प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
DevanagariHindipublished296 पृष्ठ
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रहा है, मानो वज्र की नोकों द्वारा कठोर शिला फाड़ी जा रही
हो । (३)
- अरे, क्रोधित रावण ने जटायु के दाहिने कन्धे पर तलवार का प्रहार
कर दिया । - हाय, धिक्कार है । यहं जटायु तो गिर पड़ा ।
ला - अरे, बड़ा दुख है । यह पूज्य जटायु 'सचमुच में—अपने पराक्रम के
समान पूरी तरह से प्रयास करके, खिलौने के बने मोर के समान
शत्रु रावण की परवाह न करके, राक्षसराज की प्रचण्ड शक्ति को
दबा कर उसी प्रकार समाप्त हो गया है, जैसे किसी गजराज के
द्वारा उत्पादित कोई वन वृक्ष उखाड़ कर फेंका गयां हो । (४)
दोनों—इसे स्वर्ग प्राप्त हो ।
पहला—काश्यप, आओ । ये समाचार श्री राम को दे ।
दूसरा—अच्छा । यह तो पहला काम है । (दोनों निकल जाते है)
(विष्कम्भक समाप्त हुआ)
(2) मूल
(ततः प्रविशति काञ्चुकीयः)
काञ्चुकीयः—क इह भोः ! काञ्चनतोरणद्वारमशून्यं कुरुते ?
(प्रविश्य)
प्रतिहारी—आर्य ! ग्रहं विजया । किं क्रियताम् ?
काञ्चुकीयः—विजये ! निवेद्यता निवेद्यता भरतकुमाराय- "एष खलु
रामदर्शनार्थम् जनस्थानं प्रस्थितः प्रतिनिवृत्तस्तत्रभवान्
सुमन्त्र" इति ।
प्रतिहारी—आर्य ! अपि कृतार्थस्तातसुमन्त्र आगतः ?
काञ्चुकीयः—भवति ! न जाने ।
हृदयस्थितशोकाग्निशोषिताननमागतम्
दृष्ट्वैवाकुलमासीन्मे सुमन्त्रमधुना मनः ॥ (५)
प्रतिहारी—आर्य ! एतच्छ्रुत्वा पर्याकुलमिव मे हृदयम् ।
काञ्चुकीयः—भवति ! किमिदानीं स्थिता ? शीघ्रं निवेद्यताम् ।
प्रतिहारी—आर्य ! इयं निवेदयामि । (निष्क्रान्त)