रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 38, कुल 52 में से
संदर्भ में पढ़ेंजाके तीन नैन अमृत बैन, सीस जटाधारी ।
कोटि कलप ध्यान अलप, मदन अंतकारी१ ॥१॥
जाके लील बरन अकल ब्रह्म, गले रुंडमाला ।
प्रेम मगन फिरत नगन, संग सखा बाला ॥२॥
अस महेस बिकट भेस, अजहूँ दरस आसा ।
कैसे राम मिलौं तोहिं, गावै रैदासा ॥३॥
॥ ६४ ॥
सो कहा जानै पीर पराई ।
जाके दिल मे दरद न आई ॥टेक॥
दुखी दुहागिनि होइ पियहीना,
नेह निरति करि सेव न कीना ।
स्याम प्रेम का पंथ दुहेला,
चलन अकेला कोइ संग न हेला ॥१॥
सुख की सार सुहागिनि जानै,
तन मन देय अंतर नहिँ आनै ।
आन सुनाय और नहिँ भाषै,
रामरसायन रसना चाखै ॥२॥
खालिक तौ दरमंद२ जगाया,
बहुत उमेद जवाब न पाया ।
कह रैदास कवन गति मेरी,
सेवा बंदगी न जानूँ तेरी ॥३॥
—: ० :—
( राग तोड़ी )
( ६५ )
पावन जस माधो तेरा, तुम दारुन अघमोचन मेरा ॥टेक॥
कीरति तेरी पाप बिनासे, लोक बेद यौं गावै ।
जौं हम पाप करत नहिँ भूधर, तौ तूँ कहा नसावै ॥१॥