रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
( २ )
जो शोध-कार्य हुआ है, उससे यह प्रमाणित हो गया है कि तेरहवीं सदी में बूदपुर
(ऐतिहासिक बोयान नगर) के आसपास राज करनेवाले सूर्यवंशी राजा विट्ठलराजु के
आदेशानुसार उनके पुत्र गोनबुद्ध राजा ने इसकी रचना की है। इसका उल्लेख कवि
स्वयं काव्य के प्रारंभ में कर चुके हैं। प्रकाशित एवं अप्रकाशित शिलालेखों के आधार पर
यह प्रमाणित हो चुका है कि इस काव्य की रचना लगभग १३८० ई० में हुई थी।
'रंगनाथ रामायण' की विशेषता यह है कि उसकी रचना उस समय तक जनता
में प्रचलित राम-कथा के आधार पर हुई है, जो संस्कृत-रामायण से कईस्थानो में भिन्न है।
यद्यपि, रामायण आर्यावर्त्त या उत्तरापथ के राजा राम की कथा है, तथापि वह
परंपरागत लोक-कथाओं के रूप में सारे दक्षिण में अति प्राचीन काल से व्याप्त थी।
अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका है कि दक्षिण की भाषाएं, तमिल,
तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम--जो संस्कृत भाषा-परिवार से सर्वथा भिन्न परिवार की हैं--
अपनी प्रारंभिक अवस्था में संस्कृत से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखती थीं।
ऐसी दशा में यह आशा नहीं की जा सकती कि इन भाषाओ के बोलनेवाले वाल्मीकि
रामायण की मूलकथा का ज्ञान प्राप्त करें। उन्होंने स्थूल रूप में कथा को ग्रहण किया
होगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तित्वों ने भिन्न-भिन्न युगों में उस कथा का अपने ढंग से मोड़-
तोड़कर प्रचार किया होगा। यह कोई आश्चर्य नहीं, यदि घर-घर में इस कथा का प्रचार
हो गया हो और उत्सुक बालक-बालिकाओं के मनोरंजन के लिए तथा उनमें राम तथा
उनकी पत्नी सीता के आदर्श जीवन में प्रतिबिम्बित आर्य-धर्म को प्रतिष्ठित करने के
उद्देश्य से घर के बड़े-बूढ़े, रामायण के इतिवृत्त का छोटी-छोटी कहानियों के रूप में
प्रसार किया हो। हमारे यहाँ ऐसी प्रथा रही भी है। महाकवि कालिदास अपने मेघदूत
में कहते हैं कि कौशांबी नगर में ग्रामवृद्ध अपने पोते-पोतियों को उदयन की कथा
सुनाते थे। स्वयं कालिदास-कृत रघुवंश में वर्णित राम-कथा कुछ स्थानो में मूलकथा
से भिन्नता रखती है।
राम की कथा त्रेतायुग की होने के कारण उदयन की कथा से भी अधिक प्राचीन है
और कदाचित् उसने द्रविड़ों के हृदय एवं प्रतिभा पर अमिट प्रभाव डाला होगा।
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि रामायण के दो प्रधान पात्रों में रावण
दक्षिण का था। लंका का राज्य, राम के विजय प्राप्त करने के पश्चात् भी बना रहा
और विभीषण उसका पालन करता रहा। आधुनिक युग की भाँति यदि राम भी लंका
को जीतने के पश्चात् अपने किसी भाई को अपनी तरफ से लंका का राज्य चलाने के
लिए नियुक्त करते, तो कदाचित् दक्षिणापथ का इतिहास कुछ बातो में भिन्न होता।
तेलुगु-भाषा तमिल के मुकाबले में प्राचीन न होने पर भी कुछ हद तक प्राचीन
ही कही जा सकती है; उस भाषा के बोलनेवालो में बहुत समय तक वाल्मीकि रामायण
की अपेक्षा लोक-कथाओं के द्वारा प्रचलित राम-कथा का ही आदर होता रहा। क्रमशः
तेलुगु-भाषाभाषी संस्कृत के प्रति आकृष्ट हुए और उस भाषा के प्रकांड पंडित बन गये।
'रंगनाथ रामायण' और 'भास्कर रामायण' के कवि संस्कृत के महान् पंडित थे और
( ३ )
उन्होंने अपनी कृतियों में स्पष्ट कहा भी है कि उनकी कृतियाँ वाल्मीकि रामायण को
आधार मानकर चलती हैं। फिर भी, वे जनता के बीच प्रचलित रामकथा की सर्वथा
उपेक्षा नहीं कर सके ।
कहा जाता है कि सन् १३१० ई० में 'कवित्रय' के प्रसिद्ध कवि एर्रना ने
मूल संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तेलुगु-पद्य में लिखा था । खेद है कि वह रचना
आज हमें अप्राप्त है--केवल उसके कुछ एक पद्य तेलुगु के एक लक्षण-ग्रन्थ में हमें
मिलते हैं। एर्रना के पश्चात् सन् १८६० ई० तक किसी और कवि ने वाल्मीकि रामायण
का सही-सही अनुवाद तेलुगु में प्रस्तुत नहीं किया । सन् १८६० ई० में गोपीनाथ वेंकट
कवि ने संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तेलुगु-पद्य में प्रस्तुत किया । उसके पश्चात्
कितने ही कवियों ने अपनी प्रतिभा के अनुसार संस्कृत-रामायण का अनुवाद किया ।
कहने का तात्पर्य यह है कि १८६० ई० तक राम की कथा पर जो काव्य लिखे गये,
उनपर लोक-कथाओ का ही अत्यधिक प्रभाव रहा ।
आज के शुभ समय में, जबकि भारत की विभिन्न संस्कृतियों में आदान-प्रदान का
कार्य प्रारंभ हो गया है, यह अत्यंत हर्ष की बात है कि दक्षिण के एक सुयोग्य तथा
हिन्दी-तेलुगु-भाषाओ के निपुण विद्वान् श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने, तेलुगु की अत्यंत
लोकप्रिय द्विपद रामायण का अनुवाद राष्ट्रभाषा हिन्दी के गद्य में किया है, जिससे
वह भारत के सभी साहित्यों तक पहुँच सके ।
तेलुगु की 'रंगनाथ रामायण' अपने इतिवृत्त, भाव, कला एवं शैली के कारण
तीन करोड़ तेलुगु-भाषाभाषियों के हृदय में राम-भक्ति को जागरित करने में सफलता प्राप्त
कर चुकी है । यदि उसका हिन्दी-अनुवाद आसेतुहिमाचल व्याप्त चालीस करोड़
भारतवासियों के हृदयो में राम-भक्ति जागरित करनेवाली प्रबल शक्ति का स्रोत बन सके,
तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जयहिन्द ।१
ता० ८, शाके १८८२ } विद्यारत्न निडदवोलु वेंकट राव, एम्० ए०
चैत्र, सोमवार } रीडर तथा तेलुगु-विभाग के अध्यक्ष
२८-३-६० ई० } मद्रास-विश्वविद्यालय
१. 'आन्ध्र महाभारत' के तीन प्रसिद्ध कवि नन्नया, तिक्कना और एर्रना 'कवित्रय'
के नाम से विख्यात हैं ।
२ प्रस्तुत परिचय मूल अगरेजी लेख से अनूदित ।
इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है (यह पृष्ठ रिक्त है)।
ु, तेनुगु, आंध्रम्; किन्तु 'तेलुगु' शब्द का ही
Note: भाषा हैं। (has dot on हैं). नाम हैं-- (has dot on हैं).
अधिकाधिक प्रयोग होता हैं । 'आंध्र' शब्द पहले जाति-परक था, किन्तु बाद को वह देश-
Note: होता हैं ।
परक हुआ और निदान आंध्र देश की भाषा 'आंध्रम्' कहलाई । तेलुगु अजंत भाषा है--
प्रायः इसके सभी शब्द स्वरांत और विशेष रूप से उकारांत होते हैं । (उदा०-संतोषमु,
Wait, in line 6: (उदा०-संतोषमु, or (उदा०-सतोषमु,?
Let's look at उदा०-सतोषमु: there's no dot on स. It's printed सतोषमु,. But either way, let's write सतोषमु,.
साहसमु, नीनु, नेनु आदि) । अतः, यह भाषा अधिक संगीतमय होने की क्षमता
रखती हैं। कदाचित् इसी कारण से विदेशी विद्वानो ने इसे 'पूर्व की इटालियन भाषा'
Note: रखती हैं। विद्वानो (no dot on no).
