रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पेंड परे जिव जिस घर जाता ।
सबद अतीत अनाहद राता ॥५॥
ता पर कृपा सोई भल जानै ।
गूँगो साकर¹ कहा बखानै ॥६॥
सुन्न मँडल में मेरा बासा ।
ता ते जिव में रहौँ उदासा ॥७॥
कह रैदास निरंजन ध्यावौँ ।
जिस घर जावँ सो बहुरि न आवौँ ॥८॥
॥ ५७ ॥
अबिगति नाथ निरंजन देवा ।
मैं क्या जानूँ तुम्हरी सेवा ॥टेक॥
बाँधूँ न बंधन छाऊँ न छाया ।
तुमहीं सेऊँ निरंजन राया ॥१॥
चरन पताल सीस असमाना ।
सो ठाकुर कैसे सँपुट² समाना ॥२॥
सिव सनकादिक अंत न पाये ।
ब्रह्मा खोजत जनम गँवाये ॥३॥
तोडूँ न पाती पूजूँ न देवा ।
सहज समाधि करूँ हरि सेवा ॥४॥
नख प्रसाद जाके सुरसरि³ धारा ।
रोमावली अठारह भारा⁴ ॥५॥
चारो बेद जाके सुमिरत साँसा ।
भगति हेत गावै रैदासा ॥६॥
१ शकर, चीनी। २ डब्बा। ३ कथा है कि भगीरथ की तपस्या से विष्णु के
' से साठ हजार सगर के लड़कों के तारने के लिये गंगा पृथ्वी पर आईं ।
ठारह लोक ।
( २५ )
॥ ५८ ॥
भेष लियो पै भेद न जान्यो ।
अमृत लेइ बिखै सों मान्यो ॥टेक॥
काम क्रोध में जनम गँवायो ।
साधु संगति मिलि राम न गायो ॥१॥
तिलक दियो पै तपनि न जाई ।
माला पहिरे घनेरी लाई ॥२॥
कह रैदास मरम जो पाऊँ ।
देव निरंजन सत कर ध्याऊँ ॥३॥
(राग बिलावल)
॥ ५९ ॥
का तूँ सोवै जाग दिवाना ।
झूठी जिउन¹ सत्त करि जाना ॥टेक
जिन जनम दिया सो रिजक² उमड़ा³
घट घट भीतर रहट चलावै ।
करि बंदगी छोड़ि मैं मेरा,
हृदय करीम सँभारि सबेरा ।
( २९ )
आगै पंथ खरा है झीना,
खाँडे धार जैसा है पैना १ ।
जिस ऊपर मारग है तेरा,
पंथी पंथ सँवार सबेरा ॥ ४ ॥
क्या तैँ खरचा क्या तैँ खाया,
चल दरहाल २ दिवान बुलाया ।
साहिब तो पै लेखा लेसी,
भीड़ पड़े तूँ भरि भरि देसी ॥ ५ ॥
जनम सिराना किया पसारा,
सूझि पर्यो चहुँ दिसि अँधियारा ।
कह रैदास अज्ञान दिवाना,
अजहूँ न चेतहु नीफँद ३ खाना ४ ॥ ६ ॥
॥ ६० ॥
खालिक सिकस्ता ५ मैं तेरा ।
दे दीदार उमेदगार, बेकरार जिव मेरा ॥टेक॥
औवल आखिर इलाह, आदम फरिस्ता बंदा ।
जिसकी पनह ६ पीर पैगंबर, मैं गरीब क्या गंदा ॥१॥
तू हाजरा हजूर जोग इक, अवर नहीं है दूजा ।
जिसके इसक आसरा नाहीं, क्या निवाज क्या पूजा ॥२॥
नालीदोज ७ हनोज ८ बेबखत ९, कमिँ १० खिजमतगार तुम्हारा ।
दरमाँदा दर ज्वाब न पावै, कह रैदास बिचारा ॥३॥
॥ ६१ ॥
मैं वेदनि कासनि ११ आखूँ,
हरि बिन जिव न रहै कस राखूँ ॥टेक॥
१ तेज । २ तुरंत । ३ निर्बंध । ४ घर । ५ टूटा हुआ, निर्बल । ६ पनाह, रक्षा ।
७ जूता सीने वाला यानी चमार । ८ अब तक । ९ अभागी । १० कमीना ।
११ किस से ।
( ३० )
जिव तरसै इक दंग बसेरा,
करहु सँभाल न सुर मुनि मेरा ।
बिरह तपै तन अधिक जरावै,
नीँद न आवै भोज न भावै ॥१॥
सखी सहेली गरब गहेली,
पिउ की बात न सुनहु सहेली ।
मैँ रे दुहागनि अध कर जानी,
गया सो जोबन साध न मानी ॥२॥
तू साईँ औ साहिब मेरा.
