रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकांड ८५
विचित्र-सा मालूम होता है । महाराज तुम्हें बुलाकर इस प्रकार का आदेश कैसे दे सके ?
भले ही भरत का राज-तिलक करके उसे पृथ्वी का स्वामी बना दें, किन्तु काकुत्स्थ-वंशी
राजा को तुम्हें वन भेजने की आवश्यकता क्यों हुई ? न वे विवेक-शून्य हैं, न अधम हैं ।
फिर सौत की बातों में आना उन्हें कैसे शोभा देता है ? क्या हितैषी मन्त्री तथा कुल-गुरु
वसिष्ठ ने भी तुम्हारे हित का विचार करके यह नहीं कहा कि अमुक कार्य धर्म-संगत है
और अमुक कार्य उचित है ? मेरे प्राणनाथ ने इतना बड़ा अपराध कभी नहीं किया था
और कैकेयी ने कभी ऐसा पाप नहीं किया । तुम्हें देखकर वन जाने का आदेश देने के
लिए कैकेयी का मुख कैसे खुला ? हे राम, प्रेम से प्राण भी माँग लेनेवाली, महाराज
की प्रेम-पात्री कैकेयी के गर्भ से जन्म लेकर, पृथ्वी का पालन करने का सौभाग्य प्राप्त न
करके तुमने मेरे गर्भ से क्यों जन्म लिया ? यदि तुम मेरे गर्भ से जन्म नहीं लेते, तो तुम
पर यह विपत्ति क्यों आती ? हाय ! पुत्रहीन वन्ध्या की अपेक्षा भी मुझे आज अधिक दुःख
मिल रहा है । दीर्घ काल तक संतानहीना होकर रही और उसके पश्चात् ईश्वर की
कृपा से तुम्हें पुत्र के रूप में प्राप्त किया, तो मन को बड़ी शांति मिली, किन्तु मेरा सारा
तप आज व्यर्थ हो गया है । हे राजकुमार, जिस दिन तुम मुझे छोड़कर साहस के साथ
घोर वन में चले जाओगे, उस दिन मेरे लिए मृत्यु को छोड़कर अन्य कोई शरण नहीं
दीखती । तुम मुझे छोड़कर कैसे वन में जाओगे ? मैं कैसे अपने दुःख को शान्त कर
सकूँगी ? पच्चीस वर्ष तक मैंने तुम्हें बड़े प्रेम से पाला-पोसा । यह सारा संसार जानता है ।
तुम मुझे इस दशा में छोड़कर कैसे जाओगे ? हे पुत्र, मैंने तुम्हारे लिए जो विविध
व्रत रखे तथा विविध दान दिये, वे सब ऊसर भूमि में डाले गये बीजों की तरह निष्फल
हो गये । यदि भरत राजा बन जाय, तो परिजन क्रूर कैकेयी के भय से मेरी सेवा करने
के लिए कैसे आयेंगे ? राजा के प्रेम से वंचित तथा सब प्रकार के राजभोगों तथा वैभवों
से रहित होकर मैं अपनी सौतों के मध्य कौन-सा मुँह लेकर रहूँगी ? कैकेयी का अधिकार
मैं कैसे सहूँगी ? मैं नहीं जानती थी कि सारा कार्य इस प्रकार चौपट हो जायगा । इस
अशुभ समाचार के सुनने के पहले ही मैं क्यों नहीं मर गई ? हे सूर्यवंश-तिलक, भले ही
कैकेयी सारा राज्य लेकर अपने पुत्र को उसका अधिकारी बनाकर उसे भोग ले । हे तात,
तुम वनों में क्यों जाओगे ? तुम मेरे पास वैसे ही रहो । तुम्हारी बाल्यावस्था में वसिष्ठ
आदि मुनियों ने तुम्हारे चरण-कमलों में, पद्म, हल, वज्र, ध्वजा, कलश आदि चिह्नों
को देखकर कहा था कि यह बालक समस्त विश्व का पालन करेगा । आज कैकेयी ने
उनके वचन को असत्य सिद्ध कर दिया ।”
७ लक्ष्मण का क्रोध और राम का समझाना
इस प्रकार विविध प्रकार से विलाप करनेवाली कौसल्या को देखकर लक्ष्मण दुःख
और क्रोध से व्याकुल हो गये । उनका मुख तमतमाने लगा और उनकी भौंहें तन गईं ।
क्रोधाग्नि में जलते हुए तलवार चमकाते हुए वे राम तथा राम की माता से बोले-“हाय !
पौरुष तथा अभिमान को तिलांजलि देकर, क्षत्रिय-धर्म को त्यागकर, तेजोहत हो, ऐसे दीन
वचन आप क्यों कह रहे हैं ? मदमति पिता का आदेश आपको ठुकरा देना चाहिए ।