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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

(157)
रावणः—सीत ! श्रूयतां मत्पराक्रमः ।
भग्नः शक्रः कम्पितो वित्तनाथः
कृष्टः सोमो मर्दितः सूर्यपुत्रः ।—
धिग् भोः स्वर्गं भीतदेवैर्निविष्टं
धन्या भूमिर्वर्तते यत्र सीता ॥ (१७)
सीता—आर्यपुत्रे !—परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व
परित्रायस्व माम् ।
रावणः—
रामं वा शरणमुपेहि लक्ष्मणं वा
स्वर्गस्थं दशरथमेव वा नरेन्द्रम् ।
किं वा स्यात् कुपुरुषसंश्रितैर्वचोभि
र्न व्याघ्रं मृगशिशवः प्रधर्षयन्ति ॥ (१८)
सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व
परित्रायस्व माम् ।
रावणः—विलपसि किमिदं विशालनेत्रे
विगणय मा च यथा तवार्यपुत्रम् ।
विपुलबलयुतो ममैव योद्धुं
ससुरगणोऽप्यसमर्थ एव रामः ॥ (१६)
सीता—(सरोषम्) शप्तोऽसि ।
रावणः—अहह ! अहो पतिव्रतायास्तेजः ।
योऽहमुत्पतितौ वेगान्न दग्धः सूर्यरश्मिभिः ।
अस्या परिमितैर्दग्धः शप्तोऽसीत्यभिरक्षरैः !। (२०)
सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व ।
रावणः—(सीतां गृहीत्वा) भो भोः । जनस्थानवासिनस्तपस्विनः
शृण्वन्तु भवन्तः ।
बलादेष दशग्रीवः सीतामादाय गच्छति ।
क्षात्रधर्मे यदि स्निग्धः यिङ्कुम् रामः पराक्रम ॥ (२१)
सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व । परित्रायस्व
रावणः—(परिक्रामन् विलोक्य) अये ! स्वपक्षपवनोत्क्षेपक्षुभितव
षण्डश्चण्डचञ्चुरभिधावत्येष जटायुः । आः ! तिष्ठेदानीम्

( 160 )
सीता—आर्य पुत्र, बचाओ, बचाओ । हे लक्ष्मण, मुझे बचाओ, बचाओ ।
रावण—हे दीर्घ नेत्रों वाली सीते, इस तरह क्यों विलाप कर रही हो ? जिस
प्रकार तुम्हारे पतिदेव हैं, मुझे भी वैसे ही समझो । यह राम मुझसे
लड़ने मे असमर्थ है, भले ही बहुत अधिक शक्ति से युक्त एवं देवताओ
के समूह के साथ ही क्यों न हो । (१६)
सीता—(क्रोध में) मैं तुझे शाप देती हूं ।
रावण—अहा हा, वाह रे पतिव्रता का तेज ।
जो मैं आकाश मे चलते समय सूर्य की किरणो से भी नही जलता,
वह इसके "मै शाप देती हूँ" इन थोडे से अक्षरो से कैसे जलूँगा ।
(२०)
सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(सीता को लेकर) अरे रे, जनस्थान मे रहने वाले तपस्वियो, आप
लोग सुनें ।
यह रावण सीता को बलपूर्वक लेकर जा रहा है । यदि राम को
क्षात्र धर्म पर कुछ आस्था हो, तो वह अपना पराक्रम प्रकट करें ।
(२१)
सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(घूमते हुए देख कर) अरे, अपने पंखो की तेज वायु से सारे वनवृक्षों
को कम्पित कर देने वाला ओर भयानक चोंच वाला यह जटायु मेरी
तरफ ही दौट रहा है । अरे, जरा ठहर तो,
मैं अपने हाथो मे तीखी तलवार को निकाल कर तेरे पंखो को काटता
हूँ ओर तुझे खून से भिगो कर यमलोक भेजता हूँ । (२२)
(दोनो का प्रस्थान)
पाँचवाँ अंक समाप्त

षष्ठ अङ्क
(१) मूल
(ततः प्रविशतो वृद्धतापसौ)
उभौ—परित्रायतां परित्रायतां भवन्तः !
प्रथमः—इयं हि नीलोत्पलदामवर्चसा,
मृणालशुक्लोज्ज्वलदंष्ट्रहासिना ।
निशाचरेन्द्रेण निशार्धचारिणा
मृगीव सीता परिभूय नीयते ॥ (१)
द्वितीयः—एषा खलु तत्रभवती वैदेही,
विचेष्टमानेव भुजङ्गमाङ्गना
विधूयमानेव च पुष्पिता लता ।
प्रसह्य पापेन दशाननेन सा
तपोवनात् सिद्धिरिवापनीयते ॥ (२)
उभौ—परित्रायतां परित्रायतां भवन्तः ।
प्रथमः—(ऊर्ध्वमवलोक्य) अये वचनसमकाल एव दशरथस्यानृण्यं
कर्तुम् “मयि स्थिते क्व यास्यसी” ति रावणमाहूयान्तरिक्ष-
मुत्पतितो जटायुः ।
द्वितीयः—एष रोषादुद्वृत्तनयनः प्रतिनिवृत्तो रावणः ।
प्रथमः—एष रावणः ।
द्वितीयः—एष जटायुः ।
उभौ—हन्तैतदन्तरिक्षे प्रवृत्तं युद्धम् ।
प्रथमः—काश्यप ! काश्यप ! पश्य क्रव्यादीश्वरस्य सामर्थ्यम् ।
पक्षाभ्यां परिभूय वीर्यविषयं द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते
तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णमचलः संवेष्टनं चेष्टते ।