खिदमतगार बंदा मैँ तेरा ।
कह रैदास अँदेसा येही,
बिन दरसन क्यौँ जिवहि सनेही ॥३॥
॥ ६२ ॥
हरि बिन नहिँ कोइ पतित पावन, आनहिँ ध्यावे रे ।
हम अपूज्य पूज्य भये हरि ते, नाम अनूपम गावे रे ॥टेक॥
अष्टादस ब्याकरन बखानैँ, तीन काल षट जीता रे ।
प्रेम भगति अंतर गति नाहीँ ता ते धानुक१ नीका रे ॥१॥
ता ते भलो स्वान को सत्रू२, हरि चरनन चित लावै रे ।
मूआ मुक्त बैकुंठ बास, जिवत यहाँ जस पावै रे ॥२॥
हम अपराधी नीच घर जनमे, कुटुँब लोक करै हाँसी रे ।
कह रैदास राम जपु रसना३, कटै जनम की फाँसी रे ॥३॥
॥ ६३ ॥
गोबिंदे तुम्हारे से समाधि लागी,
उर भुअंग भस्म अंग संतत बैरागी४ ॥टेक॥
१ नाम एक नीच जाति का, धुनिया । २ डोम । ३ जीभ । ४ शिव जी
को “सदा जोगी” कहा है।
जाके तीन नैन अमृत बैन, सीस जटाधारी ।
कोटि कलप ध्यान अलप, मदन अंतकारी१ ॥१॥
जाके लील बरन अकल ब्रह्म, गले रुंडमाला ।
प्रेम मगन फिरत नगन, संग सखा बाला ॥२॥
अस महेस बिकट भेस, अजहूँ दरस आसा ।
कैसे राम मिलौं तोहिं, गावै रैदासा ॥३॥
॥ ६४ ॥
सो कहा जानै पीर पराई ।
जाके दिल मे दरद न आई ॥टेक॥
दुखी दुहागिनि होइ पियहीना,
नेह निरति करि सेव न कीना ।
स्याम प्रेम का पंथ दुहेला,
चलन अकेला कोइ संग न हेला ॥१॥
सुख की सार सुहागिनि जानै,
तन मन देय अंतर नहिँ आनै ।
आन सुनाय और नहिँ भाषै,
रामरसायन रसना चाखै ॥२॥
खालिक तौ दरमंद२ जगाया,
बहुत उमेद जवाब न पाया ।
कह रैदास कवन गति मेरी,
सेवा बंदगी न जानूँ तेरी ॥३॥
—: ० :—
( राग तोड़ी )
( ६५ )
पावन जस माधो तेरा, तुम दारुन अघमोचन मेरा ॥टेक॥
कीरति तेरी पाप बिनासे, लोक बेद यौं गावै ।
जौं हम पाप करत नहिँ भूधर, तौ तूँ कहा नसावै ॥१॥
जब लग अंक पंक' नहिँ परसै, तौ जल कहा पखार ।
मन मलीन बिषया रस लंपट, तौ हरि नाम सँभारै ॥२॥
जो हम बिमल हृदय चित अंतर, दोप कौन पर धरिहौ ।
कह रैदास प्रभु तुम दयाल हौ, अबँध मुक्ति का करिहौ ॥३॥
( राग गौड )
॥ ६६ ॥
आज दिवस² लेऊँ बलिहारा ।
मेरे घर आया राम का प्यारा ॥टेक॥
आँगन बँगल भवन भयो पावन ।
हरिजन बैठे हरिजस गावन ॥१॥
करूँ डंडवत चरन पखारूँ ।
तन मन धन उन ऊपरि वारूँ ॥२॥
कथा कहैँ अरु अर्थ विचारैँ ।
आप तरैँ औरन को तारैँ ॥३॥
कह रैदास मिलैँ निज दास,
जनम जनम कै काटै पास ॥४॥
॥ ६७ ॥
ऐसे जानि जपो रे जीव,
जपि ल्यो राम न अ्रमो जीव ॥टेक॥
गनिका थी किस केरमा जोग ।
पर-पूरुष सो रमती भोग ॥१॥
