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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

दीक्षाविधिः ३७
प्राणशक्ति अत्यन्त सूक्ष्म रूप से कई पड़ावों को पार कर सहस्रदल कमल तक
पहुँच कर परतत्त्व में समाहित होती है।
इन दोनों अर्थात् मूलाधार और ब्रह्मबिल के मध्य में संविद् तत्त्व की
प्रकाश-लहरी अनुभूति का विषय है। वह प्रत्येक जीव की जीवनी शक्ति है।
शिष्य साधना के बल पर इसे और जागृत कर लेता है। गुरु से शिष्य का
परिष्कृत रूप छिपा नहीं रहता। वह उसमें अपनी ऊर्जा का अमृत उड़ेल कर
जाज्वल्यमान उद्दीप्त अग्नि के समान समिद्ध कर शिष्य के पाप-पाशों को दग्ध
कर देता है। सूत्र में दाहक्रिया का प्रयोग पूर्वकालिक क्रिया के रूप में किया
गया है।
पूर्वकालिक क्रिया के बाद मुख्य क्रिया होती है। वही मुख्य क्रिया शाक्ती
दीक्षा है। एक दूसरी बात भी यहाँ ध्यातव्य है। ध्यान तो अग्नि का हुआ।
यह ध्यान गुरु करता है। इसे शिष्य को भी भावित करना चाहिये। अग्नि दाह
करता है। केवल दाह का ही ध्यान यहाँ नहीं, वरन् पापराशि के जलने का
भी ध्यान है। ये आन्तर आनुभूतिक प्रक्रियायें साधना से ही सम्पन्न होती हैं।
इस सन्दर्भ में एक और बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है, सूत्र का
पाठक्रम। पहले शाम्भवी दीक्षा की बात कही गयी है फिर शाक्ती दीक्षा देने
का उल्लेख है। वास्तविक क्रम क्या है? यह जिज्ञासा यहाँ शेष रह जाती है।
दीक्षा का विभाग करते समय सर्वप्रथम शाक्ती का क्रम परम्पराप्राप्त है। तदन्तर
शाम्भवी दीक्षा दी जाती है। इनसे ऊर्जस्वल शिष्य को मान्त्री दीक्षा देकर गुरुदेव
उसे मन्त्रात्मिका चेतना की चिन्मयता से समन्वित करते हैं।
उपक्रम और उपसंहार दो स्थितियों पर ध्यान देकर उस विषय में विचार
करना चाहिये। इसमें प्रमाण वेदोपक्रमाधिकरण की व्यवस्था है। यह एक न्याय
अर्थात् नियम है कि, उपक्रम का स्वरूप क्या है। यहाँ उपक्रम शांभवी से किया
गया है। शाक्ती बीच में है किन्तु उपसंहार अन्यथा घटित है। पापदाह तो कर
दिया गया। पापदाह में भी यह ध्यातव्य है कि, शरीर में रहने वाला मल ही
जलता है। दूरीकृत मल नहीं। शरीरस्थ मल जब भस्म बनकर शरीर में ही
रह जाय, यह भी ठीक नहीं। इसीलिये उस शिष्य के शिर पर चरणनिर्गत
अमृतवारि से उसका प्रक्षालन करते हैं। इस प्रकार क्रमवत्ता की पूर्ति भी होती
है, और मान्त्री दीक्षा से दीक्षा का उपसंहार भी हो जाता है॥३६॥

३८ परशुरामकल्पसूत्रम्
मान्त्रीदीक्षाप्रयोगं वक्तुमुपक्रमते
त्रिकटु-त्रिफला-चतुर्जात-तक्कोल-मदयन्ती-सहदेवी-दूर्वा-
भस्म-मृत्तिका-चन्दन-कुङ्कुम-रोचना-कर्पूरवासितजलपूर्णं वस्त्रयुगवेष्टितं
नूतनकलशं बालाषडङ्गेनाभ्यर्च्य श्रीश्यामा-वार्तालीचक्राणि निःक्षिप्य
तिसृणामावरणमन्त्रैरभ्यर्च्य संरक्ष्यास्त्रेण प्रदर्श्य धेनुयोनी ।। ३७ ।।
त्रिकटुः-पिप्पली-शुण्ठी-मरीच्यः।
त्रिफला-हरीतकी-धात्री-विभीतक्यः।
तदुक्तं वैद्यसारे
शुण्ठी मरीचिपिप्पल्यः प्रोक्तास्त्रिकटुसंज्ञकाः।
त्रिफलेति समाख्याता पथ्या-धात्री-विभीतकैः।।
चतुर्जातम्—उशीरैलालवङ्गनागकेसराणि।
तदुक्तं मदनमहार्णवे
लवङ्गमेलोशीरं च त्रिसुगन्धं प्रकीर्त्तितम्।
नागकेसरसंयुक्तं चतुर्जातं प्रचक्षते ।।
तक्कोलः—मरीचिसदृशस्ताम्बूलेन सह भक्ष्यः शैत्योपचारहेतुवस्तु-
विशेषः।
मदयन्ती सहदेवी। वैद्यके प्रसिद्धे आरण्यके। दूर्वा-भस्म-मृत्तिकाः
प्रसिद्धाः। एतैर्युक्तं जलेन साकं वासितं चन्दनम्, कुङ्कुमं काश्मीरम्, रोचना
गोरोचनं, कर्पूरं प्रसिद्धम्। एतैर्वासितं यज्जलं तेन पूर्णं। वस्त्रयुगेन वेष्टितं
नूतनम् अभुक्तं कलशं बालाषडङ्गेन।
(“ऐं हृदयाय नमः, क्लीं शिरसे स्वाहा, सौः शिखायै वषट्, ऐं
कवचाय हुम्, क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्, सौः अस्त्राय फट्”) अग्नीशासुरवायु-
कोणेषु मध्ये पूर्वादिदिक्षु क्रमेण अभ्यर्च्य, श्रीश्च श्यामा च वार्त्ताली चेति तासां
चक्राणि निक्षिप्य जले स्थापयित्वेत्यर्थः। तिसृणां ललितादीनामावरणमन्त्रै-
रभ्यर्च्य पूजयित्वा, अस्त्रेण संरक्ष्य, धेनु-योनि-मुद्रे प्रदर्श्य ।। ३७ ।।