तीक्ष्णैरायसकण्टकैरिव नखैर्भीमान्तरं वक्षसो
वज्राग्रैरिव दार्यमाणविषमाच्छैलाच्छिला पाट्यते ॥ (३)
द्वितीयः—हन्त ! सक्रुद्धेन रावणेनासिना क्रव्यादीश्वरः स दक्षिणां-
संदेशे हतः ।
उभौ—हा धिक् । पतितोऽत्रभवान् जटायुः ।
प्रथमः—भोः कष्टम् । एष खलु तत्रभवान् जटायुः ।
कृत्वा स्ववीर्यसदृशं परमं प्रयत्नं
क्रीडामयूरमिव शत्रुमुचिन्तयित्वा ।
दीप्तं निशाचरपतेरवधूय तेजो
नागेन्द्रभग्नवनवृक्ष इवावसन्नः ॥ (४)
उभौ—स्वर्ग्योऽयमस्तु ।
प्रथमः—काश्यप ! आगम्यताम् । इमं वृत्तान्तं तत्रभवते राघवाय
निवेदयिष्यावः ।
द्वितीयः—बाढम् । प्रथमः कल्पः । (निष्क्रान्तौ)
(विष्कम्भः)
शब्दार्थ—परित्रायता = सीता की रक्षा करो । भवन्त = हे जन-
स्थान के रहने वालो । नीलोत्पलदामवर्चसा = नील कमलों की माला के
समान तेज वाला । मृणालशुक्ला = कमल तन्तु के समान श्वेत । उज्ज्वल-
दंष्ट्रहासिना = हँसते समय चमकीले दाँतो वाला । निशाचरेन्द्रेण = रावण के
द्वारा । निशार्धचारिणा = चोर के द्वारा । मृगीव - हरिणी की भाँति ।
परिभूय -- दुःख देकर । नीयते = ले जाई जा रही है । विचेष्टमाना = छट-
पटाती हुई । भुजङ्गमाङ्गना = सर्पिणी । विधूयमाना = काँपती हुई ।
पुष्पिता = खिली हुई । प्रसह्य = बलपूर्वक । पापेन = बुरा कार्य करने वाले ।
दशाननेन = रावण के द्वारा । सिद्धिः = तपस्या की फल सम्पत्ति । अपनीयते
= अपहरण की जा रही है । वचनसमकाले = बोलने के साथ ही । आनृण्यम्
= मित्रता का बदला । कर्तुम् = चुकाने के लिए । यास्यसि = जाओगे ।

प्राहूय = आवाहन करके अर्थात् बुला कर । अन्तरिक्ष = आकाश में ।
उत्पतितः = उड़ गया । रोषात् = क्रोध से । उद्वृत्तनयन. = आँखें निकाल
कर । प्रतिनिवृत्तः = वापस लौटा । जटायुः = गिद्ध, सम्पाति का भाई ।
प्रवृत्त = प्रारम्भ हो गया । काश्यप = एक वृद्ध तापस का नाम । क्रव्यादीश्व-
रस्य = क्रव्याद = कच्चे मास को खाने वाला, उसका ईश्वर = स्वामी अर्थात्
जटायु के । सामर्थ्यम् = शक्ति । पक्षाभ्यां = दोनो पक्षों से । परिभूय = मार
कर । वीर्यविषयं = अपने पराक्रम के लक्ष्य को । द्वन्द्वं = रावण से । प्रति-
व्यूहते = युद्ध कर रहा है । तुण्डाभ्या = दोनों चोचो से । सुनिघृष्टतीक्ष्णम् =
अच्छी तरह घिसी होने से तीखी बनी । अचल. = धीर । संवेष्टनं = भली
पकड़ के साथ । चेष्टते = प्रयास कर रहा है। तीक्ष्णैः = तीखे । आयसकण्टकैः
= लौह निर्मित कीले । भीमान्तर = भयंकर अन्त स्थित मास आदि । वक्षसः
= छाती से । वज्राग्रैः = वज्र की नोक के तुल्य । दार्यमाणविषमात् =
फाडने से अन्दर की वस्तु के प्रत्यक्ष हो जाने से भीषण । शैलात् = पर्वत से ।
शिला = पत्थर के समान । पाट्यते = तोड कर ले रहा है । असिना =
तलवार से । दक्षिणासदेशे = दाहिने कन्धे की ओर । हतः = मार डाला ।
पतितः = गिर पड़ा । स्ववीर्यसदृश = अपनी शक्ति के अनुसार । परमं =
उत्तम । क्रीडामयूरं = खेलने के मोर की तरह । अचिन्तयित्वा = नही गिन
कर । दीप्तं = भली प्रकार से प्रज्वलित । निशाचरपतेः = रावण के । अव-
धूय = तिरस्कार करके । तेज. = पराक्रम को । नागेन्द्रभग्नवनवृक्ष इव =
हाथी द्वारा तोडे गए जंगल के वृक्ष के समान । अवसन्नः = नष्ट हो गया ।
स्वर्ग्यः = स्वर्ग के योग्य । वृत्तान्त = समाचार को । बाढम् = उचित । प्रथमः
मुख्य । कल्प. = प्रस्ताव ।
अन्वय—नीलोत्पलदामवर्चसा मृणालशुक्ला उज्ज्वलदंष्ट्रहासिना
निशार्धधारिणा निशाचरेन्द्रेण इयं सीता मृगी इव परिभूय नीयते हि । (१)
अन्वय—विचेष्टमाना भुजगमांगना इव च विधूयमाना पुष्पिता लता
इव सा सिद्धिः इव पापेन दशाननेन तपोवनात् प्रसह्य नीयते । (२)
अन्वय—(अयम्) पक्षाभ्या परिभूय वीर्यविषय द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते,
अचलः तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णम् संवेष्टनं चेष्टते, आयसकण्टकैः इव तीक्ष्णैः

