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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 508 में से

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पृष्ठ 36

६ रंगनाथ रामायण
गति, पद, शय्या, अर्थ-गौरव, यति, रस, कल्पना, प्रास, असमान रीतियाँ आदि होंगे और
आदि कवि वाल्मीकि की कृपा से सभी सज्जन मेरी प्रशंसा करेंगे । कथा का प्रारंभ यो है—
३. कथा का प्रारंभ
एक दिन श्रेष्ठ तपस्स्वाध्याय-निरत, महान् शीलवान् मुनिश्रेष्ठ नारद से अनघ,
तपोनिधि वाल्मीकि ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया—“हे मुने, आप कृपया बतलाइए कि इस
संसार में, श्रीमान्, क्षमाशील, पुण्यात्मा, उन्नत, नीतिज्ञ, प्राज्ञ, दुर्दम, उत्तम, जितकाय, अजेय,
ईर्ष्याहीन, संपन्न, सुव्रती, उदार और चरित्रवान् कौन है ? जिनके क्रोध से इंद्रादि देवता
डरते रहते हैं ? ऐसा व्यक्ति क्या, कभी हुआ है या आगे चलकर इस पृथ्वी पर जन्म
लेनेवाला है ?”
यह सुनकर लोकज्ञाता नारद मुनि ने अपने मन में बहुत देर तक सोच-विचार कर
कहा—“इस पृथ्वी पर श्रीविष्णु, महाराज दशरथ के यहाँ जन्मे हैं । वे नियतात्मा, अति-
शौर्यनिधि, कृपानिधि, जयी और स्वजनों की रक्षा में विचक्षण हैं । वे कम्बु-कंधर, सुदराकार,
बिम्बारुण ओष्ठ, पीन वक्ष, विशाल-नेत्र, विशाल अवतंस और आजानुबाहु हैं । वे नियतात्मा,
वेदवेदांग-कोविद वेदविद्, विवेकभूषण, सूर्य के समान तेजस्वी, समुद्र के समान गंभीर,
अमराद्रि के समान धीर और पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं । उनकी मूर्त्ति (लोगों को)
अपनी ओर आकृष्ट करती है । वे कौसल्या के आनंद-दाता, श्रीकर, दीप्तिमान्, त्रिलोक-
पावन मूर्त्ति, राम के नाम से अवतरित हुए हैं ।
राजर्षि (विश्वामित्र) के (रामचन्द्र को) माँगने तथा राजा के भेजने पर वे मुनि
के साथ गये । (उन्होंने) यज्ञ की रक्षा की, दानवी का नाश किया, राक्षसों का संहार
किया, शिला को स्त्री बनाया, शिव-धनुष को तोड़ा और सीताजी से विवाह करके बड़ी
ख्याति पाई । सीताजी के साथ अयोध्या जाते समय बड़े क्रोध से विप्र (परशुराम) ने
आकर उन्हें रोका, तो वे उनसे जूझ पड़े और उनका धनुष छीनकर उसे तोड़ डाला ।
उनके बाद सब लोगों के हृदयों को आनंद से भरते हुए वे अयोध्या पहुँचे ।
जब पिता '(राम को) युवराज बनाऊँगा'—ऐसा कहकर अयोध्या का राज देने को
उद्यत हुए, तब ढीठ मंथरा ने कैकेयी के कान भरे । कैकेयी पहले ही युद्ध में दो वर प्राप्त
कर चुकी थी । (राजा ने) राघव को कानन में भेज दिया । पिता के वचन से बँधकर,
वे सीता और लक्ष्मण के साथ वन में गये, जहाँ उन्होंने बड़े उत्साह से वनों में तपस्या
करनेवाले संयमी मुनियों की रक्षा की, खर-दूषणादि राक्षसों के सर धरों से काट डाले,
ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव से मित्रता की, एक ही बाण से वालि का संहार किया, (सीता
को पुन प्राप्त करने का) दृढ़ निश्चय करके सेतु को बाँधा तथा पापी दशकंठ के दसों
सिर काट डाले ।
उसके पश्चात् आश्रितों के कल्पवृक्ष रामचंद्र, सीता के साथ, वनचर-समूह तथा
इंद्रादि देवताओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए और सेवा प्राप्त करते हुए, (अयोध्या) आये
और अपनी पूज्य साम्राज्य-लक्ष्मी का पालन करते हुए तथा प्रजा को सुख पहुँचाते हुए कृत-
कृत्य हुए हैं ।”