रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव काहय जात क आछ¹।
जाको जस गावै लोक ॥ ३ ॥
भगति हेत भगता के चले।
अंकमाल ले बीठल मिले² ॥ ४
कोटि जग्य जो कोई करै।
राम नाम सम तउ न निस्तरै ॥
निरगुन का गुन देखो आई।
देही सहित कबीर सिधाई³ ॥ ६
मोर कुचिल जाति कुचिल में बास।
भगत चरन हरिचरन निवास ॥
चारिउ वेद किया खंडौति।
जन रैदास करै डंडौति ॥ ८ ॥
—: * :—
( राग सारंग )
॥ ६८ ॥
जग मेंँ बेद बैद मानीजै।
इनमेंँ और अकथ कछु औरै,
कहौ कौन परि कीजै ॥ टेक ॥
भौजल ब्याधि असाधि प्रबल अति,
परम पंथ न गहीजै ॥ १ ॥
पढ़े-गुने कछु समुझि न परई,
अनुभव पद न लहीजै ॥ २ ॥
१ नामदेव भक्त ओछी जाति के अर्थात् छीपी थे। २ बीठल भक्त जाति के माली
....न ध्यान में लगे रहने से राजा के पास हार न पहुँचा सके सो भगवान् ने
आप उनका रूप धर कर हार पहुँचा दिया। ३ कथा है कि कबीर साहब देह समेत
परलोक को सिधारे [ देखो कबीर साहब का जीवन-चरित्र उनकी शब्दावली के भाग
१ में जो इसी प्रेस में छपी है। ]