चतुर्थ एवं पञ्चमांक: भरत-राम मिलन, पादुका-प्रदान एवं पंचवटी प्रसंग

( 164 )
नखैः वक्षसः भीमान्तर वज्राग्रैः दार्यमाणविष्मृात् शैलात् शिला
पाट्यते । (३)
अन्वय-(एषः) शत्रुम् क्रीडामयूरम् इव अचिन्तयित्वा । स्ववीर्यस
परमं प्रयत्न कृत्वा, निशाचरपतेः दीप्त तेजः अवधूय नागेन्द्रभग्नवनवृक्षः
अवसन्नः । (४)
हिन्दी अर्थ
(इसके बाद दो वृद्ध तपस्वी प्रवेश करते है)
दोनो—आप लोग बचाइए, बचाइए ।
पहला—यह सीता रावण के द्वारा बलपूर्वक हरी जा रही है, जैसे सिंह के
द्वारा कोई हरिणी हो । यह रावण नील कमलों की माला के समान
श्याम वर्ण का है । हँसने के समय कमल तन्तु की तरह श्वेत दन्त
पंक्ति वाला है एव आधी रात को विचरण करने वाला है । (१)
दूसरा—यह देवी सीता,
छटपटाती हुई नागिन की तरह, कांपती हुई पुष्पलता की तरह, पापी (२)
दशानन रावण के द्वारा तपोवन से तपस्या की फल सिद्धि की तरह
जबर्दस्ती ले जाई जा रही है । (२)
दोनों—आप लोग बचाइए, बचाइए ।
पहला—(ऊपर देख कर) अरे, हमारे पुकारते ही यह जटायु दशरथ से
उऋण होने के लिए "मेरे रहते तू कहाँ जायेगा" इस तरह रावण
को ललकार आकाश मे उड़ा ।
दूसरा—यह रावण क्रोध से आंखें निकाल कर वापस लौटा ।
पहला—यह रावण है ।
दूसरा—यह जटायु है ।
दोनों—हाय, आकाश मे ही युद्ध छिद गया ।
पहला—काश्यप, काश्यप, गृध्रराज जटायु के पराक्रम को देखो ।
यह अपने पखो से रावण पर प्रहार करता हुआ उससे वीरतापूर्वक
द्वन्द्व युद्ध कर रहा है । खूब डट कर अपने तीखे चंचु युगल द्वारा उसे
काट खाने की चेष्टा कर रहा है। वह लौह कण्टक युक्त नखो से
रावण की छाती पर भयानक तथा विस्तृत घाव इस तरह पैदा कर

रहा है, मानो वज्र की नोकों द्वारा कठोर शिला फाड़ी जा रही
हो । (३)

  • अरे, क्रोधित रावण ने जटायु के दाहिने कन्धे पर तलवार का प्रहार
    कर दिया ।
  • हाय, धिक्कार है । यहं जटायु तो गिर पड़ा ।
    ला - अरे, बड़ा दुख है । यह पूज्य जटायु 'सचमुच में—अपने पराक्रम के
    समान पूरी तरह से प्रयास करके, खिलौने के बने मोर के समान
    शत्रु रावण की परवाह न करके, राक्षसराज की प्रचण्ड शक्ति को
    दबा कर उसी प्रकार समाप्त हो गया है, जैसे किसी गजराज के
    द्वारा उत्पादित कोई वन वृक्ष उखाड़ कर फेंका गयां हो । (४)
    दोनों—इसे स्वर्ग प्राप्त हो ।
    पहला—काश्यप, आओ । ये समाचार श्री राम को दे ।
    दूसरा—अच्छा । यह तो पहला काम है । (दोनों निकल जाते है)
    (विष्कम्भक समाप्त हुआ)
    (2) मूल
    (ततः प्रविशति काञ्चुकीयः)
    काञ्चुकीयः—क इह भोः ! काञ्चनतोरणद्वारमशून्यं कुरुते ?
    (प्रविश्य)
    प्रतिहारी—आर्य ! ग्रहं विजया । किं क्रियताम् ?
    काञ्चुकीयः—विजये ! निवेद्यता निवेद्यता भरतकुमाराय- "एष खलु
    रामदर्शनार्थम् जनस्थानं प्रस्थितः प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान्
    सुमन्त्र" इति ।
    प्रतिहारी—आर्य ! अपि कृतार्थस्तातसुमन्त्र आगतः ?
    काञ्चुकीयः—भवति ! न जाने ।
    हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननमागतम्
    दृष्ट्वैवाकुलमासीन्मे सुमन्त्रमधुना मनः ॥ (५)
    प्रतिहारी—आर्य ! एतच्छ्रुत्वा पर्याकुलमिव मे हृदयम् ।
    काञ्चुकीयः—भवति ! किमिदानीं स्थिता ? शीघ्रं निवेद्यताम् ।
    प्रतिहारी—आर्य ! इयं निवेदयामि । (निष्क्रान्त)