दीक्षाविधिः ३९
त्रिकटु, त्रिफला, उशीर-इलायची-लवङ्ग-नागकेसर रूप चतुर्जात,
ताम्बूल-सहद्रव्य रूप तक्कोल, सहदेवी, दूर्वा, भस्म, मृत्तिका इन ओषधि रूप
द्रव्यों से वासित जल में चन्दन, कुङ्कुम, गोरोचन और कर्पूर मिलाकर तैयार
पवित्र जल से कलश को भर देना चाहिये। साथ ही दो लाल वस्त्रों से उसे
सजा कर उस कलश की पूजा करनी चाहिये। पूजा में पहला कार्य कलश का
संस्कार माना जाता है। कलश उसी समय संस्कृत होता है, जब उसे बालाषडङ्ग
मन्त्र से अभिमन्त्रित किया जाता है। इन मन्त्रों को मैंने संस्कृत टीका में कोष्ठक
में स्पष्ट कर दिया है। इनसे सभी पूर्वादि दिशाओं एवं अग्नि, ईशान, नैऋत्य
और वायुकोणों में भी पूजन का विधान है।
दूसरी पूजा प्रक्रिया चक्रपूजा है। श्रीविद्या-चक्र, श्यामा-चक्र और वार्त्ताली-
चक्र इन तीनों चक्रों की पूजा-पद्धति कलश के अतिरिक्त भूमि पर, पत्र पर
या यन्त्र पर करने की प्रक्रिया को भी मान्यता देती है। किन्तु सूत्रकार के अनुसार
चक्र पर पूजा कर चक्र कलश में ही स्थापित किया जाना प्रतीक बन जाता
है। उसी समय कलश पूजा पूरी होनी चाहिये।
इसके बाद ललिताम्बा, श्यामा और वार्त्ताली के आवरण मन्त्रों से
सचक्र, सवस्त्रवेष्टित जलपूर्ण कुम्भ की भी अर्चना सम्पन्न करनी चाहिये।
परम्परा के अनुसार चक्रोद्धार की भी क्रिया करते हैं। अस्त्रमन्त्र से विघ्नों
का अपसारण कर चक्र स्थान पर चक्रों को रख देते हैं। तदनन्तर धेनु-
मुद्रा और योनि-मुद्रा का प्रदर्शन करते हैं। धेनु-मुद्रा से आराध्या परमाम्बा
में वात्सल्य का उद्रेक होता है और योनि-मुद्रा से यह सिद्ध होता है
कि, माँ तू ही विश्व की मूल उत्स है। ये मुद्रायें स्तुतिपरक मुद्रायें मानी
जाती हैं।।३७।।
मातृकायन्त्रमाह
शिवयुक्सौवर्णकर्णिके स्वरद्वन्द्वजुष्ट-किञ्जल्काष्टके क च ट
त प य श लाक्षरवर्गाष्टियुक्ताष्टदले दिगष्टकस्थित ठं वं चतुरस्रे
मातृकायन्त्रे शिष्यं निवेश्य तेन कुम्भाम्भसा तिसृभिः विद्याभिः
स्नपयेत् ।।३८।।

४० परशुरामकल्पसूत्रम्
शिवो हकारः, तेन युक्तः 'सौ'वर्णः सौ इति वर्णः, स कर्णिकायां
कमलमध्यदेशे यस्य एतादृशे। अत्र पूर्वोक्तवर्णोपरि विसर्गोऽपि योजनीयः
"व्योमेन्द्रौरसनार्णकर्णिकम्" इति शङ्करभगवत्पादैरुक्तत्वात्। इमानि सर्वाणि
कमलविशेषणानि। स्वरा अकारादि-विसर्गान्ताः षोडश। तेषां द्वन्द्वं द्वयं द्वयं तेन
जुष्टं युक्तं किञ्जल्काष्टकं पत्रयुगमध्यवर्तिदेशविशेषो यस्येति बहुव्रीहिः। कश्च चश्च
टश्च तश्च पश्च यश्च लक्ष इति द्वन्द्वः, द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं प्रत्येकं सम्बध्यते इति
न्यायेन वर्गपदं सर्वैः सम्बध्यते। तथा च कवर्गमारभ्य पवर्गपर्यन्तं पञ्च पञ्च
वर्णाः। यवर्गः चत्वारः शवर्गोऽपि। लक्ष इति लवर्गः। एवमष्टवर्गैर्युक्तानि
अष्टदलानि यस्येति बहुव्रीहिः। एकैकदले एकैकं वर्गं लिखेदिति फलितार्थः।
केसरेषु दलेषु च वर्णलेखने क्रमाकाङ्क्षायां प्राच्यादिक्रम एव वर्त्तव्यः।
दिशां यदष्टकं प्राच्यादीशान-दिगन्तं तेषु स्थितौ वकारठकारौ यस्मिन् ईदृशं
चतुरस्रं यस्मिन्निति बहुव्रीहिः। ईदृशे मातृका-संज्ञके यन्त्रे शिष्यं निवेश्य
स्थापयित्वा, तेन कुम्भाम्भसा तिसृभिः विद्याभिः श्रीश्यामा-वार्त्ताली-विद्याभिः
स्नपयेत्। अयमेव पूर्णाभिषेक इत्युच्यते।।३८।।
चतुरस्रमातृकायन्त्र

दीक्षाविधिः ४१
यह मातृका यन्त्र है। इसकी विधि इस चित्र से स्पष्ट है। पूरी संस्कृत
विवृति में यही क्रम बताया गया है। बीच में एक वृत्त बनाइये। उसमें
ह्सौः लिख दीजिये। उसके ऊपर एक बड़ा वृत्त बनाइये। उस वृत्त के ऊपर
कमलपत्तों के समान बराबर-बराबर आठ दल बनाइये। पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर
कमल दलों का स्पर्श करती चार ऐसी सीधी रेखायें खींचिये, जिससे एक
समचतुर्भुज बन जाय। इस चित्र में जैसे अक्षर लिखे हुए हैं। उसे अपने द्वारा
निर्मित चित्र में भर दीजिये। मातृका यन्त्र तैयार। इसी के बीच में शिष्य को
बिठलाना चाहिये। उसी कलश के पावन जल से शिष्य को श्रीविद्या मूलमन्त्र,
श्यामा मूलमन्त्र और वार्त्ताली मूलमन्त्र से स्नान कराना चाहिये। इसे पूर्णाभिषेक
कहते हैं॥३८॥
मान्त्रीं दीक्षामुपसंहरति
सदुकूलं सालेपं साभरणं समालं सुप्रसन्नं शिष्यं पार्श्वे निवेश्य
मातृकां तदङ्गे विन्यस्य विमुक्त-मुखकर्पटस्य तस्य हस्ते त्रीन् प्रथम-
सिक्तान्

