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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

के दानपत्रों के अक्षरों के सिर चौकूंटे नहीं किंतु छोटी सी आड़ी लकीर से बने हुए हैं. इस
लिपिपत्र की लिपियों का समय केवल अनुमान से ही लिखा है.
लिपिपत्र ४३वें की मूल पंक्तियों का१ नागरी अक्षरांतर—
जितं भगवता श्रीविजयपलक्कडस्थानात् परम्ब्रह्म-
ण्यस्य स्वबाहुबलाज्जितोर्जितक्षात्रतपोनिधेः विहि-
तसर्व्वमर्यादस्य स्थितिस्थितस्यामितात्मनो महाराज-
स्य श्रीस्कन्दवर्म्मणः प्रपौत्रस्यार्जितशक्तिसिद्धिसम्पन्न-
स्य प्रतापोनतराजमण्डलस्य महाराजस्य वसु-
धातलैकवीरस्य श्रीवीरवर्म्मणः पौत्रस्य देवद्विज-

लिपिपत्र ४४ वां.
यह लिपिपत्र देवगिरि से मिले हुए कदंबवंशी राजा मृगेशवर्मन्२ और काकुस्थवर्मन्३ के दान-
पत्रों से तय्यार किया गया है. इनके अक्षरों के सिर चौकूंटे परंतु भीतर से भरे हुए हैं और कितने
ही अक्षरों की आड़ी लकीरें विशेष कर खमदार बनती गई हैं (देखो, मृगेशवर्मन् के दानपत्रों में इ, ख,
ज, ट, ड, घ, ब, भ, म, व और ह, और काकुस्थवर्मन् के दानपत्र में इ, ख, च, ढ, द, ल आदि).
लिपिपत्र ४४वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् ॥ जयत्यहं [स्तलोकेशः सर्व्वभूतहिते रतः रागा-
द्यैरहरोनन्तोऽनन्त[नन्द]गौश्वरः ॥ स्वस्ति विजयवैज[य]न्त्या [:] स्वामिम-
हासेनेनमातृगणानुद्ध्या (ध्या) ताभिषिक्तानां५ मानव्यसगोत्राणां६ हारितिपू-
त्राणां (णां) तां (आं) गिरसां प्रतेहृतस्वाद्ध्या (ध्या) यचर्चकाना (नां) सद्द्धर्म्मसंदर्बाना (नां)
कदंबानां अनेकजन्मान्तरोपाज्जितविपुलपुण्यस्कन्धः वाहवाज्जित-

लिपिपत्र ४५ वां.
यह लिपिपत्र चालुक्यवंशी राजा मंगलेश्वर के समय के शक सं. ५०० (ई. स. ५७८) के
शिलालेख७, उसी वंश के राजा पुलकेशिन् (दूसरे) के हैदराबाद (निज़ाम राज्य में) से मिले हुए
शक सं. ५३४ (ई. स. ६१२) के दानपत्र८ और पूर्वी चालुक्य राजा सर्वलोकाश्रय (विजयसिद्धि,
मंगियुवराज) के राज्यवर्ष दूसरे (ई. स. ६७३) के दानपत्र९ से तय्यार किया गया है. मंगलेश्वर

१. ये मूल पंक्तियां उरुवुपल्लि के दानपत्र से हैं.
२. इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५ के सामने के प्लेट से. ३. इं. ऐं; जि. ६, पृ. २४ और २५ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां मृगेशवर्मन् के दानपत्र से हैं.
५. "भिषिक्तानां' के 'ना' के पीछे ठीक वैसा ही चिह्न है जैसा कि मृगेशवर्मन् के दानपत्र से दिये हुए अक्षरों में
'हिः' के विसर्ग के नीचे की बिंदी के स्थान में पाया जाता है. संभव है कि यह अनुस्वार का चिह्न हो (न कि 'म्' का)
जो अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा हो. इस प्रकार का चिह्न उक्त दानपत्र में तीन जगह मिलता है, अन्यत्र अनुस्वार
का नियत चिह्न सर्वत्र अक्षर के ऊपर ही धरा है.
६. यहां भी ठीक वही चिह्न है जिसका विवेचन टिप्पण ५ में किया गया है.
७. इं; ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास के प्लेट से. ८. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७२ और ७३ के बीच के प्लेटों से.
९. ऐं. इं; जि. ८, पृ. २६८ और २६९ के बीच के प्लेटों से.

८६ प्राचीनलिपिमाला.
के लेख की लिपि स्थिरहस्त से लिखी गई है. पुलकेशिन् के दानपत्र की लिपि में 'अ' और 'आ'
की खड़ी लकीर को बाईं ओर मोड़ कर उक्त अक्षरों के सिरों तक ऊपर बढ़ा दिया है जिससे ये अक्षर
मंगलेश्वर के लेख के उक्त अक्षरों से कुछ कुछ भिन्न प्रतीत होने लगे हैं और इन्हीं के रूपांतर से वर्त-
मान कनड़ी और तेलुगु के 'अ' और 'आ' बने हैं (देखो, लिपिपत्र ८३ में कनड़ी लिपि की उत्पत्ति).
'र' अक्षर, जिसका प्रचार दक्षिण की भाषाओं. में मिलता है, पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता
है. सर्वलोकाश्रय के दानपत्र की लिपि में 'इ' की दो बिंदियों के ऊपर की लकीर के प्रारंभ में ग्रंथि
बनाई है और उसका घुमाव बढ़ा दिया है. इसीको चलती कलम से पूरा लिखने से वर्तमान कनड़ी
और तेलुगु लिपियों का 'इ' बनता है (देखो, लिपिपत्र ८३). 'क' की खड़ी लकीर को मोड़ कर
मध्य तक और 'र' की को सिरे तक ऊपर बढ़ा दिया है. इन्हीं रूपों में थोड़ा सा और परिवर्तन
होने पर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु के 'क' और 'र' बने हैं.
लिपि

तेलगु-कन्नड़ी लिपि. ८७
घसीट है. ‘ई’ की दो बिंदियों के बीच की कड़ी लकीर को नीचे से बाईं ओर घुमा कर सिर तक
ऊपर बढ़ाने से ही उक्त अक्षर का यह रूप बना है. ‘ळ’ (ऋग्वेद के ‘ळ्ह’ का स्थानापन्न)
पहिले पहिल इसी दानपत्र में मिलता है जिसके मध्य भाग में एक आड़ी लकीर जोड़ने से दक्षिण की
लिपियों का ‘र’ बना हो ऐसा प्रतीत होता है. इस दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में ‘ळ’, ‘ळ्ह’
और ‘ऴ’ अक्षर दिये हैं वे इस दानपत्र से नहीं हैं. ‘ळ’ और ‘ळ्ह’ पूर्वी चालुक्य राजा विजया-
दित्य दूसरे के एडुरु के दानपत्र^१ से और ‘ऴ’ उसी वंश के राजा अम्म (प्रथम) के मडुलपिटन (मसु-
लिपटन, मद्रास इहाते के कृष्णा जिले में) के दानपत्र^२ से है.
लिपिपत्र ४७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
राष्ट्रकूटकुलमलगगनमृगलांञ्छन: बुधजनमुखक-
मलांशुमाली मनोहरगुणगणांलंकारभार: ककराज-
नामधेयः तस्य पुत्रः स्ववंशानकन्दपसंघातपरंप-
राभ्युदयकारणः परमशिष(षि)ब्राह्मणभक्तितत्पय्यंकुश-
लः समस्तगुणगणाध्वितोनो (?ष्टानं) विख्यातसर्व्वलोकनिरुप-
मस्थिरभावनि(वि) जितारिमण्डनः यस्यैम(?व) मासीत् ॥ जित्वा भू-
परिवर्गेण(र्ग्वं न) यकुशलतया येन राज्यं कृतं यः
लिपिपत्र ४८ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा भीम दूसरे (ई. स. ६३४ से ६३५ तक) के पागनवरम्
के दानपत्र^३ से और उसी वंश के अम्म दूसरे (ई. स. ६४५ से ६७० तक) के एक दानपत्र^४ से
तय्यार किया गया है. इन दोनों दानपत्रों की लिपि स्थिरहस्त और सुंदर है.
लिपिपत्र ४८वें की मूल पंक्तियों^५ का नागरी अक्षरांतर-
स्वस्ति श्रीमर्ता सकलभुवनसंस्तूया(य)मान-
मानव्यसगो(गो)त्राणा(णां) हारोतिपुत्राणां कौशिकवप्र-
सादलव्धराज्यानां मातृ(तृ)गणपरिपालितानां स्वा-
मि[म]हासेनपादानुध्यातानां भगवन्नारायणप्रसा-
दसमासादितवरवराहलांच्छ(छ) नेक्षणक्षणशोल्क-
लिपिपत्र ४६ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी चालुक्यवंशी राजा राजराज के कोरुमेल्लि से मिले हुए शक सं. ६४४ (ई.
स. १०२२) के दानपत्र^६ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि घसीट है और इसके अ, आ, इ,
ई, उ, ऌ, ग, च, ज, ठ, ड, ढ, त, थ, ध, न, ब, य, र, ल और स वर्तमान कन्नड़ी या तेलुगु
लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते ही हैं. अक्षरों के सिर बहुधा V ऐसे बनाये हैं और अनुस्वार
१. ऍ. इं; जि. ५, पृ. १२० और १२१ के बीच के प्लेट की क्रमशः पंक्ति १२ और २० से.
२. ऍ. इं; जि. ५. पृ. १३२ के पास के प्लेट की पंक्ति ३२. ३. इं. पँ; जि. १३, पृ. २१४ और २१५ के बीच के प्लेटों से.
४. इं. पँ; जि. १३, पृ. २४८ और २४६ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां भीम (दूसरे) के दानपत्र से. हैं. ६. इं. पँ; जि. १४, पृ. ५० और ५३ के बीच के प्लेटों से.