( 166 )
काञ्चुकीयः— (विलोक्य) अये ! अयमत्रभवान् भरतकुमारः
सुमन्त्रागमनजनितकुतूहलहृदयश्चीरवलकलवसनश्चित्रजटा-
पुञ्जरितोत्तमाङ्ग इत एवाभिवर्तते । य एषः-
प्रख्यातसद्गुणगणः प्रतिपक्षकाल
स्तिग्मांशुवंशतिलकस्त्रिदशेन्द्रकल्पः ।
आज्ञावगादखिलभूपरिरक्षणस्थः
श्रीमानुदारकलभेभसमानयानः ॥ (६)
(ततः प्रविशति भरतः प्रतिहारी च)
भरतः-—विजये ! एवमुपगतस्तत्रभवान् सुमन्त्रः ?
गत्वा तु पूर्वमयमार्थनिरीक्षणार्थम्
लब्धप्रसादशपथे मयि सन्निवृत्ते ।
दृष्ट्वा किमागत इहात्रभवान् सुमन्त्रो
रामं प्रजानयनबुद्धिमनोभिरामम् ॥ (७)
काञ्चुकीयः-- (उपगम्य) जयतु कुमारः ।
भरतः—अथ कस्मिन् प्रदेशे वर्तते तत्रभवान् सुमन्त्रः !
काञ्चुकीय.—असौ काञ्चनतोरणद्वारे ।
भरतः—तेन हि शीघ्रं प्रवेश्यताम् ।
काञ्चुकीयः—यदाज्ञापयति कुमार. । (निष्क्रान्तः)
शब्दार्थ-कांचन=सुवर्णरचित । तोरणद्वारं=बाहर का दरवाजा ।
अशून्यं कुरुते=सूने से रहित कर रहा है अर्थात् विद्यमान है । प्रतिहारी=
द्वारपालिका । विजया=द्वारपालिका का नाम । क्रियताम्=किया जाए ।
निवेद्यतां=निवेदन करो । रामदर्शनार्थम्=राम से मिलने के लिए । जनस्थानं=
स्थान का नाम । प्रतिनिवृत्तः=वापस लौटे हैं । प्रस्थितः=गए हुए । कृतार्थः=
सफल मनोरथ वाले । अपि=क्या (अपि जब वाक्य के प्रारम्भ मे प्रयुक्त होता
है, तो प्रश्न वाचक हो जाता है) । भवति=हे देवी । जाने=जानता हूँ ।
शोषितमाननं = सूखे मुह वाले । आकुलम्=व्यग्र । जनितं=उत्पन्न । कुतूहल=
उत्कण्ठा । चीरवलकलवसनं=वृक्ष की त्वचा के वस्त्र पहनने वाले । चित्र=
नाना प्रकार की । जटापुञ्ज=जटाओ का समूह । पुञ्जरितोत्तमाङ्गः=पीले रंग
के शिर वाले । इत एव=इधर ही । अभिवर्तते=आ रहे है । प्रख्यातसद्गुण

( 167 )
...गणः = सुप्रसिद्ध अच्छे गुणों का समूह । प्रतिपक्षकालः = शत्रुओं के लिए
मृत्यु । तिग्मांशुवंशतिलकः = सूर्य वंश का भूषण भूत । त्रिदशेन्द्रकल्पः = इन्द्र
से कुछ कम । आज्ञावशात् = राम के आदेश के अनुरोध से । अखिलभूपरि-
रक्षणस्थः = सारी भूमि के पालन के अधिकार में स्थित । श्रीमान् = प्रशस्त
लक्ष्मी वाले । उदारकलभेभसमानयानः = प्रशस्त ३० वर्ष के हाथी के समान
गति वाले । उपगतः = आ गए हैं । लब्धप्रसादशपथे = पादुका रूप कृपा और
१४ वर्ष बाद राज्य ले लूँगा रूपी सौगन्ध को ग्रहण करने वाले । मयि
संनिवृत्ते = मेरे राम के पास से लौटने पर । प्रजानयनबुद्धिमनोभिरामम् =
प्रजा के नेत्र और बुद्धि के लिए सुन्दर बने (राम को) ।
अन्वय—अधुना हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननम् आगतं सुमन्त्र
दृष्ट्वा एवं मे मनः आकुलम् आसीत् (५)
अन्वय—प्रख्यातसद्गुणगणः प्रतिपक्षकालः तिग्मांशुवंशतिलकः त्रिद-
शेन्द्रकल्पः आज्ञावशात् अखिलभूपरिरक्षणस्थः श्रीमान् उदारकलभेभसमान-
यानः (भरतोऽस्ति) । (६)
अन्वय—लब्धप्रसादशपथे मयि संनिवृत्ते अयम्, अत्रभवान् सुमन्त्रः
पूर्वम् आर्यनिरीक्षणार्थम् गत्वा प्रजानयनबुद्धिमनोभिरामम् 'रामं' दृष्ट्वा इह
आगतः किम् । (७)
हिन्दी अर्थ
(कंचुकी का प्रवेश)
काञ्चुकीय—अरे, यहा कौन है ? काञ्चन तोरण द्वार पर कौन उपस्थित
है ?
(प्रवेश करके)
प्रतिहारी—आर्य, मैं विजया हूँ । क्या किया जाए ?
काञ्चुकीय—विजये, कुमार भरत से कहो कि राम से मिलने के लिए
जनस्थान गए हुए श्री सुमन्त्र वापस लौट आए हैं ।
प्रतिहारी—आर्य, क्या तात सुमन्त्र सफल मनोरथ होकर आए हैं ।
काञ्चुकीय—हे देवी, मुझे पता नहीं ।
अभी आए हुए सुमन्त्र को देख कर मेरा मन व्याकुल हो रहा है ।
उनका मुख हृदय मे विद्यमान दुःख रूपी अग्नि से सूखा हुआ
है । (५)

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[Page 169]

श्रुत इह स च मैथिलीप्रणाशो
गुण इव बह्वपराद्धमायुषा मे ॥ (८)
प्रतिहारी-(सुमन्त्रमुद्दिश्य) एत्वेत्वार्यः । एष भर्ता । उपसर्पत्वार्यः
सुमन्त्रः-(उपसृत्य) जयतु कुमारः ।
भरतः-तात ! अपि दृष्टस्त्वया लोकाविष्कृतपितृस्नेहः । अपि दृष्टं
द्विधाभूतमरुन्धतीचारित्रम् । अपि दृष्ट त्वया निष्कारणा-
वहितवनवासं सौभ्रात्रम् ।
(सुमन्त्रः सचिन्तस्तिष्ठति)
प्रतिहारी-भर्तृदारकः खल्वार्यम् पृच्छति ।
सुमन्त्रः-भवति ! किं माम् ?
भरतः-(स्वगतम्) अतिमहान् खल्वायासः । सन्तापाद् भ्रष्ट-
हृदयः । (प्रकाशम्) अपि मार्गात् प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान् ?
सुमन्त्रः-कुमार ! त्वन्नियोगाद् रामदर्शनार्थम् जनस्थानं प्रस्थितः
कथमहमन्तरा प्रतिनिवर्तिष्ये ।
भरतः-किन्नु खलु क्रोधेन वा लज्जया वात्मानं न दर्शयन्ति ?
सुमन्त्रः-कुमार !
कुतः क्रोधो विनीतानां लज्जा वा कृतचेतसाम् ।
मया दृष्टं तु तच्छून्यं तैर्विहीनं तपोवनम् ॥ (९)
भरतः अथ क्व गता इति श्रुताः ।
सुमन्त्रः-अस्ति किल किष्किन्धा नाम वनौकसां निवासः । तत्र गता
इति श्रुताः ।
भरतः-हन्त ! अविज्ञातपुरुषविशेषाः खलु वानराः दुःखिता प्रति-
वसन्ति ।
सुमन्त्रः-कुमार ! (तिर्यग्योनयोऽप्युपकृतमवगच्छन्ति ।)
भरतः-तात ! कथमिव ।
सुमन्त्रः-सुग्रीवो भ्रंशितो राज्याद् भ्रात्रा ज्येष्ठेन वालिना ।
हृतदारो वसञ्शैले तुल्यदुःखेन मोक्षितः ॥ (१०)
भरतः-तात ! कथं तुल्यदुःखेन नाम ?