कहा होगा ।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी समय आंध्र-साम्राज्य
( ६ )
शुरू हुआ। यह आंदोलन आज तक चल रहा है। आज स्थिति ऐसी है कि तेलुगु के
पचहत्तर फी सदी लेखक अपनी साहित्य-साधना बोलचाल की भाषा के माध्यम से करते हैं।
साहित्यिक भाषा (ग्रांथिक भाषा) और बोलचाल की भाषा (व्यावहारिक भाषा) में
जो अन्तर हैं, वह विशेषतया क्रियाओं तथा कुछ शब्दो के रूपो तथा संधि के नियम-
पालन के ऊपर निर्भर करता है। एक उदाहरण से यह अन्तर स्पष्ट करेंगे।
साहित्यिक-भाषा--श्री राम चरित्रमु परम पावन मैनदि । अंदुवलनने तेलुगुलो
ननेकुलु रामायण-मुनिदिवरलो रचियिंचिरि । इप्पटिकिनि रचियुचु तम जन्ममुनु
चरितार्थमु गाविंचु कोनु चुन्नारु ।
व्यावहारिक भाषा--
श्रीराम चरित्र परम पावन मैंदि। अंदुवल्लने तेलुगुलो अनेकुलु रामायणान्नि यिदि
वरलो व्रासारु । इप्पटिकी व्रास्तू तम जन्मान्नि चरितार्थमु चेसुकुंटुन्नार ।
(श्रीराम की कहानी परम पावन है। इसलिए, कई लोगो ने अबतक रामायण की
रचना की। आज भी कुछ लोग इसकी रचना करते हुए अपने जीवन को चरितार्थ कर रहे हैं।)
जैसा हम पहले निवेदन कर चुके हैं, तेलुगु द्राविड़-भाषा-परिवार की एक मुख्य
भाषा है। किसी समय तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम मूल द्राविड़-भाषा की
बोलियां मात्र थीं। किन्तु, बाद को भिन्न-भिन्न वातावरण में पनपने के कारण आज ये
एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती हैं। तेलुगु-प्रदेश पर कई राजवंशो ने राज्य किया।
सातवीं शताब्दी तक सातवाहन, इक्ष्वाकु, वृहत्फलायन, शालंकायन, पल्लव, विष्णुकुंडिन
तथा पूर्व चालुक्य राजाओ ने तेलुगु-प्रदेश पर राज्य किया था। इन राजाओ की राज-
भाषा या तो सस्कृत थी या प्राकृत। जो शिलालेख अबतक उपलब्ध हैं, उनमें बहुतों
की भाषा प्राकृत है। इन राजाओ में कुछ तो वैदिक धर्मावलंबी थे और कुछ बुद्ध के
अनुयायी थे। इस तरह तेलुगु-प्रदेश में राजभाषा तथा धर्म की भाषा की हैसियत से संस्कृत
तथा प्राकृत का अत्यधिक प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में देशभाषा पर पड़ता रहा।
परिणाम यह हुआ कि आज तेलुगु में पचहत्तर फी सदी शब्द सस्कृत या प्राकृत भाषाओ
के तत्सम या तद्भव रूप हैं। तेलुगु-प्रदेश के पंडितो का संस्कृत के प्रति इतना
अधिक आग्रह रहा कि तेलुगु का सब से प्रथम व्याकरण संस्कृत-भाषा में
लिखा गया।
तेलुगु की साहित्यिक भाषाके भी दो रूप मिलते हैं। एक रूप वह है, जो सस्कृत
शब्दों तथा समस्त पदो से भरा हुआ होता है और दूसरा वह, जिसमें ठेठ तेलुगु शब्दो
का ही बाहुल्य है। ठेठ तेलुगु को 'जानु तेनुगु' कहते हैं। इन दोनो रूपो में संस्कृत-
बहुल भाषा का ही अधिक आदर होता रहा और धीरे-धीरे ठेठ तेलुगु के प्राचीन काव्यो
के बहुत-से शब्दों का प्रचलन कम होता गया। इसलिए, ठेठ तेलुगु के प्राचीन काव्यो
को समझना बहुत-से तेलुगु-भाषाभाषियो के लिए भी आज कठिन-सा हो गया है।
ठेठ तेलुगु तथा संस्कृतबहुल तेलुगु के उदाहरणो को देखने से इन दोनों में अंतर स्पष्ट
हो जायगा--
( ७ )
ठेठ तेलुगु--
चेप्पु लोनिरायि चेविलोनि जोरीग,
कटिलोनि नलुसु, फालिमूल्ल,
इटिलोनि पोरु इंतित कादया ॥
(जूतो में पड़ा हुआ ककड, कान में पहुँचा हुआ कीडा, आंख की फिरफिरी, पैरो में
कांटा और घर में झगड़ा--इनकी पीड़ा असहनीय होती है।)
संस्कृतबहुल तेलुगु--
अधरमु गदली गदलक
मधुरमु लघु भाष लुडिगि
मौन व्रतुडौ अधिकार रोग पूरित
बधिरांधक शवमु जूड पापमु सुमती ॥
[अधरो को बिना हिलाये, मधुर भाषा से रहित हो, मौन व्रत धारण करनेवाला
अधिकार-रोग से भरा व्यक्ति बहरे तथा अंधे शव के बराबर है । उसे देखना भी पाप है।
(रेखांकित शब्द संस्कृत के हैं ।) ]
इन दोनो शैलियों का सामंजस्य भाषा के जिस रूप में पाया जाय, जिसमें तेलुगु
का मुहावरा भी और संस्कृत का मधुर एव गभीर शब्द-समूह भी हो, वही तेलुगु अधिक
लोकप्रिय है और वही सुंदर समझी जाती है । रंगनाथ रामायण की भाषा में ऐसी ही
सुंदरता पाई जाती है । इसकी चर्चा यथास्थान आगे की जायगी ।
तेलुगु-साहित्य--महाकवि नन्नया का आंध्र-महाभारत तेलुगु-साहित्य के उपलब्ध
काव्य-ग्रन्थो में सबसे प्राचीन है । इसकी रचना ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य में हुई थी।
इस काव्य की प्रौढ भाषा एव उत्कृष्ट कला-कौशल को देखकर विद्वान् यह अनुमान करते हैं
कि यही महाभारत तेलुगु-साहित्य का आदिकाव्य नहीं हो सकता । उनका विचार है
कि किसी भी भाषा के प्रथम साहित्य का रूप इतना विकसित एवं प्रौढ नहीं हो
सकता; शताब्दियों की साहित्य-साधना के परिणाम-स्वरूप ही ऐसी प्रौढ रचना का
प्रणयन संभव है । यह विचार कल्पना-मात्र कहा नहीं जा सकता। सातवीं तथा आठवीं
शताब्दी के जो शिलालेख एवं तांबे के दानपत्र अबतक उपलब्ध हुए, उनमें उत्कृष्ट
काव्य-स्वरूप के नमूने मिलते हैं । अत., यह कहना सत्य से दूर नहीं होगा कि तेलुगु में
साहित्य-रचना का प्रारंभ ईसा की सातवीं शताब्दी में ही हुआ होगा, किन्तु सातवीं से
दसवीं शताब्दी तक का साहित्य हमें आज उपलब्ध नहीं हो सका ।
सन् १०५० ई० से आजतक के तेलुगु-साहित्य के इतिहास को पांच युगो में
विभाजित किया जा सकता है--
१. पुराण-युग (१०५०--१३५० ई०)
२. श्रीनाथ-युग (१३५०--१५०० ई०)
३ प्रबंध-युग (१५००--१६०० ई०)
४ दक्षिणांध्र-युग (१६००--१८७५ ई०)
५. आधुनिक-युग (१८७५ ई० से)
( द )
प्रत्येक युग का सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है--
पुराण-युग --वैदिक धर्म तथा उसके समर्थक पुराणो के प्रचारार्थ इस युग में
साहित्य-साधना का प्रारंभ हुआ। महाकवि नन्नया ने 'महाभारत' की रचना प्रारंभ की
और अरण्य-पर्व का अर्द्ध भाग लिख भी न पाये कि उनका स्वर्गवास हो गया । उसके
दो सौ वर्ष के पश्चात् तिक्कना सोमयाजी ने विराट् पर्व से प्रारंभ कर शेष पंद्रह पर्वो की
रचना की। उसके पश्चात् एर्रना प्रग्गडा ने अरण्य-पर्व का अधूरा अंश पूरा किया । इस
तरह महाभारत की रचना तीन कवियो के द्वारा लगभग तीन सौ वर्षो में पूरी हुई ।
इन तीन महाकवियो को 'कवित्रय' कहते हैं । आन्ध्र-महाभारत तेलुगु-भाषाभाषियो के
लिए एक साथ, धर्मशास्त्र, नीति-ग्रन्थ, पुराण तथा महाकाव्य हैं। उसका प्रभाव तेलुगु-
जन-जीवन पर अक्षुण्ण हैं ।
इसी युग में रामायण की रचना भी हुई । गोनबुद्धराजु ने देशज छन्द 'द्विपदा'
में रामायण की रचना की, जो साधारण जनता के बीच अत्यंत प्रिय हुई, जिसका
हिन्दी-अनुवाद उपस्थित है। 'भास्कर रामायण' की रचना भी इसी युग में हुई,
किन्तु वह केवल पंडितों के बीच समादृत हुई । महाभारत तथा रामायण के
अलावा इस युग में शैव काव्यो की रचना अत्यधिक मात्रा में हुई । नन्नेचोड़ कवि कृत
'कुमारसम्भव', पालकुरिकि सोमनाथ-कृत 'वसवपुराणमु' तथा 'पंडिताराध्यचरित्र'
