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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 508 में से

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पृष्ठ 118

वायु, पृथ्वी, अग्नि, दिक्पाल, दश दिशाएँ, सूर्य-चन्द्र, तथा ब्रह्मा आदि सभी सदा तुम्हारा
कल्याण करते रहें।' इस प्रकार स्वस्ति-वचन कहकर कौसल्या ने देवताओ की पूजा करके
राम के दाहिने हाथ में रक्षा-कंकण बाँधा और कहा-'वृत्रासुर का वध करने के
लिए जानेवाले इन्द्र को देवताओ ने जो कल्याणप्रद कामनाएँ की थी, वे सब तुम्हें प्राप्त हो ।
स्वर्ग से अमृत लाने के लिए जानेवाले गरुड़ को विनता ने जो शुभ आशीर्वाद दिये थे,
हे राम, वे सब तुम्हें प्राप्त हो ।'
इस प्रकार, आशीर्वाद देकर कौसल्या ने राम को हृदय से लगा लिया, सिर सूंघा
और उन्हें जाने की अनुमति दी । तब माता का चरण-स्पर्श करके वे अनुज के साथ वहाँ
से अपने अंत पुर के लिए श्वेत छत्र-चामर-रहित हो पैदल रवाना हुए । अभिषेक में विघ्न
पड़ा हुआ जानकर राज-सभा के सभासद, सामंत राजा, मंत्री तथा नगर-निवासी अत्यंत दुःखी
होने लगे ।

९. राम का अभिषेक-भंग का वृत्तांत सीता को सुनाना

रामचंद्र अपने अंत पुर में पहुँच गये, तो सीता अपनी सहेलियो के साथ उनकी
अगवानी के लिए आई । सीता को देखकर राम का मुख मलिन हो गया । यह देखकर
सीता का मुख भी मलिन पड़ गया । उन्होने कहा—"हे प्राणनाथ, यह कैसी विचित्र बात है
कि आपका मुख-कमल आज मुरझाया हुआ है ? क्या राजा ने पुण्य-योग का मुहूर्त्त
बीतता जानकर आपका राज-तिलक कर दिया ? चंद्र-मंडल की समता करनेवाला श्वेत
छत्र आपके मुख-कुमुद पर क्यो छाया नही कर रहा है ? क्या कारण है कि चामरधारी
आपके पार्श्व-भाग में नही है ? भद्रगज क्यो नही दीख रहा है ? आपके सिर पर मंत्राक्षत
क्यो नही दीख रहे है ? नगर-जन आपकी सेवा में प्रवृत्त हो क्यो नही आ रहे हैं ? दुदुभी
तथा पटह-नाद क्यो नही सुनाई पड़ रहे है ? वंदी-मागधो के स्तुति-पाठ कहाँ ? हे प्रभु !
आज तो राज-तिलक का दिन है । आपमें कोई राज-चिह्न नही दीख रहा है ?
क्या कारण है कि सौमित्र का वदन प्रफुल्ल नही है ? इन सबका क्या कारण है, आप
कृपया बतलाइए ।"
सीता के ये भोले वचन सुनकर राम मन-ही-मन दुःखी हुए और उस मानिनी सीता
को देखकर बोले—"भला मुनियो को राज-चिह्नो से क्या मतलब ? सुनो, इसका कारण
बताता हूँ । माता कैकेयी ने पहले मेरे पिताजी की सेवा करके उनसे जो वर प्राप्त
किये थे, उन्हें आज माँग लिया है । एक वर से उन्होने भरत का राज-तिलक और दूसरे
वर से मेरा वन-वास माँगा है । अत राजा ने राज्य का पालन करने के लिए मेरे अनुज
का राज-तिलक करने का वचन दिया है और मुझे पिता की आज्ञा से चौदह साल तक वन
में रहना है । माता-पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले वीर के हाथ में ही ऐश्वर्य,
यश, नाना लोक और नाना पुण्य रहेंगे । इसलिए हे कमलोचनी ! जबतक मैं महाराज
की आज्ञा के अनुसार वनवास पूरा करके न लौटूं, तबतक तुम दुख त्याग कर गुरुजनो
की भक्तिपूर्वक परिचर्या करती रहो । मन-ही-मन मेरे कुशल की कामना करती रहो और
उत्तम आचरण से अपने धर्म का पालन करती हुई मातायो के पास रहो ।"