( 170 )

सुमन्त्रः—(आत्मगतम्) हन्त ! सर्वमुक्तमेव मया । (प्रकाशम्)
कुमार ! न खलु किञ्चित् । ऐश्वर्यभ्रंशतुल्या समाभिप्रेता ।
भरतः—तात ! किं गूहसे ? स्वर्गं गतेन महाराजपादमूलेन शापितः
स्याः, यदि सत्यं न ब्रूयाः ।
सुमन्त्रः—का गतिः । श्रूयताम् ।
वैरं मुनिजनस्यार्थे रक्षसा महता कृतम् ।
सीता मायामुपाश्रित्य रावणेन ततो हृता ॥ (११)
शब्दार्थ—नरपतिनिधनं = दशरथ की मृत्यु । मया = मुझ सुमन्त्र के
द्वारा । अनुभूतं = प्रत्यक्ष की गई । नृपतिसुतव्यसनं = राम का वनवास जन्य
दुःख । श्रुतः = ज्ञात हुआ । इह = इस उम्र में । स = वह प्रसिद्ध । मैथिलीप्रणाशः
= सीता का हरण । उद्दिश्य = लक्ष्य करके । एतु = आयो भर्ता = स्वामी भरत ।
उपसर्पतु = समीप में आयो । लोकाविष्कृतपितृस्नेहः = संसार में पिता की भक्ति
को प्रकट करने वाले राम । द्विधाभूतम् = दूसरे रूप में स्थित । अरुन्धतीचा-
रित्रम् = वसिष्ठ की पत्नी का पातिव्रत्य अर्थात् सीता । निष्कारणविहितवन-
वासं = बिना कारण के वनवास भोगने वाले । सौभ्रात्रम् = भाई का स्नेह
अर्थात् लक्ष्मण । सचिन्त. = चिन्ता युक्त । भर्तृदारकः = राजकुमार भरत ।
अतिमहान् = अत्यधिक । आयामः = खेद । सन्तापात् = शोक से । भ्रष्टहृदयः
= चंचल चित्त वाले । प्रतिनिवृत्तः = वापस आ गए । नियोगात् = आज्ञा से ।
अन्तरा = बीच से ही । विनीतानां = नम्र व्यक्तियों को । कृतचेतसां = सुसंस्कृत
चित्त वालों को । तच्छून्यं = तत् + शून्यं = उनसे रिक्त । विहीन = विरहित ।
श्रुताः = सुना है । किष्किंधा = नगरी का नाम वालि-सुग्रीव की राजधानी ।
वनौकसां = वानरों का । निवासः = आवास स्थान । अविज्ञातपुरुषविशेषाः =
मनुष्यों के तारतम्य को न जानने वाले । दुःखिताः = पीड़ित । तिर्यग्योनयः =
कीट आदि पशु । उपकृतं = उपकार को । अवगच्छति = समझते हैं । भ्रंशितः
राज्यात् = राज लक्ष्मी से अपहृत हुआ । ज्येष्ठेन = बड़े । हृतदारः = पत्नी का
अपहरण हो जाने वाला । वसञ्छैले = वसन् + शैले = पर्वत पर रहते हुए ।
तुल्यदुःखेन = समान कष्ट से । मोक्षितः = छुड़ा दिया गया । अभिप्रेता = कहने
का आशय । गूहसे = छिपा रहे हो । शापितः स्याः = तुमको सौगन्ध है । ब्रूयाः

( 171 )
=तुमने कहा। गतिः=अवस्था। अर्थे=लिए। महता रक्षसा=बलवान् राक्षस
रावण के साथ। मायां=कपट को। उपाश्रित्य=ग्रहणं करके। ततः=इसके
बाद। हृता=चुराई गई।
अन्वय—मया नरपतिनिधनम् अनुभूतम्। मया एव नृपतिसुतव्यसनं
दृष्टम्। च इह सः मैथिलीप्रणाशः श्रुतः। मे आयुषा गुण इव बहु
अपराद्धम्। (८)
अन्वय—विनीतानां क्रोधः कुतः। वा कृतचेतसां लज्जा। मया तैः
विहीनम् तत् शून्यं तु तपोवनं दृष्टम्। (६)
अन्वय—ज्येष्ठेन भ्रात्रा वालिना राज्यात् भ्रंशित. हतदारः शैले
वसन् सुग्रीवः तुल्यदुःखेन मोक्षितः। (१०)
अन्वय—मुनिजनस्य अर्थे महता रक्षसा वैरं कृतम्, ततः रावणेन
मायां उपाश्रित्य सीता हृता। (११)
हिन्दी अर्थ
(इसके बाद सुमन्त्र और प्रतिहारी का प्रवेश)
सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) अरे, बड़ा दुःख है।
मैने राजा दशरथ की मृत्यु का अनुभव किया। मैंने ही राम का
वनवास भी देखा। अब यही पर सीता का अपहरण भी सुन
लिया है। मेरी लम्बी आयु ने गुण के बदले अपराध ही अधिक
किए। (८)
प्रतिहारी— (सुमन्त्र को लक्ष्य करके) आर्य, आइए, आइए। ये स्वामी है।
इनके समीप जाइए।
सुमन्त्र—(पास जाकर) राजकुमार की जय हो।
भरत—तात, क्या आपने राम को देखा जिन्होंने संसार में पितृभक्ति
प्रकट की है। क्या आपने सीता को देखा, जिस मे पतिव्रता
अरुन्धती का दूसरा चरित्र प्राप्त होता है। क्या आपने लक्ष्मण को
देखा, जिसने अपने भाई के स्नेह से बिना किसी कारण के वनवास
को ग्रहण किया है।
(सुमन्त्र चिन्ताग्रस्त से खड़े रहते है)
प्रतिहारी—राजकुमार आप से ही पूछ रहे हैं।
सुमन्त्र—हे देवी, क्या मुझ से?