इस युग की श्रेष्ठतम शैवभक्तिपरक रचनाएं हैं, जो तेलुगु-साहित्य के उज्ज्वल आभूषणों की
भांति शोभायमान हैं। इस युग के एक और प्रसिद्ध कवि नाचन सोम हैं, जिनका 'उत्तर-
हरिवंश' एक बडी ही सुंदर कृति हैं।
श्रीनाथ-युग-- इस युग के प्रसिद्ध कवियो में श्रीनाथ तथा पोतना अग्रगण्य हैं।
श्रीनाथ राजदरबार के महाकवि तथा महापंडित थे । उन्होने कविता-शैली में क्रांतिकारी
परिवर्त्तन किया । उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं—'काशीखंडमु', 'शृंगारनैषधम्' तथा 'पलनाटि
चरित्रमु' । इनमें 'काशीखंडमु' और 'शृंगारनैषधम्' संस्कृत के काव्यो के अनुवाद हैं
और 'पलनाटिचरित्रमु' ऐतिहासिक वीर-काव्य हैं । श्रीनाथ के अनुवाद की शैली भी
निराली हैं । मूल ग्रन्थ को आधार मानते हुए, उसके समस्त काव्य-सौंदर्य को तेलुगु की
मुहावरेदार भाषा में मूर्त्तिमान् करने की उनकी क्षमता अद्भुत हैं। उनके समकालीन कवि
पोतना, तेलुगु-भाषाभाषियों के हृदय-पीठ पर सर्वदा विराजमान रहेंगे। उनकी उत्कृष्ट
रचना 'आन्ध्र-महाभागवत' हैं, जिसका प्रचार गरीब की झोपड़ी से अमीरो के
महलो तक में है । पोतना राम के भक्त थे, किन्तु उन्होने कृष्ण-प्रधान काव्य की रचना की ।
उनकी भक्ति विलक्षण थी । राम-कृष्ण, शिव-केशव में उन्होने कोई भेद नहीं किया।
उनकी भागवत के कुछ भाग, जैसे प्रह्लाद-चरित्र, गजेन्द्रमोक्ष तथा कृष्ण-लीलाएँ आदि
तेलुगु-प्रदेश में इतने प्रसिद्ध हैं कि लोग उन्हें जबानी याद करके समय-समय पर भक्ति-
भाव से गाते रहते हैं ।
प्रबन्ध-युग --यह युग तेलुगु-साहित्य का स्वर्ण-युग माना जाता है। विजयनगर-
साम्राज्य के विख्यात राजा श्रीकृष्णदेवराय का प्राश्रय पाकर तेलुगु-साहित्य ने अभूतपूर्व
उन्नति की। श्रीकृष्णदेवराय स्वयं भी कवि थे और उन्होंने 'आमुक्तमाल्यदा' नामक
एक प्रौढ काव्य की रचना की थी। उनके दरबार में आठ महाकवि थे, जो 'अष्टदिग्गज'
के नाम से प्रख्यात थे। इस युग में कई प्रबंध-काव्यो की रचना हुई । तेलुगु में प्रबंध-
काव्य की एक विलक्षण परिभाषा प्रचलित है । किसी पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा
काल्पनिक प्रेमाख्यान को आश्रित कर आवश्यकता तथा औचित्य की दृष्टि से उसे घटा-बढ़ाकर
अपनी प्रतिभा एवं कला-कौशल के अनुसार तेलुगु की मुहावरेदार भाषा में, तेलुगु-जन-
जीवन को प्रतिबिंबित करते हुए जिस कला-कृति का निर्माण कवि करता है, उसे प्रबंध-
काव्य कहते हैं। ऐसे प्रबंध-काव्यो में अल्लसानि पेद्दना का 'मनुचरित्र', तिम्पना का
'पारिजातापहरण' तथा रामराजभूषण का 'वसुचरित्र' अत्यत प्रसिद्ध है । धूर्जटि कवि का
'कालहस्तीश्वरशतक' और तेनालि रामकृष्ण का 'पांडुरंगमाहात्म्यम्' इस युग के भक्ति-परक
महाकाव्य है। इस युग के उत्तरार्द्ध में पिंगलि सूरना ने 'फलापूर्णोदयमु' नामक एक मौलिक
प्रबंधन्काव्य की रचना की, जो वस्तु, भाव एवं कला की दृष्टि से बेजोड है। उन्होने
'राघवपांडवीयम्' नामक एक द्वयर्थी काव्य लिखा, जो अपने ढंग का प्रथम काव्य है।
इसको अपना आदर्श मानकर आगे कई कवियो ने तीन-तीन, चार-चार अर्थवाले
काव्योकी रचना की।
दक्षिणांध्र-युग-विजयनगर-साम्राज्य के पतन के पश्चात् आन्ध्र-साम्राज्य दक्षिण
म तंजाऊर और मदुरै में प्रस्फुटित हुआ । वहां के प्रायः राजा स्वय विद्वान् होते थे
और विद्वानो तथा कवियो का बहुत आदर करते थे। उनका आश्रय प्राप्त करके कई तेलुगु-
कवि तेलुगु-साहित्य-मंदिर को अपनी सरस कृतियो से सजाने लगे। इस युग की कविता
भी प्रबंध-शैली को ही अपनाकर चली, किन्तु समय के साथ-साथ उसकी भाव-प्रवणता
में शिथिलता आती गई । भाव-सौंदर्य की अपेक्षा पांडित्य-प्रदर्शन एवं आश्रयदाता
की अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा को ही कवि अधिक महत्त्व देने लगे । फिर भी, इस
युग में कई सुंदर काव्यो की रचना हुई, जिनमें ककटि पापराजू-कृत 'उत्तर-
रामायण', चेमकूरि वेंकट कवि-कृत 'विजयविलासम्', कवयित्री मोल्ला द्वारा विरचित
'रामायण' तथा कवयित्री मुद्ददु पलनी कृत 'राधिका स्वातनमु' आदि अत्यत
प्रसिद्ध हैं ।
आधुनिक काल के साहित्य का परिचय देने के पहले तेलुगु-साहित्य की एक
और प्रवृत्ति का उल्लेख कर देना आवश्यक है । तेलुगु की प्रबंध-काव्य-धारा के साथ ही
'मुक्तक-काव्य-धारा का भी विकास समानांतर में होता रहा । मुक्तक-साहित्य के
अतर्गत शतक, गीत, सकीर्त्तन तथा यक्षगान आदि आते हैं । तेलुगु में लगभग एक
हजार शतक हैं, जिनमें बहुत-से प्रकाशित हो चुके हैं। तेलुगु-साहित्य में इन शतको का
महत्त्वपूर्ण स्थान है । इनमें बहुत-से शतक भक्तिपरक हैं, कुछ नीति-बोधक हैं और
कुछ शृङ्गार-रस से भरे हैं। इनकी कविता उच्चकोटि की है। इसके अलावा समय-समय
पर भक्तो के द्वारा रचे हुए पद तथा संकीर्त्तन साहित्य तथा संगीत की दृष्टि से अद्वितीय हैं ।
अन्नमय्या, त्यागय्या और क्षेत्रय्या, ये तेलुगु के तीन भक्त-कवि हैं, जिन्होने भक्ति के उन्मेष में
( १० )
कितने ही मधुर गीतो का गान किया है। त्यागय्या (त्यागराज) तमिलनाड के तिरुवाड़ी
नामक स्थान में हुए थे । उनके कीर्त्तन सारे दक्षिण में गाये जाते हैं।
आधुनिक युग--आधुनिक युग में तेलुगु-गद्य की अच्छी उन्नति हुई। गद्य की
विभिन्न प्रवृत्तियो को प्रारभ करके गद्य का विकास करने का श्रेय स्व० श्रीवीरेशलिंगम्
पंतुलु को है । उन्होंने स्वयं कितने ही निबंध, नाटक, प्रहसन तथा उपन्यास आदि लिखे और
दूसरे लेखको को लिखने की प्रेरणा दी। आधुनिक तेलुगु-साहित्य में उनका वही स्थान है, जो
हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का है। इस युग के प्रारम्भ में कई ऐसी संस्थाओ की स्थापना हुई,
जो गद्य-साहित्य के निर्माताओ को प्रोत्साहन देती थीं। चिलकमर्त्ति लक्ष्मीनरसिंहम्, पानुगंटि
नरसिंहराव, गुरजाड़ अप्पाराव उन प्रारंभिक लेखको में से हैं, जिन्होंने गद्य-साहित्य के निर्माण
में अथक परिश्रम किया था । इसी समय व्यावहारिक भाषा को साहित्य-रचना के लिए प्रयोग
करने के प्रश्न पर जबरदस्त आंदोलन शुरू हुआ। कई युवा-लेखको तथा पत्र-पत्रिकाओ ने
इस आंदोलन का समर्थन किया । इस आंदोलन के फलस्वरूप बहुत बड़ी संख्या में गद्य-लेखक
निकल आये, जो आजतक गद्य-साहित्य की सर्वतोमुखी उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हैं ।
कविता के क्षेत्र में भी तेलुगु-साहित्य भारत की अन्यान्य भाषाओ की साहित्यिक
प्रगति के साथ कदम-ब-कदम आगे बढ़ रहा है। अँगरेजी साहित्य का अध्ययन, स्वतंत्रता-
आंदोलन, वर्त्तमान जीवन का संघर्ष और व्यक्ति-स्वातंत्र्यवाद ने इस युग के कवियो को एक
नई दृष्टि प्रदान की तथा उसका प्रभाव उनकी कविताओ में लक्षित होने लगा । छाया-
वाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की जैसी कविताएँ हिन्दी-साहित्य में पाई
जाती है, वैसी रचनाएँ तेलुगु में भी है। भेद इतना ही है कि तेलुगु में उनके नाम भिन्न-
भिन्न हैं--जैसे भाव-कविता, अतिवास्तविक कविता, अभ्युदय-कविता आदि। वर्त्तमान समाज में
पाई जानेवाली आर्थिक असमानता, संघर्षमय जीवन, प्राचीन रूढियो तथा परंपराओं के प्रति
विद्रोह तथा समस्त मानव-जाति के कल्याण का आग्रह आज की कविताओ में दिखाई पड़ते हैं।
[ २ ]
रामायण, महाभारत एवं भागवतपुराण भारत की सांस्कृतिक एकता को सुरक्षित
रखनेवाले महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। राम और कृष्ण भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं । वस्तुतः,
आसेतुहिमाचल इन अलौकिक महापुरुषो की पूजा होती है और प्रत्येक भारतीय भाषा
के कवि इनके जीवन-वृत्तो का गान करने में ही अपने कवि-कर्म की सफलता मानते आये हैं।
रामायण की कथा नित्य नवीन है । हम अपनी बाल्यावस्था से ही न जाने
कितनी वार और कितने लोगो के द्वारा इस कथा को सुनते तथा स्वयं पढ़ते रहे हैं,
फिर भी जब-जब इसे सुनने या पढ़ने का अवसर मिलता है, तब-तब हम में नवोत्साह
जागरित हो उठता है । यही इस कथा की महत्ता है । वाल्मीकि-रामायण में चतुरानन के
मुंह से निकले हुए निम्नलिखित शब्द अक्षरशः सत्य प्रमाणित होते हैं -
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले ।
तावत् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥
( ११ )
तेलुगु भाषा में रामकथा-संबंधी कितने ही काव्य हैं । ये काव्य प्राय दो रूपों
में मिलते हैं--प्रबंध-काव्य तथा मुक्तक-गीत । प्रबंध के रूप में प्राप्त होनेवाले काव्यों
में अधिकतर काव्य वाल्मीकि-रामायण के सरस अनुवाद-मात्र हैं । 'रंगनाथ रामायण'
तथा 'मोल्ल रामायण' ही दो ऐसे प्रबंध-काव्य हैं, जो स्वतंत्र रचना कहे जा सकते हैं
इन दोनों की कथा यद्यपि प्रधानतया वाल्मीकि-रामायण को आधार मानकर चली है,
तथापि काव्य-रचना के लक्ष्य में, कथा-वस्तु के विधान में वर्णनों में, तथा चरित्र-
चित्रण में नवीनता है । इन दोनों में 'मोल्ल रामायण' आकार में छोटी है । 'रंगनाथ
रामायण' ही आंध्र-देश में अधिक लोकप्रिय है । इसके रचना-काल तक जनता में
प्रचलित रामकथा-संबंधी कई ऐसे प्रसंग इस रामायण में मिलते हैं, जो वाल्मीकि-
रामायण में नहीं मिलते । अबतक रामकथा-संबंधी जितने प्रबंध-काव्य उपलब्ध हुए,
उनमें यही सब से प्राचीन काव्य है ।
'रंगनाथ रामायण' संबंधी चर्चा प्रारंभ करने के पहले हम एक विषय स्पष्ट कर
देना आवश्यक समझते हैं । जिस प्रकार तुलसी-रामायण उत्तर-भारत के लोक-जीवन के
पोर-पोर में व्याप्त होकर, उसके पारिवारिक सामाजिक, राजनीतिक एव सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकी, उसी प्रकार और उसी मात्रा में तेलुगु-भाषाभाषियों के
जीवन को तेलुगु-रामायण प्रभावित नहीं कर सकी । आंध्र-जनता के बीच वह कार्य
आंध्र-महाभारत तथा आंध्र-महाभागवत ने किया । इन दोनों ग्रन्थों ने तेलुगु-प्रदेश में
लोक-जीवन को प्रभावित ही नहीं, बल्कि अनुप्राणित भी किया है । तुलसी-रामायण
हिन्दी-भाषाभाषियों के लिए एक साथ धर्म-ग्रन्थ, पुराण, नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र तथा
लोक-जीवन का पथ-प्रदर्शक है । तेलुगु-प्रदेश में वह स्थान तेलुगु-रामायण को नहीं,
बल्कि तेलुगु-भागवत को प्राप्त है । तेलुगु-भाषाभाषियों के लिए 'आंध्र-महाभारत'
एक साथ धर्मशास्त्र, वेदान्त-ग्रन्थ, नीति-ग्रन्थ, महाकाव्य और इतिहास हैं ।
परन्तु, फिर भी राम की कथा, जो परंपरा से जनता के बीच लोक-कथाओं
तथा लोक-गीतों के रूप में प्रचलित थी, अपना अक्षुण्ण प्रभाव लोगों के जीवन पर
डालती रही । आंध्र-देश में समय-समय पर कई ऐसे भक्त हुए, जिन्होंने अपने भक्ति-रस
पूर्ण गीतों एव भजनों के द्वारा राम-भक्ति का ऐसा प्रचार लोगों में किया कि श्रीराम
आंध्रों के इष्टदेव-से हो गये । आंध्र-प्रदेश में विरला ही ऐसा कोई गांव होगा, जहाँ
श्रीराम का मंदिर न मिलता हो । तेलुगु-भाषाभाषियों में रामय्या, रामन्ना, रामराव,
रामचन्द्र राव, सीतय्या, लक्ष्मण्ना आदि नामों की तो गिनती ही नहीं है ।
किन्तु, प्रश्न यह है कि तुलसी-रामायण के समान सर्वव्यापक तथा प्रभावशाली
राम-काव्य तेलुगु में क्यो नहीं लिखा जा सका ? ऐसी बात नहीं कि तेलुगु-प्रदेश में
इसके लिए आवश्यक प्रतिभा का अभाव था । यदि ऐसी बात होती, तो महाभारत एव
भागवत जैसे प्रौढ एव सरस महाकाव्यों की रचना ही तेलुगु में नही होती । अतः इसका
कारण जानने के लिए हमें इतिहास का आश्रय लेना पड़ेगा ।
यह सर्वविदित है कि भगवान् बुद्ध की धार्मिक क्रान्ति से वैदिक धर्म को बड़ा
भारी धक्का लगा । बौद्धधर्म कई शताब्दियों तक उत्तर-भारत के राजाओं के द्वार
( १२ )
सन्नाहूत रहा । उत्तर-भारत क कुछ राजाओ न जैनधर्म को भी अपनाया था । धीरे-
धीरे इन दोनो धर्मों न अपनी विजय-यात्रा सदूर दक्षिण तक बढ़ाई । दक्षिणापथ के
कई राजाओ ने इस धर्म क आगे अपने घुटने टेक दिये। आंध्र-राजाओ में सबसे प्रथम
शातवाहन थे, जिन्होने वैदिक धर्म के अनुयायी होते हुए भी बौद्ध तथा जैन धर्मों का
आदर किया । इन्हीं शातवाहनो के सामंत इक्ष्वाकु-वंश के राजा ( ई० पू० २०० )
बौद्धधर्म के अनुयायी बने । इन्होने बौद्ध तथा जैन धर्मों को बहुत आदर दिया और
वैदिक' धर्म के प्रभाव को नष्ट करने का भी यथाशक्ति प्रयत्न किया । इस प्रकार, दक्षिण
भारत में वैदिक, बौद्ध एवं जैन धर्मों के बीच कई शताब्दियो तक संघर्ष चलता रहा ।
बीच-बीच में ऐम आंध्र-राजा भी हुए, जिन्होने वैदिक धर्म को प्रोत्साहन दिया और बौद्ध
तथा जैन धर्मों को समूल नष्ट करने का प्रयत्न किया ।
सन् ८२५ ई० में शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ । उन्होने बौद्धधर्म के प्रचार
को रोकने तथा वैदिक धर्म को पुन. प्रतिष्ठापित करने का जो प्रयत्न किया, उससे
आंध्र-प्रदेश के वैदिक धर्मावलंवियो को आंध्र-देश से बौद्धधर्म को समूल उखाड़ फेंकने
की प्रेरणा मिली। उन्होने कई मोर्चों पर बौद्धधर्म का विरोध किया । बौद्धधर्मावलंवियो
को तरह-तरह की यातनाएँ दी गई और कई ऐसे ग्रन्थो के निर्माण का प्रयत्न हुआ,
जिनके द्वारा वैदिक धर्म तथा उनके समर्थक पुराणो की प्रतिष्ठा बढ़ी। वातावरण भी
इसके लिए अनुकूल था । उसी समय तमिल-देश में अनेक वैष्णव तथा शैव संतो का
आविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी सरस एवं सबल रचनाओ से बौद्ध तथा जैन धर्मों का
विरोध आरंभ किया । उसी युग में आंध्र में राजराज नरेन्द्र नामक एक विख्यात राजा हुए
जो वैदिक धर्म के अनन्य अनुयायी थे। इन महापुरुषो का प्रोत्साहन पाकर तेलुगु-साहित्य