निसि बासर दुष्करम कमाई ।
राम कहत बैकुंठे जाई ॥२॥
१ कीचड़ । २ दिन ।
नामदेव काहय जात क आछ¹।
जाको जस गावै लोक ॥ ३ ॥
भगति हेत भगता के चले।
अंकमाल ले बीठल मिले² ॥ ४
कोटि जग्य जो कोई करै।
राम नाम सम तउ न निस्तरै ॥
निरगुन का गुन देखो आई।
देही सहित कबीर सिधाई³ ॥ ६
मोर कुचिल जाति कुचिल में बास।
भगत चरन हरिचरन निवास ॥
चारिउ वेद किया खंडौति।
जन रैदास करै डंडौति ॥ ८ ॥
—: * :—
( राग सारंग )
॥ ६८ ॥
जग मेंँ बेद बैद मानीजै।
इनमेंँ और अकथ कछु औरै,
कहौ कौन परि कीजै ॥ टेक ॥
भौजल ब्याधि असाधि प्रबल अति,
परम पंथ न गहीजै ॥ १ ॥
पढ़े-गुने कछु समुझि न परई,
अनुभव पद न लहीजै ॥ २ ॥
१ नामदेव भक्त ओछी जाति के अर्थात् छीपी थे। २ बीठल भक्त जाति के माली
....न ध्यान में लगे रहने से राजा के पास हार न पहुँचा सके सो भगवान् ने
आप उनका रूप धर कर हार पहुँचा दिया। ३ कथा है कि कबीर साहब देह समेत
परलोक को सिधारे [ देखो कबीर साहब का जीवन-चरित्र उनकी शब्दावली के भाग
१ में जो इसी प्रेस में छपी है। ]
( ३४ )
चखबिहीन कर तारि चलतु हैं१,
तिनहिँ न अस भुज दीजै ॥ ३ ॥
कह रैदास बिबेक तत्त बिनु,
सब मिलि नरक परीजै ॥ ४ ॥
—•:—
( राग कानड़ा )
॥ ६९ ॥
माया मोहिला कान्हा, मैँ जन सेवक तेरा ॥ टेक ॥
संसार प्रपंच मेँ व्याकुल परमानंदा ।
त्राहि त्राहि अनाथ गोबिंदा ॥ १ ॥
रैदास बिनवै कर जोरी ।
अबिगत नाथ कवन गति मोरी ॥ २ ॥
॥ ७० ॥
चल मन हरि चटसाल पढ़ाऊँ ॥ टेक ॥
गुरु की साटि ज्ञान का अच्छर ।
बिसरै तौ सहज समाधि लगाऊँ ॥ १ ॥
प्रेम की पाटी सुरति की लेखनि ।
ररौ ममौ लिखि आँक लखाऊँ ॥ २ ॥
येहि बिधि मुक्त भये सनकादिक ।
हृदय बिचार प्रकास दिखाऊँ ॥ ३ ॥
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कहु मन राम नाम सँभारि ।
माया के भ्रम कहा भूल्यो, जाहुगे कर झारि ॥टेक॥
देखि धौं इहाँ कौन तेरो, सगा सुत नहिं नारि ।
तोरि उतँग सब दूरि करिहैं, देहिँगे तन जारि ॥१॥
प्रान गये कहो कौन तेरा, देखि सोच बिचारि ।
बहुरि येहि कलि काल नाहीं, जीति भावै हारि ॥२॥
यहु माया सब थोथरी रे, अगति दिस प्रतिहारि ।
कह रैदास सत बचन गुरु के, सो जिव ते न बिसारि ॥३॥
॥ ७२ ॥
हरि को टाँडो लादै जाइ रे, मैं बनिजारो राम को ।
रामनाम धन पाइयो, ता ते सहज करूँ व्योहार रे ॥टेक॥
औघट घाट घनो घना रे, निरगुन बैल हमार रे ।
