रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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माधो सतगुरु सब जग चेला ।
अब के बिछुरे मिलन दुहेला ॥२॥
धन जोबन की झूठी आसा ।
सत सत भाषै जन रैदासा ॥३॥
॥ ८१ ॥
जन को तारि तारि बाप रमइया ।
कठिन फंद परचो पंच जमइया ॥टेक॥
तुम बिन सकल देव मुनि ढूँढूँ ।
कहूँ न पाऊँ जमपास छुड़इया ॥१॥
हम से दीन दयाल न तुम से ।
चरनसरन रैदास चमइया१ ॥२॥
—:०:—
॥ अथ आरती ॥
॥ ८२ ॥
आरती कहाँ लौँ जोवै ।
सेवक दास अचंभो होवै ॥टेक॥
बावन कंचन दीप धरावै ।
जड़ बैरागी दृष्टि न आवै ॥१॥
कोटि भानु जाकी सोभा रोमै ।
कहा आरती अगनी होमै ॥२॥
पाँच तत्त्व तिरगुनी माया ।
जो देखै सो सकल समाया ॥३॥
कह रैदास देखा हम माहीँ ।
सकल जोति रोम सम नाहीँ ॥४॥
॥ ८३ ॥
संत उतारैँ आरती देव सिरोमनिये ।
उर अंतर तहाँ बैसे बिन रसना भनिये ॥टेक॥
१ चमार ।