४२ परशुरामकल्पसूत्रम्
मुख-बन्ध से मुक्त कर दिया गया, जिससे वह खुली आँखों से पारमेश्वरी सर्जना
का शैव स्वरूप ध्यान में ला सके।
उसके हाथ में प्रथम सिक्त अर्थात् पहले से ही सिक्त होने के लिये
रखे गये थे और गुरु द्वारा शिष्य को देने के लिये रखे गये दूसरे भाग को
देकर तत्त्व मन्त्रों से (ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा) (क्लीं विद्यातत्त्वं
शोधयामि नमः स्वाहा) (सौः शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहाः) उसे खिलाना
चाहिये। यह ध्यातव्य है कि, उस खण्ड को चन्दन से भी सिक्त करना
चाहिये।
उसके बाद उसके दाहिने कान में त्र्यक्षरी बाला मन्त्र का उपदेश करना
चाहिये। त्र्यक्षरी बाला “ऐं क्लीं सौः” मन्त्रमयी मानी जाती है। इस मन्त्र का
उपदेश मन्त्र बोलकर होना चाहिये, जिसे शिष्य ग्रहण कर सके। इसके बाद
इष्ट मन्त्र का कथन भी करना चाहिये। इष्ट मन्त्र गुरु पर निर्भर है।।३९।।
गुरुकर्त्तृकं कर्मशेषं वदति
ततस्तस्य शिरसि स्वचरणं निक्षिप्य सर्वान् मन्त्रान् सकृद्वा
क्रमेण वा यथाधिकारमुपदिश्य स्वाङ्गेषु कमप्यङ्गं शिष्यं स्पर्शयित्वा
तदङ्गमातृकावर्णादि द्व्यक्षरं त्र्यक्षरं चतुरक्षरं वा आनन्दनाथशब्दान्तं
तस्य नाम दिशेत् ।।४०।।
तत इत्यनेन वक्ष्यमाणधर्माणाम् उत्तराङ्गत्वं सूचितम्। स्वस्य गुरोः
चरणम् “अनादेशे दक्षिणं प्रतीयात्” इति परिभाषया दक्षिणचरणमेव
न्यसेत्। सर्वान् मन्त्रान् श्रीविद्याङ्गभूतान् गणपति-श्यामा-वार्त्ताली-परा-पञ्चदशी
नित्या-रश्मिमाला-मन्त्रादीन् सर्वान् सकृद्वा इत्यत्र वाकार एवकारार्थः। क्रमेण
वा तत्तदुपासनवेलायां वा यथाधिकारम् उपदिश्य स्वाङ्गेषु किमप्यङ्गं शिष्यं
स्पर्शयित्वा 'कस्यापि ममाङ्गस्य स्पर्शं कुरु' इत्यादिश्य। ततः शिष्यो
यमवयवं स्पृशेत् तत्र मातृकान्यासे यो वर्णः स आदिर्यस्मिन् ईदृशम्। यथा
शिरःस्पर्शे तत्र मातृका-वर्णः अकारः स आदिर्यस्य अमृतानन्दनाथ इति।
द्व्यक्षरं वेत्यादि स्पष्टार्थः। आनन्दनाथशब्दान्तं स्पष्टम्। तस्य शिष्यस्य नाम
दिशेत् ।।४०।।

दीक्षाविधिः ४३
इतना कर्मकाण्ड सम्पन्न कर लेने के बाद गुरुदेव अपना दाहिना चरण
शिष्य के शिर पर रखें। यह ध्यातव्य है कि, पादाधस्तल में श्री देवी का निवास
होता है। श्रीविद्या की दीक्षा के क्रम में शिष्य का सहस्रार श्रीविद्या की रश्मियों
से प्रकाशमान हो उठे, यह शिष्य के शिर पर गुरुचरण रखने का रहस्य है।
सूत्र में दायें-बायें किसी चरण का निर्देश नहीं है। अतः जहाँ निर्देश नहीं होता,
वहाँ दाहिना ग्रहण करना चाहिये। इस नियम के अनुसार गुरु का दाहिना चरण
ही शिष्य के शिर पर रखना चाहिये, उपासना में या उसी अवस्था में सभी
मन्त्रों का चाहे एक बार या श्रीविद्या के अङ्गभूत गणपति-श्यामा-वार्ताली परा-
पञ्चदशी-नित्या-रश्मिमाला इत्यादि सभी मन्त्रों का क्रमशः अधिकारानुसार उपदेश
करना चाहिये। श्रद्धा, भक्ति की कमी पर अपेक्षानुसार अधिकार की परीक्षा गुरु
कर लेता है।
इसके बाद गुरुदेव शिष्य को यह आदेश देते हैं कि, मेरे शरीर के किसी
अवयव का स्पर्श करो। आज्ञानुसार शिष्य गुरु के जिस अङ्ग का स्पर्श करता
है, गुरु यह जानता है कि, इस अङ्ग पर मातृका के किस अक्षर का न्यास
है। उस अक्षर से प्रारम्भ होने वाले द्व्यक्षर, त्र्यक्षर या चतुरक्षर संज्ञा शब्द के
साथ अमृतानन्द सदृश शब्द से नाथ लगाकर शिष्य का नाम रखने का आदेश
दे। जैसे शिष्य ने शिर का स्पर्श किया। गुरु का वह अङ्ग 'अ' अक्षर से न्यास-
युक्त है। अतः अमृतानन्दनाथ नाम रखना उचित माना जाता है क्योंकि इसके
आदि में 'अ'कार आता है। नाम दो, तीन और चार अक्षरों का होना चाहिये।
अमृत शब्द भी तीन अक्षरों वाला ही है।।४०।।
गुरुपादुकामन्त्रदानम्
बालोपदिष्टेः पूर्वमात्मनः पादुकां षट्त्तारयुक्तां दद्यात् ।।४१।।
द्वितीयशकल-ग्रासानन्तरं बालोपदिष्टेन पूर्वम् आत्मनः पादुकाम्
आत्मनः गुरोर्दीक्षाकाले दत्तं यन्नाम तद्घटितपादुकाऽन्तं मन्त्रं षट्त्तारयुक्तं तस्मै
उपदिशेत्। षट्त्तारश्च कुलार्णवे—
वाग्भवं च परा श्रीश्च कालीबीजं ततः प्रिये।
भुवनेशी मन्मथं च षट् ताराश्च प्रकीर्त्तिताः।।