रामनाम धन लादियो, ता ते बिषय लाद्यो संसार रे ॥१॥
अंतेही धन धरयो रे, अंतेहि ढूँढ़न जाइ रे ।
अनत को धरो न पाइये, ता ते चाल्यो मूल गँवाइ रे ॥२॥
रैन गँवाई सोइ करि, दिवस गँवायो खाइ रे ।
हीरा यह तन पाइ करि, कौड़ी बदले जाइ रे ॥३॥
साधुसंगति पूँजी भई रे, बस्तु भई निर्मोल रे ।
सहज बरदवा¹ लादि करि, चहुँ दिसि टाँडो मोल रे ॥४॥
जैसा रंग कुसुंभ का रे, तैसा यह संसार रे ।
रमइया रंग मजीठ का, ता ते भन रैदास बिचार रे ॥५॥
॥ ७३ ॥
प्रीति सुधारन आव ।
तेज सरूपी सकल सिरोमनि, अकल निरंजनराव ॥टेक॥
१ बैल ।
( ३६ )
पिउ सँग प्रेम कबहुँ नहिँ पायो, करनी कवन बिसारी ।
चक१ को ध्यान दधिसुत२ सोँ हेत है, योँ तुम ते मैँ न्यारी ॥१॥
भवसागर मोहिँ इक टक जोवत, तलफत रजनी जाई ।
पिय बिन सेजइ क्यों सुख सोऊँ, बिरह बिथा तन खाई ॥२॥
मेटि दुहाग सुहागिन कीजै, अपने अंग लगाई ।
कह रैदास स्वामी क्यों बिछोहे, एक पलक जुग जाई ॥३॥
—०—
( राग जैतिश्री )
॥ ७४ ॥
सब कछु करत न कहौँ कछु कैसे ।
गुन बिधि बहुत रहत ससि जैसे ॥टेक॥
दरपन गगन अनिल३ अलेप जस ।
गंध जलधि प्रतिबिंब देखि तस ॥१॥
सब आरम्भ अकाम अनेहा ।
बिधि निषेध कीयौ अनेकेहा ॥२॥
यह पद कहत सुनत जेहि आवै ।
कह रैदास सुकृति को पावै ॥३॥
—०:—
( राग धनाश्री )
॥ ७५ ॥
तेरे देव कमलापति सरन आया ।
मुझ जनम संदेह भ्रम छेदि माया ॥टेक॥
अति संसार अपार भवसागर,
जा मेँ जनम मरना संदेह भारी ।
काम भ्रम क्रोध भ्रम लोभ भ्रम मोह भ्रम,
अनत भ्रम छेदि मम करसि यारी ॥१॥
१ चकोर के ऐसा ध्यान । २ चंद्रमा । ३ हवा ।
( ३७ )
पंच संगी मिलि पीड़ियो प्रान यौँ,
जाय न सक्यो बैराग भागा ।
पुत्रबरग कुल बंधु ते भारजा,
भखै दसो दिसा सिर काल लागा ॥ २ ॥
भगति चितऊँ तो मोह दुख व्यापही,
मोह चितऊँ तो मेरी भगति जाई ।
उभय संदेह मोहिँ रैन दिन व्यापही,
दीनदाता करूँ कवन उपाई ॥ ३ ॥
चपल चेतो नहीं बहुत दुख देखियो,
काम बस मोहिहो करम फंदा ।
सक्ति संबंध कियो ज्ञान पद हरि लियो,
हृदय बिस्वरूपे तजि भयो अंधा ॥ ४ ॥
परम प्रकास अबिनासी अधमोचना,
निरखि निज रूप बिसराम पाया ।
बंदत रैदास बैराग पद चिंतना,
जपौ जगदीस गोबिंद राया ॥ ५ ॥
॥ ७६ ॥
तेरी प्रीति गोपाल सौँ जनि घटै हो ।
मैंँ मोलि महँगै लई तन सटै हो ॥ टेक ॥
हृदय सुमिरन करूँ नैन अवलोकनो,
स्रवनौँ हरि कथा पूरि राखूँ ।
मन मधुकर करौँ चित्त चरना धरौँ,
राम रसायन रसना चाखूँ ॥ १ ॥