५८ प्राचीनलिपिमाला.
को कहीं अक्षर की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ और कहीं अक्षर के सामने मध्य में धरा है. इस
दानपत्र से दिये हुए अक्षरों के अंत में जो अ, आ, ख, र, ऊ, खा और उ अक्षर दिये हैं वे इस ताम्र-
पत्र से नहीं है. उनमें से अ, आ, ख और र ये चार अक्षर जान्हवी (गंगा) वंशी राजा अरिवर्मन्
के जाली दानपत्र¹ से लिये गये हैं. इस पुस्तक में जाली दानपत्रों से कोई लिपिपत्र नहीं बनाया
गया परंतु उक्त अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र नहीं मिलते और उनका जानना भी आवश्यक होने से ये यहां
दिये गये हैं. बाकी के तीन अक्षरों में से 'ऊ' और 'खा' पूर्वी चालुक्य राजा विष्णुवर्द्धन पांचवें
(कलिंविष्णुवर्द्धन) के दानपत्र से² और अंतिम 'उ'³ एहोल के नारायण के मंदिर के शिलालेख⁴ से
लिया गया है.
लिपिपत्र ४६वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
श्रीधाम्नः पुरुषोत्तमस्य महतो नारा-
यणस्य प्रभोर्नाभीपंकरुहाद्बभूव जगतस्स्रष्टा
स्वयंभूस्ततः जज्ञे मानससूनुरत्रिरिति य[:]
तस्मान्मुनेरभूत्सोमो वंशकर्त्तामृतांशुर्द्दिशा[:] श्रीक-
ण्ट(ण्ठ)चूडामणिः। तस्मादासीत्सुधामूतेर्बुधो बुध-
नुतस्ततः ज(जा)तः पुरूरवा नाम चक्रवत्तो[त्तौ] स-

लिपिपत्र ५० वां.
यह लिपिपत्र काकतीयवंशी राजा रुद्रदेव के शक सं. १०८४ (ई. स. ११६२) के अनंकोंड के
शिलालेख⁶ और उसी वंश के राजा गणपति के समय के शक सं. ११३५ (ई. स. १२१३) के चेब्रोलू के
शिलालेख⁷ से तय्यार किया गया है. अनंकोंड के लेख से मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं.
इस लिपिपत्र में दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, ई, उ, ओ, औ, ख, ग, च, छ, ज, झ, ट, ठ, ड,
ढ, ण, त, थ, ध, न, ब, भ, म, य, र, ल, श और स वर्तमान कनड़ी या तेलुगु के उक्त अक्षरों से बहुत
कुछ मिलते जुलते हैं. चेब्रोलू के लेख के 'श्री' में 'शी' बना कर उसके चौतरफ़ चतुरस्र सा बना
कर उस के अंत में ग्रंथि लगाई है. यह सारा चतुरस्रवाला अंश 'र' का ही विलक्षण रूप है. 'ष्टा'
और 'स्थ' में 'ठ' और 'थ' का केवल नीचे का आधा हिस्सा ही बनाया है. चेब्रोलू के लेख के
अक्षरों के अंत में ऋ के तीन रूप और ए अक्षर अलग दिये हैं. उनमें से पहिला 'ऋ' चालुक्य-
वंशी राजा कीर्तिवर्मन् (दूसरे) के वक्कलेरी से मिले हुए शक सं. ६७६ (ई. सं. ७५७) के दानपत्र ⁸
से, दूसरा वनपल्ली से मिले हुए अण्णवेम के शक सं. १३०० (? १३०१) के दानपत्र ⁹ से, और
तीसरा 'ऋ' तथा 'ऐ' दोनों चालुक्यवंशी राजा पुलुकेशिन् [प्रथम] के जाली दानपत्र ¹⁰ से लिये
गये हैं.

१. इं. ऐं; जि. ८, पृ. २१२ और २१३ के बीच के प्लेटों से.
२. इं. ऎं; जि. १३, पृ. १८६ और १८७ के बीच के प्लेटों से.
३. लिपिपत्र ४६ में दिये हुए अक्षरों के अंतिम अक्षर के ऊपर गलती से नागरी का 'ऊ' छप गया है जो अशुद्ध है.
उसके स्थान में पाठक 'उ' पढ़ें.
४. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७५ के पास के प्लेट से. ५. ये मूल पंक्तियां राजराज (दूसरे) के दानपत्र से हैं.
६. इं. ऐं; जि. ११ पृ. १२ और १७ के बीच के प्लेटों से. ७. ऎ. इं; जि. ५, पृ. १४६ और १४७ के बीच के प्लेटों से.
८. ऍ इं; जि. ५, पृ. २०२ के पास के प्लेट ४ B, पंक्ति ६५ से.
९. ऍ. इं; जि. ३, पृ. ६३ के पास के प्लेट ३ A, पंक्ति ५०.
१०. इं. ऐं; जि. ८ पृ. ३४० के पास की प्लेट, क्रमशः पंक्ति ४५ और ३६.

ग्रंथ लिपि ८६
लिपिपत्र ५०वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
एषां वंशे रघूणां क्षितिपतिरभवद्दुर्जयश्चौ-
र्थ्यकेळि(खि)स्फूर्जद्भूमा ततोभूत्प्रतिकरटघटाशात-
नो बेतराजः । चक्रे विक्रांतबाहुस्तदनु व-
सुमतीपालनं प्रोत्नभूपस्तत्पुत्रो रुद्रदेवस्त-
दुपरि च नृपोत्तंसरत्नं बभूव ॥ ततस्तत्सोद्-
लिपिपत्र ५१ वां.
यह लिपिपत्र दोनेपूंर्डि से मिले हुए पीठापुरी के नामयनायक के शक सं. १२५६ (ई. स.
१३३७) के दानपत्र², वनपल्ली से मिले हुए अन्नवेम के दानपत्र³ तथा कोंडवीडु से मिले हुए
गणदेव के शक सं. १३७७ के दानपत्र⁴ से तय्यार किया गया है. वनपल्ली और कोंडवीडु के
दानपत्रों से मुख्य मुख्य अक्षर दिये गये हैं. दोनेपूंर्डि के दानपत्र के क, ञ (‘ज्ञ’ में), द, प, फ,
व और ह में थोड़ा सा परिवर्तन होने से वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियों के वे ही अक्षर बने हैं.
‘फ’ के नीचे जो उलटे अर्धवृत्त का सा चिह्न लगा है वह ‘फ’ और ‘प’ का अंतर बतलाने के लिये
ही है. पहिले उसका स्थानापन्न चिह्न ‘फ’ के भीतर दाहिनी ओर की खड़ी लकीर के साथ
सटा रहता था (देखो, लिपिपत्र ४८, ४६, ५०) और वर्तमान कनड़ी तथा तेलुगु लिपियों में
उसका रूप शंकु जसी आकृति की खड़ी लकीर में बदल कर अक्षर के नीचे लगाया जाता है.
अनुस्वार अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे लगाया है. ई. स. की १४ वीं शताब्दि के पीछे भी इस
लिपि में और थोड़ा सा अंतर पड़ कर वर्तमान कनड़ी और तेलुगु लिपियां बनी हैं. यह अंतर लिपि-
पत्र ८० में दी हुई लिपियों का लिपिपत्र ५१ से मिलान करने पर स्पष्ट होगा.
लिपिपत्र ५१वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
श्रौउ(भ्यु)मामहेश्वराभ्यां न(न)मः । पायादः
करिवदनः कु(कु)तनिजदानस्तुताविवालिगणे ।
निनदति मुहुरपिधत्ते कर्णौ(णौ) यः कर्ण(र्ण)-
तालाभ्यां ॥ औविष्णुरस्तु भवदिष्टफलप्रदा-
१४—ग्रंथ लिपि.
ई. स. की ७ वीं शताब्द्दी से (लिपिपत्र ५२ से ५६).
इस लिपि का प्रचार मद्रास इहाते के उत्तरी व दक्षिणी आर्कट, सलेम, त्रिचिनापली, मदुरा
और तिन्नेवेल्लि जिलों में तथा त्रावनकोर राज्य में ई. स. की सातवीं शताब्दी के आस पास से
१. ये मूल पंक्तियां चेब्रोलू के लेख से हैं. २. पँ. इं; जि. ५, पृ. २६४ और २६७ के बीच के प्लेटों से.
३. पं. इं; जि. ३, पृ. ६२ और ६३ के बीच के प्लेटों से. ४. इं. पं; जि. २०, पृ. ३६२ और ३६३ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां नामयनायक के दोनेपूंर्डि के दानपत्र से हैं.