( 172 )

भरत—(मन में) सचमुच में महान् दुःख है। पीड़ा के कारण इनका हृदय
स्थिर नहीं है। (प्रकट में) क्या आप बीच में से ही लौट आए?
सुमन्त्र—राजकुमार, आपके आदेश से मैं राम के दर्शन के लिए जनस्थान
गया हुआ बीच से ही कैसे लौट आता?
भरत—कहीं वे लोग क्रोध और संकोच के कारण अपने को छिपा कर तो
नहीं रहते?
सुमन्त्र—राजकुमार,
विनयी जनों को क्रोध कहाँ और निर्मल अन्तःकरण में लज्जा का
प्रवेश कहाँ? किन्तु जब मैंने तपोवन देखा, तब वह उन लोगों से
रहित तथा सूनसान था। (६)
भरत—तो फिर वे कहाँ चले गए, कुछ सुना।
सुमन्त्र—किष्किन्धा नामक नगर वानरों का निवास स्थान है। वहाँ चले
गए, ऐसा सुना है।
भरत—हाय, वानरों का तो मनुष्यों से परिचय नहीं होता। वहाँ वे कष्ट
से रहते होंगे।
सुमन्त्र—कुमार, पशु-पक्षी भी उपकार मानते हैं।
भरत—तात, किस प्रकार?
सुमन्त्र—सुग्रीव नाम के एक वानर को उसके बड़े भाई बाली ने
राज्यच्युत कर दिया था और उसकी स्त्री भी छीन ली थी। पर्वत
पर रहने वाले उस सुग्रीव को 'उसके समान दुःख वाले' राम ने
कष्टमुक्त कर दिया। (१०)
भरत—तात, 'उसके समान दुःख वाले' का आशय क्या है?
सुमन्त्र—(मन में) हाय, मैंने तो सब कुछ कह दिया। (सबके सामने)
कुमार, कुछ नहीं। मेरा आशय राज्य नहीं प्राप्त होने की समानता
से है।
भरत—तात, क्यों छिपा रहे हैं? यदि सच बात नहीं बताई तो आपको
स्वर्गवासी महाराज दशरथ के चरणों की शपथ है।
सुमन्त्र—क्या उपाय है? सुनो,
मुनियों की रक्षा के कारण बलवान् राक्षसों से शत्रुता हो गई थी।

( 173 )
इसी कारण रावण ने कपट वेश धारण करके सीता का हरण
कर लिया। (११)
(४) मूल
भरतः—कथं हृतेति? (मोहमुपगतः)
सुमन्त्रः—समाश्वसिहि, समाश्वसिहि।
भरतः—(पुनः समाश्वस्य) भोः! कष्टम्।
पित्रा च वान्धवजनेन च विप्रयुक्तो
दुःखं महत् समनुभूय वनप्रदेशे।
भार्यावियोगमुपलस्य पुनर्ममार्यो
जीमूतचन्द्र इव खे प्रभया वियुक्तः॥ (१२)
भोः! किमिदानीं करिष्ये? भवतु, दृष्टम्। अनुगच्छतु
मां तातः।
सुमन्त्रः—यदाज्ञापयति कुमारः।
(उभौ परिक्रामतः)
सुमन्त्रः—कुमार! न खलु न खलु गन्तव्यम्। देवीनां चतुश्शालमिदम्।
भरतः—अत्रैव मे कार्यम्। भोः! क इह प्रतिहारे?
(प्रविश्य)
प्रतिहारी—जयतु भर्तृदारकः। विजया खल्वहम्।
भरतः—विजये! ममागमनं निवेदयात्रभवत्यै।
प्रतिहारी—कतमस्यै भट्टिन्यै निवेदयामि।
भरतः—या मां राजानमिच्छति।
प्रतिहारी—(आत्मगतम्) हं किन्नु खलु भवेत्? (प्रकाशम्)
भर्तः! तथा।
(ततः प्रविशति कैकेयी प्रतिहारी च)
कैकेयी—विजये! मां प्रेक्षितुं भरत आगतः।
प्रतिहारी—भट्टिनि! तथा। भर्तृदारकस्य रामस्य सकाशात् तात-
सुमन्त्र आगतः। तेन सह भर्तृदारको भरतो भट्टिनीं
प्रेक्षितुमिच्छति किल।
कैकेयी—(स्वगतम्) केन खलूद्घातेन मामुपालप्स्यते भरतः?
प्रतिहारी—भट्टिनि! किं प्रविशतु भर्तृदारकः?

