा) का आना, उसके साथ वार्त्तालाप, रामानुज के द्वारा उसका नाश, उधर
रावण का बुद्धि-भ्रष्ट होना, कुटिल मारीच की मृत्यु, राक्षसराज (रावण) के द्वारा सीता-
पहरण, राम का विलाप, जटायु की मृत्यु, कबंध से भेंट, पपासरोवर को गमन, ऋष्यमूक पर्वत पर
सुग्रीव से भेंट, उससे मित्रता, वालि-सुग्रीव के वैर का कारण जानना, श्रीराम का एक साथ