साधु संगत बिना भाव नहिँ उपजै,
भाव भगति क्योँ होइ तेरी ।
( ३८ )
बंदत रैदास रघुनाथ सुनु बीनती,
गुरुपरसाद कृपा करौ मेरी ॥ २ ॥
॥ ७७ ॥
कवन भगति ते रहै प्यारो पाहुनो रे ।
घर घर देखौँ मैं अजब अभावनो रे ॥टेक॥
मैला मैला कपड़ा केता एक धोऊँ ।
आवै आवै नींदहि कहाँ लौँ सोऊँ ॥१॥
ज्योँ ज्योँ जोड़ै त्योँ त्योँ फाटै ।
झूठै सबनि जरै उठि गयो हाटै ॥२॥
कह रैदास परो जब लेख्यो ।
जोई जोई कियो रे सोई सोई देख्यो ॥३॥
॥ ७८ ॥
मैँ का जानूँ देव मैँ का जानूँ ।
मन माया के हाथ बिकानूँ ॥टेक॥
चंचल मनुवाँ चहुँ दिसि धावै ।
पाँचो इंद्री थिर न रहावै ॥१॥
तुम तो आहि जगतगुरु स्वामी ।
हम कहियत कलिजुग के कामी ॥२॥
लोक बेद मेरे सुकृत बड़ाई ।
लोक लीक मो पै तजी न जाई ॥३॥
इन मिलि मेरो मन जो बिगार्यौ ।
दिन दिन हरि सौँ अंतर पार्यौ ॥ ४ ।
सनक सनंदन महामुनि ज्ञानी ।
सुक नारद ब्यास यह जो बखानी ॥ ५ ।
गावत निगम उमापति स्वामी ।
सेस सहस मुख कीरति गामी ॥ ६ ॥
जहा जाऊ तहा दुख का रासा ।
जो न पतियाइ साधु हैं साखी ॥७॥
जम दूतन बहु बिधि करि मारयो ।
तऊ निलज अजहूँ नहिँ हारयो ॥८॥
हरिपद बिमुख आस नहिँ छूटै ।
ताते तृस्ना दिन दिन लूटै ॥६॥
बहु बिधि करम लिये भटकावै ।
तुम्हें दोष हरि कौन लगावै ॥१०॥
केवल रामनाम नहिँ लीया ।
संतति बिषय स्वाद चित दीया ॥११॥
कह रैदास कहाँ लगि कहिये ।
बिन जगनाथ बहुत दुख सहिये ॥१२॥
॥ ७९ ॥
त्राहि त्राहि त्रिभुवनपति पावन ।
अतिसय सूल सकल बलि जावन ॥टेक॥
काम क्रोध लंपट मन मोर ।
कैसे भजन करूँ मैं तोर ॥१॥
बिषम बिहंगम दुंद नकारी ।
असरनसरन सरन भौहारी ॥२॥
देव देव दरबार दुआरै ।
राम राम रैदास पुकारै ॥३॥
॥ ८० ॥
दरसन दीजै राम दरसन दीजै ।
दरसन दीजै बिलँब न कीजै ॥टेक॥
दरसन तोरा जीवन मोरा ।
बिन दरसन क्योँ जिवै चकोरा ॥१॥
( ४० )
माधो सतगुरु सब जग चेला ।
अब के बिछुरे मिलन दुहेला ॥२॥
धन जोबन की झूठी आसा ।
सत सत भाषै जन रैदासा ॥३॥
॥ ८१ ॥
जन को तारि तारि बाप रमइया ।
कठिन फंद परचो पंच जमइया ॥टेक॥
तुम बिन सकल देव मुनि ढूँढूँ ।
कहूँ न पाऊँ जमपास छुड़इया ॥१॥
हम से दीन दयाल न तुम से ।
चरनसरन रैदास चमइया१ ॥२॥
—:०:—
॥ अथ आरती ॥
॥ ८२ ॥
आरती कहाँ लौँ जोवै ।
सेवक दास अचंभो होवै ॥टेक॥
बावन कंचन दीप धरावै ।
जड़ बैरागी दृष्टि न आवै ॥१॥
कोटि भानु जाकी सोभा रोमै ।
कहा आरती अगनी होमै ॥२॥
पाँच तत्त्व तिरगुनी माया ।