६० प्राचीनलिपिशाला. मिलता है और इसीमें क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी (देखो, ऊपर पृ. ४३-४४).
मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्गों की अपूर्णता के कारण संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे इसका नाम
'ग्रंथ लिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो. यह पल्लव, पांड्य, और चोल राजाओं, तथा चोल- वंशियों का राज्य छीननेवाले वेंगी के पूर्वी चालुक्य राजा राजेंद्रचोड़ के वंशजों, गंगवंशियों, बाणवंशियों,
विजयनगर के यादवों आदि के शिलालेखों या ताम्रपत्रों में मिलती है. यह लिपि प्रारंभ में तेलुगु- कनड़ी से बहुत कुछ मिलती हुई थी (लिपिपत्र ५२ में दी हुई राजा राजसिंह के कांचीपुरम् के लेख की
लिपि को लिपिपत्र ४३ में दी हुई पल्लववंशी विष्णुगोपवर्मन् के उरुपुवूलि के दानपत्र की लिपि से मिला कर देखो), परंतु पीछे से चलती कलम से लिखने तथा खड़ी और आड़ी लकीरों को वक्र या
`` रामदार रूप

"उद्भूतभ्रूकुटि[मु]खसंक्षयधूमकेतुः"!
"mukha-kṣaya-dhūmakētuḥ"!
Wait, where is कुल?
Is कुल even there?
LOOK AT THE WORD:
[मु]ख
Wait, does it say कु ल or मु ख?
LOOK AT:
[मु]खसंक्षयधूम-!
Wait! The letters are:
(मु) then ख then सं then क्ष then य then धू then म -!
Look at what I thought was कु ल:
It's NOT कु ल!
Wait, look at the letter after (मु):
It is ख!
Wait, is there a कुल?
Let's look at line L8 again:
Wait! Before संक्षय:
There is:
... (मु) ख सं क्ष य धू म -
Wait, where did णुकुल come from in my first reading?
Ah! टि looked like णि?
No! भ्रूक़ुटि(मु)खसंक्षयधूम-!
Let's trace every letter:

  1. भ्रू
  2. कु
  3. टि
  4. (मु)
  5. ख

६२
प्राचीनलिपिमला.
लिपिपत्र ५५ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
क्षि(क्षो)रोदम् मथितम् मनोभिरतुलम्(लं) देवासुरैर्मंदरं
हित्वाक्षिप्त इवाञ्जनाद्रिरिव यत्तक्षाधिकम्(कं) राज-
ते यो भोगि(गौ)न्द्रनिविष्टमूत्ति(र्त्ति)रनिशम् भूयोमृतस्या-
शये रक्षो[द्]वः सुरदृ(वृ)न्दवन्दितपत(द)द्वन्द्वः स्स(न्दस्स)

लिपिपत्र ५६ वां.
यह लिपिपत्र पांड्यवंशी राजा सुंदरपांड्य के श्रीरंगम् के लेख², आलंपूंडि से मिले हुए विजय-
नगर के यादव राजा विरूपाक्ष के शक सं. १३०५ (ई. स. १३८३) के दानपत्र³ और वहीं के श्रीगिरि-
भूपाल के शक सं. १३४६ (ई. स. १४२४) के दानपत्र⁴ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र में
दिये हुए अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ऊ, ऋ, ए, ओ, क, ख, ग, घ, ङ, च, ज, ठ, ड, ण, त, थ, द, ध, न,
प, फ, ब, भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ वर्तमान ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों से मिलते जुलते
ही हैं. ई. स. की १४ वीं शताब्दी के पीछे थोड़ा सा और अंतर पड़ने पर वर्तमान ग्रंथ लिपि बनी.
लिपिपत्र ५६ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
हरिः ओम् स्वस्ति श्रौः येनासौ
करुणामनीयत दशां श्रीरंगपत्मा(द्मा)करः
कृत्वा तम् भुवनान्तरप्रणयिनं करुणा-

१५—कलिंग लिपि.
ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ५७ से ५६).

कलिंग लिपि मद्रास इहाते के चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में कलिंगनगर के गंगा-
वंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं शताब्दी के आस पास से ११ वीं शताब्दी के आस पास
तक मिलती है. इसका सब से पहिला दानपत्र, जो अब तक मिला है, पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्र-
वर्मन् का गांगेय संवत् ८७ का है. उसकी लिपि में मध्यप्रदेशी लिपि का अनुकरण पाया जाता है
क्योंकि अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं और कई अक्षर समकोण वाले हैं
(देखो, ऊपर पृ. ४४). पिछले दानपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं किंतु पश्चिमी एवं तेलुगु-कनड़ी
लिपि की नांई गोलाईदार मिलते हैं और उनमें तेलुगु-कनड़ी के साथ साथ कुछ ग्रंथ तथा नागरी
लिपि का मिश्रण भी पाया जाता है.

१. ये मूल पंक्तियां उदयेंदिरम् के दानपत्र से हैं.
२. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १४ के पास के प्लेट से.
३. ए. इं; जि. ३, पृ. २२८ के पास के प्लेट से.
४. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३१२ और ३१३ के बीच के प्लेटों से.
५. ये मूल पंक्तियां श्रीरंगम् के लेख से हैं.

कलिंग लिपि. ६३
लिपिपत्र ५७ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र¹, राजा इंद्रवर्म्मन् (दूसरे)
के चिकाकोल के दानपत्र² और राजा देवेंद्रवर्म्मन् के दानपत्र³ से तय्यार किया गया है. अच्युतपुरम्
के दानपत्र के अक्षरों के सिर मध्यदेशी लिपि की नांई संदूक की आकृति के, भीतर से भरे हुए, हैं
और अ, आ, क, र आदि अक्षर समकोणवाले हैं. 'न' नागरी का सा है और बाकी के अक्षर
तेलुगु-कनड़ी से मिलते हुए हैं. चिकाकोल के दानपत्र के अक्षरों के भी सिर चौकूंटे, भीतर से भरे
हुए हैं, और 'म्' ग्रंथ लिपि की शैली का है.
लिपिपत्र ५७वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति सर्व्वतुरमणीयाद्विजयकलिङ्गनगरात्सकलभुवन-
निर्म्माणैकसूत्रधारस्य भगवतो गोकर्णस्वामिनश्चरणकम-
लयुगलप्रणामादपगतकलिकलङ्को विनयनयसम्पदा-
माधारः स्वासिधारापरिस्पन्दाधिगतसकलकलिङ्गाधिराज्यश्चतु-
रुदधितरङ्गमेखलावनितलप्रविततामलयशः अनेकसम-

लिपिपत्र ५८ वां.
यह लिपिपत्र पूर्वी गंगावंशी राजा देवेंद्रवर्म्मन् दूसरे (अनंतवर्मन् के पुत्र) के गांगेय संवत्
[२]५१⁵ और २५४⁶ के दो दानपत्रों से तय्यार किया गया है. पहिले दानपत्र के अक्षरों में 'अ'
तीन प्रकार का है जिनमें से पहिले दो रूप नागरी हैं और तीसरा रूप तेलुगु-कनड़ी की शैली का है और
लिपिपत्र ४६ में दिये हुए 'अ' के दूसरे रूप से मिलता हुआ है. उ, ए, ग (पहिला), ज (दूसरा),
त (दूसरा), द और न (पहिला और दूसरा) नागरी से मिलते हुए ही हैं. दूसरे ताम्रपत्र के
अक्षरों में से अ, आ, इ, ट, ध और ष नागरी के ही हैं.
लिपिपत्रं ५८वें की मूल पंक्तियों⁷ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति अमरपुरानुकारिण [:] सर्व्वर्तु (तुं) सुखरम-
णीयाद्विजयवत [:] कलिङ्गा (ङ्ग) नगराधिवासका [त्] महेन्द्राच-
लामलशिखरप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरो [:] सक-
लभुवननिर्माणैकसूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणि (णे)-


१. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १२८ और १२६ के बीच के प्लेटों से.
२. इं. ऐं; जि. १३, पृ. १२२ और १२३ के बीच के प्लेटों से. इस लिपिपत्र में चिकाकोल के दानपत्र का संवत् गांगेय
सं. १४६ छुपा है जिसको शुद्ध कर पाठक १४८ पढें.
३. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १३२ और १३३ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां राजा इंद्रवर्म्मन् के अच्युतपुरम् के दानपत्र से हैं.
५. इं. ऐं; जि. १३, पृ. २७४ और २७५ के बीच के सेटों से. ६. इं. ऐं; जि. १८, पृ. १४४ और १४५ के बीच के सेटों से.
७. ये मूल पंक्तियां देवेंद्रवर्म्मन् के गांगेय संवत् [२]५१ के दानपत्र से हैं.

