प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
वासुदेव के सिक्कों की दोनों ओर ग्रीक लेख ही हैं; गा; कँ. कॉ. ग्री. सी. किं. बा. इं; सेट २५-२६. हा; कँ. कॉ. पं. म्यू; जि. १,
Wait, look at line 4:
कुजुलकर कडफसिस और वेम कडफसिस इन तीन के सिक्कों पर खरोष्ठी लेख मिलते हैं और कनिष्क, हुविष्क और वासु-
देव के सिक्कों की दोनों ओर ग्रीक लेख ही हैं; गा; कँ. कॉ. ग्री. सी. कि. बा. इं; सेट २५-२६. हा; कँ. कॉ. पं. म्यू; जि. १,
Wait, किं. or कि.?
In line 4 of note 5: ग्री. सी. कि. बा. इं; - look at कि., it does not have anusvara (or very faint). Let's check: in note 1 it was किं., in note 4 किं., here कि.. Let's keep it accurate: किं. or कि..
Next line:
सेट १७-२०. स्मि; कँ. कॉ. ई. म्यू; सेट ११-१४.
- Footnote 6:
`६. औदुंबर और कुनिंदवंशी राजाओं के पंजाब से मिलने
खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३३
कुशनवंशी १ राजाओं के समय के हैं इनमें से कितने एक में राजाओं के नाम मिलते हैं,
और दूसरों में साधारण पुरुषों २ के ही नाम हैं, राजाओं के नहीं. ये बौद्ध स्तूपों में रक्खे हुए
पत्थर आदि के पात्रों और सोने, चांदी या तांबे के पत्रों पर; अथवा चटानों और शिलाओं
या मूर्त्तियों के आसनों पर खुदे हुए मिले हैं. इनमें से अधिकतर गांधारदेश से ही मिले हैं,
और वहां भी विशेषकर तक्षशिला (शाहढेरी, पंजाब के ज़िले रावलपिंडी में) और चारसड्डा
(पुष्कलावती) से. पंजाब के बाहर अफ़गानिस्तान में वर्डक (ज़िले वर्डक में) तथा हिड्डा (जलालाबाद
से ५ मील दक्षिण) आदि में, और मथुरा में, मिले हैं, अन्यत्र ३ नहीं.
१. कुशनवंशी राजाओं के समय के खरोष्ठी लिपि के लेख अधिक संख्या में मिले हैं. राजा कनिष्क के समय का
एक शिलालेख (सं. ११ का) ज़ेड़ा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से (ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६); एक ताम्रलेख
(सं. ११ का) सुएविहार (पंजाब के बहावलपुर राज्य में) से (इं. ऐं; जि. १०, पृ. ३२६; और जि. ११, पृ. १२८); एक लेख
माणिक्यिाल से (क; आ. स. रि; जि ५, पृ. १६० के सामने का सेट); और पेशावर के कनिष्कविहार के स्तूप से मिले
हुए डिब्बे पर खुदे हुए तीन छोटे छोटे लेख (आ. स; ई. स. १९०६-१०, पृ. १३६-३८) मिले हैं. आरा नामक
नाले (बागनीलाब से २ मील पर-पंजाब में) के अंदर के एक पुराने कुए में से वाक्षेष्प के पुत्र कनिष्क के समय का एक
शिलालेख (सं. ४१ का) मिला है (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ५८). हुविष्क के समय का एक लेख (सं. ५१ का) वर्डक (अफ़ग़ा-
निस्तान में) के स्तूप में से मिले हुए एक पीतल के पात्र पर खुदा है (ए. इं; जि. ११, पृ २१०-११). पंजतार (ज़िले यूसफ़ज़ई
में) से एक शिलालेख (सं. १२२ का) किसी गुशन (कुशन) वंशी राजा के समय का (क; आ. स. रि; जि. ५, पृ. १६१,
और सेट १६, संख्या ४), तथा महाराज राजातिराज देवपुत्र खुशन (कुशन. उक्त नाम के राजा या कुशन वंशी किसी राजा)
का एक लेख (सं १३६ का) रौप्यपत्र पर खुदा हुआ तक्षशिला से मिला है (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९१४, पृ. ९७२-७६.
और ई. स. १९१५, पृ. १६२ के सामने का सेट).
२. हिड्डा के स्तूप से मिले हुए मिट्टी के पात्र पर (सं. २८ का) लेख (ज. रॉ. ए. सो; ई स. १९१५, पृ. ६२, और उस
के सामने का सेट); शकदरी (पंजाब के ज़िले अटक में) से मिला हुआ (सं. ४० का) शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६६);
ओहिंद (यूसफ़ज़ई ज़िले में) का (सं. ६१ का) लेख (क; आ. स. रि; जि. ५ पृ. ५८; सेट १६, संख्या २.); फतहजंग
(ज़िले अटक में) का (सं. ६८ का) शिलालेख (ज. ए; ई. स १८६०, भाग १, पृ. १३०); सुचइ (ज़िले यूसफ़ज़ई में) से
मिला हुआ (सं. ८१) का शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६४); बोज़ पहाड़ का (सं. १०२ का) लेख (ज. ए; ई. स. १८६४,
भाग २, पृ. ५१४); पाजा (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं. १११ का) शिला लेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६५); कलदरां नदी
(पश्चिमोत्तर सीमांत प्रदेश में दर्गाई के पास) में से मिला हुआ (सं. ११३) का शिलालेख (इं. ऐं; जि. ३७, पृ. ६६);
स्कारहढेरी (चारसड्डा अर्थात् हश्तनगर से ८ मील उत्तर में) से मिली हुई हारिती की मूर्त्ति के आसनपर खुदा हुआ (सं.
१७६ का) लेख (आ. स; ई. स. १९०३-४; पृ. २५५; सेट ७०, संख्या ६); देवाई (ज़िले यूसफ़ज़ई में) का (सं २०० का) शि-
लालेख (ज. ए; ई. स. १८६४. भाग २, पृ. ५१०); लोरियन तंगाइ (ज़िले स्वात में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्त्ति के आसन
पर खुदा हुआ (सं. ३१८ का) लेख (आ. स; ई. स. १९०३-४; पृ. २५१; सेट ७०, संख्या ४); हश्तनगर (पेशावर ज़िले की
चारसड्डा तहसील में) से मिली हुई बुद्ध की (अपने शिष्यों सहित) मूर्त्ति के आसन पर खुदा हुआ (सं. ३८४ का) लेख
(ए. इं; जि. १२, पृ. २०२). ये सब साधारण पुरुषों के संवत् वाले लेख हैं. इन लेखों में जो संवत् लिखा है वह कौन सा
है यह अभी तक पूर्णतया निश्चित नहीं हुआ, परंतु हमारी संमति में उनमें से अधिकतर लेखों का संवत् शक संवत् ही होना
चाहिये. बिना संवत् वाले लेख ये हैं—
तक्षशिला के गंगू नामक स्तूप से मिला हुआ सुवर्णपत्र पर खुदा हुआ लेख (क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३०,
और सेट ५६); माणिक्यिाल के
३४ | प्राचीनलिपिमाला.
खरोष्ठी लिपि की लेखन शैली फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर होने से निश्चित है
कि यह लिपि सेमिटिक् वर्ग की है, और इसके ११ अक्षर—'क'१, 'ज'२, 'द'३, 'न'४, 'ब'५, 'य'६,
'र'७, 'व'८, 'ष'९, 'स'१० और 'ह'११ समान उच्चारण वाले अरमइक् अक्षरों से बहुत कुछ मिलते
हुए हैं.
सेमिटिक् लिपि संबंधी आधुनिक शोध से अनुमान होता है कि असीरिया और बाबीलन में
क्यूनिफ़ॉर्म लिपि का प्रचार होने पर भी राजकीय और व्यापार के कामों में अरमइक् लिपि१२ काम
में आती थी. हखामनी १३ (अकॅमीनिअन्) वंश के बादशाहों के समय ईरान के राज्य का प्रताप
बहुत बढ़ा और दूर दूर के देश १४ उक्त राज्य के अधीन हो गये. उस समय के अरमइक् लिपि के अनेक
शिलालेख मिसर १५, अरब १६ और एशिया माइनर १७ में मिले हैं और एक ईरान १८ में तथा एक हिंदुस्तान
है कि उक्त लेख का लेखक 'पड' (पंड) पंजाब की तरफ़ का होना चाहिये, जिसको खरोष्ठी लिपि का भी ज्ञान होगा जिसे
जतलाने के लिये ही उसने ये अंतिम पांच अक्षर उस लिपि में लिखे हों. इसी तरह भरहुत के प्रसिद्ध स्तूप के द्वार पर
कहीं एक एक अक्षर खरोष्ठी का खुदा हुआ मिला है (कः भ. स्तृ; सेट ८) : ये पंजाब की तरफ से आये हुए शिल्पियों के
खोदे हुए होने चाहिये.
१. खरोष्ठी का 'क' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'कॉफ' से मिलता हुआ है (देखो पृ. २३ पर छपा हुआ
नक्शा).
२. 'ज' सक्कारा, टीमा आदि के लेखों के 'ज़ाइन' से मिलता हुआ है.
३. 'द' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'दालेथ' से मिलता है.
४. 'न' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'नून' से मिलता है.
५. 'ब' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'बेथ' से मिलता है.
६. 'य' तक्षशिला के लेख, पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'योध्' से मिलता है.
७. 'र' तक्षशिला के लेख तथा पॅपायरसों के 'रेश' से मिलता है.
८. 'व' तक्षशिला तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'वाव' से मिलता है.
९. 'ष' को उलटा करने पर वह पॅपायरसों तथा सक्कारा आदि के लेखों के 'शिन' से मिलता है.
१०. 'स' तक्षशिला और सक्कारा के लेखों के 'त्साधे' से मिलता है.
११. 'ह' तक्षशिला के लेख के 'हे' से मिलता हुआ है.
१२. ज. रॉय. ए. सो; ई. स. १९१५, पृ. ३४६-४७.
१३. आर्य जाति के हखामन (ऍकॅमीनि) नामक ईरानी राजवंशी (जो ई. स. पूर्व की ८ वीं शताब्दी में हुआ हो)
के नाम पर से उसके वंशज, ईरान के बादशाह, हखामनी वंशी कहलाते हैं. पहिले ईरान का राज्य मीडिया के अधीन था
और हखामन के वंशज साइरस (कुरु, कुरुष-कैखुसरो) ने, जो प्रारंभ में अनशान (ईरान में) का स्वामी या शासक था,
मीडिया के राजा अस्त्यगिस (इष्टुविगु) को छलवल से परास्त कर समस्त ईरान और मीडिया पर अपना साम्राज्य ई. स.
पूर्व ५४८ के आस पास जमाया, जिसकी समाप्ति ई. स. पूर्व ३३१ में यूनान के बादशाह सिकंदर ने बादशाह दारा (तीसरे)
को परास्त कर की.
१४. हखामनी वंश के साम्राज्य के संस्थापक साइरस ने ईरान, मीडिया, लीडिआ (एशिआ माइनर का पूर्वी आधा
हिस्सा), एशिया माइनर का पश्चिमी हिस्सा जिसमें यूनानियों के कई उपनिवेश थे, आयोनिया (मीडिया से पश्चिम का
एशिया माइनर का समुद्रतट का प्रदेश), खीवा, समरकंद, बुखारा, अफ़गानिस्तान तथा गांधार आदि देश अपने अधीन किये.
उसके पुत्र कंबैसिस (कंबुजीय) ने मिसर देश विजय किया. कंबैसिस के पुत्र दारा (प्रथम) ने ग्रीस के थ्रेस तथा मसी-
डन आदि हिस्सों पर अपना अधिकार जमाया और पूर्व में हिंदुस्तान में आगे बढ़कर सिंधुत्तट का प्रदेश अपने अधीन किया.
१५. मिसर में सक्कारा, सेरापिअम तथा एंबिडॉस आदि स्थानों में अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं, जिनमें से सक्का-
रा का लेख ई. स. पूर्व ४८२ का है (पेलिओग्राफिक सोसाइटीज़ ओरिएंटल सीरीज़, प्लेट ६३).
१६. अरब में हजाज से उत्तर के टीमा नामक स्थान में कुछ अरमइक् लिपि के लेख मिले हैं, जिनमें से एक ई. स.
