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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 161

( 176 )
प्रतिहारी—(मन में) अरे, अब क्या होगा ? (प्रकट में) स्वामी, अच्छा ।
(इसके बाद कैकेयी और प्रतिहारी का आगमन)
कैकेयी—विजये, क्या भरत मुझसे मिलने आया है ?
प्रतिहारी—महारानी, हा राजकुमार राम के पास से तात सुमन्त्र आए हैं .
उनके साथ राजकुमार भरत ने महारानी ने मिलने की इच्छा
प्रकट की है ।
कैकेयी—(मन में) न जाने किस बात पर भरत ताडना देगा ।
प्रतिहारी—महारानी, क्या राजकुमार आ जाएं ?
कैकेयी—जाओ । उन्हें भेज दो ।
प्रतिहारी—महारानी, ठीक है । (घूम कर ओर पास जाकर) राजकुमार की
जय हो । आप प्रवेश कीजिए ।
भरत—विजये, क्या सूचना दे दी ?
प्रतिहारी—हाँ ।
भरत—तो फिर हम दोनों प्रवेश करे । (प्रवेश करते हैं)
कैकेयी—पुत्र, विजया ने कहा है कि राम के पास से सुमन्त्र आए हैं ?
भरत—आपको मैं इससे भी अच्छी सूचना दे रहा हूँ ।
कैकेयी—पुत्र, तब तो क्या कौसल्या और सुमित्रा को भी बुला लें ?
भरत—नही, उन्हें नहीं सुनाना चाहिए ।
कैकेयी—(मन मे) अरे, पता नहीं क्या बात है । (प्रकट में) पुत्र, कहो तो ।
भरत—सुनो,
जो अपने राज्य का परित्याग करके तुम्हारी आज्ञा से वन में गए थे,
उनकी पत्नी सीता का अपहरण हो गया है । अब तो तुम्हारी
इच्छा पूरी हुई । (१३)
कैकेयी—अहो !
भरत—हाय, दुःख है कि तुम्हारी जैसी बहू को पाकर अत्यन्त पराक्रमी और
सम्मान वाले इक्ष्वाकु वंश के लोगों को अपनी स्त्री के अपहरण को
भी देखना पडा । (१४)