४४ परशुरामकल्पसूत्रम्
अमुकानन्दनाथ श्रीपादुकां पूजयामीति।।४१।।
उपर्युक्त क्रम में द्वितीय खण्ड के ग्रास का वर्णन किया गया है। उसके
बाद और बालामन्त्रोपदेश के पहले गुरु अपनी पादुका का मन्त्र शिष्य को
बतलाये। गुरु की दीक्षा के समय परमगुरु ने उन्हें जो मन्त्र दिया होता है,
उस नाम को लगा कर कहना चाहिये कि, “अमुकानन्दनाथ श्रीपादुकां पूजयामि'।
इस मन्त्रात्मक वाक्य के पहले वाग्भवबीज, पराबीज, श्रीबीज, कालीबीज,
भुवनेशीबीज और मन्मथबीज रूप छः देवी प्रणवों का उच्चारण करना चाहिये।
गुरुपादुकामन्त्र परमेष्ठिगुरु, परमगुरु और दीक्षागुरु के क्रम से कुछ पृथक् से
प्रयुक्त किये जाते हैं।।४१।।
आचारानुशासनादिः
आचाराननुशिष्य हार्द-चैतन्यमामृश्य विद्यात्रयेण तदङ्गं त्रिः
परिमृज्य परिरभ्य मूर्धन्यवघ्राय स्वात्मरूपं कुर्यात् ।।४२।।
आचारान् दशम-खण्डे वक्ष्यमाणान् अनुशिष्य शिक्षयित्वा हार्दं
हृदयाकाशसम्बन्धि चैतन्यं तं शिष्यमामृश्य ध्यात्वा स्वहृदयस्थचैतन्याभिन्नं
शिष्यं भावयेदित्यर्थः। विद्यात्रयेण श्री-श्यामावार्त्तालीविद्याभिः तदङ्गं त्रिः
स्वहस्तेन शिष्यस्य सर्वशरीरं संस्पृश्य परिरभ्य आलिङ्ग्य मूर्धन्यवघ्राय
स्वात्मरूपं कुर्यात्। स्वस्य यथा आत्मा मोक्षप्रतिबन्धकपौरुषमलरहितस्तथा तं
कुर्यात् ।।४२।।
दशवें खण्ड में निर्दिष्ट आचारों की शिक्षा शिष्य के लिये गुरु दे।
हृदयाकाश में प्रकाशमान चैतन्य गुरु के हृदय में जैसे है, उसी प्रकार के चैतन्य
को शिष्य के हृदयाकाश में ध्यान द्वारा उल्लसित और अभिन्न रूप से उद्रिक्त
कर दे। श्री, श्यामा और वार्त्ताली विद्याओं के उच्चारणपूर्वक पारम्परिक रूप
से शिष्य के सारे शरीर का स्पर्श करे। शिष्य को अपने हृदय से लगा ले।
शिर को सूँघकर उसे स्वात्म रूप में आत्मसात् कर ले। जैसे मोक्ष के प्रतिबन्धक
पौरुष मल से स्वयम् उन्मुक्त हैं, उसी तरह उसे भी निर्मल बनाकर मोक्ष मार्ग
में अग्रसर कर दे। यह दीक्षागुरु का उत्तरदायित्व है।।४२।।

दीक्षाविधिः ४५
शिष्यस्य अशेषमन्त्राधिकारित्वम्, शिष्यकर्त्तृकक्रिया च
शिष्योऽपि पूर्णतां भावयित्वा कृतार्थस्तं गुरुं यथाशक्तिवित्तै-
रुपचर्य विदितवेदितव्योऽशेषमन्त्राधिकारी भवेदिति शिवम् ॥४३॥
पूर्णता पूर्वमेव व्याख्याता। अत एव कृतोऽर्थो मोक्षसाधनं येन सः,
तादृशः। तं गुरुं यथाशक्तिवित्तैः 'लक्षं लक्षपतिर्दद्याद्दरिद्रस्तु वराटिकाम्' इति
रीत्या उपचर्य सन्तोष्य विदितं ज्ञातं वेदितव्यं ज्ञातुं योग्यं येन सः सर्वज्ञ
इत्यर्थः। अशेषमन्त्राणां सौरवैष्णवादिसप्तकोटिमन्त्रेषु अधिकारी भवेत्। एतेन
एतदुपदेशेन सर्वमन्त्रोपदेशो जातः। यच्चोपक्रान्तं दीक्षा-प्रकरणं तत्
समाप्तमिति ज्ञापकः शिवशब्दः ॥४३॥
।। इति श्रीरेणुकागर्भसम्भूत-श्रीभार्गवोपाध्यायजामदग्न्यमहादेवप्रधानशिष्य-महाकौलाचार्य-
श्रीमत्परशुरामकृतौ कल्पसूत्रे श्रीरामेश्वररचितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां परशुरामकल्पसूत्र-
(मुख्यांश)वृत्तौ दीक्षाविधिर्नाम प्रथमः खण्डः सम्पूर्णः।।
इस दीक्षा से परिष्कृतचेतन शिष्य को दृढ़तापूर्वक यह भावन करना
चाहिये कि, अब मैं पूर्णपुरुष हो गया हूँ। मैंने मोक्ष साधन रूप सर्वोत्तम अर्थ
को दीक्षा द्वारा प्राप्त कर लिया है। मैं सचमुच कृतार्थ हो गया हूँ। पूर्ण भी
हूँ और पूर्ण क्रियावान् भी हो चुका हूँ। यदि तत्काल दीक्षा में अवस्थित हो,
तो उस समय तत्काल यथाशक्ति अर्थात् वित्तशाठ्य से बचते हुए गुरु के चरणों
में भूरि दक्षिणा उपस्थित करे। निर्धन व्यक्ति वराटिका, कौड़ी या बाटी ही दे।
इस विषय में एक उक्ति है—
'लखपति देवे लाख, निर्धन केवल बाटी'। इस उक्ति के अनुसार गुरुदेव
को सन्तुष्ट कर स्वयं प्रसन्नता का अनुभव करे।
इसी जीवन में सब कुछ जाना जा सकता है किन्तु वही जानना श्रेष्ठ
माना जाता है, जो सचमुच जानने योग्य हो, जानने योग्य ब्रह्म है, गुरुदेव हैं
और स्वात्म का अस्तित्व है। गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही सबसे अधिक उपयोगी
और जानने योग्य माना जाता है। जो ऐसा जानकार होता है उसे विदितवेदितव्य
कहते हैं। शिष्य अपने को ऐसा ही समझे।

४६ परशुरामकल्पसूत्रम्
जो इतना जान गया, वह धन्य हो गया, यह समझना चाहिये। गुरुमन्त्र
मिल जाने पर शिष्य सौर-वैष्णव आदि सात करोड़ मन्त्रों का अधिकारी हो
जाता है। इस उपदेश से सारा ज्ञानविज्ञानोपदेश हो गया। यह दृढ़ता ही शिष्य
का अधिकार है। इस प्रकार यह दीक्षाविधि-प्रकरण जो प्रारम्भ किया गया था,
अब सम्पन्न हो गया। यह अर्थ अन्त में आये 'शिवम्' इस अमृत प्रयोग
का है।।४३।।
।।श्रीरामेश्वरकृत मुख्यांश सौभाग्योदयवृत्तिसहित
डॉ. परमहंसमिश्रकृत नीर-क्षीर-विवेक भाषा-भाष्य-समन्वित
श्रीपरशुरामकल्पसूत्र का दीक्षाविधि-नामक प्रथम खण्ड परिपूर्ण ।।१।।
।। शुभं भूयात् ।।