( 176 )
प्रतिहारी—(मन में) अरे, अब क्या होगा ? (प्रकट में) स्वामी, अच्छा ।
(इसके बाद कैकेयी और प्रतिहारी का आगमन)
कैकेयी—विजये, क्या भरत मुझसे मिलने आया है ?
प्रतिहारी—महारानी, हा राजकुमार राम के पास से तात सुमन्त्र आए हैं .
उनके साथ राजकुमार भरत ने महारानी ने मिलने की इच्छा
प्रकट की है ।
कैकेयी—(मन में) न जाने किस बात पर भरत ताडना देगा ।
प्रतिहारी—महारानी, क्या राजकुमार आ जाएं ?
कैकेयी—जाओ । उन्हें भेज दो ।
प्रतिहारी—महारानी, ठीक है । (घूम कर ओर पास जाकर) राजकुमार की
जय हो । आप प्रवेश कीजिए ।
भरत—विजये, क्या सूचना दे दी ?
प्रतिहारी—हाँ ।
भरत—तो फिर हम दोनों प्रवेश करे । (प्रवेश करते हैं)
कैकेयी—पुत्र, विजया ने कहा है कि राम के पास से सुमन्त्र आए हैं ?
भरत—आपको मैं इससे भी अच्छी सूचना दे रहा हूँ ।
कैकेयी—पुत्र, तब तो क्या कौसल्या और सुमित्रा को भी बुला लें ?
भरत—नही, उन्हें नहीं सुनाना चाहिए ।
कैकेयी—(मन मे) अरे, पता नहीं क्या बात है । (प्रकट में) पुत्र, कहो तो ।
भरत—सुनो,
जो अपने राज्य का परित्याग करके तुम्हारी आज्ञा से वन में गए थे,
उनकी पत्नी सीता का अपहरण हो गया है । अब तो तुम्हारी
इच्छा पूरी हुई । (१३)
कैकेयी—अहो !
भरत—हाय, दुःख है कि तुम्हारी जैसी बहू को पाकर अत्यन्त पराक्रमी और
सम्मान वाले इक्ष्वाकु वंश के लोगों को अपनी स्त्री के अपहरण को
भी देखना पडा । (१४)

( १७७ )

मूल
कैकेयी—(आत्मगतम्) भवतु , इदानीं कालः कथयितुम् । (प्रकाशम्)
जात ! त्वं न जानासि महाराजस्य शापम् ।
भरतः—किं शप्तो महाराजः ?
कैकेयी—सुमन्त्र ! आचक्ष्व विस्तरेण ।
सुमन्त्र—यदाज्ञापयति भवती । कुमार ! श्रूयताम्—पुरामृगयां गतेन
महाराजेन कस्मिंश्चित् सरसि कलश पूरयमाणो वनगजवृं हि-
तानकारिशब्दसमुत्पन्नवनगजशङ्कया शब्दवेधिना शरेण
विपन्नचक्षुषो महर्षेश्चक्षुर्भूतो गुणितनयो हिंसितः ।
भरतः—हिंसित इति । शान्तं शान्तं पापम् । ततस्ततः ?
सुमन्त्रः—ततस्तमेव गतं दृष्ट्वा,
तेनोक्तं रुदितस्यान्ते मुनिना सत्यभाषिणा ।
यथाहं भोस्त्वमप्येवं पुत्रशोकाद् विपत्स्यते ॥ (१५) इति ।
भरतः—नन्विदं कष्टं नाम ।
कैकेयी—जात ! एतन्निमित्तमपराध मा निक्षिप्य पुत्रको रामो वनं
प्रेषितः, न खलु राज्यलोभेन । अपरिहरणीयो महर्षिशापः
पुत्रविप्रवासं विना न भवति ।
भरतः—अथ तुल्ये विप्रवासे कथमहमरण्यं न प्रेषितः ?
कैकेयी—जात ! मातुल कुले वर्तमानस्य प्रकृतिभूतस्ते विप्रवासः ।
भरत—अथ चतुर्दश वर्षाणि किं कारणमवेक्षितानि ?
कैकेयी—जात ! चतुर्दश दिवसा इति वक्तुकामया
पर्याकुलहृदयया चतुर्दश वर्षाणीत्युक्तम् ।
भरतः—अस्ति पाण्डित्यं सम्यग् विचारयितुम् । अपि विदितमेतद्
गुरुजनस्य ?
सुमन्त्रः—कुमार वसिष्ठवामदेवप्रभृतीनामनुमतं विदितं च ।
भरतः—हन्त ! त्रैलोक्यसाक्षिणः खल्वेते । दिष्ट्यानपराद्धात्रभवती ।
अम्ब ! यद् भ्रातृस्नेहात् समुत्पन्नमन्युना मया दूषितात्रभवती,
तत्सर्वं मर्षयितव्यम् । अम्ब ! अभिवादये ।

(184)
तापस-- नन्दिलक, कुलपति ने कहा है कि अपनी स्त्री का अपहरण करने
वाले, तीनो लोको को व्याकुल करने वाले रावण को मारकर, राक्षसी
आचरण के विरुद्ध, अनेक गुणो से मण्डित विभीषण का अभिषेक
करके, देवताओं और ऋषियो के सम्मुख अपने पवित्रचरित्र को
प्रमाणित करने वाली देवी सीता को लेकर, भालू, वानरो और
राक्षसों के प्रमुख व्यक्तियो से घिरे हुए श्री राम यहाँ आए हुए
है, जो शरद् ऋतु के स्वच्छ आकाश के चन्द्रमा के समान सुशोभित
हो रहे है। आज इस तपोवन मे अरण्य सुलभ भोग-वैभव के अनुसार
उनका स्वागत करने के लिए जो अभीष्ट है, वह सब सज्जित करके
रखा जाए।
नन्दिलक--आर्य, सब कुछ तैयार है। किन्तु,
तापस--यह क्या ?
नन्दिलक--यहाँ विभीषण के साथ अन्य राक्षस भी है। उनके खाने के
सम्बन्ध में कुलपति ही जानें।
तापस--किसलिए ?
नन्दिलक--वे तो मांस भी खाते है।
तापस--अरे, मत घबराओ। वे राक्षस तो विभीषण के वश में रहने
वाले है।
नन्दिलक--तो ऐसे सज्जन राक्षस को नमस्कार। (निकल जाता है)
तापस--(देख कर) अरे, ये तो श्रीमान् राम है। जो-
"हे मनुष्यो मे श्रेष्ठ, आपकी जय हो। आप अपने दूसरे शत्रुओ पर
भी विजय प्राप्त करें। यह पृथ्वी एकच्छत्र वाली होकर
आपके अधीन हो" इस प्रकार प्रसन्न बने बहुत से मुनियो द्वारा
प्रशंसित होकर राजा राम पुष्पक- विमान से पृथ्वी तल पर
उतर गए है। (१)