पूर्व ५०० के आसपास का माना जाता है. टीमा में अरमइक् भाषा का व्यवहार करने वाले व्यापारियों की आबादी थी
(प. ब्रि; जि. २१, पृ. ६४७).
१७. एशिया माइनर—टर्की के एशियाई राज्य का पश्चिमी हिस्सा जो टर्की के यूरोपी राज्य से मिला हुआ है.
१८. ईरान के सँक कलिह (तेहरान और तेब्रीज़ के बीच) नामक स्थान में एक लेख मिला है (ई. पॅ; जि. २४, पृ. २८७).
खरोष्ठी लिपि की उत्पत्ति. ३५
में तक्षशिला नगर १ से भी मिल चुका है. मिसर से हखामनियों के राजत्वकाल के उसी लिपि के बहुतेरे
पँपायरस् २ मिले हैं और एशिया माइनर से मिले हुए ईरानी क्षत्रपों (सत्रपों) के कई सिक्कों ३ पर
उसी लिपि के लेख मिलते हैं, जिनसे पाया जाता है कि हखामनी वंश के ईरानी बादशाहों की राज-
कीय लिपि और भाषा अरमइक् ही होनी चाहिये. व्यापार के लिये भी उसका उपयोग दूर दूर
तक होना पाया जाता है ४.
हिंदुस्तान का ईरान के साथ प्राचीन काल से संबंध रहा और हखामनी वंश के बादशाह सा-
इरस (ई. स. पूर्व ५५८-५३०) ने पूर्व में बढ़ कर गांधारदेश विजय किया और ई. स. पूर्व ३१६ के
कुछ ही बाद दारा (प्रथम) ने सिंधु तक का हिंदुस्तान का प्रदेश अपने अधीन किया जो ई. स. पूर्व
३३१ तक, जब कि यूनान के बादशाह सिकंदर ने गॉगमेला ५ की लड़ाई में ईरान के बादशाह दारा
(तीसरे) को परास्त कर ईरानी राज्य पर नाम मात्र के लिये अपना अधिकार जमाया, किसी न
किसी प्रकार बना रहा. अत एव संभव है कि ईरानियों के राजत्वकाल में उनके अधीन के हिंदुस्तान
के इलाकों में उनकी राजकीय लिपि अरमइक् का प्रवेश हुआ हो और उसीसे खरोष्ठी लिपि का उद्भव
हुआ हो, जैसे कि मुसलमानों के राज्य समय फ़ारसी लिपि का, जो उनकी राजकीय लिपि थी,
इस देश में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ वर्ण बढ़ाने से उर्दू लिपि बनी.
अरमइक् लिपि में केवल २२ अक्षर होने तथा स्वरों की अपूर्णता और उनमें ह्रस्व दीर्घ का भेद न
होने एवं स्वरों की मात्राओं का सर्वथा अभाव होने से वह यहां की भाषा के लिये सर्वथा उपयुक्त न थी तो
भी राजकीय लिपि होने के कारण यहां वालों में से किसी ने ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी के आसपास
उसके अक्षरों की संख्या बढ़ा कर, कितने एक को आवश्यकता के अनुसार बदल तथा स्वरों की मात्राओं
की योजना कर उसपर से मामूली पढ़े लिखे लोगों, व्यापारियों तथा अहल्कारों के लिये काम चलाऊ
खरोष्ठी लिपि बना दी हो. संभव है कि इसका निर्माता चीन वालों के लेखानुसार खरोष्ठ नामक आचार्य ६
(ब्राह्मण) हो, जिसके नाम पर से इस लिपि का नाम खरोष्ठी हुआ, और यह भी संभव है कि तक्ष-
शिला जैसे गांधार के किसी प्राचीन विद्यापीठ में इसका प्रादुर्भाव हुआ हो.
जितने लेख अब तक इस लिपि के मिले ७ हैं उनसे पाया जाता है कि इसमें स्वरों तथा उनकी
मात्राओं में ह्रस्व दीर्घ का भेद न था. संयुक्ताक्षर केवल थोड़े ही मिलते हैं इतना ही नहीं, किंतु उनमें
से कितने एक में संयुक्त व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं पाये जाते परंतु एक विलक्षण
ही रूप मिलता है जिससे कितने एक संयुक्ताक्षरों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त ही है. बौद्धों
के प्राकृत पुस्तक ८, जिनमें स्वरों के ह्रस्व दीर्घ का विशेष भेद नहीं रहता था और जिनमें संयु-
१. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५, पृ. ३४० के सामने का प्लेट.
२. मिसर से ई. स. पूर्व ५०० से लगा कर ई. स. पूर्व २०० तक के अरमइक् लिपि के पँपायरस् मिले हैं.
३. ई. ऐं; जि. २४, पृ. २८७. ४. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१५; पृ. ३४६-४७.
५. गॉगमेला (अरबैला) तुर्की के एशियाई राज्य का एक नगर, जो मोसल और बगदाद के बीच में है.
६. खरोष्ठ के लिये देखो ऊपर, पृ. १८.
७. खरोष्ठी लिपि के शिलालेखादि के लिये देखो ऊपर पृ. ३२, टि. ७-६; और पृ. ३३, टि. १, २.
८. हिड्डा के स्तूप (संख्या १३) से मिले हुए खरोष्ठी लेखवाले मिट्टी के पात्र के भीतर खरोष्ठी लिपि में लिखे हुए
कितने एक भोजपत्र एक पत्थर पर लिपटे हुए मिले थे परंतु बहुत प्राचीन होने के कारण वे बच न सके (ऐरिआना ॲंटिका, पृ.
५६-६०, ८४, ६४, १११, ११६). ये सब से पुराने हस्तलिखित भोजपत्र थे. ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास की 'धम्मपद'
की एक प्रति खोतान से मिली है जिसमें स्वरों की मात्राओं में कुछ सुधार किया हुआ पाया जाता है (भू. इं. पे; पृ. १८-१६).
३६ प्राचीनलिपिमाला.
काक्षरों का प्रयोग विरलही होता था, इसमें लिखे हुए मिले हैं, परंतु यह लिपि संस्कृत ग्रंथों १ के लिखने
के योग्य नहीं थी. शुद्धता और संपूर्णता के विचार से देखा जावे तो इसमें और ब्राह्मी में उतना
१. कलकत्ता हाई कोर्ट के भूतपूर्व जज एफ. ई. पार्जिटर नामक विद्वान् ने 'दी पुराण टेक्स्ट ऑफ़ दी डाइनेस्टीज़
ऑफ़ दी कलि एज' (कलियुग के राजवंशों के संबंध के पुराणों के मूल पाठ) नामक पुस्तक में यह बतलाने का यत्न किया
है कि पुराणों के ये पाठ मूल में खरोष्ठी लिपि में और पीछे से उसपर से ब्राह्मी में लिखे गये होंगे. इसके प्रमाण में लिखा
है कि 'विष्णुपुराण में बहुधा अशोकवर्धन नाम मिलता है परंतु उसकी एक हस्तलिखित प्रति (k Vs) में अयोशोक-
वर्धन पाठ है. यहां पर लेखक ने 'शो' को गलती से 'यो' पढ़ कर वैसा ही लिखा. बाद उसने (या किसी दूसरे ने) यह
गलती देखी और उस प्रति में 'शो' लिखा या बढ़ा दिया, परंतु 'यो' को काटा नहीं और अशुद्ध नाम अयोशोक बना
रहा और जब वह प्रति (k Vs) लिखी गई तब तक वैसी ही नकल होती रही. हिंदुस्तान की केवल खरोष्ठी लिपि में ही
'यो' और 'शो' अक्सर एक से लिखे जाते हैं अत एव यह प्रायः निश्चित ही है कि विष्णुपुराण में यह अंश अवश्य मूल
खरोष्ठी हस्तलिखित प्रति से लिया गया होगा' (पृ. ८४). इसी तरह विष्णुपुराण की एक प्रति (cy Vs) में 'कोशल'
के स्थान पर 'कोयल' और वायुपुराण की एक प्रति (e Va) में 'शालिशूक' के स्थान पर 'शालियूक' पाठ मिला. इन
तीनों स्थानों में 'श' के स्थान पर 'य' लिखा है. इसी तरह मत्स्यपुराण की एक हस्तलिखित प्रति (dj Mt) में 'काशेयाः'
के स्थान पर 'कालेयाः' और वायुपुराण में कहीं कहीं 'शृंगभृत्य' के स्थान पर 'शृंगकृत्य' पाठ मिला (पृ. ८५). इन थोड़े से
लेखक दोषों पर से मि. पार्जिटर ने यह अनुमान कर लिया कि लेखक ने 'श' को 'य' वा 'ल' और 'भ' को 'क' पढ़ लिया
और यह अशुद्धता खरोष्ठी से ब्राह्मी में नकल करने से ही हुई होगी. परंतु खरोष्ठी लिपि के जितने लेख अब तक मिले हैं
उन सब में, सिवाय बर्डक के पात्र पर के लेख के, 'श' और 'य' में स्पष्ट भेद पाया जाता है (देखो लिपिपत्र ६५-७०).
'श' और 'ल' में, और 'भ' तथा 'क' में भ्रम होने की संभावना बहुत ही कम है क्योंकि उनमें स्पष्ट अंतर है. खरोष्ठी लिपि
में वास्तव में भ्रम उत्पन्न कराने वाले अक्षरों में से 'ण' और 'न' में विशेष भेद बहुधा नहीं मिलता, तथा 'त,' 'न' और 'र'
इन तीन अक्षरों में परस्पर भेद मालूम करना मामूली लेखक के लिये कठिन है. इसी तरह स्वरों तथा उनकी मात्राओं में
ह्रस्व दीर्घ का भेद न होने तथा विसर्ग और हलंत व्यंजनों का अभाव होने से दीर्घ स्वरों तथा उनकी मात्राओं एवं विसर्ग, हलंत
व्यंजन तथा संयुक्त व्यंजनों की शुद्ध नकल होना सर्वथा असंभव है. इस लिये यदि पुराणों के ये अंश खरोष्ठी से ब्राह्मी में
नकल किये गये होते तो उनमें 'ऋ', 'ॠ', 'ऌ', 'ॡ' और 'औ' अक्षर तथा उनकी मात्राओं का तथा विसर्ग और हलंत
व्यंजनों का सर्वथा अभाव होता और 'न' तथा 'ण', एवं 'त', 'न' और 'र' अक्षरों वाले शब्दों में हज़ारहां गलतियां मिलतीं
क्योंकि पुस्तकों की नकल करने वाले संस्कृत के विद्वान् नहीं किंतु मामूली पढ़े हुए लोग होते हैं और जैसा वे मूल प्रति में
देखते हैं वैसा ही लिख डालते हैं (मक्षिकास्थाने मक्षिका). अत एव पुराणों के हस्तलिखित राजवंशवर्णन के अंश जिस
स्थिति में हमें इस समय मिलते हैं उस स्थिति में सर्वथा न मिलते किंतु कातंत्र व्याकरण के प्रारंभ के संधियों तक के पांच
पादों के सूत्रों की जो दशा हम राजपूताने की 'सीधो' * की पांच पाटियों में देखते हैं उससे भी बुरी दशा में
मिलते, परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि वे प्रारंभ से ही ब्राह्मी लिपि में लिखे गये थे और उनकी नक़्लें
ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई भिन्न भिन्न लिपियों में समयानुसार होती रहीं. मि. पार्जिटर ने खरोष्ठी से ब्राह्मी में नक़्ल
करने में जहां हज़ारहां अशुद्धियां होने का संभव था उन अक्षरों का तो तनिक भी विचार न किया, ऐसी दशा में हम उक्त
कथन को किसी तरह आदरणीय नहीं मान सकते. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. स्टेन कॉनो ने भी उक्त पुस्तक की समालो-
- राजपूताने में विद्यार्थियों को पहिले कातंत्र व्याकरण पढ़ाया जाता था और उस प्राचीन परिपाटी के अनुसार अब
तक भी पुराने ढंग की पाठशालाओं में उसके प्रारंभ के संधि विषयक पांच पाद रटाये जाते हैं. कातंत्र व्याकरण के प्रथम
सूत्र का पहिला शब्द 'सिद्धो' (सिद्धो वर्णसमाम्नायः) होने से उनको 'सीधो' कहते हैं और उक्त पांच पादों को 'सीधो
की पांच पाटी' कहते हैं. संस्कृत न जानने वालों के द्वारा उनकी नक़लें तथा पढ़ाई होते होते इस समय उनकी कैसी
दुर्दशा होगई है और मूल में तथा उनमें कितना अंतर पड़ गया है, यह बतलाने के लिये उनके प्रारंभ के थोड़े से सूत्र नीचे
उद्धृत किये जाते हैं—
कातंत्र—सिद्धो वर्णसमाम्नायः । तत्र चतुर्दशादौ स्वराः । दश समानाः । तेषां द्वौ द्वावन्योन्यस्य सवर्णौ ।
सीधो—सीधो बरना समामुनाया । चउचुत्रउदासा दउसंँवारा । दसे समाना । तेसुदुव्वावरणो नसीसवरणो ।
कातंत्र—पूर्वो ह्रस्वः । परो दीर्घः । स्वरोऽवर्णवज्र्जो नामी । एकारादीनि सन्ध्यक्षराणि । कादीनि व्यञ्जनानि ।
सीधो—पूरबो हंसवा । पारो दीरघा । सारो बरणा विगान्जो नामी । ईकरादिणी संधकराणी । कादीनावू विणज्यौनामी ।
कातंत्र—ते वर्गाः पञ्च पञ्च ।
सीधो—ते विरघा पंचा पंचा ।
खरोष्ठी लिपि एवं उत्तरी शैलियों का विकास (मौर्य, शुंग, कुषाण व गुप्त लिपि)
प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना. ३७
ही अंतर पाया जाता है जितना कि इस समय छपी हुई नागरी की पुस्तकों तथा राजपूताने के अधिकतर
रजवाड़ों के मामूली पढ़े हुए अहल्कारों की लिखावटों में.
