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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 296 में से

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पृष्ठ 152

रहा है, मानो वज्र की नोकों द्वारा कठोर शिला फाड़ी जा रही
हो । (३)

  • अरे, क्रोधित रावण ने जटायु के दाहिने कन्धे पर तलवार का प्रहार
    कर दिया ।
  • हाय, धिक्कार है । यहं जटायु तो गिर पड़ा ।
    ला - अरे, बड़ा दुख है । यह पूज्य जटायु 'सचमुच में—अपने पराक्रम के
    समान पूरी तरह से प्रयास करके, खिलौने के बने मोर के समान
    शत्रु रावण की परवाह न करके, राक्षसराज की प्रचण्ड शक्ति को
    दबा कर उसी प्रकार समाप्त हो गया है, जैसे किसी गजराज के
    द्वारा उत्पादित कोई वन वृक्ष उखाड़ कर फेंका गयां हो । (४)
    दोनों—इसे स्वर्ग प्राप्त हो ।
    पहला—काश्यप, आओ । ये समाचार श्री राम को दे ।
    दूसरा—अच्छा । यह तो पहला काम है । (दोनों निकल जाते है)
    (विष्कम्भक समाप्त हुआ)
    (2) मूल
    (ततः प्रविशति काञ्चुकीयः)
    काञ्चुकीयः—क इह भोः ! काञ्चनतोरणद्वारमशून्यं कुरुते ?
    (प्रविश्य)
    प्रतिहारी—आर्य ! ग्रहं विजया । किं क्रियताम् ?
    काञ्चुकीयः—विजये ! निवेद्यता निवेद्यता भरतकुमाराय- "एष खलु
    रामदर्शनार्थम् जनस्थानं प्रस्थितः प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान्
    सुमन्त्र" इति ।
    प्रतिहारी—आर्य ! अपि कृतार्थस्तातसुमन्त्र आगतः ?
    काञ्चुकीयः—भवति ! न जाने ।
    हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननमागतम्
    दृष्ट्वैवाकुलमासीन्मे सुमन्त्रमधुना मनः ॥ (५)
    प्रतिहारी—आर्य ! एतच्छ्रुत्वा पर्याकुलमिव मे हृदयम् ।
    काञ्चुकीयः—भवति ! किमिदानीं स्थिता ? शीघ्रं निवेद्यताम् ।
    प्रतिहारी—आर्य ! इयं निवेदयामि । (निष्क्रान्त)