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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 508 में से

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पृष्ठ 117

दी है। मेरा भाई इस समस्त राज्य पर शासन करनेवाला है। अब तुम किसपर क्रोध
करते हो ? ऐसे समय में अपने बल का घमड दिखाना क्या तुम्हें उचित है ? पिता की
आज्ञा का पालन करने से बढकर दूसरा धर्म कौन-सा है ? पिता की आज्ञा का उल्लघन
करने से बढकर दूसरा पाप कौन-सा है ? चाहे तुम किसी भी रीति से विचार करो,
राजा की आज्ञा का पालन करना मेरे लिए, तुम्हारे लिए और माताओ के लिए धर्म-संगत है।'
उनकी आज्ञा के अनुसार मुझ वन जानेवाले को मत रोको । परम पवित्र रविकुल के
वशजो के चरित्र का तो तुम्हें विचार करना चाहिए। जो होना है, वह होकर ही रहेगा ।
विधि का लेख कौन मिटा सकता है ?" इन बानो को सुनकर लक्ष्मण ने अपना क्रोध-
शान्त कर लिया और रामचन्द्र का रुख देखकर भीत हो चुप रह गये ।
८. राम का कौसल्या को धैर्य देना
सती कौसल्या अपने पुत्र का त्याग देखकर अत्यत दुःखी हुईं और षोडश कलाओ से
युक्त, पूर्णचन्द्र के सदृश, प्रकाशमान राम का मुख देखकर बोली—'हे मेरे कुल-दीपक,
हे मेरे प्रिय पुत्र, हे मेरे तात, वत्स (बछडा) को खोनेवाली गाय की तरह मैं तुम्हें छोड़कर
चौदह साल तक यहाँ नहीं रह सकूंगी। मैं भी तुम्हारे साथ घने वन में आकर रहूँगी।'
इस प्रकार विलाप करती हुई_माता को सातवना देते हुए बड़े अनुनय-विनय से तथा अत्यंत
दीन भाव से राम बोले—
"हे माता, ऐसा कहना क्या आपको उचित है ? विचार करके देखिए । स्त्री के
लिए पति ही प्राण हैं, नातेदार हैं और देवता हैं। ऐसे पति को त्यागकर मेरे साथ जाने
के लिए जो आप कहती हैं, क्या यह आपको उचित है ? यदि महाराज ने राज-पाट
भरत को देने की आज्ञा दी है तो इसमें दोष क्या है ? राजा ने जो वर देने का वचन
दिया था, उन्हें माँगना क्या कैकेयी की भूल है ? असत्य कहने से डरकर राजा का वर
देना क्या अनुचित है ? अपने पिता की आज्ञा मानकर मेरा इस प्रकार वन जाने के लिए
प्रस्तुत होना क्या दोष है ? सत्य तो यह है कि पति के आज्ञा-पालन में बाधा देना आपकी
भूल कही जायगी । मेरे वन जाने के पश्चात् आपको दीन तथा दुःखी राजा की सतत
सेवा-परिचर्या करते हुए, उनके मन का दुःख दूर करते रहना चाहिए। पाप-रहित तथा
बंधु-प्रेमी भरत मुझसे अधिक भक्ति-युक्त होकर आपकी सेवा करेगा । आप शोक न करें ।
स्वप्न में भी महाराज दशरथ के सवध में कटु विचार मत लाइए । आप कैकेयी के साथ
स्नेहयुक्त होकर रहिए । मेरे कुशल का विचार करके आप मुझे वन जाने की आज्ञा
दीजिए ।"
इस प्रकार कहते हुए राम ने माता को प्रणाम किया । कौसल्या ने राम को हृदय
से लगा लिया । उनकी आँखों से दुःख के अश्रु उमड़-उमड़कर राम की पीठ पर गिरने लगे ।
उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए वे गद्गद स्वर से बोली—'हाय, तुम वन में जाओगे ?'
इसके पश्चात् उन्होंने किंचित् धैर्य धारण करके अपने कपोलों पर झरनेवाले अश्रुओं को
पोछ लिया । पवित्र जल से हाथ तथा मुंह का प्रक्षालन किया और पुण्याह-वाचन कराया और
कहा—'सुर, खेचर, यति, गिरि, वृक्ष, वेद, शान्ति, दान्ति, नदी, निधि, समुद्र आकाश, जल,