६४ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ५६ वां.
यह लिपिपत्र गंगवंशी राजा वज्रहस्त के पर्लाकिमेडी के दानपत्र१ से तय्यार किया गया है.
इस दानपत्र का लेखक उत्तरी और दक्षिणी शैली की भिन्न भिन्न लिपियों का ज्ञाता रहा हो और
उसने इसमें अपने लिपिसंबंधी विशेष ज्ञान का परिचय देने के विचार से ही भिन्न भिन्न लिपियों
का मिश्रण जान बूझ कर किया हो ऐसा अनुमान होता है. प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. कीलहॉर्न ने
इस दानपत्र का संपादन करते समय इसके अक्षरों की गणना कर लिखा है कि प्रायः ७३० अक्षरों
में से ३२० नागरी में लिखे हैं और ४१० दक्षिणी लिपियों में२. प्राचीन लिपियों के सामान्य बोध-
वाले को भी इस लिपिपत्र के मूल अक्षरों को देखते ही स्पष्ट हो जायगा कि उनमें अ (पहिला),
आ (पहिला), ई, उ, ऋ, क (पहिले तीन रूप), ग (पहिला), च (पहिला), ज (पहिला), ड
(दूसरा), ण (पहिला), त (पहिला), द (पहिला व दूसरा), न (पहिला), प (पहिला), भ
(पहिला), म (पहिला), र (पहिला व दूसरा), ल (पहिला), व (पहिला), श (पहिला व दूसरा),
ष (पहिला), स (पहिला) और ह (पहिला व दूसरा) नागरी के ही हैं. दक्षिणी शैली के अक्षरों में
से अधिकतर तेलुगु-कनड़ी हैं और ग्रंथ लिपि के अक्षर कम हैं जैसे कि 'ग' (पांचवां), ण (चौथा और
पांचवां) और म (दूसरा).
लिपिपत्र ५६वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
ॐ स्वस्त्यमरपुरानुकारिणः सर्व्वर्तुसुखरमणी-
याद्विजयवतः कलिङ्ग(ङ्क)नगरवासकान्महेन्द्राचलामलशिख-
रप्रतिष्ठितस्य सचराचरगुरोस्सकलभुवननिर्माणैक-
सूत्रधारस्य शशाङ्कचूडामणेर्भगवतो गोकर्णस्वामि-
१६-तामिळ लिपि.
ई. स. की सातवीं शताब्दि से (लिपिपत्र ६०-६२).
यह लिपि मद्रास के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथ लिपि प्रचलित थी वहां के तथा उक्त इहाते के
पश्चिमी तट अर्थात् मलबार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में पल्लव, चोल, राजेन्द्रचोड आदि पूर्वी
चालुक्य एवं राष्ट्रकूट आदि वंशों के शिलालेखों तथा दानपत्रों में एवं साधारण पुरुषों के लेखों में ई. स.
की सातवीं शताब्दी से मिलती है. इस लिपि में 'अ' से 'औ'३ तक के स्वर, और व्यंजनों में केवल क, ङ, च,
ञ, ट, ण, त, न, प, म, य र, ल, व, ळ, ऴ, ऱ और ऩ के चिह्न हैं. ग, ज, ड, द, ब और श के उच्चारण भी
१. ऎं. इं; जि. ३, पृ. २२० और २२२ के बीच के सेटों से. २. ऎं. इं; जि. २, पृ. २२०.
३. अब तक जितने लेख प्राचीन तामिळ लिपि के मिले हैं उनमें 'औ' अक्षर नहीं मिला परंतु संभव है कि जैसे
'उ' के सिर की दाहिनी ओर नीचे को झुकी हुई खड़ी लकीर लगा कर 'ऊ' बनाया जाता था (देखो, लिपिपत्र ६० में
पल्लववंशी राजा नंदिवर्मन् के कशाकूडि के दानपत्र के अक्षरों में) वैसा ही चिह्न 'ओ' के साथ जोड़ने से 'औ' बनता
होगा; क्योंकि वर्तमान तामिळ में जो चिह्न 'ऊ' बनाने में 'उ' के आगे लिखा जाता है वही 'औ' बनाने में 'ओ' के आगे
रक्खा जाता है जो उक्त प्राचीन चिह्न का रूपांतर ही है.

तामिळ लिपि. ६५
तामिळ भाषा में मिलते हैं परंतु उन अक्षरों के लिये स्वतंत्र चिह्न नहीं हैं. 'ग' की ध्वनि 'क' से,
'ज' और 'श' की 'च' से, 'द' की 'त' से और 'ब' की 'प' से व्यक्त की जाती है जिसके लिये
विशेष नियम मिलते हैं. संयुक्त व्यंजन एक दूसरे से मिला कर नहीं किंतु एक दूसरे के पास लिखे जाते
हैं और कई लेखों में हलंत और सस्वर व्यंजन का भेद नहीं मिलता, तो भी कितने एक लेखों में संयुक्त
व्यंजनों में से पहिले के ऊपर बिंदी, वक्र या तिरछी रेखा लगा कर हलंत को स्पष्ट कर जतलाया है.
अनुस्वार का काम अनुनासिक वर्णों से ही लिया जाता है. इस लिपि में व्यंजन वर्ण केवल १८ ही है
जिनमें से चार (ळ, ऴ, र और ण) को छोड़ देवें तो संस्कृत भाषा में प्रयुक्त होनेवाले व्यंजनों में से तो
केवल १४ ही रह जाते हैं. ऐसी दशा में संस्कृत शब्द इसमें लिखे नहीं जा सकते, इसलिये जब उनके
लिखने की आवश्यकता होती है तब वे ग्रंथलिपि में ही लिखे जाते हैं. इस लिपि के अधिकतर अक्षर
ग्रंथ लिपि से मिलते हुए ही हैं और ई, क, और र आदि अक्षर उत्तरी ब्राह्मी से लिये हों ऐसा प्रतीत होता है;
क्योंकि उनकी खड़ी लकीरें सीधी ही हैं, नीचे के अंत से बाईं ओर मुड़ कर ऊपर को बढ़ी हुई नहीं हैं.
अन्य लिपियों की नांई इसमें भी समय के साथ परिवर्तन होते होते १० वीं शताब्दी के आस पास कितने
एक और १४ वीं शताब्दी के आस पास अधिकतर अक्षर वर्तमान तामिळ से मिलते जुलते हो गये.
फिर थोड़ा सा और परिवर्तन होकर वर्तमान तामिळ लिपि बनी. लिपिपत्र १ से ५६ तक के प्रत्येक पत्र
में पाठकों के अभ्यास के लिये मूल शिलालेखों या दानपत्रों से पंक्तियां दी हैं परंतु लिपिपत्र ६० से ६४
तक के पांच लिपिपत्रों में वे नहीं दी गई, जिसका कारण यही है कि संस्कृतज्ञ लोग उनका एक भी
शब्द समझ नहीं सकते. उनको केवल वे ही लोग समझते हैं जिनकी मातृभाषा तामिळ है या
जिन्होंने उक्त भाषा का अध्ययन किया है. तो भी बहुधा प्रत्येक शताब्दी के लेखादि से उनकी
विस्तृत वर्णमालाएं बना दी हैं जिनसे तामिळ जाननेवालों को उस लिपि के प्राचीन लेखादि पढ़ने
में सहायता मिल सकेगी.

लिपिपत्र ६० वां.

यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा परमेश्वरवर्मन के कूरम के दानपत्र¹ तथा उसी वंश के राजा
नंदिवर्मन् के कशाकूडि² और उदयेंदिरम्³ के दानपत्रों के अंत के तामिळ अंशों से तय्यार किया
गया है. कूरम के दानपत्र के अक्षरों में से अ, आ, इ, उ, ओ, च, ज, ए, त, न, प, य और व
(पहिले) ग्रंथ लिपि के उक्त अक्षरों की शैली के ही हैं. 'अ' और 'आ' में इतना ही अंतर है कि उन
की खड़ी लकीरों को ऊपर की तरफ दोहराया नहीं है. इस अंतर को छोड़कर इस ताम्रपत्र के
'अ' और लिपिपत्र ५२ में दिये हुए मामल्लपुरम् के लेखों के 'अ' (दूसरे) में बहुत कुछ समा-
नता है. क, ट, र और व (दूसरा) उत्तरी शैली की ब्राह्मी लिपि से मिलते हुए हैं. कशाकूडि
के दानपत्र का 'अ' कूरम के दानपत्र के 'अ' की ग्रंथि को लंबा करने से बना है. उदयेंदिरम्
के दानपत्र में हलंत और सस्वर व्यंजन में कोई भेद नहीं है.

लिपिपत्र ६१ वां.

यह लिपिपत्र पल्लवतिलकवंशी राजा दंतिवर्मन् के समय के तिरुवेळ्ळरै के लेख⁴, राष्ट्रकूट


१. हु; सा. इं. इं; जि. ३, भाग ३, प्लेट १२, पंक्ति ५७-८६ से.
२. हु; सा. इं. इं; जि. ३, भाग ४, प्लेट १४-५, पंक्ति १०५-१३३ से.
३. इं. ऐं; जि. ८, पृ. २७७ के पास के प्लेट की पंक्ति १०५-१०६ से.
४. ऐं. इं; जि. ११, पृ. १५७ के पास के प्लेट से.