ई. स. की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ प्रचार पंजाब में बना
रहा, जिसके बाद यह इस देश में से सदा के लिये अस्त हो गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया,
तो भी हिंदुकुश पर्वत से उत्तर के देशों तथा चीनी तुर्किस्तान आदि में, जहां बौद्ध धर्म और भारतीय
सभ्यता दृढ़ हो रही थी, कई शताब्दी पीछे तक भी इस लिपि का प्रचार बना रहा. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता
डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने चीनी तुर्किस्तान आदि प्रदेशों से असाधारण श्रम कर जो प्राचीन वस्तुएं एक-
त्रित की हैं उनमें इस लिपि में लिखे हुए पुस्तक और लकड़ी की लिखित तख्तियां आदि बहुमूल्य
सामग्री भी है.
४-प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना.
भारतवर्ष के विद्वान् ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पहिले ही अपने देश की प्राचीन लिपि
ब्राह्मी तथा उससे निकली हुई ई. स. की छठी शताब्दी तक की लिपियों का पढ़ना भूल गये थे, परंतु
पिछली अर्थात् ७ वीं शताब्दी से इधर की लिपियां, संस्कृत और प्राकृत के विद्वान्, जिनको प्राचीन
हस्तलिखित पुस्तकों के पढ़ने का अभ्यास था, यत्न करने से पढ़ सकते थे. ई. स. १३५६ में देहली
के सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ ने बड़े उत्साह के साथ टोपरा¹ तथा मेरठ से अशोक के लेखों वाले
दो विशाल स्तंभ उठवा कर असाधारण श्रम² से देहली में लाकर एक (सवाल्क स्तंभ) को फ़ीरोज़-
शाह के कोटले में और दूसरे को 'कुश्क शिकार' (शिकार का महल) के पास³ खड़ा करवाया. उस
ने उन स्तंभों पर के लेखों का आशय जानने के लिये बहुत से विद्वानों को एकत्र किया परंतु किसी से
वे पढ़े न गये⁴. यह भी प्रसिद्धि है कि बादशाह अकबर को भी उक्त लेखों का आशय जानने की बहुत
कुछ जिज्ञासा रही परंतु उस समय एक भी विद्वान ऐसा न था कि उनको पढ़ कर बादशाह की जि-
ज्ञासा पूर्ण कर सकता.
हिंदुस्तान में अंगरेज़ों का राज्य होने पर फिर विद्या के सूर्य का उदय हुआ और प्राचीन
वस्तुओं का मान होने लगा. तारीख़ १५ जनवरी सन् १७८४ ई. को सर विलियम जोन्स की प्रेरणा
से एशिया खंड के प्राचीन शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, इतिहास, भूगोल, भिन्न भिन्न शास्त्र, रीत रवाज़,
शिल्प आदि विद्या से संबंध रखने वाले सभी विषयों का शोध करने के निमित्त 'एशियाटिक सोसा-
चना करते समय उक्त कथन का विरोध किया है (इ. पँ; जि. ४२, पृ. १६६). यह निश्चित है कि ब्राह्मणों ने खरोष्ठी लिपि को
अपने धर्मग्रंथों में कभी स्थान नहीं दिया क्योंकि वह उनके लिखे जाने के योग्य ही न थी और जितने लेख अब तक उस
लिपि के मिले हैं उनमें एक भी ऐसा नहीं है जो ब्राह्मणों के धर्म से संबंध रखता हो.
१. पंजाब के ज़िले अंबाला में (सवाल्क में).
२. टोपरा का (सवाल्क) स्तंभ किस प्रकार महान् परिश्रम तथा उत्साह के साथ देहली में लाया गया इसका वृत्तान्त
समकालीन लेखक शम्स-इ-शीराज ने तारीख़-इ-फ़ीरोज़शाही में किया है (इ; हि. इं; जि. ३, पृ. ३५०-५३).
३. यह स्तंभ देहली में 'रिज' नामक पहाड़ी पर ग़दर की यादगार के स्थान के पास है.
४. क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३.
३८ प्राचीनलिपिमाला.
इटी' नामक एक समाज भारतवर्ष की उस समय की राजधानी कलकत्ता नगर में स्थापन हुआ,
और बहुत से यूरोपियन तथा देशी विद्वान् अपनी अपनी रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न विषयों में
उक्त समाज का उद्देश्य सफल करने को प्रवृत्त हुए. कितने एक विद्वानों ने ऐतिहासिक विषयों के
शोध में लग कर प्राचीन शिलालेख, दानपत्र, सिक्के तथा ऐतिहासिक पुस्तकों का टटोलना प्रारंभ
किया. इस प्रकार भारतवर्ष की प्राचीन लिपियों पर प्रथम ही प्रथम विद्वानों की दृष्टि पड़ी.
ई. स. १७८५ में चार्ल्स विल्किन्स ने दीनाजपुर जिले के बदाल नामक स्थान के पास मिला
हुआ एक स्तंभ पर का लेख' पढ़ा, जो बंगाल के राजा नारायणपाल के समय का था२. उसी वर्ष में
पंडित राधाकांतशर्मा ने टोपरावाले देहली के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए अजमेर के
चौहान राजा आन्नल्लदेव (आना) के पुत्र वीसलदेव (विग्रहराज-चौथे) के तीन ३ लेख पढ़े जिनमें से
एक [विक्रम] 'सं. १२२० वैशाख शुदि १५' का है. इन सब की लिपि बहुत पुरानी न होने से ये
आसानी के साथ पढ़े गये, परंतु उसी वर्ष में जे. एच. हैरिंग्टन् ने बुद्धगया के पास वाली 'नागार्जुनी'
और 'बराबर' की गुफ़ाओं में उपर्युक्त लेखों से अधिक पुराने, मौखरी वंश के राजा अनंतवर्मन्
के तीन लेख पाये, जिनकी लिपि गुप्तों के समय के लेखों की लिपि से मिलती हुई होने के कारण उनका
पढ़ना कठिन प्रतीत हुआ, परंतु चार्ल्स विल्किन्स ने ई. स. १७८५ से ८६ तक श्रम कर के उन तीनों
लेखों४ को पढ़ लिया जिससे गुप्तलिपि ५ की अनुमान आधी वर्णमाला का ज्ञान हो गया.
ई. स. १८१८ से १८२३ तक कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूताना के इतिहास की खोज में लग कर
राजपूताना तथा काठियावाड़ में कई प्राचीन लेखों का पता लगाया जिनमें से ई. स. की ७ वीं शताब्दी
से लगा कर १५ वीं शताब्दी तक के कई लेख उक्त विद्वान् इतिहासलेखक के गुरु यति ज्ञानचंद्र ने पढ़े
और जिनका अनुवाद या सारांश कर्नल टॉड के 'राजस्थान' नामक पुस्तक में कई जगह छपा है.
बी. जी. बॅबिंग्टन् ने मामल्लपुर के कितने एक संस्कृत और तमिळ भाषा के प्राचीन लेखों को
पढ़ कर ई. स. १८२८ में उनकी वर्णमालाएं तय्यार कीं. इसी तरह वॉल्टर इलियट ने प्राचीन कनड़ी
अक्षरों को पहिचाना और ई. स. १८३३ में उनकी वर्णमालाओं को विस्तृत रूप से प्रकट किया ७.
ई. स. १८३४ में कप्तान ट्रायर ने इसी उद्योग में लग कर अलाहाबाद (प्रयाग) के अशोक
के लेख वाले स्तंभ पर खुदे हुए गुप्तवंशी राजा समुद्रगुप्त के लेख का कुछ अंश पढ़ा और उसी वर्ष
में डॉ. मिल् ने उसे पूरा पढ़ कर ई. स. १८३७ में भिटारी के स्तंभ पर का स्कंदगुप्त का लेख १० भी
पढ़ लिया.
१. ए. रि; जि. १, पृ. १३१. यह लेख फिर भी छप चुका है (ए. इं; जि. २, पृ. १६१-६४).
२. ई. सं. १७८६ में चार्ल्स विल्किन्स ने मुंगेर से मिला हुआ बंगाल के राजा देवपाल का एक दानपत्र पढ़ा था,
परंतु वह भी ई. स. १७८८ में छपा (ए. रि; जि. १, पृ. १२३). यह ताम्रपत्र दूसरी बार शुद्धता के साथ छप चुका है
(इं. पें; जि. २१, पृ. २५४-५७).
३. ए. रि; जि. १, पृ. ३७६-८२. को; भि. ए; जि. २, पृ. २३२-३७. इं. पें; जि. १६, पृ. २१५.
४. बराबर का लेख-ए. रि; जि. २, पृ. १६७. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. ६७४; प्लेट ३६, सं १४, १६, १७. इं. पें;
जि. १३, पृ ४२८. फ्ली; गु. इं; पृ. २२२-२३. नागार्जुनी गुफ़ा के २ लेख-ए. रि; जि. २, पृ. १६८. ज. ए. सो. बंगा; जि. १६,
पृ. ४०१; प्लेट १०. फ्ली; गु. इं; पृ. २२४-२७.
५. गुप्तवंशी राजाओं के समय की प्राचीन लिपि को गुप्तलिपि कहते हैं.
६. ट्रांजेक्शनस् ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसाइटी (जि. २, पृ. २६४-६६; प्लेट १३, १४, १७ और १८).
७. ब. आ. स. वे. इं; जि. ३, पृ. ७३.
८. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ११८.
९. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३३६. फ्ली; गु. इं; पृ. ६-१०
१०. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. १. फ्ली; गु. इं; पृ. ५३-५४.
प्राचीन लिपियों का पढ़ा जाना. ३६
ई. स. १८३५ में डब्ल्यू एच. वॉथन ने वल्लभी के कितने एक दानपत्र पढ़े¹.
ई. स. १८३७-३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने देहली, कहाउं और एरण के स्तंभों तथा सांची और
अमरावती के स्तूपों और गिरनार के चटान पर के गुप्तलिपि के लेख पढ़े². कप्तान् ट्रायर, डा. मिल्
तथा जेम्स प्रिन्सेप के श्रम से चार्ल्स विल्किन्सन् की गुप्तलिपि की अधूरी वर्णमाला पूर्ण हो गई और
गुप्तवंशी राजाओं के समय के शिलालेख, ताम्रपत्र और सिक्कों के पढ़ने में सुगमता हो गई.