महागणपतिक्रमः
[ द्वितीयः खण्डः ]
पूर्वखण्डे दीक्षाविधिं परिसमाप्य श्रीललितोपास्तिप्रकरणं विवक्षु-
स्तदुपास्तेः पूर्वाङ्गभूतां श्रीमहागणपत्युपास्तिं वक्तुं प्रक्रमते—
इत्थं सद्गुरोराहित-दीक्षो महाविद्याराधन-प्रत्यूहापोहाय गाण-
नायकीं पद्धतिमामृशेत् ॥१॥
इत्थं पूर्वोक्तप्रकारेण सद्गुरोः शास्त्रोक्त-लक्षण-सहितगुरोः सकाशाद्
आहिता प्राप्ता दीक्षा येन ईदृशः। महाविद्या पञ्चदशी षोडशी वा। तस्या
आराधनं जपः। यद्वा महाविद्या श्रीललिता। महाविद्यावाच्यत्वाद् वाच्यवाचक-
योरभेदात्, तस्या आराधन-फलप्राप्त्यन्तं पूजनं, तदुत्पत्तिप्रतिबन्धकीभूता ये
प्रत्यूहा विघ्नाः “विघ्नोऽन्तरायः प्रत्यूहः” इत्यमरः। तेषामपोहाय नाशाय
गाणनायकीं गणेशसम्बन्धिनीं पद्धतिं मार्गं, “सरणिः पद्धतिः पद्यावर्त्तन्येक-
पदीति च” इत्यमरः। उपासनासरणिमित्यर्थः। आमृशेत् स्वीकुर्यात्॥१॥
परशुरामकल्पसूत्र के प्रथम खण्ड में दीक्षा के सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश
डाला गया है। उसी के अनुसार सद्गुरु सम्बन्धी समस्त शास्त्रीय लक्षणों से
सम्पन्न सद्गुरुदेव के शरण में जाना चाहिये। उनसे दीक्षा लेनी चाहिये। उनसे
दीक्षा प्राप्त करने के उपरान्त शिष्य ‘आहितदीक्ष’ हो जाता है। दीक्षा के अनन्तर
श्रीविद्या की उपासना का अधिकार शिष्य को प्राप्त होता है। महाविद्या शब्द
से सर्वप्रथम पञ्चदशी विद्या का अर्थ ग्रहण करते हैं। यों षोडशी भी महाविद्या
ही है किन्तु पञ्चदशी उपासना के पूर्ण होने पर ही षोडशी की उपासना का
क्रम अपनाना चाहिये। महाविद्यारूपिणी पञ्चदशी की आसधना से जीवन धन्य
हो उठता है।

४८ परशुरामकल्पसूत्रम्
आराधना शब्द में आ उपसर्ग है। राधू धातु है और ल्युट् प्रत्यय है।
नपुंसक लिङ्ग में आराधन शब्द निष्पन्न होता है। सेवा, उपासना, अर्चना, प्रार्थना,
समृद्धि और सामर्थ्य का चिन्तन कर समर्थ के प्रति श्रद्धा का आचरण इस शब्द
के अर्थ के परिवेश में गृहीत होते हैं। जप इस शब्द का अर्थ नहीं है। उपासना
का एक अंग मात्र ही जप होता है।
महाविद्या श्रीललिताम्बा को भी कहते हैं। उसका आराधन भी महाविद्या
का ही आराधन है। इस प्रकरण में भी आराधन का अर्थ फलप्राप्ति के लिये
पूजन ही हो सकता है। आराधना में बड़े विघ्न आते हैं। विघ्नों का निराकरण
ही प्रत्यूह का अपोह माना जाता है। प्रत्यूहों के अपाकरण के लिये भगवान्
परशुराम साधक को विधि में उतार रहे हैं। 'आमृशेत्' विधि क्रिया का प्रयोग
कर साधक को सावधान कर रहे हैं। आ के साथ मृश धातु के चिन्तन,
स्वीकरण आदि अर्थ होते हैं। इसके अनुसार भगवान् गणेश की पूजा-उपासना
पद्धतियों का आश्रय लेना चाहिये। इससे भगवान् गणेश प्रसन्न होते हैं। फलस्व-
रूप विघ्नों का विनाश होता है और उपासना शान्तिपूर्वक सम्पन्न होती है॥१॥
एवं गणनायकोपास्तेरावश्यकतामुक्त्वा तदुपासनाप्रकारं प्रपञ्चयति
ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थाय द्वादशान्ते सहस्रदलकमलकर्णिकामध्य-
निविष्ट-गुरुचरणयुगलविगलदमृतरसविसरपरिप्लुताखिलाङ्गो हृदय-
कमलमध्ये ज्वलन्मुग्धदरुण-कोटि-पाटलमशेषदोषनिर्वेष-भूत-
मनेकपाननं नियमित-पवनमनोगतिर्ध्यात्वा तत्रभापटलपाटली-
कृततनुर्बहिर्निर्गत्य मुक्तमलमूत्रो दन्तधावनस्नानवस्त्रपरिधानसूर्यार्घ्य-
दानानि विधाय उद्यदादित्यवर्त्तिने महागणापतये 'तत्पुरुषाय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्' इत्यर्घ्यं दत्त्वा नित्यकृत्यं
विधाय चतुरावृत्तितर्पणं कुर्यात्।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं बलं पुष्टिर्महद्यशः।
कवित्वं भुक्तिमुक्ती च चतुरावृत्तितर्पणात् ॥२॥
ब्राह्मे मुहूर्त्ते उषःकाले उत्थाय शयनादिति शेषः। द्वादशान्ते ललाटोर्ध्वं
कपालोर्ध्वावसानं द्वादशान्तपदवाच्यम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसङ्ग्रहे—

