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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 508 में से

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पृष्ठ 34

४ रंगनाथ रामायण
आदितत्त्व, 'तत्त्वमसि' आदि कथनानुसार भेदातीत, अभेद, प्रतापी परमेश्वर का (भक्ति-युक्त
ध्यान करने के निमित्त) मैने अत्यंत धैर्य के साथ नियमो का पालन किया, कर्म के बंधनो
को ठुकराया, एकांत में रहते हुए इन्द्रिय-व्यापारो को भुला दिया, सुस्थिर होकर सुलभ-
साध्य तथा परिचित आसन (सुखासन) पर उपविष्ट हुआ, मन को भक्ति-रस-परिपूर्ण
बनाया, (शरीर के भीतर रहनेवाली) बहत्तर नाडियो का विचार करके उनका परिमार्जन किया,
एकचित्त तथा निर्मल मन से नाडियो में अत्यंत सूक्ष्म रूप से व्याप्त पवन को रोका,
मन को निश्चल बनाकर निरुद्ध प्राण-वायु को मूलाधार-चक्र में प्रविष्ट कराया और उसे
क्रमशः छह कमलो को पार कराते हुए चंद्रमंडल में पहुँचाया । वहाँ योगीन्द्रो के हृदय का
भेद परखने के लिए परम-व्योम के रूप में स्थित अनादि ब्रह्म-स्वरूपा, अत्यंत सूक्ष्म तथा
निर्मल नाडी को यूप, अविचल मन को यज्ञ-पशु, निष्ठानुरक्ति को वेदी, समस्त इन्द्रियो को
काष्ठ, ज्ञान को अखंड अग्नि तथा आनंद-योग को यज्ञ-फल के रूप में मानते हुए इच्छित-
आनंद-प्राप्ति के हेतु, कर्म के द्वारा प्राप्त होनेवाले मोक्ष रूपी परमेश्वर, अगोचर, कर्म-रहित,
हमारे देव, कमलनेत्रवाले, हमारे पालनहार, आदि नारायण तथा अखिल लोकार्थेश की
भक्ति, स्तुति, प्रार्थना एवं वंदना की । अपने मन की इच्छा पूर्ण करने के निमित्त हार,
कर्पूर, नीहार, गोक्षीर तथा तारको के सदृश उज्ज्वल शारदा देवी की उपासना की; चारु
रामायण-रूपी चंद्र के जन्म-स्थान के रूप में विलसित होनेवाले वाल्मीकि का स्मरण किया,
भारत-रूपी मंजरी के पारिजात, तत्त्ववेत्ता पराशर-पुत्र का स्मरण किया और उनके पुत्र
शुकदेव की बडी भक्ति से स्तुति करने के पश्चात् मैं अपने मन में एक ऐसे ग्रन्थ की रचना
करने का विचार करने लगा, जिसकी कथा के कथन से सभी सज्जन मेरा कीर्त्ति-गान करेंगे,
जिसकी कथा का वर्णन करने से मेरे इह-लोक और पर-लोक दोनो सफल होगे और जिस
कथा के कथन से ईप्सितार्थ सिद्ध होगे और साथ-ही-साथ पुण्य की प्राप्ति होगी ।
२. ग्रन्थ-रचना का कारण
सृष्टि के समस्त प्राणी, जिस पुण्यात्मा की प्रशंसा बडे आदर से करते हैं, जो सदा-
चार के पुण्य-फलस्वरूप सूर्य के समान उदित होकर कलिकाल का अंधकार दूर करते थे,
जो श्रेष्ठ धर्म-पथ का महत्त्व जानते थे, जिनके पवित्र तेज के समान शत्रु-रूपी नक्षत्रों के
प्रकाश मंद पड जाते थे, जिन्होंने अपने खड्ग की दीप्ति-रूपी गंगा-प्रवाह में अन्य राजाओ
के ललाट में लगे गर्व-पंक को धो दिया था, असमान बलशाली, सत्यनिष्ठ, शरणार्थी
राजा-रूपी भ्रमरो के लिए (जिनका कर-कमल) आधार था, ऐसे कोनकाट भूपति के वंश
की कीर्त्ति बढाने हुए नय, विनय, दया के आगार महाराजा के पुत्र गोनरुद्र नरेन्द्र महान
प्रतापी तथा पवित्रात्मा थे । उनके पौत्र बुद्ध भूपाल अभंग, अप्रतिम विक्रमी, कुल-गोत्र के
संवर्द्धक, देवेन्द्र के समान वैभवशाली, वीर और विख्यात थे । उनके पुत्र अक्षीण दाक्षिण्य-
वनी (अर्थात् अक्षीण कृपावाले), धन-धान्य में कुवेर, मर्म में धर्मराज (युधिष्ठिर) के समान
अति-पुण्य सौजन्य-शील, शत्रुओ के लिए अति शौर्यवान् वामदेव कार्त्तिकेय, शुभजन्मा,
कामिनियों के लिए कामदेव, अखंड विक्रमी और रण-विशारद थे । वे चंदन, मदार-चंद्रिका-
हार, कदली, कुंद, इंदु सम उज्ज्वल कीर्तिमान्, गोनवंश-रूपी पारिजात के फल-स्वरूप