ब्राह्मी लिपि गुप्तलिपि से पुरानी होने के कारण उसका पढ़ना बड़ा दुस्तर था. ई. स. १७९५
[ब्राह्मीलिपि.] में सर चार्ल्स मेलेट ने इलोरा की गुफाओं के कितने एक छोटे छोटे लेखों की छापें तय्यार
कर सर विलियम् जोन्स के पास भेजीं. फिर ये छापें विल्फर्ड के पास पढ़ने को भेजी गईं
परंतु जब वे पढ़ी न गईं तो एक पंडित ने कितनी एक प्राचीन लिपियों की वर्णमालाओं का पुस्तक
विल्फर्ड को बतला कर उन लेखों को अपनी इच्छा के अनुसार कुछ का कुछ पढ़ा दिया. विल्फर्ड ने
इस तरह पढ़े हुए वे लेख अंग्रेज़ी अनुवाद सहित सर विलियम् जोन्स के पास भेज दिये. बहुत
बरसों तक उन लेखों के शुद्ध पढ़े जाने में किसी को शंका न हुई परंतु पीछे से उनका पढ़ना और अनु-
वाद कपोल कल्पित सिद्ध हुए.
बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के संग्रह में देहली और अलाहाबाद के स्तंभों तथा खंडगिरि के
चटान पर खुदे हुए लेखों की छापें आ गई थीं परंतु विल्फर्ड का यत्न निष्फल होने से कितने एक वर्षों
तक उन लेखों के पढ़ने का उद्योग न हुआ. उन लेखों का आशय जानने की जिज्ञासा रहने के कारण
जेम्स प्रिन्सेप ने ई. स. १८३४-३५ में अलाहाबाद, राधिया और मथिया के स्तंभों पर के लेखों की
छापें मंगवाईं और उनको देहली के लेख से मिला कर यह जानना चाहा कि उनमें कोई शब्द एकसा
है या नहीं. इस प्रकार उन चारों लेखों को पास पास रख कर मिलाने से तुरंत ही यह पाया
गया कि वे चारों लेख एक ही हैं. इस बात से प्रिन्सेप का उत्साह बढ़ा और उसे अपनी जिज्ञासा
पूर्ण होने की दृढ़ आशा बंधी. फिर अलाहाबाद के स्तंभ के लेख से भिन्न भिन्न आकृति के अक्षरों
को अलग अलग छांटने पर यह विदित हो गया कि गुप्ताक्षरों के समान उनमें भी कितने एक अक्षरों
के साथ स्वरों की मात्राओं के पृथक् पृथक् चिह्न लगे हुए हैं, जो एकत्रित कर प्रकट किये
गये³. इससे कितने एक विद्वानों को उक्त अक्षरों के यूनानी होने का जो भ्रम⁴ था वह दूर हो
गया. स्वरों के चिह्नों को पहिचानने के बाद मि. प्रिन्सेप ने अक्षरों के पहिचानने का उद्योग
करना शुरू किया और उक्त लेख के प्रत्येक अक्षर को गुप्तलिपि से मिलाना और जो मिलता गया
उसको वर्णमाला में क्रमवार रखना प्रारंभ किया. इस प्रकार बहुत से अक्षर पहिचान में आ गये.
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ४, पृ. ४७७.
२. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६, पृ. २१८, ४५५; जि. ७, पृ. ३६, ३३७, ६२६, ६३२.
३. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ७, प्लेट ५.
४. अशोक के लेखों की लिपि मामूली देखने वाले को अंग्रेज़ी या ग्रीक लिपि का भ्रम उत्पन्न करा दे ऐसी है. टॉम
कोरिअट् नामक मुसाफ़िर ने अशोक के देहली के स्तंभ के लेख को देख कर ऐल. हिटकर को एक पत्र में लिखा कि 'मैं इस
देश (हिंदुस्तान) के देली (देहली) नामक शहर में आया जहां पर 'अलेक्ज़ेंडर दी ग्रेट' (सिकंदर) ने हिंदुस्तान के राजा पोरस
को हराया और अपनी विजय की यादगार में उसने एक बृहत् स्तंभ खड़ा करवाया जो अब तक वहां विद्यमान है' (केर्स
वॉयेजिज़ ऐंड ट्रैवल्स, जि. ६, पृ. ४२३; क; आ. स. रि; जि. १, पृ. १६३). इस तरह जब टॉम कोरिअट् ने अशोक के लेखवाले
स्तंभ को बादशाह सिकंदर का खड़ा करवाया हुआ मान लिया तो उस पर के लेख के पढ़े न जाने तक दूसरे यूरोपियन
यात्री आदि का उसकी लिपि को ग्रीक मान लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं है. पादरी एडवर्ड टेरी ने लिखा है कि, टॉम
कोरिअट ने मुझ से कहा कि मैंने देली (देहली) में ग्रीक लेख वाला एक बहुत बड़ा पाषाण का स्तंभ देखा जो 'अलेक्ज़ेंडर
दी ग्रेट' ने उस प्रसिद्ध विजय की यादगार के निमित्त उस समय वहां पर खड़ा करवाया था' (क; आ. स. रि; जि. १,
पृ. १६३-६४). इसी तरह दूसरे लेखकों ने उस लेख को ग्रीक लेख मान लिया था.
४० प्राचीनलिपिममाला.
पादरी जेम्स स्टिवन्सन ने भी प्रिन्सेप की नांई इसी शोध में लग कर 'क,' 'ज,' 'प' और
'व' अक्षरों१ को पहिचाना और इन अक्षरों की सहायता से लेखों को पढ़ कर उनका अनुवाद
करने का उद्योग किया गया परंतु कुछ तो अक्षरों के पहिचानने में भूल हो जाने, कुछ वर्णमाला पूरी
ज्ञात न होने२ और कुछ उन लेखों की भाषा को संस्कृत मान कर उसी भाषा के नियमानुसार
पढ़ने से वह उद्योग निष्फल हुआ. इससे भी प्रिन्सेप को निराशा न हुई. ई. स. १८३६ में
प्रसिद्ध विद्वान् लैसन ने एक बाक्ट्रियन ग्रीक सिक्के पर इन्हीं अक्षरों में अगॅथॉक्लिस का नाम पढ़ा.
ई. स. १८३७ में मि. प्रिन्सेप ने सांची के स्तूपों से संबंध रखने वाले स्तंभों आदि पर खुदे हुए
कई एक छोटे छोटे लेखों की छापें एकत्र कर उन्हें देखा तो उनके अंत के दो अक्षर एकसे दिखाई
दिये और उनके पहिले प्रायः 'स' अक्षर पाया गया जिसको प्राकृत भाषा के संबंध कारक के
एक वचन का प्रत्यय (संस्कृत 'स्य' से) मान कर यह अनुमान किया कि ये सब लेख अलग
अलग पुरुषों के दान प्रकट करते होंगे और अंत के दोनों अक्षर, जो पढ़े नहीं जाते और जिनमें
से पहिले के साथ 'आ' की मात्रा और दूसरे के साथ अनुस्वार लगा है उनमें से पहिला अक्षर
'दा' और दूसरा 'नं' (दानं) ही होगा. इस अनुमान के अनुसार 'द' और 'न' के पहिचाने
जाने पर वर्णमाला संपूर्ण हो गई और देहली, अलाहाबाद, सांची, मथिया, रधिया, गिरनार,
धौली आदि के लेख सुगमता पूर्वक पढ़ लिये गये. इससे यह भी निश्चय हो गया कि उनकी
भाषा जो पहिले संस्कृत मान ली गई थी वह अनुमान ठीक न था, वरन उनकी भाषा उक्त स्थानों
की प्रचलित देशी (प्राकृत) भाषा थी. इस प्रकार प्रिन्सेप् आदि विद्वानों के उद्योग से
ब्राह्मी अक्षरों के पढ़े जाने से पिछले समय के सब लेखों का पढ़ना सुगम हो गया क्योंकि भारत-
वर्ष की समस्त प्राचीन लिपियों का मूल यही ब्राह्मी लिपि है.
कर्नल जेम्स टॉड ने एक बड़ा संग्रह बाक्ट्रियन ग्रीक, शक, पार्थियन और कुशनवंशी
खरोष्ठी लिपि. राजाओं के प्राचीन सिक्कों का किया था जिनकी एक ओर प्राचीन ग्रीक और दूसरी
ओर खरोष्ठी अक्षरों के लेख थे. जनरल वेंदुरा ने ई. स. १८३० में मानिकिआल के स्तूप
को खुदवाया तो उसमें से कई एक सिक्के और दो लेख खरोष्ठी लिपि के३ मिले. इनके अतिरिक्त
सर अलेकज़ेंडर बर्न्स आदि प्राचीन शोधकों ने भी बहुत से प्राचीन सिक्के एकत्र किये जिनके
एक ओर के प्राचीन ग्रीक अक्षर तो पढ़े जाते थे परंतु दूसरी ओर के खरोष्ठी अक्षरों के पढ़ने के
लिये कोई साधन न था. इन अक्षरों के लिये भिन्न भिन्न कल्पनाएं होने लगीं. ई. स. १८२४ में कर्नल
जेम्स टॉड ने कदफिसेस् के सिक्के पर के इन अक्षरों को 'ससेनियन' प्रकट किया४. ई. स. १८३३
में ऍपॉलोडॉटसं के सिक्के पर के इन्हीं अक्षरों को प्रिन्सेप ने पहलवी५ माना और एक दूसरे सिक्के
पर की इसी लिपि६ को तथा मानिकिआल के लेख की लिपि को भी पाली७ (ब्राह्मी) बतलाया
और उनकी आकृति टेढ़ी होने से यह अनुमान किया कि छापे और महाजनी लिपि के नागरी
अक्षरों में जैसा अंतर८ है वैसा ही देहली आदि के अशोक के लेखों की पाली (ब्राह्मी) लिपि
और इनकी लिपि में है, परंतु पीछे से स्वयं प्रिन्सेप को अपना अनुमान अयुक्त जंचने लगा.
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ४०४.
२. 'न' को 'र' पढ़ लिया था और 'द' को पहिचाना न था.
३. प्रिं; ऐं; जि. १, पृ. ६३-६६. ४. ए. रि; जि. १८, पृ. ५७८.
५. ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३. ६. ज. ए. सो. बंगा; जि. २, पृ. ३१३, ३१६.
७. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१८. ८. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ३१६.
ब्राह्मी लिपि. ४१
ई. स. १८३४ में कसान कोर्ट को एक स्तूप में से इसी लिपि का एक लेख मिला जिसको देख कर
प्रिन्सेप ने फिर इन अक्षरों को पहलवी माना १. अफ़गानिस्तान में प्राचीन शोध के कार्य में लगे हुए मि.
मेसन को जब यह मालूम हो गया कि एक ओर ग्रीक लिपि में जो नाम है ठीक वही नाम दूसरी ओर
की लिपि में है, तब उसने मिनॅन्डर, ऍपॉलॉडोटस, हर्मिअस, बसिलेअस (राजा) और सॉटेरस ( त्रातर् )
शब्दों के खरोष्ठी चिह्न पहिचान लिये और वे प्रिन्सेप को लिख भेजे. मि. प्रिन्सेप ने उन चिह्नों
के अनुसार सिक्कों को पढ़ कर देखा तो उन चिह्नों को ठीक पाया और ग्रीक लेखों की सहायता से
उन ( खरोष्ठी ) अक्षरों को पढ़ने का उद्योग करने पर १२ राजाओं के नाम तथा ६ खिताब पढ़ लिये
गये. इस तरह खरोष्ठी लिपि के बहुत से अक्षरों का बोध होकर यह भी ज्ञात हो गया कि यह लिपि
दाहिनी ओर से बाईं ओर को पढ़ी जाती है. इससे यह भी पूर्ण विश्वास हो गया कि यह लिपि
सेमिटिक् वर्ग की है परंतु इसके साथ ही उसकी भाषा को, जो वास्तव में प्राकृत थी, पहलवी मान
लिया. इस प्रकार ग्रीक लेखों के सहारे से खरोष्ठी लिपि के कितने एक अक्षर मालूम हो गये किंतु
पहलवी भाषा के नियमों पर दृष्टि रख कर पढ़ने का उद्योग करने से अक्षरों के पहिचानने में अशुद्धता
हो गई जिससे यह शोध आगे न बढ़ सका. ई. स. १८३८ में दो बाकट्रिअन ग्रीक राजाओं के सिक्कों
पर पाली ( प्राकृत ) लेख देखते ही सिक्कों पर के खरोष्ठी लिपि के लेखों की भाषा को पाली ( प्राकृत )
मान उसके नियमानुसार पढ़ने से प्रिन्सेप का शोध आगे बढ़ सका और १७ अक्षर पहिचान में आ गये.