में पुराण-युग प्रारंभ हुआ, जिसमें प्रधानतया पुराणो और इतिहासो का अनुवाद-कार्य हुआ ।
इन ग्रन्थों की रचना करने में कवियो का उद्देश्य यही था कि उनके द्वारा भगवान्
के उस लोकरंजनकारी रूप की अभिव्यक्ति की जाय, जिसको आलंबन मानकर मानव-
हृदय वैदिक धर्म के कल्याण-मार्ग की ओर अपने आप आकृष्ट हो सके । लगभग
सन् १०२५ ई० में कवि नन्नया ने महाभारत का अनुवाद प्रारंभ किया, किन्तु वे महा-
भारत के केवल ढाई पर्व-मात्र की रचना कर पाये थे कि उनका स्वर्गवास हो गया।
इसके पश्चात् तेलगू-रामायण (रंगनाथ रामायण) की रचना हुई ।
तेलुगु में रामायण की रचना को प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियां तुलसी-रामायण
की रचना के लिए प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियो से भिन्न थीं। रंगनाथ रामायण का उद्देश्य
वैदिक धर्म की प्रतिष्ठा को बढ़ाना तथा रामचन्द्र जैसे अलौकिक शक्तिशाली एवं सौदर्य-
संपन्न व्यक्ति तथा अवतार-पुरुष के भव्य चरित्र को प्रस्तुत करना था, जिसकी अनुभूति-
मात्र से मानव-हृदय गद्गद हो उठे। या यों कह सकते हैं कि रंगनाथ रामायण उस
व्यापक पृष्ठभूमि को तैयार करने में सफल हुई, जो पीछे चलकर राम के प्रति भक्ति-
भावना को जन्म देने के लिए आवश्यक थी। भक्ति का प्रादुर्भाव अचानक नहीं होता । अनंत
सौंदर्य, शक्ति और शील से संपन्न चरित्र के प्रत्यक्षीकरण से व्यक्ति का हृदय पहले
( १३ )
आश्चर्य से भर जाता है और धीरे-धीरे वह उस शक्ति-सपन्न व्यक्ति के महत्त्व की
अनुभूति करने लगता है । उसके उपरात उसकी प्रशसा करने की इच्छा सहज ही उसके
मन में जागरित होती है । महान् व्यक्ति की प्रशसा करने की यह इच्छा ही भक्ति की
पहली सीढ़ी है । रंगनाथ रामायण के प्रतिभावान् रचयिता ने अपनी रचना के द्वारा
यही कार्य संपन्न किया ।
रंगनाथ रामायण वाल्मीकिरामायण का मात्र अनुवाद नहीं है । स्थूल रूप से
वाल्मीकिरामायण की कथा इसमें आ तो गई है, किन्तु उसके कवि ने बीच-बीच में
ऐसे प्रसंग भी जोड़े हैं, जो कदाचित् उस समय तक जनता के बीच लोक-कथाओ के रूप
में प्रचलित हो चुके थे । हम नीचे ऐसे कुछ प्रसगो का उल्लेख करेंगे, जो वाल्मीकि-
रामायण में नहीं मिलते, यद्यपि उनमें से कुछ प्रसंग जैनग्रन्थो में मिलते हैं । कदाचित्
कवि ने वहीं से इन प्रसगो को लेकर अपनी रामायण में सम्मिलित कर दिया हो
१. जंबुमाली का वृत्तात, २. रावण से तिरस्कृत हो विभीषण का अपनी माता के
पास जाना, ३ कैकेसी (रावण की माता) का रावण को हितोपदेश, ४. रावण का राम की
धनुर्विद्या-कुशलता की प्रशसा करना, ५. गिलहरी की भक्ति, ६. नागपाश में बद्ध होकर
राम-लक्ष्मण के पास नारदजी का आना, ७. रावण के आगे मदोदरी का राम की महिमा
एवं शौर्य की प्रशसा करना, ८. दूसरी बार सजीवनी लाते समय हनुमान् तथा माल्यवान्
का युद्ध, ६. कालनेमि का वृत्तात, १०. सुलोचना का वृत्तात, ११. शुक्राचार्य के आगे रावण
का दुखड़ा रोना, १२. रावण का पाताल-होम, १३. अंगद का रावण के समक्ष
मदोदरी को बुला लाना, १४. रावण की नाभि में स्थित अमृत-कलश को
सोखने के निमित्त आग्नेयास्त्र का प्रयोग करने की विभीषण की सलाह,
१५ लक्ष्मण की हँसी ।
उक्त प्रसंगों में जंबुमाली का वृत्तांत, कालनेमि का वृत्तात, रावण के समक्ष अंगद
का मंदोदरी को घसीटकर लाना, आग्नेयास्त्र का प्रयोग करने की विभीषण की सलाह
आदि ऐसे हैं, जो मूलकथा की घटनाओ को अधिक तर्क-सगत सिद्ध करने के निमित्त
जोड़े हुए प्रतीत होते हैं। रावण से तिरस्कृत होकर विभीषण का अपनी माता के पास
जाना, कैकेसी का हितोपदेश और सुलोचना का वृत्तात आदि रावण के परिवार के लोगो
के चरित्र पर प्रकाश डालने के साथ ही साथ इस ओर भी इगित करते हैं कि रावण
भूत-प्रेतो का वशज एव भूत-प्रेतो का राजा नहीं था, किन्तु एक विलक्षण परिवार में
उत्पन्न हुआ विशिष्ट व्यक्ति था । रावण का, राम की धनुर्विद्या की कुशलता की प्रशसा
करना, मंदोदरी का रावण के समक्ष श्रीराम की महिमा एव पराक्रम की प्रशंसा करना,
गिलहरी का वृत्तात आदि प्रसंग राम के उस लोकोत्तर व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हैं,
जो शत्रुओ की भी प्रशंसा प्राप्त करने की क्षमता रखता था । साथ ही साथ, वे रावण
तथा मंदोदरी के चरित्र पर भी प्रकाश डालते हैं । उक्त प्रसगो के अलावा इस रामायण
में यत्र-तत्र ऐसे वर्णन भी मिलते हैं, जो वाल्मीकिरामायण में नहीं मिलते, किन्तु जिन्हें
कवि ने वैदिक धर्म में लोगो की निष्ठा बढाने के निमित्त जोडा है ।
पात्रों का चित्रण-पात्र-चित्रण की दृष्टि से रंगनाथ रामायण विशेष महत्त्व रखती है ।
जैसा हमने पहले ही निवेदन किया है, रंगनाथ रामायण में श्रीराम के महिमा-समन्वित शक्ति,
शील तथा सौंदर्य से परिपूर्ण चरित्र को प्रस्तुत करने का अधिक प्रयत्न हुआ है । इस रामायण
के नायक राम जहां एक धीरोदात्त वीर तथा सर्वगुणसंपन्न व्यक्ति थे, वहां इस काव्य
का खलनायक रावण भी उदार, वीर, साहसी, असमान पराक्रमी, राजनीतिकुशल, स्वाभि-
मानी एवं शिवजी का अनन्य भक्त भी था । किन्तु, उसके दोष भी उसके गुणोसे
कम नहीं थे । वह कामुक, अभिमानी तथा उद्धत था । इसलिए, इस रामायण के कवि ने
रावण के चरित्र का चित्रण करने में अपनी अद्वितीय प्रतिभा एव सहृदयता का
परिचय दिया है । उन्होंने एक कलाकार तथा इतिहास-लेखक—इन दोनो के उत्तर-
दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया है । जहाँ उन्होंने रावण के कृष्ण पक्ष की निंदा की है
वहाँ उसके उज्ज्वल पक्ष को प्रकट करने की उदारता भी दिखाई है । उनकी दृष्टि
में रावण एक विलक्षण वीर था, जिसमें जड़-चेतन तथा गुण-दोषो का अद्भुत
सम्मिश्रण था। उसका पतन इसलिए हुआ था कि जड़ ने चैतन्य पर पूरा-पूरा अधिकार
प्राप्त कर लिया था । कदाचित् यह रामायण के प्रति द्राविड़ दृष्टि का प्रमाण भी हो ।
द्राविड़ लोग रावण को उसी दृष्टि से नहीं देखते, जिस दृष्टि से आर्यों ने उसे देखा और
राक्षस, निशाचर आदि नामो से संबोधित किया । द्रविड़ दृष्टि में रावण भी एक वीर,
विद्वान्, पराक्रमी मनुष्य ही था, किन्तु उसके गुणो पर दुर्गुणो ने विजय प्राप्त कर ली थी
और यही उसके सर्वनाश का कारण हुआ । इसके अतिरिक्त, कला की दृष्टि से
देखा जाय, तो हमें यह मानना पड़ेगा कि रामचन्द्रजी का प्रतिद्वन्द्वी केवल एक लपट
तथा नीच व्यक्ति नहीं हो सकता था । रावण को अपने बल-पौरुष का जहाँ अभिमान है,
वहां उसके हृदय में अपने शत्रु के गुणो के प्रति आदर भी है । वह राम के बल-
विक्रम पर आश्चर्य ही प्रकट नहीं करता, वल्कि उनकी प्रशंसा भी करने लगता है। श्रीराम
की धनुर्विद्या की निपुणता देखकर रावण कहता है—
नल्लवो रघुराम नयनाभिराम, विल्लविद्या गुरुव, वीरावतार ।
वापुरे, राम भूपाल, लोकमुल नीपाटि विलुकाडु नेर्चुने कलग ?