जो देखै सो सकल समाया ॥३॥
कह रैदास देखा हम माहीँ ।
सकल जोति रोम सम नाहीँ ॥४॥
॥ ८३ ॥
संत उतारैँ आरती देव सिरोमनिये ।
उर अंतर तहाँ बैसे बिन रसना भनिये ॥टेक॥
१ चमार ।
( ४१ )
मनसा मंदिर माहिँ धूप धुपइये ।
प्रेमप्रीति की माल राम चढ़इये ॥१॥
चहुँ दिसि दियना बारि जगमग हो रहिये ।
जोति जोति सम जोती हिलमिल हो रहिये ॥२॥
तन मन आतम वारि तहाँ हरि गाइये री ।
भनत जन रैदास तुम सरना आइये री !
॥ ८४ ॥
नाम तुम्हारो आरतभंजन¹ मुरारे ।
हरि के नाम बिन झूठे सकल पसारे ॥टेक॥
नाम तेरो आसन नाय तेरो उरसा² ।
नाम तेरो केसरि लै छिड़का रे ॥१॥
नाम तेरो अमिला नाम तेरो चंदन ।
धसि जपै नाम ले तुझ कूँचा रे ॥२॥
नाम तेरो दीया नाम तेरो बाती ।
नाम तेरो तेलै ले माहिँ पसारे ॥३॥
नाम तेरे की जोति जगाई ।
भयो उँजियार भवन सगरा रे ॥४॥
नाम तेरो धागा नाम फूल माला ।
भाव अठारह सहस जुहारे³ ॥५॥
तेरो कियो तुझे का अरपूँ ।
नाम तेरो तुझे चँवर ढुला रे ॥६॥
अष्टादस अठसठ चारि खानि हू ।
बरतन है सकले संसारे ॥७॥
कह रैदास नाम तेरो आरति ।
अंतरगत हरि भोग लगा रे ॥८॥
१ कष्ट हरता । २ हुरसा चंदन घिसने का । ३ प्रनाम ।
६
॥ ८५ ॥
जो तुम गोपालहि नहिँ गैहौ ।
तो तुम काँ सुख में दुःख उपजै सुखहि कहाँ ते पैहौ ॥टेक॥
माला नाय सकल जग डहको झूठो भेख बनैहौ ।
झूठे ते साँचे तब होइहौ हरि की सरन जब ऐहौ ॥१॥
कन रस१ बत रस२ और सबै रस झूठहि मूड़ डोलैहौ ।
जब लगि तेल दिया में बाती देखत ही बुझि जैहौ ॥२॥
जो जन राम नाम रँगराते और रंग न सुहैहौ ।
कह रैदास सुनो रे कृपानिधि प्रान गये पछितैहौ ॥३॥
॥ ८६ ॥
अब कैसे छूटै नाम रट लागी ॥टेक॥
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी ।
जाकी अँग अँग बास समानी ॥१॥
प्रभुजी तुम घन बन हम मोरा ।
जैसे चितवत चंद चकोरा ॥२॥
प्रभुजी तुम दीपक हम बाती ।
जीकी जोति बरै दिन राती ॥३॥
प्रभुजी तुम मोती हम धागा ।
जैसे सोनहिँ मिलत सुहागा ॥४॥
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा ।
ऐसी भक्ति करै रैदासा ॥५॥
॥ ८७ ॥
प्रभुजी संगति सरन तिहारी ।
जग जीवन राम मुरारी ॥टेक॥
गली गली-को जल बहि आयो,
सुरसरि जाय समायो ।
१ कान से सुनने का मजा । २ जबान से बोलने का मजा ।
सगत क परताप महातम,
नाम गंगोदक पायो ॥१॥
स्वाँति बूँद बरसै फनि१ ऊपर,
सीस बिषै२ होइ जाई ।
ओही बूँद कै मोती निपजै,
संगति की अधिकाई ॥२॥