महागणपतिक्रमः ४९
“द्वादशान्तं ललाटोर्ध्वं ललाटोर्ध्वावसानकम्” इति। यद्वा द्वादशान्ते
स्थूलशरीरे सुषुम्नानाडीमाश्रित्य द्वात्रिंशत्पद्मानि सन्ति। तेषु सहस्रदलकमले द्वे,
सर्वाधः अकुलनामकमेकमूर्ध्वमुखं सर्वोर्ध्वं द्वादशान्तनामकमधोमुखमपरम्। अत्र
प्रमाणं सविस्तरं योगिनीतन्त्रस्योत्तरचतुश्शतीव्याख्याने सेतुबन्धे अस्मत्परम-
गुरुकृते द्रष्टव्यम्।
द्वादशान्तसंज्ञकं यत्कमलं तत्कर्णिका-मध्यनिविष्ट-गुरुचरण-युगलं द्वन्द्वं
तस्माद् विगलत् स्रवद्यद् अमृतं तस्य रसस्य यो विसरो विस्तारस्तेन परिप्लुतं
क्लिन्नम् अखिलाङ्गं यस्य एवं भूत्वेति शेषः।
नियमिता पवनमनोगतिर्येन, प्राणान् मनश्चाचलं कृत्वेत्यर्थः। हृदय-
कमल-मध्ये अनाहते ज्वलन्तमित्यनेन स्वशरीरस्थपापदाहकर्तृत्वं सूचितम्।
उद्यदरुणकोटिपाटलमित्यनेन अभूतोपमानेन ब्रह्माण्डमध्ये एतदुपममन्यन्ना-
स्तीति सूचितम्। अशेषदोषनिर्वेषमशेषाणां स्वकीयदोषाणां निर्वेषो निर्गतो वेषः
स्वरूपं येषां ते स्वरूपशून्याः।
अनेकपो द्विपस्तस्य आननं यस्य ईदृशं ध्यात्वा तस्य देवस्य प्रभायाः
पटलेन समूहेन पाटलीकृतः। उद्यदादित्यवर्त्तिने महागणपतये गणेशगायत्र्या
अर्घ्यं दत्त्वा, नित्यकृत्यम् अग्निहोत्रादिकं विधाय चतुरावृत्तितर्पणं कुर्यात्।
आयुरारोग्यमित्यर्थवादः। गणपतिप्रीतये इति सङ्कल्पं विधायेति।
साधक का यह कर्तव्य है कि, वह ब्राह्म मुहूर्त में उठ जाय। शय्या
का परित्याग कर सर्वप्रथम उसे महागणपति का ध्यान करना चाहिये। ध्यान के
क्रम का निर्देश स्वयं सूत्रकार ने किया है। वह इस प्रकार है—
१. उपासक ध्यान की मुद्रा में विराजमान होकर दैनिक साधना के अनुसार
द्वादशान्त ललाटोर्ध्वकेन्द्र की कर्णिका के मध्य में या अन्य तन्त्रानुसार (अ
उ म, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रेखिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और
उन्मना इन बारह चक्रों के ऊर्ध्वान्त केन्द्र में) एक हजार पत्रों वाले कमल
की मध्यरेखा के ऊपर अवस्थित गुरुदेव के दो चरणों का प्रकल्पन करे।
२. उन चरणों से स्रवित होने वाली सुधाधारा से पूरी तरह स्वात्म के सर्वाङ्ग
को सुख-स्नात अनुभव करे।

५० परशुरामकल्पसूत्रम्
३. अब अपने हृदय केन्द्र में हृत्पद्म का ध्यान करे। उस पद्मकोश में विराजमान
महागणपति का ध्यान में ही दर्शन करे। मानो भगवान् गणेश प्रकाश
परमोज्ज्वल उदीयमान अनन्त आदित्यों की पाटलिमा को भी अतिक्रान्त
करने वाले आरुण्य से अलङ्कृत हो रहे हैं।
४. दोष-राशि के वेष की कल्पना यदि की जाय और उसे साकार होने से पहले
ही प्रध्वस्त कर दिया जाय, उस स्थिति को निर्वेष कहते हैं। गणेश ऐसे
ही हैं। दोषों के अस्तित्व का उनमें सर्वथा अभाव है।
५. यह प्रसिद्ध है कि, उनका मुख अनेकप (द्विप अर्थात् गज) के समान है।
यह पौराणिक मान्यता है। तान्त्रिक प्रक्रिया प्राण को ही गणेश मनती है।
६. उपासक उस समय ब्रह्मवेला के वर्चस् की ऊर्जा से ओत-प्रोत हो रहा है।
उसने पवन अर्थात् प्राणापानवाह को नियन्त्रित कर लिया है। मन उसके
वशीभूत हो चुका है। वह भगवान् गणेश के उस दिव्यरूप में समाविष्ट
हो चुका है।
७. गणेश का वह प्रभाभास्वर स्वरूप और उससे सतत विनिःसृत रश्मिराशि
से स्वयं भासमान हो उठा है। उसकी व्यक्तिसत्ता में दिव्यता खिल उठी
है। लगता है, उसका शरीर भी गणेश की अरुण आभा से लाल-लाल
हो रहा है।
गणेश उपासक का यह दैनन्दिन उपक्रम उसे सतत आनन्दोल्लास से
उल्लसित करता है। इतनी प्रक्रिया अपनाने के बाद अब उपासक शयन-
कक्ष से बाहर निकलता है।
८. अब वहं दैनिक प्राकृतिक प्रक्रिया पूरी करता है। शौच आदि से निवृत्त होता
है। मुख प्रक्षालन, दन्तधावन, स्नान, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य परिधानीय
धारण कर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता है।
९. अब अरुणोदय का समय हो गया है। नये निकलते लालिमा लिये उगते
आदित्य में अपने आराध्य एकदन्त का वह दर्शन करता है। उन्हें पवित्र
अर्घ्य अर्पित करता है। इसका एक मन्त्र है। उसे गणेश गायत्री कहते हैं।
उसे इस रूप से जानते हैं।