१६ प्राचीनलिपिमाला.
राजा कण्यरदेव (कृष्णराज तीसरे) के समय के तिरुक्कोवलूर १ और वेल्लूर २ के लेखों से तय्यार
किया गया है. इसमें क, ङ, ट, ण, प, य और व में लिपिपत्र ६० से कुछ परिवर्तन पाया
जाता है.
लिपिपत्र ६२ वां.
यह लिपिपत्र राजेन्द्रचोल (प्रथम) के तिरुमलै के चट्टान पर खुदे हुए लेख ३, पगन (बर्मा
में) से मिले हुए वैष्णव लेख ४, विजयनगर के राजा विरूपाक्ष के शोरेक्कावुर के शक सं. १३०८
(ई. स. १३८७) के दानपत्र ५ और महामंडलेश्वर वालककायम ६ के शक सं. १४०३ (ई. स. १४८२)
के जंबुकेश्वर के शिलालेख ७ से तय्यार किया गया है. तिरुमलै के चट्टान के लेख का 'ई' उत्तरी
शैली की ब्राह्मी का है क्योंकि उसकी दो बिंदियों के बीच की खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं
ओर मुड़ कर ऊपर की तरफ़ बढ़ा हुआ नहीं है. यह 'ई' प्रायः वैसा ही है जैसा
कि मथुरा से मिले हुए संवत् ७६ के लेख ८ में मिलता है, और महाक्षत्रप ईश्वरदत्त के सिक्कों
(लिपिपत्र १०) और अमरावती के लेखों (लिपिपत्र १२) के 'ई' से भिन्न है क्योंकि उनमें
खड़ी लकीर का नीचे का अंश बाईं ओर ऊपर को मुड़ा हुआ मिलता है. विरूपाक्ष के दानपत्र
और वालककामय के लेख के अक्षरों में से अधिकतर वर्तमान तमिळ अक्षरों से मिलते जुलते
हो गये हैं.
१७-वट्टेऴुत्तु लिपि.
ई. स. की सातवीं शताब्दी के अन्त के आसपास से (लिपिपत्र ६३ से ६४).
यह लिपि तमिळ लिपि का घसीट रूप ही है और इसके अक्षर बहुधा गोलाई लिये हुए
या ग्रंथिदार होते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी विभाग में
ई. स. की ७ वीं शताब्दी के अंत के आसपास से चोल, पांड्य आदि वहां के राजवंशों के शिला-
लेखों और दानपत्रों में मिलता है. कुछ समय से इसका व्यवहार बिलकुल उठ गया है.
लिपिपत्र ६३ वां.
यह लिपिपत्र जटिलवर्मन् के समय के आनैमले के शिलालेख ९, उसी राजा के दानपत्र १०
और वरगुणपांड्य के अंबासमुद्रम् के लेख ११ से तय्यार किया गया है. आनैमले के लेख का 'अ' और
'आ' कूरम के दानपत्र (लिपिपत्र ६०) के उक्त अक्षरों के कुछ विकृत और घसीट रूप हैं. मुख्य अंतर
१. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १४४ के पास के प्लेट, लेख G से.
२. ऍ. इं; जि. ४, पृ. ८२ के पास के प्लेट से. ३. ऍ. इं; जि. ६, पृ. २३२ के पास के प्लेट से.
४. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १६४ के पास के प्लेट (लेखसंख्या २७) से.
५. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के प्लेटों से.
६. लिपिपत्र ६२ में वाकलकायम छप गया है जिसको शुद्ध कर पाठक वालककायम पढ़ें.
७. ऍ. इं; जि. ३, पृ. ७२ के पास के प्लेट के नीचे के भाग से.
८. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३२१ के पास के प्लेट चौथे में. इसी लेख की छाप उसी जिल्द के पृ. २०५ के पास के प्लेट
(लेख संख्या २०) में छपी है परंतु उसमें 'ई' स्पष्ट नहीं आया.
९. ऍ. इं; जि. ८, पृ. ३२० के पास के प्लेट, लेख दूसरे से. १०. इं. ऍ; जि. २२, पृ. ७० और ७१ के बीच के प्लेटों से.
११. ऍ. इं; जि. ६, पृ. १० के पास के प्लेट से.
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri

खरोष्ठी लिपि. ६७
यही है कि बाहर की ग्रंथि भीतर की ओर बनी है. 'इ' कूरम के दानपत्र के 'इ' के नीचे के अंश को
बाईं ओर न मोड़ कर दाहिनी ओर मोड़ने और घसीट लिखने से बना हो ऐसा प्रतीत होता है. उ,
क, ङ, च, ज, ट, ण, त, न, प, म, य, र, ल, व, ळ और ऱ लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के
घसीट रूप ही हैं. जटिलवर्मन् के दानपत्र का 'ई' प्राचीन तमिळ 'ई' (देखो, लिपिपत्र ६२) का
घसीट रूप मात्र है. 'ए' और 'ओ' लिपिपत्र ६० में दिये हुए उक्त अक्षरों के ही ग्रंथिवाले या
घसीट रूप हैं.
लिपिपत्र ६४ वां.
यह लिपिपत्र मांबळ्ळि से मिले हुए श्रीवल्लभंगौडै के कोल्लम् (कौलंब) संवत् १४९ (ई.
स. ९७४) के दानपत्र१, कोचीन से मिले हुए भास्कररविवर्मन् के दानपत्र२ और कोट्टयम् से
मिले हुए वीरराघव के दानपत्र३ से तय्यार किया गया है. इसकी लिपि में लिपिपत्र ६३ की
लिपि से जो कुछ अंतर पाया जाता है वह त्वरा से लिखे जाने के कारण ही समयानुसार हुआ है.
कोट्टयम् के दानपत्र में जो ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास का माना जा सकता है, 'ए',
ओर 'ओ' के दीर्घ और ह्रस्व रूप मिलते हैं. वर्तमान कनड़ी, तेलुगु, मलयाळम् और
तमिळ लिपियों में भी 'ए' और 'ओ' के दो दो रूप अर्थात् ह्रस्व और दीर्घ मिलते हैं, परंतु
१४ वीं शताब्दी के आसपास तक के तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ और तमिळ लिपियों के लेखों में यह भेद
नहीं मिलता; पहिले पहल यह वीरराघव के दानपत्र में ही पाया जाता है. अतएव संभव है कि
इस भेद का ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आसपास तमिळ लिपि में प्रारंभ हो कर दूसरी लिपियों में
उसका अनुकरण पीछे से हुआ हो. नागरी लिपि में 'ए' और 'ओ' में ह्रस्व और दीर्घ का भेद नहीं
है इस लिये हमने 'ए' और 'ओ' के ऊपर आड़ी लकीर लगा कर उनको दीर्घ 'ए' और
दीर्घ 'ओ' के सूचक बनाया है.
१८-खरोष्ठी लिपि.
ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी से ई. स. की तीसरी शताब्दी तक (लिपिपत्र ६५ से ७०).
खरोष्ठी लिपि आर्य लिपि नहीं, किंतु अनार्य (सेमिटिक) अरमइक् लिपि से निकली हुई
प्रतीत होती है (देखो, ऊपर पृ. ३४-३६). जैसे मुसलमानों के राज्यसमय में ईरान की फ़ारसी लिपि का
हिंदुस्तान में प्रवेश हुआ और उसमें कुछ अक्षर और मिलाने से हिंदी भाषा के मामूली पढ़े लिखे
लोगों के लिये काम चलाऊ उर्दू लिपि बनी वैसे ही जब ईरानियों का अधिकार पंजाब के कुछ अंश
पर हुआ तब उनकी राजकीय लिपि अरमइक् का वहां प्रवेश हुआ, परंतु उसमें केवल २२ अक्षर,
जो आर्य भाषाओं के केवल १८ उच्चारणों को व्यक्त कर सकते थे, होने तथा

६८ प्राचीनलिपिमाला.
नये अक्षरों तथा ह्रस्व स्वरों की मात्राओं की योजना कर मामूली पढ़े हुए लोगों के लिये, जिनको शुद्धा-
शुद्ध की विशेष आवश्यकता नहीं रहती थी, काम चलाऊ लिपि बना दी (देखो, ऊपर पृ. ३५-३६).
यह लिपि फ़ारसी की नांई दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखी जाती है और आ, ई, ऊ, ऋ, ऐ और
औ स्वर तथा उनकी मात्राओं का इसमें सर्वथा अभाव है. संयुक्त व्यंजन भी बहुत कम मिलते हैं,
जिनमें भी कितने एक में तो उनके घटक व्यंजनों के अलग अलग रूप स्पष्ट नहीं होते किंतु उनका
एक विलक्षण ही रूप मिलता है, जिससे कितने एक संयुक्त व्यंजनों का पढ़ना अभी तक संशययुक्त
ही है. इसके लेख भारतवर्ष में विशेष कर पंजाब से ही मिले हैं अन्यत्र बहुत कम. यह लिपि
ईरानियों के राज्यकाल के कितने एक चांदी के मोटे और भद्दे सिक्कों, मौर्यवंशी राजा अशोक के
शहबाज़गढ़ी और मानसेरा के चटानों पर खुदे हुए लेखों, एवं शक, क्षत्रप, पार्थिअन और कुशनवंशी
राजाओं के समय के बौद्ध लेखों और बाकट्रिअन ग्रीक, शक, क्षत्रप, पार्थिअन, कुशन, औदुंबर आदि
राजवंशों के कितने एक सिक्कों पर या भोजपत्रों पर लिखे हुए प्राकृत पुस्तकों में मिलती है. इस
लिपि के शिलाओं आदि पर खुदे हुए लेखों की, जो अब तक मिले हैं, संख्या बहुत कम १ है. ई. स.
की तीसरी शताब्दी के आस पास तक इस लिपि का कुछ न कुछ प्रचार पंजाब की तरफ़ बना रहा
जिसके बाद यह इस देश से सदा के लिये उठ गई और इसका स्थान ब्राह्मी ने ले लिया (विशेष
वृत्तान्त के लिये देखो, ऊपर पृ ३१-३७).