( 185 )
(२) मूल
(ततः प्रविशति रामः)
रामः--भोः !
समुदितबलवीर्यम् रावणं नाशयित्वा
जगत्ति गुणसमग्रां प्राप्य सीतां विशुद्धाम् ।
वचनमपि गुरूणामन्तः पूरयित्वा
मुनिजनवनवासं प्राप्तवानस्मि भूयः ॥ (२)
तापसीनांमभिभवनार्थमभ्यन्तरं प्रविष्टा चिरायते खलु मैथिली ।
(विलोक्य) अये ! इयं वैदेही,
सरवीति सीतेति च जानकीति
यथावयः स्निग्धतरं स्नुषेति ।
तपस्विदारैर्जनकन्द्रपुत्री
सम्भाष्यमाणा समुपैति मन्दम् ॥ (३)
(ततः प्रविशति सीता तापसी च)
तापसी—हला ! एष ते कुटुम्बिकः । उपसर्पैनम् । न शक्यं त्वामे-
काकिनीम् प्रे क्षितुम् ।
सीता—हम्, अद्यात्यविश्वसनीयमिव मे प्रतिभाति । (उपसृत्य) जय-
त्वार्यपुत्रः ।
रामः—मैथिलि ! अपि जानासि, पूर्वाधिष्ठानमस्माकं जनस्थानमा-
सीत् । अप्यत्र ज्ञायन्ते पुत्रकृतका वृक्षाः ।
सीता—जानामि जानामि । अवलोकितंपत्रका उल्लोकयितव्या
इदानी संवृत्ताः ।
रामः—एवमेतत् । निम्नस्थलोत्पादको हि कालः । मैथिलि ! अप्यु-
पलभ्यतेऽस्य सप्तपर्णस्याधस्ताच्छुक्लवाससं भरतं दृष्ट्वा परि-
त्रस्तं मृगयूथमासीत् ।
सीता—आर्यपुत्र ! दृढं खलु स्मरामि ।
रामः—अयं तु नस्तपसः साक्षिभूतो महाकच्छः ।

( 186 )
अत्रास्माभिरासीनैस्तातस्य निवपनक्रिया।
चिन्तयद्भिः काञ्चनपार्श्वो नाम मृगो दृष्टः ।
सीता—हम् आर्यपुत्र ! मा खलु मा खल्वेवं भणितुम् । (भीता वेपते)
रामः—अलमलं सम्भ्रमेण । अतिक्रान्तः खल्वेषकालः । (दिशो
विलोक्य) अये कुतो नु,
रेणुः समुत्पतति लोध्रसमानगौरः
सम्प्रावृणोति च दिशः पवनावधूतः ।
शङ्खध्वनिश्च पटहस्वनधीरनादः
सम्मूर्च्छितो वनमिदं नगरीकरोति ॥ (४)
शब्दार्थ—समुदितबलवीर्यम् = अच्छी तरह से बढ़ी हुई शक्ति वाले ।
जगति=संसार मे । गुणसमग्राम् = सभी गुणों से युक्त । विशुद्धाम्=पवित्र ।
गुरुणाम्=पिता आदि के । अन्तशः=अक्षरशः या पूरी तरह से । पूरयित्वा=
पूरा करके । प्राप्तवान् अस्मि = आ गया हूँ । भूयः = फिर । अभिवादनार्थम्=
प्रणाम के लिए । अभ्यन्तरं अन्दर । प्रविष्टा=गई हुई । चिरायते=देर कर
रही है । यथावयः = अपनी अवस्था के अनुरूप । स्निग्धतर = अत्यन्त प्रेम
से । स्नुषा=पुत्रवधू । तपस्विदारैः = मुनियों की स्त्रियों द्वारा । जनकेन्द्र-
पुत्री = सीता । सम्भाष्यमाणा=बातचीत करती हुई । समुपैति = पास आ
रही है । मन्दम् = धीरे-धीरे । कुटुम्बिकः = पति । उपसर्प = पास जाओ ।
एनम् = इसके । प्रेक्षितुम्=देखने में । अविश्वसनीयम् = बिना भरोसे के । मे=
मुझे । प्रतिभाति = लगता है । उपसृत्य=पास जाकर । अपि=क्या । जानासि=
याद करती हो । पूर्वाधिष्ठानं = पहले के समय का निवास । ज्ञायन्ते=पहचान
रही हो । पुत्रकृतकाः=कृत्रिम पुत्र । अवलोकितपत्रकाः=थोड़े से पत्तों वाले
अर्थात् छोटे । उल्लोक यितव्याः=शिर ऊँचा उठा कर देखने योग्य अर्थात्
बड़े । संवृत्ताः=हो गए। निम्नस्थलोत्पाटक=नीचे-ऊँचे भाव को पैदा करने
वाला । कालः=समय । उपलभ्यते=याद कर रही हो । सप्तपर्णस्य=सतछोने
के वृक्ष के । अधस्तात्=नीचे । शुक्लवासम्=श्वेत वस्त्र पहने । परित्रस्त=
भयभीत । मृगयूथम्=हरिणों का समूह । दृढम्=अच्छी तरह । नः=हमारी ।
तपसः=तपस्या का । साक्षिभूत = गवाह बना । महाकच्छः=बड़ा तालाब ।