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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 42

कहु मन राम नाम सँभारि ।
माया के भ्रम कहा भूल्यो, जाहुगे कर झारि ॥टेक॥
देखि धौं इहाँ कौन तेरो, सगा सुत नहिं नारि ।
तोरि उतँग सब दूरि करिहैं, देहिँगे तन जारि ॥१॥
प्रान गये कहो कौन तेरा, देखि सोच बिचारि ।
बहुरि येहि कलि काल नाहीं, जीति भावै हारि ॥२॥
यहु माया सब थोथरी रे, अगति दिस प्रतिहारि ।
कह रैदास सत बचन गुरु के, सो जिव ते न बिसारि ॥३॥
॥ ७२ ॥
हरि को टाँडो लादै जाइ रे, मैं बनिजारो राम को ।
रामनाम धन पाइयो, ता ते सहज करूँ व्योहार रे ॥टेक॥
औघट घाट घनो घना रे, निरगुन बैल हमार रे ।
रामनाम धन लादियो, ता ते बिषय लाद्यो संसार रे ॥१॥
अंतेही धन धरयो रे, अंतेहि ढूँढ़न जाइ रे ।
अनत को धरो न पाइये, ता ते चाल्यो मूल गँवाइ रे ॥२॥
रैन गँवाई सोइ करि, दिवस गँवायो खाइ रे ।
हीरा यह तन पाइ करि, कौड़ी बदले जाइ रे ॥३॥
साधुसंगति पूँजी भई रे, बस्तु भई निर्मोल रे ।
सहज बरदवा¹ लादि करि, चहुँ दिसि टाँडो मोल रे ॥४॥
जैसा रंग कुसुंभ का रे, तैसा यह संसार रे ।
रमइया रंग मजीठ का, ता ते भन रैदास बिचार रे ॥५॥
॥ ७३ ॥
प्रीति सुधारन आव ।
तेज सरूपी सकल सिरोमनि, अकल निरंजनराव ॥टेक॥
१ बैल ।