महागणपतिक्रमः ५१
“तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्” इस मन्त्र
का अर्थ है, उदीयमान दिवाकर की दिव्य आभा से भासमान भगवान् गणेश
को हम उपासक लोग तात्त्विक रूप से जानते हैं। वे वक्रतुण्ड हैं। हम उनका
ध्यान करते हैं। वे एकदन्त द्वैमातुर हेरम्ब हमारी बुद्धि शक्ति के प्रेरक बनें।
इस मन्त्र से इस भावना के साथ गणेशार्घ्य प्रदान कर अवशिष्ट नित्यकृत्य
जैसे अग्निहोत्र आदि सम्पन्न करे। इसके बाद तर्पण करना चाहिये। तर्पण करने
से, 'आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, 'बल' पुष्टि, महती कीर्ति, कवित्व-शक्ति, भुक्ति
और मुक्ति अवश्य प्राप्त होती है। इसे चार बार करना चाहिये। सूत्र के साथ
इस अर्थवाद वाक्य को जोड़ दिया गया है। इससे उपासक के लिये इसको
प्रतिदिन सम्पन्न करना अनिवार्य कर दिया गया है।।२।।
तदेव स्पष्टं विशिनष्टि
प्रथमं द्वादशवारं मूलमन्त्रेण तर्पयित्वा मन्त्राष्टाविंशतिवर्णान्
स्वाहान्तानेकैकं चतुर्वारं मूलं च चतुर्वारं तर्पयित्वा पुनः श्री-
श्रीपति-गिरिजागिरिजापति-महीमहीपति-महालक्ष्मीमहालक्ष्मीपति-
ऋद्ध्यामोद-समृद्धिप्रमोद-कान्तिसुमुख-मदनावतीदुर्मुख-मदद्रवा-
विघ्न-द्राविणी-विघ्न-कर्तृ-वसु-धारा-शङ्खनिधि-वसुमतीपद्मनिधि-
त्रयोदशमिथुनेष्वेकैकां देवतां चतुर्वारं च तर्पयेत्। एवं चतुश्चत्वारिं-
शदधिकचतुःशततर्पणानि भवन्ति ।।३।।
मूलमुच्चार्य तर्पयामीति मन्त्रेण तर्पणम्। एवमेव अग्रे सर्वत्र मूलस्थले
संयोज्यम्। स्वाहान्त इत्यनेन प्रतिवर्णमन्त्रे स्वाहाकारघटकत्वं सूचितम्।
स्वाहान्ते तर्पयमि इत्यपि योज्यम्।
तथा च मूलस्यैकवर्णः, तत्र बिन्दुयोगोऽपि शिष्टसम्प्रदायात्, ततः
स्वाहाकारः, ततस्तर्पयामीति। एवं चतुर्वारं। ततो मूलेन चतुर्वारम्। एवं सर्वेषु
वर्णेषूह्यम्। पूर्वं द्वादशवारं तर्पयित्वेति एको गणः सूचितः। तदुत्तरं चतुर्वारं
तर्पयित्वेत्यन्ततर्पणम् एको गणः सूचितः। अस्मिन् सूत्रे पुनरित्यनेन
त्रयोदशमिथुनतर्पणम् अन्यो गणः सूचितः। गणत्रयसूचनाफलं च एकैकगणस्य

५२ परशुरामकल्पसूत्रम्
एकैकापूर्वजनकत्वात् तन्मध्ये एकस्य विस्मरणे पुनस्तद्गणमारभ्यैव अनुष्ठानं
न सकलादिमारभ्य।
श्रीश्रीपतीत्येकं, गिरिजागिरिजापतीत्येकं मिथुनम्। एवं रीत्या एकं
स्त्रीलिङ्गान्तमेकञ्च पुंलिङ्गान्तं मिथुनं ज्ञेयम्। एवं त्रयोदशमिथुनेषु एकैकां देवतां
द्वितीयान्तमुच्चार्य तर्पयामीति योजयेत्। इत्थं चोक्तरीत्या एकदेवतायाश्चतुर्वारं
तर्पणम्, ततो मूलेन चतुर्वारं कार्यं पूर्ववत्। तदित्थं मूलतर्पणानि २२८ वर्ण-
तर्पणानि ११२ मिथुनतर्पणानि १०४ आहत्य ४४४ तर्पणानि भवन्तीत्यर्थः॥३॥
मूलमन्त्र पहले उच्चारण कर उसके साथ 'तर्पयामि' क्रिया लगाकर तर्पण
का मन्त्र बनता है। इसी तरह सर्वत्र मूल के साथ 'तर्पयामि' क्रिया का संनियोजन
करना चाहिये। चार बार तर्पण में क्रिया की आवृत्ति आवश्यक नहीं होती। मन्त्र
की आवृत्ति नितान्त आवश्यक मानी जाती है। स्वाहान्त शब्द प्रयोग का तात्पर्य
प्रतिवर्ण मन्त्र में 'स्वाहा' का प्रयोग आवश्यक है, यही मानना चाहिये। स्वाहा
के अनन्तर 'तर्पयामि' क्रियायोग ही परम्परा में गृहीत है।
इस प्रकार मूल के एक वर्ण और इसके साथ बिन्दु के प्रयोग शिष्टस्वीकृत
माने जाते हैं। इसके बाद 'स्वाहा' का प्रयोग और तदनन्तर 'तर्पयामि' क्रिया
का प्रयोग कर तर्पण मन्त्र का निर्माण करते हैं। इस मन्त्र से चार बार तर्पण
कर पुनः मूलमन्त्र से ही चार बार तर्पण करना चाहिये, इस तरह ऊह द्वारा
वर्ण मन्त्रों का प्रयोग कर तर्पण का विधान पूरा करने का नियम है। गण के
अनुसार तर्पण का निर्देश सूत्रों से प्राप्त होता है। जैसे पहले १२ बारह बार
तर्पण करने की प्रक्रिया से प्रथम गण का सूचन हो रहा है। पुनः चतुर्वार तर्पण
की बात से यह स्पष्ट हो रहा है कि, यह एक पृथक् गण है। 'पुनः' के प्रयोग
के आधार पर इसके बाद तेरह मिथुनों का तर्पण सूचित हो रहा है। यह एक
तीसरा गण प्रतीत होता है। इन गणों के पृथक्-पृथक् तर्पण का फल भी बड़ा
अच्छा मिलता है। कभी बीच में विस्मृतिवश यदि प्रमाद घटित हो जाय तो,
उसी गण से पुनः प्रारम्भ किया जाता है। अन्यथा इसे प्रारम्भ से शुरू करना
पड़ता है।
श्री और श्रीपति का एक मिथुन, गिरिजा-गिरिजापति यह द्वितीय मिथुन,
इसी तरह एक स्त्रीलिङ्ग शब्द तथा साथ के पुल्लिङ्ग शब्द को मिलाकर तेरह