तुम चंदन हम रँड़ बापुरे,
निकट तुम्हारे आसा ।
संगत के परताप महातम,
आवै बास सुबासा ॥३॥
जाति भी ओछी करम भी ओछा,
ओछा कसब हमारा ।
नीचै से प्रभु ऊँच कियो है,
कह रैदास चमारा ॥४॥
संतबानी की कुल पुस्तकों का सूचीपत्र
[ हर महात्मा का जीवन-चरित्र उनकी बानी के आदि में दिया है ]
कबीर साहिब का अनुराग सागर ... ... १।-)
कबीर साहिब का बीजक ... ... १)
कबीर साहिब का साखी-संग्रह . ... ... १॥)
कबीर साहिब की शब्दावली, पहला भाग ... ... १)
कबीर साहिब की शब्दावली, दूसरा भाग ... ... १)
कबीर साहिब की शब्दावली, तीसरा भाग ... ... ॥)
कबीर साहिब की शब्दावली, चौथा भाग ... ... ।)
कबीर साहिब की ज्ञान-गुदड़ी, रेखते और झूलने ... ... ॥)
कबीर साहिब की अखरावती ... ... ।)
धनी धरमदास जी की शब्दावली ... ... ।।।)
तुलसी साहिब (हाथरस वाले) की शब्दावली भाग १ ... ... १॥)
तुलसी साहिब दूसरा भाग पद्मसागर ग्रंथ सहित ... ... १॥)
तुलसी साहिब का रत्नसागर ... ... १।।।)
तुलसी साहिब का घट रामायण पहला भाग .. ... २)
तुलसी साहिब का घट रामायण दूसरा भाग ... :. २)
दादू दयाल की बानी भाग १ “साखी” ... ... २)
दादू दयाल की बानी भाग २ “शब्द” .. ... १॥=)
सुन्दर बिलास ... ... १।=)
पलटू साहिब भाग १-कुंडलियाँ ... ... १)
- पलटू साहिब भाग २-रेखते, झूलने, अरिल, कवित्त, सवैया ... ... १)
पलटू साहिब भाग ३- भजन और साखियाँ ... ... १)
जगजीवन साहिब की बानी पहला भाग .. ... १-)
जगजीवन साहिब की बानी दूसरा भाग ... ... १-)
दूलन दास जी की /.. ... ।=)
पद और साखी ... ... |=
दरिया साहिब (मारवाड़ वाले) की बानी ... ... ॥-
भीखा साहिब की शब्दावली ... ... ॥=)
गुलाल साहिब की बानी ... ... १=
बाबा मलूकदास जी की बानी ... ... |=
गोसाईं तुलसीदास जी की बारहमासी ... ... -)
धरनी साहिब की रत्नावली ... ... =)
बुल्ला साहिब का शब्दसार ... ... |=)
केशवदास जी की अमीघूँट ... ... =)
बेनीदास जी की बानी ... ... ॥)
मीराबाई की शब्दावली ... ... ॥॥=)
सहजो बाई का सहज-प्रकाश ... ... ॥=)
दया बाई की बानी ... ... ।-)
संतबानी संग्रह, भाग १ (साखी) [प्रत्येक महात्माओं के संक्षिप्त
जीवन चरित्र सहित] ... ... २)
संतबानी संग्रह, भाग २ (शब्द) [ऐसे महात्माओं के संक्षिप्त जीवन
चरित्र सहित जो भाग १ में नहीं हैं ] ... ... २)
कुल ४३=)॥
अहिल्या बाई (