प्रिन्सेप की नांई मि. नॉरिस ने इस शोध में लग कर इस लिपि के ६ अक्षर पहिचान लिये और
जनरल कनिंगहाम ने बाकी के अक्षरों को पहिचान कर खरोष्ठी की वर्णमाला पूर्ण कर दी और संयुक्ता-
क्षर भी पहिचान लिये.
५—ब्राह्मी लिपि.
ई. स. पूर्व ५०० के आसपास से लगा कर ई. स. ३५० के आसपास तक ( लिपिपत्र १—१५ ).
ब्राह्मी लिपि भारतवर्ष की प्राचीन लिपि है. पहिले इस लिपि के लेख अशोक के समय अर्थात्
ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी तक के ही मिले थे, परंतु कुछ बरस हुए इस लिपि के दो छोटे छोटे
लेख १, जिनमें से एक पिप्रावा के स्तूप से और दूसरा बर्ली गांव से, मिले हैं जो ई. स. पूर्व की पांचवीं
शताब्दी के हैं. इन लेखों की और अशोक के लेखों की लिपि में कोई स्पष्ट अंतर २ नहीं है, जैसा कि
ई. स. की १४ वीं शताब्दी से लगा कर अब तक की नागरी लिपि में नहीं पाया जाता; परंतु दक्षिण
से मिलने वाले भट्टिप्रोलु के स्तूप के लेखों की लिपि में, जो अशोक के समय से बहुत पीछे की नहीं है,
१. ज. ए. सो. बंगा; जि. ३, पृ. ५४७, ५६३.
२. देखो ऊपर पृ. २.
३. पिप्रावा के लेख में दीर्घ स्वरों की मात्राओं का अभाव है और बर्ली के लेख में 'ई' की मात्रा का जो चिह्न है
वह अशोक और उसके पिछले किसी लेख में नहीं मिलता ( देखो ऊपर पृ. २-३, और पृ. ३ का टिप्पण २).
४२ प्राचीनलिपिमाला
पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से बहुत कुछ भिन्नता पाई जाती है जिससे
अनुमान होता है कि भट्टिप्रोलु के लेखों की लिपि अशोक के लेखों की लिपि से नहीं निकली
किंतु उस प्राचीन ब्राह्मी से निकली होगी जिससे पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि
निकली है. यह भी संभव है कि भट्टिप्रोलु के स्तूप की लिपि ललितविस्तर की 'द्राविड़ लिपि'
हो क्योंकि वे लेख द्रविड़ देश के कृष्णा जिले में ही मिले हैं.
अशोक से पूर्व के जैन 'समवायांग सूत्र' में तथा पिछले बने हुए 'ललितविस्तर' में ब्राह्मी
के अतिरिक्त और बहुतसी लिपियों के नाम मिलते हैं, परंतु उनका कोई लेख अब तक नहीं
मिला जिसका कारण शायद यह हो कि प्राचीन काल में ही वे सब अस्त हो गई हों और उन-
का स्थान अशोक के समय की ब्राह्मी ने ले लिया हो जैसा कि इस समय संस्कृत ग्रंथों के
लिखने तथा छपने में भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों की भिन्न भिन्न लिपियों का स्थान बहुधा
नागरी ने ले लिया है. ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दि से पहिले की ब्राह्मी का कोई लेख अब-
तक नहीं मिला; अतएव इस पुस्तक की ब्राह्मी लिपि का प्रारंभ ई. स. पूर्व ५०० के आस
पास से ही होता है.
हस्तलिखित लिपियों में सर्वत्र ही समय के साथ और लेखकों की लेखन रुचि के अनुसार
परिवर्तन हुआ ही करता है. ब्राह्मी लिपि भी इस नियम से बाहर नहीं जा सकती. उसमें
भी समय के साथ बहुत कुछ परिवर्तन हुआ और उससे कई एक लिपियां निकलीं जिनके
अक्षर मूल अक्षरों से इतने बदल गये कि जिनको प्राचीन लिपियों का परिचय नहीं है वे
सहसा यह स्वीकार न करेंगे कि हमारे देश की नागरी, शारदा (कश्मीरी), गुरमुखी (पंजाबी),
बंगला, उड़िया, तेलुगु, कनडी, ग्रन्थ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान लिपियां एक ही मूल लिपि
ब्राह्मी से निकली हैं. ब्राह्मी लिपि के परिवर्तनों के अनुसार हमने अपने सुभीते के लिये उसके
विभाग इस तरह किये हैं—
ई. स. पूर्व ५०० के आस पास से लगा कर ई. स. ३५० के आस पास तक की समस्त
भारतवर्ष की लिपियों की संज्ञा ब्राह्मी मानी है. इसके पीछे उसका लेखन प्रवाह दो
स्रोतों में विभक्त होता है जिनको उत्तरी और दक्षिणी शैली कहेंगे. उत्तरी शैली का प्रचार
विंध्य पर्वत से उत्तर के तथा दक्षिणी का दक्षिण के देशों में बहुधा रहा तो भी विंध्य से उत्तर
में दक्षिणी, और विंध्य से दक्षिण में उत्तरी शैली के लेख कहीं कहीं मिल ही आते हैं.
उत्तरी शैली की लिपियां ये हैं—
१. गुप्तलिपि—गुप्तवंशी राजाओं के समय के लेखों में सारे उत्तरी हिंदुस्तान में इस
लिपि का प्रचार होने से इसका नाम 'गुप्तलिपि' कल्पित किया गया है. इसका प्रचार ई. स.
की चौथी और पांचवीं शताब्दी में रहा.
२. कुटिललिपि—इसके अक्षरों तथा विशेष कर स्वरों की मात्राओं की कुटिल आकृतियों
के कारण इसका नाम कुटिल रक्खा गया. यह गुप्तलिपि से निकली और इसका प्रचार ई. स.
की छठी शताब्दी से नवीं तक रहा, और इसीसे नागरी और शारदा लिपियां निकलीं.
३. नागरी—उत्तर में इसका प्रचार ई. स. की ६ वीं शताब्दी के अंत के आस पास से
मिलता है परंतु दक्षिण में इसका प्रचार ई. स. की आठवीं शताब्दी से होना पाया जाता है क्योंकि
दक्षिण के राष्ट्रकूट (राठौड़) वंशी राजा दंतिदुर्ग के सामनगढ़ (कोल्हापुर राज्य में) से मिले हुए शक
संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) के दानपत्र १ की लिपि नागरी ही है और दक्षिण के पिछले कई राजवंशों
१. इं. ऐं; जि. ११, पृ. ११० से ११२ के सामने के प्लेट.
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ब्राह्मी लिपि. ४३
के लेखों में इसका प्रचार ई. स. की १६ वीं शताब्दी के पीछे तक किसी प्रकार मिल आता है. दक्षिण
में इसको 'नंदिनागरी' कहते हैं. प्राचीन नागरी की पूर्वी शाखा से बंगला लिपि निकली, और
नागरी से ही कैथी, महाजनी, राजस्थानी (राजपूताने की) और गुजराती लिपियां निकली हैं.
४. शारदा—इस का प्रचार भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों अर्थात् कश्मीर और पंजाब में
रहा. ई. स. की ८ वीं शताब्दी के राजा मेरुवर्मा के लेखों से (देखो लिपिपत्र २२ वां) पाया जाता है
कि उस समय तक तो पंजाब में भी कुटिल लिपि का प्रचार था, जिसके पीछे उसी लिपि से शारदा
लिपि बनी. उसके जितने लेख अब तक मिले हैं उनमें सब से पुराना लेख सराहां (चंबा राज्य में) की
प्रशस्ति.है, जो ई. स. की दसवीं शताब्दी की अनुमान की जा सकती है. इसी लिपि से वर्तमान कश्मीरी
और टाकरी लिपियां निकली हैं और पंजाबी अर्थात् गुरुमुखी के अधिकतर अक्षर भी इसीसे निकले हैं.
५. बंगला—यह लिपि नागरी की पूर्वी शाखा से ई. स. की १० वीं शताब्दी के आस पास निकली
है. बदाल के स्तंभ पर खुदे हुए नारायणपाल के समय के लेख में, जो ई. स. की १० वीं शताब्दी का
है, बंगला का झुकाव दिखाई देता है. इसीसे नेपाल की ११ वीं शताब्दी के बाद की लिपि, तथा
वर्तमान बंगला, मैथिल और उड़िया लिपियां निकली हैं.
दक्षिणी शैली की लिपियां प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उस परिवर्तित रूप से निकली हैं जो क्षत्रप
और आंध्रवंशी राजाओं के समय के लेखों में, तथा उनसे कुछ पीछे के दक्षिण की नासिक, कार्ली
आदि गुफाओं के लेखों में पाया जाता है.
दक्षिणी शैली की लिपियां नीचे लिखी हुई हैं—
१. पश्चिमी—यह लिपि काठियावाड़, गुजरात, नासिक, खानदेश और सतारा ज़िलों में, हैदरा-
बाद राज्य के कुछ अंशों में, कौंकण में तथा कुछ कुछ मासोर राज्य में, ई. स. की पांचवीं शताब्दी के
आस पास से नवीं शताब्दी के आस पास तक मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस पास
इसका कुछ कुछ प्रचार राजपूताना तथा मध्य भारत में भी पाया जाता है. इसपर उत्तरी लिपि का
बहुत कुछ प्रभाव पड़ा है. भारतवर्ष के पश्चिमी विभाग में इसका अधिकतर प्रचार होने के कारण
इसका 'पश्चिमी' यह नाम कल्पित किया गया है.
२. मध्यदेशी—यह लिपि मध्यप्रदेश, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग, तथा बुंदेलखंड के
कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं शताब्दी से लगा कर आठवीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है.
इस लिपि के अक्षरों के सिर चौकूंटे या संदूक की सी आकृति के होते हैं जो भीतर से बहुधा खाली,
परंतु कभी कभी भरे हुए भी, होते हैं. अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली होती है, अर्थात्
उनके बनाने में आड़ी और खड़ी रेखाएं काम में लाई गई हैं, न कि गोलाईदार. इस लिपि के ताम्र-
पत्र ही विशेष मिले हैं, शिलालेख बहुत कम.
३. तेलुगु-कनडी—यह लिपि बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग अर्थात् दक्षिणी मराठा प्रदेश,
शोलापुर, बीजापुर, बेलगांव, धारवाड़ और कारवाड़ ज़िलों में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों में,
मासोर राज्य में, एवं मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग अर्थात् विज़गापट्टम, गोदावरी, कृष्णा, कर्नूल,
बिलारी, अनंतपुर, कड्डुप्पा, और नेल्लोर ज़िलों में मिलती है. ई. स. की पांचवीं शताब्दी से १४ वीं
शताब्दी तक इसके कई रूपांतर होते होते इसीसे वर्तमान तेलुगु और कनडी लिपियां बनीं. इसीसे
इसका नाम तेलुगु-कनडी रक्खा गया है.
४. ग्रंथलिपि—यह लिपि मद्रास इहाते के उत्तरी व दक्षिणी आर्कट, सलेम्, ट्रिचिनापल्ली,
मदुरा और तिन्नेवेल्लि ज़िलों में मिलती है. ई. स. की सातवीं शताब्दी से १५ वीं शताब्दी तक इसके
कई रूपांतर होते होते इससे वर्त्तमान ग्रंथलिपि बनी और उससे वर्तमान मलयालम् और तुलु लिपियां
४४ प्राचीनलिपिमाला.
निकलीं. मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्णों की अपूर्णता के कारण
संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे
इसका नाम 'ग्रंथलिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो ऐसा अनुमान होता है.
५. कलिंग लिपि—यह लिपि मद्रास इहाते में चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में वहां
के गंगवंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है.
इसका सब से पहिला दानपत्र [गांगेय]संवत् ८७ का मिला है जो गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् का है.