(हे नीलमेघश्याम, नयनाभिराम, धनुर्विद्या-निपुण, वीरावतार, रघुराम,
हे राजा राम, इस संसार में तुम्हारे समान धनुर्धर और कोई हो सकता है ?)
रावण की इस प्रशंसापूर्ण शब्दो को सुनकर रावण के मत्री रावण से कहते हैं
कि आपका इस प्रकार शत्रु की प्रशंसा करना आपको शोभा नहीं देता । तब रावण
कहता है--
विल्लुविद्या पेंपुनु, विक्रम क्रममु, गलितनवुनु, बाहुगर्व राजसमु,
लादियो गुणमुल नधिकुडैनहि, कोदंडदीक्षा गुरुनितो राज
वरुनितो, रामभूवरुनितो नोरुलु पकिचि चूड नेपट्टुन नैन,
साटिये इम्भूडु जगमुलयदु ? मेटि शूरुल पंषु पेच्चंग वलदे ?
( १५ )
(धनुर्विद्या-नैपुण्य, पराक्रम, शौर्य, बाहुबल आदि गुणो में श्रेष्ठ राजा राम की समता
करनेवाला तीनो लोको में कौन है ? क्या महान् पराक्रमी व्यक्तित्वयो की महानता की प्रशसा नहीं
करनी चाहिए ?
रावण के इन शब्दो से कवि दो उद्देश्यो की पूर्ति करना चाहते हैं। रावण के ये
वचन जहाँ एक ओर उसकी उदारता प्रकट करते हैं वहाँ वे शत्रु के द्वारा भी
प्रशसा प्राप्त करनेवाले श्रीराम के असाधारण एवं अलौकिक व्यक्तित्व पर भी प्रकाश
डालते हैं ।
यही नहीं, रावण अच्छी तरह जानता था कि श्रीराम विष्णु के अपर रूप हैं
और उनके हाथो मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है । इसलिए, वह सोचता है कि युद्ध
के लिए ललकारनेवाले शत्रु के सामने घुटने टेककर में अपनी दीनता क्यो प्रकट
करूँ और अपनी वीरता को क्यो कलंकित करूँ । जब मंदोदरी राम की महिमा
का वर्णन करके रावण को युद्ध करने से रोकने का प्रयत्न करती हैं, तो रावण
कहता है-
ये नेल्लभगुल ఁनिक राघवुल बोनीक चपुदु; भूमिज नीय
वारुठ बलुडनै, यटु गाक येनु श्रीरामु शरमुलचे जत्तुनेनि
नाकवासुलु मेच्च ना कोरुचुन्न वेंकुंठ मेदुरागवच्चु निच्चटिकि
ललन नीवेटिकि ? लक येमिटिकि ? दलकोन्नु मुक्ति सत्पथमु गेकोडु ।
(अब मैं किसी भी प्रकार राघवो का वध करूँगा ही; मैं सीता को नहीं दूंगा। यदि
इसके विपरीत मैं श्रीराम के शरो से ही मारा जाऊँगा, तो मेरा चिर अभिलषित
स्वर्ग मेरे पास स्वयं आ जायगा और स्वर्ग के निवासी मेरी प्रशसा करेंगे । जब मैं
मुक्तिपथ को प्राप्त करने जा रहा हूँ, तब हे सुन्दरी ! मुझे न तुम्हारी आवश्यकता है न
लका की ।)
वाल्मीकिरामायण में सुलोचना का वृत्तात नहीं मिलता है । तुलसी-रामायण
की कुछ प्रतियो में इस कथा का बडा सरस वर्णन मिलता है। किन्तु पडितो का विचार है
कि तुलसी-रामायण का यह अंश प्रक्षिप्त है । रंगनाथ रामायण में इस महान् साध्वी
के चरित्र का अत्युत्तम चित्रण मिलता है । बँगला-कवि माइकेल मधुसूदन ने अपनी रचना
'मेघनाद-वध' में सुलोचना के चरित्र को विशेष प्रधानता दी है और उस वीर एव
सती-साध्वी स्त्री का एक भव्य चरित्र उपस्थित किया है । इन्द्रजीत की मृत्यु के उपरात
उसकी वीर पत्नी सुलोचना अपने पति के मृत शरीर के साथ सती होना चाहती है ।
अतः, वह अपने ससुर रावण से इन्द्रजीत के मृत शरीर को मँगा देने की प्रार्थना करती है ।
किन्तु, रावण अपनी असमर्थता प्रकट करता है; क्योकि इन्द्रजीत का शव शत्रुओ के अधीन
में था । तब सुलोचना अपने पति का मृत शरीर प्राप्त करने के हेतु स्वयं साहस के साथ
शत्रु-शिविर में चली जाती है। वहाँ पहुँचकर वह पहले रामचन्द्रजी से पति-भिक्षा देने
की प्रार्थना करती है । उसके साहस पति-भक्ति एवं निर्मल चरित्र से प्रभावित होकर
रामचन्द्र उसकी प्रार्थना स्वीकार करने को प्रस्तुत-से होते दीखते हैं । तब हनुमान् उन्हें
( १६ )
समझाते हैं कि ब्रह्मा का लेख झूठा नहीं होने देना चाहिए। इस पर रामचन्द्र सुलोचना
को आश्वासन देते हैं कि अगले जन्म में तुम अपने पति के साथ चिरकाल तक सुखमय
जीवन व्यतीत करने के उपरांत वैकुंठ-धाम प्राप्त करोगी। इसके पश्चात् सुलोचना राम से
अपने पति का शरीर माँगती हैं । तब सुग्रीव उसे ताना देते हुए कहता है—'यदि तुम
पतिव्रता हो, तो अपने मृत पति से वार्तालाप करो।' सुलोचना इस चुनौती को स्वीकार
करती हैं और युद्ध-भूमि में पड़े हुए अपने पति के शव के पास जाकर बड़े ओजपूर्ण
शब्दों में कहती हैं—'यदि मैं मन, वचन, कर्म से अपने पति की सच्ची भक्ति करती हूँ,
तो मेरे पति सजीव होकर मुझसे वार्तालाप करें।' तब मेघनाद का शव आँखें खोलकर
कहता है—'हे प्रिये ! मेरे पिता ने ही मुझे मारा है। नहीं तो और किसकी ऐसी शक्ति थी
कि मुझे मार सके, काल की गति प्रबल है। इसलिए चिन्ता मत करो।' इतना
कहकर इन्द्रजीत की आँखें सदा के लिए बंद हो जाती हैं। इसके पश्चात् सती सुलोचना
अपने पति के शव को साथ लेकर जाती हैं और उसके साथ सती होकर देवलोक में
पहुँच जाती हैं।
कला-पक्ष--कला की दृष्टि से भी रंगनाथ रामायण उच्च कोटि का महाकाव्य है।
कला के उत्कृष्ट चमत्कार इसके प्रत्येक पृष्ठ में दृष्टिगोचर होते हैं। कवि संस्कृत के
काव्य-शास्त्र के निष्णात विद्वान् होने के कारण उक्ति-वैचित्र्य एव अर्थगौरव, इन दोनो
का उचित अनुपात बनाये रखने में सर्वथा सफल हुए हैं। उनकी कला-साधना में पग-पग
पर उनका हाथ बँटानेवाले अनुप्रास एवं यमक अलंकारों की छटा कवि के अगाध
पांडित्य एवं भाषा पर उनके विलक्षण अधिकार का प्रमाण प्रस्तुत करती है। भावों की
मार्मिक अभिव्यंजना के लिए प्रयुक्त अर्थालंकार इतने स्वाभाविक हैं कि हम कवि की
औचित्य-प्रियता पर मुग्ध हो जाते हैं। रंगनाथ रामायण की भाषा विलक्षण माधुर्य एवं
गंभीरता से परिपूर्ण है । तेलुगु की साहित्यिक भाषा के जिन दो रूपों की चर्चा पहले की
गई है, उन दोनो रूपों का सुन्दर सम्मेलन इस काव्य में हो गया है। कवि
का तेलुगु एवं संस्कृत दोनो भाषाओ पर पूरा-पूरा अधिकार था और दोनो भाषाओ के
शब्द-भांडार उनको आदेश का पालन के लिए सर्वथा प्रस्तुत रहते दिखाई देते हैं।
कवि ने तेलुगु की सजीव एवं मधुर मुहावरेदार भाषा के साथ संस्कृत-शब्दो का