लिपिपत्र ६५ वां.
यह लिपिपत्र मौर्यवंशी राजा अशोक के शहबाज़गढ़ी और मान्सेरा के लेखों २ से तय्यार किया
गया है. उक्त लेखों से दिये हुए अक्षरों में सब स्वर 'अ' के साथ स्वरों की मात्रा लगा कर ही बनाये हैं
और कितने एक अक्षरों की बाईं ओर झुकी हुई खड़ी लकीर के नीचे के अंत को मोड़ कर कुछ ऊपर
की ओर बढ़ाया है [देखो, 'अ' (तीसरा), 'ख' (दूसरा), 'ग' (दूसरा), 'च' (तीसरा), 'ढ'
(दूसरा), 'न' (चौथा), 'प' (दूसरा), 'फ' (दूसरा), 'ब' (तीसरा), 'र' (तीसरा), 'व'
(दूसरा), और 'श' (दूसरा)]. 'ज' (दूसरे) की खड़ी लकीर के नीचे एक आड़ी लकीर और
जोड़ी है. 'म' (चौथे) की बाईं ओर अपूर्ण वृत्त और 'म' (पांचवें) के नीचे के भाग में तिरछी
लकीर अधिक लगाई है. 'र' (दूसरे) की तिरछी खड़ी लकीर के नीचे के अंत से दाहिनी ओर
एक आड़ी लकीर ३ और लगाई है. यह लकीर संयुक्ताक्षर में दूसरे आनेवाले 'र' का चिह्न है परंतु
उक्त लेखों में कहीं कहीं यह लकीर बिना आवश्यकता के भी लगी हुई मिलती है और वर्डक से
मिले हुए पीतल के पात्र पर के लेख में तो इसकी भरमार पाई जाती है जो उक्त लेखों के लेखकों
का शुद्ध लिखना न जानना प्रकट करती है ४. इन लेखों में 'इ' की मात्रा एक खड़ी या तिरछी

१. खरोष्ठी लिपि के लेखों के लिये देखो ऊपर पृष्ठ ३२, टिप्पण ७-६, और पृष्ठ ३३, टिप्पण १-२.
२. पं. इं; जि. १, पृ. १६ के पास का प्लेट. ज. ए; ई. स. १८९० में छपे हुए प्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान् सेनार्ट के 'नोट्स डी'
ऐपिग्राफे इंडियने' (संख्या १) नामक लेख के अंत के मान्सेरा के लेखों के २ सेट; और 'डाइरेक्टर जनरल ऑफ़ आर्कि-
आलॉजी इन इंडिया' के भेजे हुए अशोक के शहबाज़गढ़ी के लेखों के फोटो से.
३. पं. इं; जि. २, पृ. १६ के पास के सेट की पंक्ति १ में 'देवनं प्रियो प्रियद्रशि रज' में 'रय' के 'र' के नीचे 'र'
की सूचक जो आड़ी लकीर लगी है वह बिलकुल स्पष्ट है. यहां 'र' के साथ दूसरा 'र' जुड़ ही नहीं सकता. ऐसी दशा में
इस लकीर को या तो 'र' का अंश ही या निरर्थक मानना पड़ता है. अशोक के उक्त लेखों में ऐसी ही 'र' सूचक निरर्थक
लकीरें अन्यत्र जहां 'र' की संभावना नहीं है वहां भी लगी हुई मिलती है (जैसे कि उक्त पहिली पंक्ति में 'सवप्रषंडनि'
में 'प' के साथ, जहां 'पर्षड' (पाषंड) शब्द में 'र' का सर्वथा अभाव है, आदि).
४. अब तक राजपूताना के कई महाजन लोग. जिनको अक्षरों का ही ज्ञान होता है और जो संयुक्ताक्षर तथा स्वरों की
मात्राओं का शुद्ध लिखना नहीं जानते, अपनी लिखावट में ऐसी अशुद्धियां करने के अतिरिक्त स्वरों की मात्राएं या तो

खरोष्ठी लिपि. ६६
लकीर है जो अक्षर के ऊपर के भाग या मध्य को काटती हुई लगती है (देखो, इ, कि, गि, चि, जि,
ठि, णि, ति, मि, शि और सि). 'उ' की मात्रा सीधी आड़ी या घुमावदार लकीर है जो अक्षर के
नीचे के अंत (या कभी कुछ ऊंचे) से बाईं ओर जुड़ती है (देखो, उ, गु, चु, तु, धु, नु, यु, बु और
हु). 'ए' की मात्रा एक तिरछी या खड़ी लकीर है जो बहुधा अक्षर के ऊपर के भाग के साथ
और कभी कभी मध्य में ऊपर की तरफ़ जुड़ती है (देखो, ए, जे, ते, ने, दे, ये और षे). 'ओ'
की मात्रा एक तिरछी रेखा है जो बहुधा अक्षर के मध्य से बाईं ओर को झुकती हुई लगती है
(देखो, ओ, चो, नो, मो और सो, परंतु 'यो' में उसका झुकाव दाहिनी ओर है). अनुस्वार का
चिह्न एक आड़ी सीधी या वक्र रेखा है जो बहुधा अक्षर के अंत भाग से सटी रहती है (देखो, अं,
थं, रं, वं और षं) परंतु कभी कभी अक्षर की खड़ी लकीर के अंत से कुछ ऊपर उक्त खड़ी लकीर को
काटती हुई भी लगती है (देखो, झं, नं और हं). 'मं' (प्रथम) के साथ का अनुस्वार का चिह्न
'म' से विलग नीचे को लगा है, 'म' (दूसरे) में दाहिनी ओर भिन्न रूप में जुड़ा है और 'यं'
के साथ उसके दो विभाग करके 'य' की नीचे को झुकी हुई दोनों तिरछी रेखाओं के अंतों में
एक एक जोड़ा है. इन लेखों में रेफ कहीं नहीं है. रेफ को या तो संयुक्ताक्षर का दूसरा अक्षर
बनाया है (जैसे कि 'सर्व' को 'स्रव') या उसको पूर्व के अक्षर के नीचे 'र' के रूप से जोड़ा है
('प्रियदर्शी' को 'प्रियद्रशि', 'धर्म' को 'ध्रम' आदि). संयुक्ताक्षर में दूसरे 'र' के लिये एक
आड़ी, तिरछी या कुछ गोलाईदार लकीर है जो व्यंजन के नीचे के अंत के साथ दाहिनी ओर जुड़ती
है, परंतु कहीं कहीं 'र' का योग न होने पर भी ऐसी लकीर अधिक जुड़ी हुई मिलती १ है
जिससे यह संदेह रह जाता है कि कहां यह अनावश्यक है और कहां ठीक है ('प्रियद्रशि पढ़ें
या 'पियदशि'; 'स्रवप्रषंडनि' या 'सवपषंडनि' आदि). संयुक्ताक्षरों में कहीं कहीं भिन्न वर्णों के
रूप स्पष्ट नहीं हैं (देखो, न्त्रि).
लिपिपत्र ६५वें की मूल पंक्तियों २ का नागरी अक्षरांतर-
देवनं प्रियो प्रियद्रशि रय सवप्र(प)षंडनि गृहठनि
च पुजेति दनेन विविधये च पुजये नो चु त-
थ दन व पुज व देवनं प्रियो मजति यथ कि-
ति सलवढि सिय सवप्र(प)षंडनं सलवढि तु.
लिपिपत्र ६६ वां.
यह लिपिपत्र ग्रीक (युनानी), शक, पार्थिअन और कुशनवंशी राजाओं के सिक्कों ३ से तय्यार
किया गया है. ग्रीकों के सिक्कों से लिये हुए अक्षरों में कहीं कहीं 'त', 'द' और 'न' में स्पष्ट
बिल्कुल नहीं लगाते अथवा बिना किसी विचार के उनका प्रयोग करते हैं अर्थात् जहां मात्रा की आवश्यकता नहीं होती वहां कोई
भी मात्रा लगा देते हैं और जहां मात्रा की अपेक्षा रहती है वहां उसे या तो छोड़ जाते हैं या अशुद्ध मात्रा लगा देते हैं. ऐसी
लिखावटों के अक्षरों को राजपूतानावाले 'केवळां अक्षर' (केवल अक्षर संकेत) कहते हैं और पुरानी महाजनी लिखावटें
विशेष कर ऐसी ही मिलती हैं. ऐसी लिखावटों से ही 'काकाजी अजमेर गया' (ककज अजमर गय) के स्थान में 'का-
काजी आज मर गया' पढ़े जाने की कथा प्रसिद्ध है.
१ देखो. ऊपर पृष्ठ ६८ टिप्पण ३.
२ ये मूल पंक्तियां अशोक के शहबाजगढ़ी के लेख से हैं (एं. इं; जि. १ पृष्ठ १६ के पास के सेट से).
३ ग्रीकों (यूनानियों) के सिक्के गा; कँ. कॉ. ग्री. सिं. किं. बा. ई; सेट ४-१५. सि; कँ. कॉ. ई. म्यु; प्लेट १-६.
व्हा; कँ. कॉ. पं. म्यु; प्लेट १-६. शक, पार्थिअन और कुशनवंशियों के सिक्के गा; कँ. कॉ. ग्री. सिं. किं. बा. ई; प्लेट १६-२४.
सि; कँ. कॉ. ई. म्यु; प्लेट ८-६. व्हा; कँ. कॉ. पं. म्यु; प्लेट १०-१७.

१०० प्राचीनलिपिमाला.
अंतर नहीं है (देखो, 'त' का चौथा रूप, 'द' का दूसरा रूप और 'न' का तीसरा रूप). कहीं
कहीं 'म' के नीचे आड़ी लकीर या बिंदी और 'ह' के नीचे भी बिंदी लगी मिलती है. 'खे'
के साथ के रेफ को अक्षर के नीचे लगाया है परंतु उसको ग्रंथि का सा रूप देकर संयुक्ताक्षर
में आनेवाले दूसरे 'र' से भिन्न बतलाने का यत्न पाया जाता है और शक, पार्थिअन आदि
के सिक्कों में यह भेद अधिक स्पष्ट किया हुआं मिलता है (देखो 'र्व'). शक, पार्थिअन आदि
के सिक्कों से जो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये गये हैं उनमें कई अक्षरों की लकीरों के प्रारंभ या
अंत में ग्रंथियां लगाई हैं वे, संभव है कि, अक्षरों में सुंदरता लाने के लिये ही हों. 'फ' की
ऊपर की दाहिनी ओर की लकीर नीचे की ओर नहीं किंतु ऊपर की तरफ़ बढ़ाई है.
लिपिपत्र ६६वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
महरजस भ्रमिकस हेलियक्रेयस. महरजस भ्रमिकस जयधरस
अर्खेबियस. महरजस चतरस मेनद्रस. महरजस अपडिहतस
फिलसिनस. महरजस चतरस अयंतस हिपुस्त्रतस. महरजस
चतरस हेरमथस. रजतिरजस महतस मोअस. महरजस रजरजस
महतस अयसं. महरजस रजरजस महतस अयिलिषस.