उसकी लिपि मध्यदेशी लिपि से मिलती हुई है. अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से
भरे हुए, हैं और अक्षर बहुधा समकोणवाले हैं (लिपिपत्र ५७ में दी हुई राजा देवेंद्रवर्मन् के दानपत्र
की लिपि को लिपिपत्र ४१ से मिला कर देखो); परंतु पिछले ताम्रपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं,
किंतु गोलाई लिये हुए हैं और उनमें नागरी, तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथलिपि का मिश्रण होता गया है.
६. तामिळलिपि—यह लिपि मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथलिपि प्रचलित थी वहां
के, तथा उक्त इहाते के पश्चिमी तट अर्थात् मलवार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में ई. स. की
सातवीं शताब्दी से बराबर मिलती चली आती है. इस लिपि के अधिकतर अक्षर ग्रंथलिपि से
मिलते हुए हैं (लिपिपत्र ६० में दी हुई लिपि को लिपिपत्र ५२ और ५३ में दी हुई लिपियों से
मिला कर देखो); परंतु 'क', 'र' आदि कुछ अक्षर उत्तर की ब्राह्मी लिपि से लिये हुए हैं. इसका
रूपांतर होते होते वर्तमान तामिळलिपि बनी इस वास्ते इसका नाम तामिळ रक्खा गया है.
वट्टॆऴुत्तु—यह तामिळ लिपि का ही भेद है और इसे त्वरा से (घसीट) लिखी जाने वाली
तामिळ लिपि कह सकते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी
विभाग के ई. स. की ७ वीं से १४ वीं शताब्दी तक के लेखों तथा दानपत्रों में मिलता है परंतु
कुछ समय से इसका प्रचार नहीं रहा.
ब्राह्मी लिपि के वैदिक काल में ब्राह्मी लिपि के ध्वनिसूचक संकेत या अक्षर नीचे लिखे अनुसार
अक्षर. माने जाते थे—
स्वर. ह्रस्व. अ इ उ ऋ १ ऌ २
दीर्घ. आ ई ऊ ॠ [ॡ?]
प्लुत ३. आ ३ ई ३ ऊ ३ ॠ ३ [ॡ ३?]
संध्यक्षर. ए ऐ ओ औ
इनके प्लुत. ए ३ ऐ ३ ओ ३ औ ३
१. आज कल 'ऋ' और 'ऌ' का उच्चारण बहुधा सब लोग 'रि' और 'लि' के सदृश करते हैं. दक्षिण के कुछ
लोग 'रु' और 'लु' के से विलक्षण उच्चारण करते हैं और उत्तर-भारत के कितने एक वैदिक 'र्ॅ' और 'लॅ' के से उच्चा-
रण करते हैं; परंतु वास्तव में ये तीनों उच्चारण कल्पित ही हैं. 'ऋ' और 'ऌ', 'र' और 'ल' से स्वरमय उच्चारण थे
जो बिना किसी और स्वर की सहायता के होते थे, परंतु बहुत काल से वे लुप्त हो गये हैं. अब तो केवल उनके अक्षरसं-
केत रह गये हैं.
२. 'ऌ' स्वर वेद में केवल 'क्लृप्' धातु में मिलता है और संस्कृत साहित्य भर में उक्त धातु को छोड़ कर कहीं उसका
प्रयोग नहीं मिलता. वैयाकरणों ने तोतले बोलने वाले बच्चों के 'ऋ' के अशुद्ध उच्चारण के अनुकरण में इसे माना है, तो
भी इसके प्लुत का प्रयोग मानने को वे तय्यार नहीं हैं; क्योंकि इसका व्यवहार ही नहीं है. शुक्ल यजुर्वेद के प्रातिशाख्य में
अन्य स्वरों से समानता करने के लिये 'ऌ' के दीर्घ और प्लुत रूप माने हैं परंतु उनका प्रयोग कहीं नहीं मिलता. ह्रस्व
ऌकार वाले शब्द के कल्पित संबोधन में प्लुत 'ऌ ३' का होना वैयाकरण और कुछ शिक्षाकार मानते हैं, तो भी वास्तव में
'ऌ' केवल ह्रस्व ही है.
३. आज कल त्रिमात्रिक स्वर अर्थात् प्लुत के लिये दीर्घ स्वर के आगे ३ का अंक लगाते हैं परंतु यह रीति प्राचीन
नहीं जान पड़ती. दीर्घ स्वरों के लिये जैसे ह्रस्व के आगे २ का अंक नहीं लगाया जाता परंतु ब्राह्मी और वर्तमान नागरी में
अ' पर ही मात्रा लगा कर काम चलाया जाता है (ॲ, ॲ, ओ, औ-गुजराती) वैसे ही प्लुत केWait, look at(ॲ, ॲ, ओ, औ-गुजराती): Wait! In Gujarati, E and AI on A: ॲ, ॲ? Wait, look at the characters: (ॲ, ॲ? No, Gujarati અwith matras! In Gujarati types:ઍ, ઐ! Wait, look at the typeset characters: It is (ઍ, ઐ, ઓ, ઔ-गुजराती)! Wait, let's look at the image: (thenઍ(orॲ), then ,thenऐ? Look at the image: First character: अwith a matra? Look closely: It'sॲ? No, it's ऐonअ? In Gujarati script: એis written asઅwith matra:ઍorએ? Look at the printed text: ( ઍ, ऐ, ओ, औ-गुजराती )or( ॲ, ... )? Wait, it's Devanagari अwith matras! First one:अwith a single slanted matra (likeेonअ): ॲ? No, अे`!
Second
४६ प्राचीनलिपिम़ाला.
अन्तस्थ. य र ल व
ऊष्मन्. श ष १ स ह
यम.२ कुँ खुँ गुँ घुँ
इस तरह वैदिक साहित्य में अधिक से अधिक ६४ (ऋग्वेद में ६४३ और यजुर्वेद में ६३४)
ध्वनिसूचक संकेत अर्थात् वर्ण थे, परंतु पीछे से साधारण मनुष्यों एवं जैन और बौद्धों में, जिन-
का प्रारंभिक साहित्य प्राकृत में था, ४६ या ४७५ अक्षर व्यवहार में आते थे. ई. स. की चौथी
१. याज्ञवल्क्य के अनुसार उत्तर-भारत के यजुर्वेदी लोग संहितापाठ में टवर्ग के साथ के संयोग को छोड़ कर और
सर्वत्र ‘ष’ को ‘ख’ बोलते हैं, जैसे षष्ठी=खष्ठी; इसीसे मिथिला, बंगाल, पंजाब आदि के संस्कृतज्ञ तथा अन्य लोग
भी संस्कृत एवं ‘भाखा’ में बहुधा ‘ष’ को ‘ख’ बोलने लग गये. इसी वैदिक उच्चारण से प्राकृत में ‘क्ष’ के दो रूप छ (च्छ)
और ख (क्ख) हो गये.
२. वर्गों के पहिले चार वर्णों का जब किसी वर्ग के पांचवें वर्ण से संयोग होता है तब उस अनुनासिक वर्ण के पहिले
वैदिक काल में एक विलक्षण ध्वनि होती थी जिसे यम कहते थे, जैसे ‘पत्नी’ में ‘त्’ और ‘न्’ के बीच में. इस तरह बीस
यम होने चाहियें, परंतु प्रातिशाख्यों में तथा शिक्षाओं में चार ही यम माने हैं और उनके नाम या संकेत ‘कुँ’, ‘खुँ’, ‘गुँ’ और
‘घुं’ दिये हैं. इसका तात्पर्य यह है कि वर्गों के पहिले अक्षरों अर्थात् क, च, ट, त, प के संयोग से जो यम उत्पन्न होता
था वह ‘कु’ कहलाता था, और उसके लिये एक चिह्न नियत था. इसी तरह ख, छ, ठ, थ, फ के संयोग से उत्पन्न होने-
वाले यम के लिये ‘खु’ प्रकृति का चिह्न, ग, ज, ड, द, ब के संयोग से बने हुए यम के लिये ‘गु’ प्रकृति का कोई तीसरा
चिह्न, और घ, झ, ढ, ध, भ के संयोग से उद्धत यम के लिये ‘घ’ प्रकृति का कोई और चिह्न नियत था. ये चिह्न कैसे थे
इसका पता न तो शिलालेखादि में और न पुस्तकों में मिलता है, किंतु व्याकरणवाले इन यमों को क, ख, ग, घ से बतलाते
हैं, जैसे-
पत्नी= पत् ( मूल व्यंजन ) क् ( यम ) नी= पत्क्नी
सक्थ्ना= सक्थ ( ,, ,, ) ख् ( ,, ) ना= सक्थ्खना
अग्नि= अग् ( ,, ,, ) ग् ( ,, ) नि= अग्ग्नि
यज्ञ= •यज् ( ,, ,, ) ग् ( ,, ) ञ= यज्ग्ञ
गृभ्णामि= गृभ् ( ,, ,, ) घ् ( ,, ) णामि= गृभ्घ्णामि.
३. ऋग्वेद में २१ स्वर (‘लृ’ के दीर्घ और प्लुत को छोड़ने से), ४ अयोगवाह (अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय), २५ स्पर्श वर्ण (पांचों वर्गों के २५ और ‘ळ’ तथा ‘ळ्ह’), ४ अंतःस्थ, ४ ऊष्मन् और ४ यम, मिलकर ६४ वर्ण
होते हैं.
४. यजुर्वेद में वर्णसंख्या बहुधा ऋग्वेद के समान ही है, केवल ‘ळ’ और ‘ळ्ह’ का प्रयोग उसमें नहीं होता परंतु
उसमें अनुस्वार का ऴ रूप अलग होता है. इसीसे उसमें ६३ वर्ण काम में आते हैं.
५. जैनों के दृष्टिवाद में, जो लुप्त हो गया है, ब्राह्मी अक्षरों की संख्या ४६ मानी है, (वे; इं. स्ट, १६, २८१), जो अ,
आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब,
भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ (या क्ष) होने चाहिये. हुएन्त्सँग अक्षरों की संख्या ४७ बतलाता है (बी; बु. रे. वे.
घ; जिल्द १, पृ. ७८), जो 'अ' से 'ह' तक के ४५ अक्षर तो ऊपर लिखे अनुसार और बाकी के दो अक्षर 'क्ष' और 'ज्ञ'
होने चाहियें. बौद्ध और जैनों के प्राकृत ग्रंथों में ऋ, ॠ, लृ, ॡ इन चार स्वरों का प्रयोग नहीं है. प्राकृत साहित्य में इन-
की आवश्यकता ही नहीं रहती. जहां संस्कृत शब्द के प्रारंभ में 'ऋ' होता है वहां प्राकृत में 'रि' हो जाता है (ऋषभ=
रिसभ, ऋक्ष=रिच्छ या रिक्ख); और जहां व्यंजन के साथ 'ऋ' की मात्रा लगी होती है वहां 'ऋ' के स्थान में 'अ', 'इ'
या 'उ' हो जाता है (मृग=मग, तृषा=तिसा, सुर्वण=सुहंग; निभृत=निहुअ). ये चारों वर्ण (ऋ, ॠ, लृ, ॡ) अब भी
साधारण लोगों के व्यवहार में नहीं आते और प्रारंभिक पढ़ने वालों की 'बारखड़ी' (द्वादशाक्षरी) में भी इनको स्थान नहीं
मिलता. यह आरंभिक पठनशैली आधुनिक नहीं है, किंतु अशोक के समय अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में भी
ऐसी ही थी, क्योंकि बुद्धगया के अशोक के समय के बने हुए महाबोधी मंदिर के पास बुद्ध के चंक्रम अर्थात् भ्रमणस्थान में
दोनों ओर ११, ११ स्तंभों की दो पंक्तियां हैं उन स्तंभों की कुंभियों (आधार) पर शिल्पियों ने एक एक करके 'अ' को छोड़ कर
'आ' से 'ह' तक के अक्षर खोदे हैं. उनमें भी ये चारों स्वर नहीं है. यद्यपि सामान्य लोगों के व्यवहार में ये चार वर्ण
नहीं आते थे तो भी वर्णमाला में उनको स्थान अवश्य मिलता था, क्योंकि जापान के होर्युजी नामक स्थान के बौद्ध
मठ में रक्खी हुई ई. स. की छठी शताब्दी की 'उष्णीषविजयधारणी' नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई बौद्ध पुस्तक
ब्राह्मी लिपि. ४७
शताब्दी के पीछे, लेखनशैली में अक्षरों के रूपों में परिवर्त्तन होते होते संयुक्ताक्षर 'क्ष' में 'क्'
और 'ष' के मूल रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण ही रूप 'क्ष' बन गया तब बौद्धों
ने 'क्ष' को भी वर्णों अर्थात् मातृकाओं (सिद्धमातृकाओं) में स्थान दिया. इसी तरह पीछे से
संयुक्ताक्षर 'ज्ञ' के 'ज्' और 'ञ' के रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण रूप 'ज्ञ' बन गया
तब उसको भी लोगों ने वर्णों में स्थान दिया. तंत्रग्रंथों में 'क्ष' और 'ज्ञ' की वर्णों अर्थात् मातृका-
ओं में संज्ञा की गई है परंतु ये दोनों सर्वथा वर्ण नहीं किंतु संयुक्तवर्ण हैं और उनके घटक दो दो
अक्षरों के मूलरूप न रहने पर एक ही विलक्षण नया संकेत बन जाने से ही उनकी वर्णों में गणना
हुई है जैसे कि वर्तमान काल में नागरी की वर्णमाला में 'त्र' की भी².