ऐसा सुन्दर मेल कराया है कि भाषा में मणि-कांचन-योग की-सी शोभा आ गई है।
इसकी भाषा का एक नमूना नीचे दिया जाता है—
राज-तिलक चेतोविनिर्मलशिष्ट विशिष्ट, गौतम जावालिकश्यप वामदेवाहुलो
वरमुनीश्वरुल नामादि बहुवेद चतुर वोवकुल भरतुडु रप्पिचि भय भुक्तु लोप्प, परम सम्मद
वचोभंगुलु, मेरय 'श्री रामुनकु पट्टाभिषेकंबु सेयुडारूढ नियतितो' ननि पलुक वारु पूनि
मंगल तूर्य मुलु मोयुचुंड, जानकी रामुल चडुरोप्प तेच्चि रमणीयतरमैन रत्नपीठमुन, कोडरोप्प
निरुवुर कूर्चुंड बनि चि मानित वेदोक्त मंत्र पूर्वकमुग अभिषेकंवु करमथिचेय ना रामुनीदल
ना पूर्णवारि धार डग्गएनप्पुडु तग चूडनोप्पे गीर्वाण मुत्युलु कीर्तनल सेय पार्वती सहितुडै
प्रणुनिपनोप्पु अंगजहर मौलि नमल नैतोरुगु गंगा नदियु वोले कमनीय मगुचु ना तीर्थचरुलु
( १७ )
अंघ्रुल कोलिविकि भूतलंबुन निंडि पोलुपारे जूड हरिपाद मुन वृष्टि अय्यादि गंग
धरणि पै बरगुविधवच्चु पडग वरिकिप राम भूपालकुंड़पुडु हरुडुविष्णुवु, दानयनु
माड्रिकिनुंडे ।
(भरत ने निर्मलचेता एवं सदाचार-संपन्न वसिष्ठ, गौतम, जाबालि, कश्यप, गर्ग,
वामदेव आदि मुनीश्वरो को तथा चतुर्वेद-पारंगत विबुधो को बुलाकर विनय एव भक्ति
के साथ उनसे कहा--'आप कृपया विधिवत् श्रीराम का राजतिलक कीजिए ।' तब
मंगल-वाद्यो की ध्वनि के साथ वे जानकी तथा राम को बुला लाये और रमणीय रत्नपीठ
पर उन दोनो को आसीन कराया और वेदमंत्र-पूर्वक पुण्य सलिल से उनका अभिषेक
किया । राम के मस्तक पर से गिरनेवाली वह पुण्य जलधारा देखने में बहुत ही रमणीय
प्रतीत होती थी। देवताओ की स्तुतियो को प्राप्त करते हुए पार्वती के साथ विलसित
होनेवाले परमशिव की जटा से झरनेवाली गंगा नदी की भाँति वह जलधारा अत्यत
कमनीय दीख रही थी । वह (जलधारा) क्रमशः उनके चरणो से होकर पृथ्वी पर
ऐसे गिरने लगी, मानो विष्णु के चरणो में जन्म लेकर पवित्र गगा पृथ्वी पर उतर
रही हो। इस प्रकार, उस समय रामचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव की भाँति
शोभायमान हुए ।)
मुहावरों का सम्यक् प्रयोग, भावो के अनुकूल भाषा, स्वाभाविक अनुप्रासो की
छटा, उक्ति-सौंदर्य तथा ओज, प्रसाद एवं माधुर्य गुणों से युक्त शैली, ये सभी कवि के
विलक्षण पांडित्य तथा कवित्व-शक्ति का परिचय देते हैं।
वैसे तो अनुवाद का कार्य ही कुछ कठिन है; क्योकि कितना भी प्रयत्न किया जाय,
मूल की सुन्दरता अनुवाद में नहीं आ सकती । एक भाषा की श्रेष्ठ कलाकृति का दूसरी
भाषा के गद्य में सरस अनुवाद प्रस्तुत करना स्वभावत. कठिन कार्य है । तेलुगु और
हिन्दी दो भिन्न भाषा-परिवार की भाषाएँ हैं और उनके अपने-अपने मुहावरे हैं। मुहावरो
का अनुवाद तो हो नहीं सकता। हाँ, यह प्रयत्न अवश्य हो सकता है कि तेलुगु मुहावरे
का मिलता-जुलता हिन्दी-मुहावरा का उपयोग किया जाय। फिर भी, अनुवाद अनुवाद ही है।
अनुप्रास, यमक आदि अलकारो का सौंदर्य एवं उक्ति-वैचित्र्य आदि अनुवाद में लाना
कठिन है । उदाहरण के लिए--
तोगलु वेट्टितुमु दुष्टारि सतुल, तोगलु जानकि इक तोल पग
तोगलार ! इकभीव तोग येष्ट्रि दनुचु, तोगतेल्ल चिदिभि वैतु रु पेच्चु पेरिगि।
'तोग' के कई अर्थ हैं--दुख, कष्ट, धक्ल। यहाँ कवि ने यमक अलकार के
द्वारा 'तोग' शब्द के प्रयोग से भिन्न-भिन्न अर्थो की अभिव्यञ्जना की हैं; किन्तु यह सुन्दरता
अनुवाद में लाना असभव है ।
फिर भी, अनुवादक ने मूल के प्रति निष्ठा बरतते हुए यथा.सभव मूल रचना की
सुंदरता को अनुवाद में लाने की भरपूर चेष्टा की है। उसे कहाँतक सफलता मिली है,
इसका मूल्याकन करना सहृदय पाठको का काम है ।
( १८ )
मैं अंत में दक्षिण-भारत-हिन्दी-प्रचार-सभा के भूतपूर्व संयुक्त मंत्री परम आदरणीय
पडित अवधनंदनजी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ, जो इस ग्रन्थ के
संपादन का कार्य बडी दक्षता के साथ संपन्न करते हुए लगातार मेरी सहायता करते रहे।
में विहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् का भी आभार मानता हूँ, जिसने मुझे इस कार्य
के लिए योग्य समझकर मेरे द्वारा यह अनुवाद कराया । यदि यह ग्रन्थ हिन्दी-भाषा-
भाषियो को तेलुगु की विपुल साहित्य-संपत्ति का किंचित् भी आभास करा सकेगा, तो में
अपने परिश्रम को सफल मानूंगा ।
श्रीरामनावमी
ता० १६, शके १८८२ } ए० सी० कामाक्षि राव
५-४-१९६० ई०
विषयानुक्रमणी
परिचय १-३
प्रस्तावना ५-६५
बालकांड १-६९
१ देवस्तुति--३, २ ग्रन्थ-रचना का कारण--४, ३ कथा का प्रारम्भ--६,
४ कुश-लव का रामायण-गान--६, ५ पुत्रकामेष्टियज्ञ करने के लिए दशरथ का मन्त्रियो
से परामर्श--६, ६ ऋष्यशृंग का वृत्तान्त--१०, ७ वेश्याओ के साथ ऋष्यशृंग का
रोमपाद के घर आना--१२, ८ दशरथ का यज्ञदीक्षा लेना--१४, ९ रावण के अत्या-
चारो के बारे में ब्रह्मा से देवताओ की शिकायत--१४, १० देवताओ का विष्णु की
स्तुति करना--१५, ११ दशरथ को यज्ञपुरुष का पायस देना--१६, १२ देवताओ को
वानरो के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्मा की सलाह--१६, १३ श्रीराम आदि का
जन्म--१७, १४ श्रीरामादि का बचपन--१८, १५ विश्वामित्र का आगमन--१८,
१६ यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भेजने के लिए राजा से विश्वामित्र की प्रार्थना--१६,
१७ राम-लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए वसिष्ठ की सम्मति--२०,
१८ विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण को भेजना--२१, १६ अनगाश्रम का
वृत्तान्त--२१, २० विश्वामित्र का श्रीरामचन्द्र को ताडका का वृत्तान्त सुनाना--२२,
२१ ताडका का वध--२३, २२ विश्वामित्र का श्रीराम को भृशाश्व-सतान-रूपी शस्त्र
देना--२४, २३ कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तात सुनाना--२६, २४
विश्वामित्र का यज्ञ--२६, २५ कौशाबी का वृत्तात-२८, २६ गगा नदी का वृत्तात--३३,
२७ गगावतरण की कथा--३५, २८ अमृत-मथन की कथा--३६, २६ गौतम
