प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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भरत—(मन में) सचमुच में महान् दुःख है। पीड़ा के कारण इनका हृदय
स्थिर नहीं है। (प्रकट में) क्या आप बीच में से ही लौट आए?
सुमन्त्र—राजकुमार, आपके आदेश से मैं राम के दर्शन के लिए जनस्थान
गया हुआ बीच से ही कैसे लौट आता?
भरत—कहीं वे लोग क्रोध और संकोच के कारण अपने को छिपा कर तो
नहीं रहते?
सुमन्त्र—राजकुमार,
विनयी जनों को क्रोध कहाँ और निर्मल अन्तःकरण में लज्जा का
प्रवेश कहाँ? किन्तु जब मैंने तपोवन देखा, तब वह उन लोगों से
रहित तथा सूनसान था। (६)
भरत—तो फिर वे कहाँ चले गए, कुछ सुना।
सुमन्त्र—किष्किन्धा नामक नगर वानरों का निवास स्थान है। वहाँ चले
गए, ऐसा सुना है।
भरत—हाय, वानरों का तो मनुष्यों से परिचय नहीं होता। वहाँ वे कष्ट
से रहते होंगे।
सुमन्त्र—कुमार, पशु-पक्षी भी उपकार मानते हैं।
भरत—तात, किस प्रकार?
सुमन्त्र—सुग्रीव नाम के एक वानर को उसके बड़े भाई बाली ने
राज्यच्युत कर दिया था और उसकी स्त्री भी छीन ली थी। पर्वत
पर रहने वाले उस सुग्रीव को 'उसके समान दुःख वाले' राम ने
कष्टमुक्त कर दिया। (१०)
भरत—तात, 'उसके समान दुःख वाले' का आशय क्या है?
सुमन्त्र—(मन में) हाय, मैंने तो सब कुछ कह दिया। (सबके सामने)
कुमार, कुछ नहीं। मेरा आशय राज्य नहीं प्राप्त होने की समानता
से है।
भरत—तात, क्यों छिपा रहे हैं? यदि सच बात नहीं बताई तो आपको
स्वर्गवासी महाराज दशरथ के चरणों की शपथ है।
सुमन्त्र—क्या उपाय है? सुनो,
मुनियों की रक्षा के कारण बलवान् राक्षसों से शत्रुता हो गई थी।