लिपिपत्र ६७ वां.
यह लिपिपत्र क्षत्रप राजुल के समय के मथुरा से मिले हुए सिंहाकृतिवाले स्तंभसिरे के
लेखों², तक्षशिला से मिले हुए क्षत्रप पतिक के ताम्रलेख³ और वहीं से मिले हुए एक पत्थर
के पात्रपर के लेख⁴ से तय्यार किया गया है. इस लिपिपत्र के अक्षरों में 'उ' की मात्रा का रूप
ग्रंथि बनाया है और 'न' तथा 'ण' में बहुधा स्पष्ट अंतर नहीं पाया जाता. मथुरा के लेखों
में कहीं कहीं 'त', 'न' तथा 'र' में भी स्पष्ट अंतर नहीं है.
लिपिपत्र ६७वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिहिलेन⁵ सिहरखितेन च भ्रातरेहि तखशिलए अयं थुवो प्र-
तिथवितो सवबुधन पुयए* *तखशिलये नगरे उत-
रेण प्रचु देशो क्षेम नम अच ···ये पतिको अप्रतिठवित ˙

१. ये मूल पंक्तियां ग्रीक आदि राजाओं के सिक्कों पर के लेखों से हैं.
२. ऐं. इं.; जि. ६, पृष्ठ १३६ और १४६ के बीच के प्लेटों से.
३. ऐं. इं.; जि. ४, पृष्ठ ५६ के पास के प्लेट से. इस ताम्रलेख में अक्षर रेखारूप में नहीं खुदे हैं किंतु बिंदियों से
बनाये हैं. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के बाद के कुछ ताम्रपत्र ऐसे ही बिंदियों से खुदे हुए भी देखने
में आये जिनमें से सब से पिछला २० वर्ष पहिले का है. कई तांबे और पीतल के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम इसी
तरह बिंदियों से खुदे हुए भी देखने आते हैं. ताम्रपत्रादि बहुधा सुनार या लुहार खोदते हैं. उनमें जो अच्छे कारीगर होते
हैं वे तो जैसे अक्षर स्याही से लिखे होते हैं वैसे ही खोद लेते हैं परंतु जो अच्छे कारीगर नहीं होते या ग्रामीण होते हैं वे
बहुधा स्याही से लिखे हुए अक्षरों पर बिंदियां बना देते हैं. यह त्रुटि खोदनेवाले की कारीगरी की ही है.
४. ऐं. इं.; जि. ८, पृष्ठ २४६ के पास के प्लेट से.
५. 'सिहिलेन' से लगाकर 'पुयए' तक के लेख में तीन बार 'ण' या 'न' आया है जिसको दोनों ही तरह पढ़
सकते हैं, क्योंकि उस समय के आसपास के खरोष्ठी लिपि के कितने एक लेखों में 'न' और 'ण' में स्पष्ट भेद नहीं पाया जाता.

  • . यहां तक का लेख तक्षशिला के पत्थर के पात्र से है.
    ˙ . यहां से लगाकर अंत तक का लेख तक्षशिला से मिले हुए ताम्रलेख से लिया है.

CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghazıabad. Digitzed by eGangotri

खरोष्ठी लिपि. १०१
लिपिपत्र ६८ वां.
यह लिपिपत्र पार्थिअनवंशी राजा गंडोफरस के समय के तख्त-इ-बाही के शिलालेख¹, कुशन-
वंशी राजा कनिष्क के समय के सुएविहार (बहावलपुर राज्य में) के ताम्रलेख², शाहजी की ढेरी
(कनिष्क विहार) के स्तूप से मिले हुए कांसे के पात्र पर के राजा कनिष्क के समय के तीन
लेखों³ और भेडा के शिला लेख⁴ से तय्यार किया गया है. सुएविहार के ताम्रलेख में 'ष्य' और
'स्य'⁵ के नीचे का ग्रंथिदार अंश 'य' का सूचक है.
लिपिपत्र ६८वें की मूल पंक्तियों⁶ का नागरी अक्षरांतर—
महरजस्य रजतिरजस्य देवपुत्रस्य कनिष्कस्य संवत्सरे एकदुशे
सं १० १⁷ दइसिकस्य मसस्य दिवसे अठविशे दि २० ४ ४⁸ उच्च दि-
वसे भिक्षुस्य नगदतस्य संखके( ?)तिस्य अचर्यदमचतशिष्यस्य
अचर्यभवप्रशिष्यस्य यठिं अरोषयतो इह दमने विहरस्वामिनि
लिपिपत्र ६६ वां.
यह लिपिपत्र वर्डक से मिले हुए पीतल के पात्र पर खुदे हुए कुशनवंशी राजा हुविष्क के
समय के लेख९, कुशनवंशी वाझेष्प के पुत्र कनिष्क के समय के आरा के लेख१० और पाजा¹¹ तथा
कलदरा¹२ के शिलालेखों से तय्यार किया गया है. वर्डक के पात्रपर का लेख बिंदियों से खुदा
है और उसमें कई जगह अक्षरों के नीचे के भाग से दाहिनी ओर 'र' सूचक आड़ी लकीर
निरर्थक लगी है, जैसे कि भग्रवद्¹³ (भगवद्=भगवत्), अग्रभग (अग्रभग=अग्रभाग), नतिग्र
१. ज. प; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. ११६ और प्लेट (देखो, ऊपर पृ. ३२, टिप्पण ६).
२. इं. पँ; जि. १०, पृ. ३२५ के पास के प्लेट से. ३. आ. स. रि; ई. स. १६०६-१०, प्लेट ५३. ये लेख भी बिंदियों से खुदे हैं.
४. ज. ए; ई. स. १८६०, भाग १, पृ. १३६ और प्लेट.
५. पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इनको 'ष्ष' और 'स्स' पढ़ा है (इं. पँ; जि. ११, पृ. १२८) परंतु इनको 'ष्य'
और 'स्य' पढ़ना ही ठीक होगा. यह वृत्तांत लिखते समय मेरे पास एक गुप्तलिपि के प्राकृत लेख की छाप आई जिसमें
'छन्दसेठिस्य' स्पष्ट है. संस्कृतमिश्रित प्राकृत लेखों में 'स्स' के स्थान में 'स्य' विभक्ति-प्रत्यय का होना कोई आश्चर्य की
बात नहीं है.
६. ये मूल पंक्तियां सुएविहार के ताम्रलेख से हैं. ७. १० १ =१०+१=११.
८. २० ४ ४ =२०+४+४=२८. ९. इं. पँ; जि. ११, पृ. २१० और २११ के बीच के प्लेटों से.
१०. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ५८ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.
११. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६४ के पास का प्लेट, लेख दूसरा.
१२. इं. पँ; जि. ३७, पृ. ६६ के पास का प्लेट, लेख पहिला.
१३. भारतवर्ष की किसी प्राचीन प्राकृत भाषा में 'भगवत्' का 'भग्रवद्' और 'अग्रभाग' का 'अग्रभग' रूप नहीं
होता. ऐसी दशा में जैसे अशोक के खरोष्ठी लेखों में 'त्य' (देखो, ऊपर पृ. ६६) के 'त' के नीचे ऐसी ही लकीर लगी है वहां 'र्त'
किसी तरह पढ़ा नहीं जा सकता वैसे ही 'अग्रवद' और 'अग्रभग' आदि पढ़ना अशुद्ध ही है. अशोक के लेखों में (देखो,
लिपिपत्र ६५) जैसे 'ज' (दूसरे), और 'म' (चौथे), तथा ग्रीकों के सिक्कों में (लिपिपत्र ६६) 'ज' (पांचवें, छठे और
सातवें), त (दूसरे, तीसरे और चौथे), 'न' (पहिले व दूसरे), 'म' (पहिले) और 'स' (पहिले) के नीचे दोनों
तरफ निकली हुई आड़ी लकीरें बिना किसी आशय के लगी मिलती हैं वैसे ही इस लेख में इस लकीर का होना संभव है;
जो कलम को उठा कर दोनों तरफ निकली हुई न बना कर चलती कलम से दाहिनी ओर ही बना दी जान पड़ती है.
इसलिये इस रेखा को पूरे 'ग' का अंश ही मानना चाहिये. ऐसे ही 'भि' के साथ ऐसी लकीर कहीं कहीं निरर्थक लगी
है जहां उसको या तो 'मि' का अंश ही मानना चाहिये अथवा उसको 'भिम' पढ़ना चाहिये. जहां 'र' की संभावना हो
नहीं 'भ्रि' पढ़ना चाहिये.

, जिनमें से दो मिट्टी के

Line 15:
पात्रों पर स्याही से लिखे हुए⁶ हैं और तीसरा एक मूर्ति के नीचे⁷ खुदा है, तय्यार किया गया

Line 16:
है. तक्षशिला के रौप्यपत्र पर का लेख बिंदियों से खुदा है.