के आश्रम का वृत्तात--४२, ३० मिथिला में आगमन--४३, ३१ विश्वामित्र की
शवित का परिचय--४४, ३२ शिव-धनुष का वृत्तात--५३, ३३ शिव-धनुर्भंग--५४,
३४ दशरथ का वशक्रम--५८, ३५ राजा जनक की वशावली--६०, ३६ सीता
और राम का विवाह--६३, ३७ परशुराम का गर्व-भग--६५, ३८ अयोध्या
में प्रवेश--६८ ।
अयोध्याकांड ७१-१२२
१ रामराज्याभिषेक का सकल्प--७३, २ मथरा की कुमत्रणा--७६, ३ कैकेयी
के महल में दशरथ का आगमन--७८, ४ दशरथ से कैकेयी का वर मांगना--८०,
( २० )
५ कैकेयी के भवन में राम का दशरथ से भेंट करना—८२, ६ कौसल्या का दुख—८४;
७ लक्ष्मण का क्रोध और राम का समझाना—८५, ८ राम का कौसल्या
को धैर्य देना—८७, ९ राम का अभिषेक-भंग का वृत्तांत सीता को सुनाना—८८;
१० राम का सीता तथा लक्ष्मण को भी साथ चलने की अनुमति देना—६०, ११ राम-
लक्ष्मण का सम्पत्ति-दान—६१, १२ त्रिजटाख्य को राम का गायो का दान देना—६१;
१३ सीता-लक्ष्मणसहित रामका दशरथ के दर्शनार्थ जाना—६२, १४ कैकेयी पर वसिष्ठ
का क्रोध—६५, १५ राम का दशरथ को सांत्वना देना—६६, १६ सीता को सीख
देना—६६, १७ राम का वन-गमन—६७, १८ गुह से राम की भेंट—१००, १९
राम का गगा पार करके वन में प्रवेश करना—१०२, २० काकासुर-वृत्तान्त—१०३,
२१ सुमंत्र का अयोध्या पहुँचना—१०३, २२ दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का
वृत्तांत सुनाना—१०४, २३ दशरथ का स्वर्गवास—१०८, २४ भरत का अयोध्या में
प्रवेश—११०, २५ भरत का कौसल्या के घर जाना—१११, २६ भरत का राम के
पास जाना—११३, २७ भरत का भरद्वाज के आश्रम में पहुँचना—११४, २८ भरत
की राम से भेंट—११६, २९ भरत का राम को दशरथ की मृत्यु का समाचार देना—११७,
३० श्रीराम को जाबालि का उपदेश—१२०, ३१ पादुका-दान—१२० ।
अरण्यकांड १२३-१७०
१ चित्रकूट से प्रस्थान—१२५, २ राम का दण्डक वन की यात्रा करना—
१२६, ३ विराध का वध—१२६, ४ श्रीराम का शरभंग के आश्रम में पहुँचना—१२७,
५ श्रीराम का सुनीक्षण मुनि के आश्रम में पहुँचना—१२८, ६ मदकर्णी का वृत्तांत—
१३०, ७ अगस्त्य से भेंट—१३०, ८ जटायु से मित्रता—१३२, ९ हेमंत-वर्णन—
१३२, १० जवुमालि का वृत्तांत—१३३, ११ शूर्पणखा का वृत्तांत—१३६; १२ खर-
दूषण का वध—१३६, १३ लका में अकपन तथा रावण का वार्त्तालाप—१४५;
१४ शूर्पणखा का रावण से दीनालाप—१४६, १५ रावण का पुन मारीच के पास
जाना—१४७, १६ मारीच का पुन उद्बोधन—१४८, १७ मारीच का माया-मृग के
रूप में आना—१४६, १८ राम का माया-मृग का पीछा करना—१५१, १९ भिक्षुक
के वेश में रावण का सीता के पास आना—१५३, २० जानकी का शोक—१५५,
२१ जटायु और रावण का युद्ध—१५६, २२ जानकी को अशोकवन में रखना—१५६,
२३ श्रीराम का दुख—१५६, २४ लक्ष्मण का राम को सांत्वना देना—१६३, २५
जटायु का अग्नि-संस्कार करना—१६५, २६ कबध का वध—१६६, २७ राम-लक्ष्मण
की शबरी से भेंट—१६७, २८ श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना—१६८।
किष्किंधाकांड १७१-२१०
१ पंपासर-दर्शन—१७३, २ हनुमान की राम से भेंट—१७५, ३ हनुमान् का
अपने जन्म का वृत्तांत सुनाना—१७६; ४ सुग्रीव का सीताके आभूषणो को देना—१७८,
( २१ )
५ वालि-सुग्रीव का द्वंद्व-युद्ध--१८३ ; ६ तारा का वालि को रोकना--१८४ ;
७ वालि का सहार--१८७, ८ तारा का शोक--१८६; ९ वालिका सुग्रीव को उपदेश
देना--१६१, १० सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाना--१६२, ११ राम का माल्य-
वत पर पहुँचना--१६३, १२ लक्ष्मण का किष्किंधा में जाना--१६५; १३ सुग्रीव का
माल्यवत पर पहुँचना--१६७, १४ सीता के अन्वेषण के लिए सुग्रीव का वानरो को
भेजना--१६८, १५ हनुमान् को मुद्रिका देना--१६६, १६ महर्षि कडु के आश्रम
में--२०१, १७ स्वयंप्रभा का सत्कार--२०२, १८ वानरो की व्याकुलता--२०३,
१६ सपाति से भेंट--२०४, २० सीता का पता बताना--२०५, २१ वानरो का
अपनी शक्ति का परिचय देना--२०६, २२ समुद्र लाँघने के लिए हनुमान् को प्रेरित
करना--२०७, २३ समुद्र पार करना--मैनाक से भेंट--२०८ ।
सुन्दरकांड २१९-२४६
१ हनुमान् का लका में प्रवेश--२१३, २ लकिणी का हनुमान् को रोकना--
२१४, ३ हनुमान् का लका में सीता का अन्वेषण -- २१५, ४ हनुमान् का रावण
के अत पुर में प्रवेश करना--२१६, ५ हनुमान् का रावण के उद्यान में जाना--२१८,
६ हनुमान् की सीता से भेंट--२१६, ७ सीता से रावण का प्रलाप--२२०, ८ सीता
का रावण की निन्दा करना--२२२, ६ मन्दोदरी का रावण को उपदेश--२२३;
१० राक्षसियो का सीता को दुख देना--२२४, ११ त्रिजटा का स्वप्न--२२४,
१२ हनुमान् का सीता को राघवो का वृत्तात सुनाना--२२५, १३ हनुमान् का सीता
को राम की अँगूठी देना--२२६, १४ सीता का सदेह--२२६, १५ अशोकवन का
ध्वस--२३०, १६ हनुमान् का राक्षसो का वध करना--२३१, १७ अक्षयकुमार का
हनुमान् पर आक्रमण करना--२३५, १८ इन्द्रजीत का हनुमान् को वन्दी बनाना--
२३७, १६ हनुमान् का रावण को अपने आगमन का कारण बताना--२३८, २०
लका-दहन--२३६, २१ अगद आदि वानरो से हनुमान् की भेंट--२४२, २२ वानरो का
मधुवन में विचरण करना--२४३, २३ राम को सीता का कुशल-समाचार सुनाना-२४४।
युद्धकांड २४७-४७७
१ श्रीराम का हनुमान् की प्रशसा करना--२४६, २ लका के वैभव का वर्णन--
२५०, ३ कपि-सेनाओ की युद्ध-यात्रा--२५२, ४ महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र
को देखना--२५३, ५ सध्या-वर्णन--२५४, ६ मत्रियो के साथ रावण की मत्रणा--
२५५, ७ दानव-वीरो के दर्पपूर्ण वचन--२५६, ८ राक्षस-वीरो को विभीषण का
उपदेश--२५७, ६ रावण को विभीषण का हितोपदेश--२५८, १० कुभकर्ण को सीता-
पहरण का वृत्तात सुनाना--२६०, ११ इन्द्रजीत का विभीषण को अपने पराक्रम का
परिचय देना--२६२; १२ विभीषण द्वारा इन्द्रजीत के दभ की निंदा--२६२, १३
रावण का विभीषण को नगर से निर्वासित करना--२६३, १४ विभीषण का अपनी
माता के भवन में जाना--२६५, १५ विभीषण की शरणागति--२६६, १६ हनुमान