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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ३० )
जिव तरसै इक दंग बसेरा,
करहु सँभाल न सुर मुनि मेरा ।
बिरह तपै तन अधिक जरावै,
नीँद न आवै भोज न भावै ॥१॥
सखी सहेली गरब गहेली,
पिउ की बात न सुनहु सहेली ।
मैँ रे दुहागनि अध कर जानी,
गया सो जोबन साध न मानी ॥२॥
तू साईँ औ साहिब मेरा.
खिदमतगार बंदा मैँ तेरा ।
कह रैदास अँदेसा येही,
बिन दरसन क्यौँ जिवहि सनेही ॥३॥
॥ ६२ ॥
हरि बिन नहिँ कोइ पतित पावन, आनहिँ ध्यावे रे ।
हम अपूज्य पूज्य भये हरि ते, नाम अनूपम गावे रे ॥टेक॥
अष्टादस ब्याकरन बखानैँ, तीन काल षट जीता रे ।
प्रेम भगति अंतर गति नाहीँ ता ते धानुक१ नीका रे ॥१॥
ता ते भलो स्वान को सत्रू२, हरि चरनन चित लावै रे ।
मूआ मुक्त बैकुंठ बास, जिवत यहाँ जस पावै रे ॥२॥
हम अपराधी नीच घर जनमे, कुटुँब लोक करै हाँसी रे ।
कह रैदास राम जपु रसना३, कटै जनम की फाँसी रे ॥३॥
॥ ६३ ॥
गोबिंदे तुम्हारे से समाधि लागी,
उर भुअंग भस्म अंग संतत बैरागी४ ॥टेक॥


१ नाम एक नीच जाति का, धुनिया । २ डोम । ३ जीभ । ४ शिव जी
को “सदा जोगी” कहा है।