Line 17:
लिपिपत्र ७०वें की मूल पंक्तियों⁸ का नागरी अक्षरांतर—

Line 18:
स १०० २० १० ४ २⁹ अयस अपडस मसस दिवसे १० ४ १¹⁰ इऋ दिवसे
Wait, look at "इऋ": is it "इऋ" or "इश"?
In Kharosthi: "isa divase" (on this day).
In Naagari transcription:
Is that "इश" or "इऋ"?
Look at the character: it is 'इ' followed by 'श' or 'ऋ'?
Let's look at line 5:
"तथा 'य' और 'श' में स्पष्ट अंतर नहीं है"
Look at line 18:
"इ" followed by "श": wait, look at the loop: it has a loop with a tail, like 'श' or 'ऋ'?
Wait, in line 19: "लोताफ़िऋपुचन"? No! "लोताफ़िक़पुचन" or "लोताफ़िक्र"?
Wait, let's look at the Taxila silver scroll inscription:
"sa 1

१६—ब्राह्मी और उससे निकली हुई लिपियों के अंक.
(लिपिपत्र ७१ से ७६ के उत्तरार्द्ध के प्रथम खंड तक).
प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों तथा हस्तलिखित पुस्तकों के देखने से पाया जाता है
कि लिपियों की तरह प्राचीन और अर्वाचीन अंकों में भी अंतर है. यह अंतर केवल उनकी
आकृति में ही नहीं किंतु अंकों के लिखने की रीति में भी है. वर्तमान समय में जैसे १ से
९ तक अंक और शून्य इन १० चिह्नों से अंकविद्या का संपूर्ण व्यवहार चलता है वैसे प्राचीन
काल में नहीं था. उस समय शून्य का व्यवहार ही न था और दहाइयों, सैकड़ों, हज़ार आदि
के लिये भी अलग चिह्न थे. अंकों के संबंध में इस शैली को 'प्राचीन शैली' और जिसमें शून्य
का व्यवहार है उसको 'नवीन शैली' कहेंगे.
प्राचीन शैली के अंक
प्राचीन शैली में १ से ९ तक के अंकों के ९ चिह्न; १०, २०, ३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८० और
९० इन ९ दहाइयों के लिये ९ अलग चिह्न; और १०० तथा १००० के लिये एक एक अलग चिह्न
नियत था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में). इन २० चिह्नों से ९९९९९
तक की संख्या लिखी जा सकती थी. लाख, करोड़, अरब आदि के लिये जो चिह्न थे उनका पता
अब तक नहीं लगा क्योंकि शिलालेख अथवा दानपत्रों में लाख¹ या उसके आगे का कोई चिह्न नहीं
मिला.
इन अंकों के लिखने का क्रम १ से ९ तक तो वैसा ही था जैसा कि अब है. १० के लिये
नवीन शैली के अंकों की नांई १ और ० नहीं किंतु एक नियत चिह्न ही लिखा जाता था; ऐसे ही २०,
३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८०, ९०, १०० और १००० के लिये भी अपना अपना चिह्न मात्र लिखा जाता
था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में).
११ से ९९ तक लिखने का क्रम ऐसा था कि पहिले दहाई का अंक लिख कर उसके आगे
इकाई का अंक रक्खा जाता था, जैसे कि १५ के लिये १० का चिह्न लिख उसके आगे ५; ३३ के
लिये ३० और ३; ६३ के लिये ६० तथा ३, इत्यादि (देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक).
१. प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने अगाध परिश्रम के साथ तुर्कस्तान से जो अमूल्य प्राचीन सामग्री
प्राप्त की है उसमें कुछ खरड़े ऐसे भी हैं जिन पर भारतवर्ष की गुप्तलिपि से निकली हुई तुर्कस्तान की ई. स. की छठी
शताब्दी के आसपास की आर्य लिपि में स्वर, व्यंजन, स्वरों की १२ मात्राओं (ऋ ॠ और ऌ ॡ को छोड़ कर) की बारहखड़ी
(द्वादशाक्षरी) तथा किसी में प्राचीन शैली के अंक भी दिये हुए हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९११, पृ. ४५२ और ४५८ के
बीच के प्लेट १ से ४ तक). एक खरड़े में १ से १००० तक के वहां के प्रचलित प्राचीन शैली के चिह्नों के पीछे दो और चिह्न
की ✪ ऐसे हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९११, पृ. ४५५) जिनको प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. होर्नले ने क्रमशः १०००० और १००००० के
चिह्न माना है, परंतु हमको उन चिह्नों को १०००० और १००००० के सूचक मानने में शंका होती है. संभव है कि इनमें
से पहिला चिह्न १००००० का सूचक हो और दूसरा केवल समाप्ति (विराम) का चिह्न हो. उसको अंकसूचक चिह्न
मानना संदिग्ध ही है.

१०४ प्राचीनलिपिमाला.
२०० के लिये १०० का चिह्न लिख उसकी दाहिनी ओर, कभी ऊपर कभी मध्य और कभी नीचे
की तरफ़, आड़ी ( सीधी, तिरछी या वक्र ) रेखा जोड़ी जाती थी१. ३०० के लिये १०० के चिह्न के साथ
वैसे ही दो लकीरें जोड़ी जाती थीं. ४०० से ९०० तक के लिये १०० का चिन्ह लिख उस के साथ क्रमशः ४ से ९
तक के अंक एक छोटी सी आड़ी लकीर२ से जोड़ देते थे. १०१ से ९९९ तक लिखने में सैकड़े के अंक
के आगे दहाई और इकाई के अंक लिखे जाते थे, जैसे कि १२९ के लिये १००, २०, ९; ९५५ के लिये
९००, ५०, ५. यदि ऐसे अंकों में दहाई का अंक नहीं हो तो सैकड़े के बाद इकाई का अंक रक्खा
जाता था, जैसे कि ३०१ के लिये ३००, १. ( देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक ).
२००० के लिये १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को एक छोटीसी सीधी आड़ी ( या नीचे
को मुड़ी हुई ) लकीर जोड़ी जाती थी और ३००० के लिये वैसी ही दो लकीरें. ४००० से ९०००
तक और १०००० से ९०००० तक के लिये १००० के चिह्न के आगे ४ से ९ तक के और १० से ९० तक
के चिह्न क्रमशः एक छोटी सी लकीर से जोड़े जाते थे ( देखो, लिपिपत्र ७५ ). ११००० के वास्ते
१०००० लिख, पास ही १००० लिखते थे. इसी तरह २१००० के लिये २००००, १०००; ९९०००
के लिये ९००००, ९००० लिखते थे. ऐसे ही ९९९९९ लिखने हो तो ९००००, ९०००, ९००,
९०, ९ लिखने थे. यदि सैकड़ा और दहाई के अंक न हों तो हज़ार के अंक के आगे इकाई का अंक
लिखा जाता था, जैसे कि ९००१ लिखना हो तो ९०००, १.
उपर्युक्त प्राचीन अंकों के चिह्नों में से १, २, और ३ के चिह्न तो क्रमशः -, = और ≡ आड़ी
लकीरें हैं जो अब तक व्यापारियों की बहियों में रुपयों के साथ आने लिखने में एक, दो और तीन के
लिये व्यवहार में आती हैं. पीछे से इन लकीरों में वक्रता आने लगी जिससे १ की लकीर से वर्तमान
नागरी आदि का १ बना, और २ तथा ३ की वक्र रेखाओं के परस्पर मिल जाने से वर्तमान नागरी आदि
के २ और ३ के अंक बने हैं. बाकी के चिह्नों में से कितने एक अक्षरों से प्रतीत होते हैं और जैसे समय
के साथ अक्षरों में परिवर्तन होता गया वैसे ही उनमें भी परिवर्तन होता रहा. प्राचीन शिलालेख
और दानपत्रों में ४ से १००० तक के चिह्नों के, अक्षरों से मिलते हुए, रूप नीचे लिखे अनुसार पाये
जाते हैं-
४-अशोक के लेखों में इस अंक का चिह्न 'क' के समान है. नानाघाट के लेख में उसपर
गोलाईदार या कोणदार सिर बनाया है जिससे उसकी आकृति 'प्क' से कुछ कुछ मिलती होने
लगी है. कुशनवंशियों के मथुरा आदि के लेखों में उसका रूप 'प्क' जैसा मिलता है. क्षत्रपों और
आंध्रवंशियों के नासिक आदि के लेखों में 'प्क' ही विशेष कर मिलता है परंतु उन लेखों से उद्धृत
किये हुए चिह्नों में से चौथे में 'क' की खड़ी लकीर को बाईं तरफ़ मोड़ कर कुछ ऊपर को बढ़ा
दिया है जिससे उसकी आकृति 'प्कृ' सी प्रतीत होती है. पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों में 'क' की
दाहिनी ओर मुड़ी हुई खड़ी लकीर, चलती कलम से पूरा चिह्न लिखने के कारण, 'क' के मध्य
की आड़ी लकीर से मिल गई जिससे उक्त सिक्कों से उद्धृत किये चिह्नों में से दो अंतिम चिह्नों की आकृति
'प्र' के समान बन गई है. जग्गयपेट के लेखादि से उद्धृत किये हुए चिह्नों में चार के चिह्न के 'प्क' और
'प्र' से रूप मिलते हैं; गुप्तों आदि के लेखों में भी 'प्क' और 'प्र' से ही मिलते हैं. पल्लव और शालंकायन
वंशियों के दानपत्रों से उद्धृत ९ चिह्नों में से पहिला 'प्क', दूसरा 'प्की', तीसरा और चौथा 'त्क',
१. यह रीति ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी और उसके पीछे के शिलालेखादि में मिलती है. अशोक के लेखों में इससे
कुछ भिन्नता पाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७४ के पूर्वार्द्ध में अशोक के लेखों से दिये हुए २०० के अंक के तीन रूप).
२. पिछले लेखों में कहीं कहीं यह लकीर नहीं भी लगाई जाती थी (देखो, लिपिपत्र ७४ के उत्तरार्द्ध में भिन्न भिन्न
लेखों से उद्धृत किये हुए अंकों में ४०० और ७०० तथा प्रतिहारों के दानपत्रों में ९००.)