लिपिपत्र पहिला.
यह लिपिपत्र गिरनार पर्वत के पास के चट्टान पर खुदे हुए मौर्यवंशी राजा अशोक के लेख की
अपने हाथ से तय्यार की हुई छापों से बनाया गया है. यह लेख मौर्यराज्य के पश्चिमी विभाग का
होने से वहां की ब्राह्मी लिपि को प्रकट करता है. इसमें स्वरों की मात्राओं के चिह्न इस प्रकार
मिलते हैं-
'आ' की मात्रा एक छोटीसी आड़ी लकीर (-) है जो व्यंजन की दाहिनी तरफ बहुधा अक्षर
के ऊपर की ओर (देखो, खा, रा) परंतु कभी कभी मध्य में भी, (देखो, जा, मा, बा) लगाई जाती
है. 'ज' के साथ 'आ' की मात्रा का योग केवल 'ज' के मध्य की लकीर को कुछ अधिक लंबी कर
के बतलाया है जिससे कभी कभी 'ज' और 'जा' में भ्रम हो जाता है.
'इ' की मात्रा का नियत चिह्न ┘ है जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ लगता है
(देखो, नि), परंतु कहीं कहीं समकोण के स्थान पर गोलाइदार या तिरछी लकीर भी मिलती है
(देखो, टि, लि).
'ई' की मात्रा का नियत चिह्न ╜ है, जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ जोड़ा
जाता है (देखो, टी, ठी), परंतु कहीं कहीं आड़ी सीधी लकीर को तिरछा कर दिया है, और समकोण के
स्थान में गोलाई मिलती है (देखो, पी, मी); 'धी' बनाने में 'ध' के साथ केवल दो तिरछी लकीरें ही
लगा दी गई हैं.
अशोक के पूर्व के बर्ली गांव के लेख में 'वीराय' के 'वी' ६ अक्षर के साथ 'ई' की मात्रा
का चिह्न ( है, जो अशोक के समय में लुप्त हो चुका था और उसके स्थान में ऊपर लिखा हुआ
नया चिह्न बर्ताव में आने लग गया था (देखो, ऊपर पृष्ठ ३ और वहीं का टिप्पण २).
के अंत में जिस लेखक ने वह पुस्तक लिखी है उसीके हाथ की लिखी हुई उस समय की पूरी वर्णमाला है
जिसमें इन चार वर्णों को स्थान दिया गया है (देखो, लिपिपत्र १६). ऐसे ही हन्नाकोल से मिले हुए ई. स. की
१२ वीं शताब्दी के बौद्ध तांत्रिक शिलालेख में प्रत्येक वर्ण पर अनुस्वार लगा कर पूरी वर्णमाला के बीज बनाए हैं जिनमें
भी ये चारों वर्ण हैं (लिपिपत्र ३५) और उदयादित्य के समय के उज्जैन के शिलालेख के अंत में खुदी हुई पूरी वर्णमाला
में भी ये चारों वर्ण दिये हुए हैं (देखो लिपिपत्र २५).
२. वर्तमान 'त्र' में मूल घटक दोनों अक्षरों में से एक अर्थात् 'र' का चिह्न तो पहिचाना जाता है, परंतु 'त्' का
नहीं, किंतु 'क्ष' और 'ज्ञ' में दोनों ही के मूल अक्षरों का पता नहीं रहा. इतना ही नहीं, 'ज्ञ' में तो वास्तविक उच्चारण
भी नष्ट हो गया. दक्षिणी लोग कोई कोई इसे 'द्न्य' बोलते हैं (देखो बंबई के अंगरेजी पत्र ज्ञानप्रकाश का अंगरेज़ी
अक्षरांतर Dnan Prakash) और उत्तर में 'ज्ञ' का स्पष्ट 'ग्य' उच्चारण है, केवल कुछ संस्कृतज्ञ 'ज्ज्य' के सदृश उच्चारण
करते हैं. ऐसी दशा में जब इन संकेतों से मूल अक्षरों का भान नहीं होता तब उच्चारण और वर्णज्ञान की शुद्धि के लिये
इन्हें 'क्-ष' और 'ज्-ञ' लिखना और छापना ही उचित है.
४८ प्राचीनलिपिमाला.
'उ', और 'ऊ' के चिह्न क्रमशः एक और दो आड़ी ( - = ) या खड़ी ( । ॥) लकीरें हैं जो
व्यंजन के नीचे को लगाई जाती हैं. जिन व्यंजनों का नीचे का हिस्सा गोल या आड़ी लकीरवाला
होता है उनके साथ खड़ी, और जिनका खड़ी लकीरवाला होता है उनके साथ आड़ी (दाहिनी ओर)
लगाई जाती हैं (देखो, तु, धु, नु, सु, कू, जू,).
'ए' और 'ऐ' के चिह्न क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें ( - = ) हैं जो बहुधा व्यंजन की
बाईं ओर ऊपर की तरफ़ परंतु कभी कभी मध्य में भी लगाई जाती हैं, (देखो, के, टे, ऐ, थै).
'ओ' का चिह्न दो आड़ी लकीरें हैं ( - - ) जिनमें से एक व्यंजन की दाहिनी ओर को
'आ' की मात्रा की नांईं, और दूसरी बाईं ओर को 'ए' की मात्रा के समान लगाई जाती है
(देखो, ओ, नो).
'औ' का चिह्न इस लेख में नहीं है किंतु उसमें 'ओ' के चिह्न से इतनी ही विशेषता है कि
बाईं ओर को एक के स्थान में दो आड़ी लकीरें ( = ) होती हैं जैसे कि लिपिपत्र आठवें में 'पौ' में.
अनुस्वार का चिह्न एक बिंदु ( ˙ ) है जो बहुधा अक्षर की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ रक्खा
जाता है (देखो, अं).
विसर्ग का चिह्न इस लेख में तथा अशोक के दूसरे लेखों में भी कहीं नहीं मिलता, परंतु
ई. स. की दूसरी शताब्दी के लेखों में वह मिलता है जो वर्तमान विसर्ग के चिह्न के सदृश ही है
और वैसे ही अक्षर के पास आगे लगता है (देखो, लिपिपत्र ७, मूल की पहिली पंक्ति में 'राज्ञः'.)
अशोक के समय ऋ, ॠ, लृ और लॄ की मात्राओं के चिह्न कैसे थे इसका पता नहीं लगता
इतना ही नहीं, किंतु पिछले लेखों में भी 'ऋ' और 'लृ' की मात्राओं के चिह्नों का कहीं पता नहीं
है. 'ऋ' की मात्रा का चिह्न पहिले पहिल ई. स. की दूसरी शताब्दी के लेखों में मिलता है
(देखो, लिपिपत्र ६ में मथुरा के लेखों के अक्षरों में 'गृ', 'मृ' और 'वृ'; लिपिपत्र ७ में 'कृ'
और 'वृ'; और लिपिपत्र आठवें में 'कृ', 'गृ' और 'वृ'). संयुक्त व्यंजनों में कितने एक स्थानों में
पहिले उच्चारण होनेवाले को ऊपर और पीछे उच्चारण होनेवाले को उसके नीचे जोड़ा है (देखो,
म्य, म्हि, र्व, स्ति, स्व) जो शुद्ध है, परंतु कहीं कहीं दूसरे को ऊपर और पहिले को नीचे लिखा है
(देखो, त्र, त्या, व्यो, स्टा, स्ना) जो अशुद्ध है, और यह प्रकट करता है कि लेखक शुद्ध लिखना नहीं
जानता था. हमने उन अक्षरों के ऊपर वर्तमान नागरी के शुद्ध अक्षर जान कर दिये हैं, जैसे खुदे हैं वैसा
अक्षरांतर नहीं किया. 'क्र' में 'र' को अलग नहीं जोड़ा किंतु 'क' की खड़ी लकीर को 'र' का
रूप देकर उसके साथ आड़ी लकीर जोड़ दी है. ऐसे ही 'ब्र' में 'ब' की बाईं तरफ़ की
खड़ी लकीर को भीतर दबा कर उसमें कोण बना दिया है. ऐसे रूप अशोक के किसी दूसरे
लेख में अथवा पिछले लेखों में कहीं नहीं मिलते.
संयुक्त व्यंजनों में पहिले आनेवाले 'र' (रेफ) तथा पीछे आनेवाले 'र' का भेद तो इस
लेख का लेखक जानता ही न था जिससे उसने संयुक्त व्यंजनों में जहां जहां 'र' आया उसको
सर्वत्र पहिले ही लिखा है और उसको (चिह्न से बतलाया है जो उसके लिखे हुए 'र' का अग्रभाग
है (देखो, त्र और र्व).
इस लेख में 'ई', 'ऊ', 'ऐ', 'औ', 'ङ', 'ठ', 'श', और 'ष' अक्षर नहीं है. 'ई' का
रूप गॆ होना चाहिये, जिससे मिलता हुआ रूप क्षत्रपों के सिक्कों में (देखो, लिपिपत्र १०); अमरावती
के लेख में (देखो, लिपिपत्र १२) और कई पिछले लेखों में मिलता है. 'ऊ', ह्रस्व 'उ' के नीचे दाहिनी
ओर एक और आडी लकीर जोड़ने से बनता था जैसा कि भरहुत स्तूप के लेखों से उद्धृत किये हुए
ब्राह्मी लिपि. ४६
अक्षरों में (लिपिपत्र ३) दिया गया है. 'ऐ', 'ए' के अग्रभाग के साथ बाईं ओर एक आड़ी लकीर जोड़ने
से बनता था जैसा कि हाथीगुंफा के लेख में मिलता है (देखो, लिपिपत्र ३). 'औ' का प्राचीन रूप
अशोक के लेखों में अथवा गुप्तों के समय के पूर्व के किसी लेख में नहीं मिलता. उसका अशोक के समय
का रूप ⅂ होना चाहिये. 'ङ' बुद्धगया के उपर्युक्त मंदिर के स्तंभ पर मिलता है जिसकी आ-
कृति [ है. 'ठ' का रूप बिलकुल वृत्त O है और वह देहली के सवालक स्तंभ पर के अशोक के लेख
में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २). 'श' और 'ष' अशोक के खालसी के लेख में मिलते हैं (देखो,
लिपिपत्र २).
इस लेख में बहुतेरे अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं. संभव है कि कुछ तो उस समय
भिन्न भिन्न रूप से लिखे जाते हों परंतु यह भी हो सकता है कि उक्त लेख का लेखक जैसे शुद्ध लिखना
नहीं जानता था वैसे ही बहुत सुंदर अक्षर लिखनेवाला भी न था; क्योंकि इस लेख की लिपि वैसी सुंदर
नहीं है जैसी कि अशोक के देहली के सवालक स्तंभ और पडेरिया (रुंमिंदेई) के स्तंभ के लेखों की है, और
जैसे उनमें अक्षर तथा स्वरों की मात्राओं के चिह्न एकसा मिलते हैं वैसे इस लेख में नहीं हैं. यह भी संभव
है कि लेखक सिद्धहस्त न हो और त्वरा से लिखता हो जिससे अक्षर एकसा नहीं लिख सका.
इसीसे कहीं सीधी खड़ी लकीर को तिरछा (देखो, उ, झ, न और प के दूसरे रूप) या गोलाईदार
(देखो, ग और फ के दूसरे रूप) कर दिया है और कहीं गोलाईदार को तिरछा (देखो, 'अ' का चौथा
रूप और 'घ' का तीसरा रूप) बना दिया है.
लिपिपत्र पहिले की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
इयं धंमलिपी देवानं प्रियेन प्रियदसिना राजा लेखा-
पिता इध न किंचि जीवं आरभित्या प्रजूहितव्यं न
च समाजो कतव्यो बहुकं हि दोसं समाजम्हि पसति
देवानं प्रियो प्रियदसि राजा अस्ति पि तु एकचा समा-
जा साधुमत्ता देवानं प्रियस प्रियदसिनो राज्ञो पुरा महा-
नसम्हि देवानं प्रियस प्रियदसिनो राज्ञो अनुदिवसं ब-
लिपिपत्र दूसरा.
यह लिपिपत्र देहली के सवालक स्तंभ¹, खालसी², जोगड³ और सिद्धापुर⁴ के चटानों तथा राधिआ⁵,
सारनाथ⁶ और सांची⁷ के स्तंभों पर खुदे हुए अशोक के लेखों के फोटों से बनाया गया है और इसमें
बहुधा वे ही अक्षर लिये गये हैं जिनमें लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से या तो कुछ भिन्नता पाई जाती है
या जो लिपिपत्र पहिले में नहीं मिले. यह भिन्नता कुछ तो देशभेद से है और कुछ लेखक की
रुचि और त्वरा से हुई है.
देहली के सवालक स्तंभ के लेख की लिपि बड़ी सुंदर और जमी हुई है और वह सारा लेख
सावधानी के साथ लिखा गया है. उसमें 'आ' में 'आ' की मात्रा का चिह्न ऊपर नहीं किंतु मध्य में लगा
१. ई. ऍ; जि. १३. पृ. ३०६-१० के बीच के सेट. २. ऍ. इं; जि. २, पृ. ४५०-६० के बीच के सेट.
३. आ. स. स. इं; जि. १, सेट ६७-६६. ४. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १३८-४० के बीच के सेट.
५. ऍ. इं; जि. २, पृ. २४८-४६ के बीच के सेट. ६. ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६८ के पास का प्लेट.
७. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३६६ के पास का प्लेट.
५० प्राचीनलिपिमाला.
है. 'द' का मध्य भाग कहीं कहीं गोलाईदार नहीं किंतु समकोणवाला है. 'घ' को कहीं कहीं उलटा
भी लिखा है१. 'ज' के मध्य की दाहिनी तरफ़ की आडी लकीर को कुछ अधिक लंबा कर 'जा' बनाने
से 'ज' और 'जा' में भ्रम होने की संभावना रहती थी जिसको स्पष्ट करने के लिये ही लेखक ने 'ज' के
मध्य की लकीर के अंत में बिंदी बनाकर फिर 'आ' की मात्रा का चिह्न लगाया है. जिन अक्षरों का ऊपर
का भाग खडी लकीरवाला है उनके साथ 'ई' की मात्रा गिरनार के लेख की 'इ' की मात्रा के समान लगाई
है परंतु कुछ नीचे की तरफ़ से, जिससे 'ई' की मात्रा का रूप बन जाता है (देखो, 'पिं' और 'ली' में
'इ' और 'ई' की मात्राओं का भेद). अनुस्वार का चिह्न कहीं अक्षर के ऊपर परंतु विशेष कर आगे ही
धरा है (देखो, 'पिं' और 'भ्युं' )
खालसी के चटान के लेख की लिपि भद्दी है और त्वरा से लिखी हुई प्रतीत होती है जिससे अक्षर
सर्वत्र सम नहीं मिलते और स्वरों की मात्राओं में कहीं कहीं अंतर पड़ गया है (देखो, 'ता', 'शा', 'तु', 'खे',
'गे' और 'ले'). एक स्थान में 'ए' का रूप 'ठ' से मिल गया है. 'घ' और 'ल' का नीचे का भाग कहीं
कहीं गोल नहीं किंतु समकोणवाला बना दिया है (देखो, 'घ', और 'ल' का दूसरा रूप). 'छ' के
ऊपरी भाग में ∨ आकृति का सिर बना दिया है जिससे अनुमान होता है कि उस समय किसी किसी
लिपि में अक्षरों के सिर भी बनते हों, जिसका कुछ आभास भट्टिपोलु के लेखों में स्वरों की मात्रारहित
व्यंजनों में होता है. 'छ' का नीचे का भाग कलम को उठाये बिना ही (चलती कलम से) लिखा है. ऐसे
ही 'ज' को भी कहीं कहीं लिखा है जिससे बीच की आडी लकीर के स्थान में ग्रंथि हो गई है. अशोक
के लेखों में केवल एक यही लेख ऐसा है कि जिसमें 'श' और 'ष' के रूप मिलते हैं.
जोगड़ के लेख में 'ओ' उलटा लिखा है और एक स्थान में 'स' को चलती कलम से लिख दिया है
जिससे मध्य में गांठ बन गई है (जोगड के लेख के इस 'स' को गिरनार, सवालक स्तंभ और खालसी
के लेखों के 'स' से मिलाकर देखो).
सिद्धापुर के लेख में कहीं कहीं 'अ', 'फ', 'म' और 'र' की आकृतियां कुछ विलक्षण बनी हैं.
रधिआ के लेख में 'ड' के नीचे बिंदी बनाई है.
गिरनार के लेख और अशोक के अन्य लेखों के अक्षरों में कहां कहां अंतर है यह लिपिपत्र
दूसरे में दिये हुए अक्षरों को लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से मिलाने से स्पष्ट हो जायगा. प्रत्येक अक्षर
की भिन्नता का विवेचन करने की आवश्यकता नहीं.
लिपिपत्र दूसरे की मूल पंक्तियों२ का नागरी अक्षरांतर―
देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आहा सडुवीसति वस
अभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता हिदतपालते
दुसंप्पटिपादये अंनत अगाया धंमकामताया अगाय
पलीखाया अगाय सुसूसाया अगेन भयेना अगेन उसा-
हेना एस चु खो मम अनुसथिया धंमापेखा धंमकां-
मता चा सुवे सुवे वढिता वढीसति चेवा पुलिसा पि
च मे उकसा चा गेवया चा मझिमा चा अनुविधियंती
――――
१. देखो ऊपर पृ. २७ का टिप्पण ६. २. ये मूल पंक्तियां देहली के सवालक स्तंभ के लेख से हैं.
ब्राह्मी लिपि. ५१
लिपिपत्र तीसरा.
यह लिपिपत्र रामगढ़१, घोसुंडी२, बेसनगर३ (विदिशा), नागार्जुनी गुफा४, नानाघाट५, भर-
हुत६ और सांची७ के स्तूपों और हाथीगुंफा८ के लेखों से तय्यार किया गया है और मुख्य मुख्य अक्षर
ही दिये गये हैं. उक्त लेखों में से पहिले ७ में कोई संवत् नहीं है, केवल हाथीगुंफा के लेख में मुरिय
काल९ (मौर्य संवत्) १६४ (गत) दिया है, अतएव इस लिपिपत्र का समय अनुमान के आधार
पर ही दिया गया है.
घोसुंडी के लेख में 'त्रे' में 'त्' के साथ 'र' को जोड़ने में 'त' के नीचे की दाहिनी ओर
की तिरछी लकीर को कुछ लंबा कर दिया है (इसी तरह बेसनगर के लेख के 'त्रे' में भी). 'प्रा'
में 'र' नीचे की तरफ जोड़ा गया है और 'ष्रे' में 'ष' के प्रारंभ की सीधी खड़ी लकीर को
अधिक लंबा कर 'र' का रूप उसीमें बता दिया है.
बेसनगर (विदिशा) के लेख में 'त्रा' और 'द्र' में 'र' को अधिक लंबी वक्र रेखा का रूप
देकर नीचे की तरफ जोड़ा है.
नानाघाट के लेख में 'इं' ⁝·१० बनाया है जिसमें तीन बिंदी तो 'इ' की हैं और चौथी अनुस्वार
की है. 'थो' में 'ओ' की मात्रा की दोनों तरफ की आड़ी लकीरों को जोड़ कर एक ही लकीर बना दी है
जो 'थ' से ऊपर अलग ही लगाई है परंतु 'लो' में 'ओ' की मात्रा की दोनों लकीरों को जोड़ कर
एक कर दिया है और उसे 'ल' के अग्रभाग के साथ ही ठीक ठीक जोड़ा है. 'प्र', 'ब्र' और
'व्र' में 'र' को नीचे की तरफ जोड़ा है जो 'उ' की मात्रा का भ्रम उत्पन्न कराता है.
भरहुत के लेख में 'वि' के साथ की 'इ' की मात्रा के अग्र भाग को दाहिनी तरफ़ बढ़ा कर
उसमें सुंदरता लाने का यत्न किया है और 'गी' के साथ की 'ई' की मात्रा की दोनों खड़ी लकीरों
को कुछ बाईं ओर झुकाया है.
१. आ. स. इं; ई. स. १६०३-४; प्लेट ४३ वां (B).
२. उदयपुर के विक्टोरिआ हाल में रक्खे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
३. आ. स. इं; ई. स. १६०८-६, प्लेट ४६ वां. ४. इं. अँ; जि. २०, पृ. ३६४-५ के पास के प्लेट.
५. आ. स. वे. इं; जि. ५; प्लेट ५१, लेख सं. १-२. ६. इं. अँ; जि. १४; पृ. १३६.
७. बू; इं. पे; प्लेट २, पंक्ति १८, अक्षर संख्या ४१.
८. बू; इं. पे; प्लेट २; पंक्ति २१-२२; और पं. भगवानलाल इंद्राजी संपादित 'हाथीगुंफा अँड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स्'
के साथ का प्लेट, लेख संख्या १.
९. यदि मौर्य संवत् का प्रारंभ मौर्यवंश के संस्थापक चंद्रगुप्त के राज्याभिषेक अर्थात् ई. स. पूर्व ३२१ से माना जावे
तो उक्त लेख का समय (३२१-१६४=) ई. स. पूर्व १५७ होगा.
१०. डॉ. बूलर ने इस चिह्न :: को 'ई' माना है (बू; इं. पे; पृ. ३४) और कोई कोई यूरोपियन् विद्वान् इसे बूलर के कथना-
नुसार ही पढ़ते हैं (ए. इं; जि. ८, पृ. ६०) परंतु वास्तव में यह 'इं' ही है. 'इ' की तीन बिंदियों के साथ अनुस्वार की चौथी
बिंदी लगने ही ऐसा रूप बनता है और चार बिंदी होने से ही उनको समान रेखा में लिखा है. अब तक केवल निम्न
लिखित ५ लेखों में ही यह चिह्न मिला है जहां सर्वत्र 'इं' पढ़ना ही युक्त है—
नानाघाट के लेख में—'नमो इंदस' (आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, पंक्ति पहिली). बुद्धगया के २ लेखों में—'इंदागिमित्तास'
(क; भ. बो; प्लेट १०, संख्या ६-१०). मथुरा के लेख में—'गोतिपुत्रस इंद्रपा[ल...'] (ए. इं; जि. २, पृ. २०१ के पास का
प्लेट, लेख संख्या ६). नासिक के लेख में—'धंमदेवपुतस इंद्राग्निदतस' (ए. इं; जि. ८, पृ. ६०).
इन पांचों लेखों में यह चिह्न 'इंद्र' शब्द के प्राकृत रूप 'इंद' में प्रयुक्त हुआ है जहां 'ईद' पढ़ना ठीक नहीं हो सकता.
नानाघाट के लेख का कर्ता जहां प्राकृत में अनुस्वार की आवश्यकता नहीं थी वहां भी अनुस्वार लगाता है (नमो संकंसन-
बासुदेवानं......चतूंनं चं लोकपालानं) तो वह 'इंद्र' के प्राकृत रूप को 'इंद' न लिख कर 'ईद' लिखे यह संभव
ही नहीं.