महागणपतिक्रमः ५३
मिथुनों का सूत्र में उल्लेख है। इनमें से एक-एक देवता के साथ द्वितीया विभक्ति
लगाकर 'तर्पयामि' क्रिया का प्रयोग कर तर्पण करना चाहिये। इस तरह एक
देवता का चार बार तर्पण कर पुनः मूल से भी चार बार तर्पण करने का विधान
है। इस तरह मूल तर्पण २२८ बार, वर्ण तर्पण ११२ बार, मिथुन तर्पण १०४
बार होते हैं। कुल मिलाकर चार सौ चौवालिस तर्पण होते हैं॥३॥
एवं तर्पणक्रममुक्त्वा पूजाविधिं वक्तुमुपक्रमते
अथ यागविधिः। गृहमागत्य स्थण्डिलमुपलिप्य द्वारदेश
उभयपार्श्वयोर्भद्रकाल्यै, भैरवाय, द्वारोर्ध्वं लम्बोदराय नम इति अन्तः
प्रविश्य आसनमन्त्रेण आसने स्थित्वा, प्राणानायम्य षडङ्गानि विन्यस्य
मूलेन व्यापकं कृत्वा स्वात्मनि देवं सिद्धलक्ष्मीसमाश्लिष्ट-
पार्श्वम् अर्द्धेन्दुशेखरमारक्तवर्णं मातुलुङ्गगदापुण्ड्रेक्षु-कार्मुकशूल-
सुदर्शनशङ्खपाशोत्पलधान्यमञ्जरीनिजदन्ताञ्चलरत्नकलशपरिष्कृत-
पाण्येकादशकं प्रभिन्नकटमानन्दपूर्णमशेषविघ्नध्वंसनिघ्नं विघ्नेश्वरं
ध्यात्वा ॥४॥
अथ अधिकारान्तरवाक्यमिदम्। एतेन तर्पणप्रकरणं समाप्तम्। गृहमाग-
त्येत्यनेन तर्पणं नद्यादौ गृहाद्बहिः कार्यम् इति सूचितम्। स्थण्डिलं यागदेश-
मुपलिप्य गोमयेनेति शेषः। उभयपार्श्वयोरित्यत्रानादेशाद्दक्षिणं प्रथमं पश्चाद्वामम्।
दक्षवामौ द्वाराद्बहिर्निर्गमनवेलायां तौ ग्राह्यौ। नम इत्युत्तरं यजेदिति शेषः।
अन्तः प्रविश्य इत्यनेन द्वारपूजा बहिः स्थित्वैव कार्या इति सिद्धम्। आसन-
मन्त्रेणेत्यनेन श्यामाप्रकरणपठितो मन्त्रो ज्ञेयः, सन्निकृष्टत्वात्। प्राणायामः
श्वासनिरोधः। षडङ्गानि मूलमन्त्रषडङ्गानि हृदयादीनि। तेषु विन्यस्य सर्वाङ्गे
विन्यसेत्। इदमेव व्यापककरणम्। स्वात्मनि स्वहृदये। गदा आयुधविशेषः,
पुण्ड्रेक्षुः नानारेखायुक्तेक्षुः। कार्मुकश्चापः। शूल आयुधविशेषः। सुदर्शनं चक्रम्।
शङ्खपाशौ प्रसिद्धौ। एवं मातुलुङ्गादिरत्नकलशान्तैः परिष्कृतं पाण्येकादशकं
यस्येदृशम्। यद्यपि श्रीमहागणपतिमूर्तेः दश भुजाः प्रसिद्धाः, अत्रैकादशेति
विरुद्धम्, तथापि पाणिपदेन शुण्डादण्डोऽप्यत्र ग्राह्यः, तत्र पाण्यपरपर्यायेणः
करः हस्त इति व्यवहारात्। करी हस्तीति सर्वलोकप्रसिद्धेः। इत्थं च दश

५४ परशुरामकल्पसूत्रम्
भुजाः, एकादशः शुण्डादण्ड इति तदभिप्रायेण सूत्रकृता भगवता
पाण्येकादश-मित्युक्तम्। प्रभिन्नः प्रस्रवन् कटो गण्डो यस्य तम्। अशेषा ये
विघ्नजनिता ध्वंसा अनिष्टकलापास्तेषां निघ्नं नाशकं विघ्नेश्वरम्
उक्तगुणविशिष्टं ध्यायेत् ।।४।।
'अथ' यह अव्यय शब्द पूरे एक वाक्य के लिये प्रयुक्त है। इससे यह
सूचित हो रहा है कि, एक वर्ण्यविषय का अधिकार क्षेत्र समाप्त हो गया,
अर्थात् पूर्वप्रवर्त्तित तर्पण प्रकरण समाप्त हुआ। अब याग-विधि का वर्णन यहाँ
से प्रारम्भ हो रहा है। इसके तुरत बाद 'गृहमागत्य' इस वाक्य में पूर्वकालिक
क्रिया का प्रयोग किया गया है। इससे यह सूचना-सी प्राप्त हो रही है कि,
तर्पण की प्रक्रिया नदी आदि में घर से बाहर पूरी करनी चाहिये। बाहर तर्पण
कर याग-गृह में आने का उपक्रम करना चाहिये। सर्वप्रथम स्थण्डिल के स्थान
अर्थात् यागभूमि को गाय के गोबर से लीप कर पवित्र करना आवश्यक माना
जाता है।
द्वार में प्रवेश के पहले ही द्वार के उभयपार्श्व में द्वारपूजा के उद्देश्य से
दाहिनी ओर 'भद्रकाल्यै नमः', बायीं ओर 'भैरवाय नमः' और ऊपर 'लम्बोदराय
नमः' ये तीन नमस्कार मन्त्र लिखना चाहिये। द्वारपूजा बाहर रहकर ही पूरी की
जाती है। दक्ष और वाम पार्श्व का निर्णय प्रवेश की दृष्टि से नहीं, वरन् निर्गम
की दृष्टि से करना चाहिये।
अब याग गृह में उस द्वार से प्रवेश कर आसनशुद्धि के मन्त्र से आसन
को दिव्य बनाकर उस पर उपवेशन करना चाहिये। यह आसन मन्त्र श्यामा
प्रकरण में लिखा गया है। उसी का प्रयोग करना उचित है। आसन पर आसीन
होकर मूलमन्त्र से प्राणायाम की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिये। यद्यपि सूत्र में संकल्प
का उल्लेख नहीं है फिर भी 'श्रीविद्या की उपासना में निर्विघ्नता की सिद्धि के
लिये श्रीमहागणपति-क्रम का अनुपालन कर रहा हूँ' यह संकल्प अवश्य कर
लेना चाहिये।
तदनन्तर षडङ्गन्यास का क्रम आता है। मूलमन्त्र से हृदय, शिर, शिखा,
नेत्रत्रय, कवच और अस्त्रात्मक विन्यास आवश्यक है। इसमें क्रमशः नमः स्वाहा,
वषट्, वौषट्, हुम् और फट् इन पूरकों का उच्चारण चतुर्थ्यन्त अङ्गशब्दों के साथ

महागणपतिक्रमः ५५
करना विधिसम्मत है। इसके बाद सर्वाङ्ग न्यास करना चाहिये। इसे ही ‘व्यापक’
प्रक्रिया भी कहते हैं। यह प्रक्रिया भी मूल मन्त्र से ही पूरी की जाती है।
इसके बाद स्वात्म में सिद्धलक्ष्मी द्वारा समाश्लिष्ट पार्श्व, रक्तवर्ण,
अर्धेन्दुशेखर, एकादश हस्तों में एकादश प्रकार के आयुध एवं पदार्थ धारण
करने वाले, मद प्रभिन्न गण्डस्थल, परमानन्दनिमग्न और निखिल विघ्नराशि से
उत्पन्न उपद्रवों के दारक भगवान् विघ्नेश्वर का ध्यान करना चाहिये।
उनके द्वारा धार्यमाण द्रव्य एवं आयुध—
१. मातुलुङ्ग— एक प्रकार का जम्बीर चकोतरा (नींबू)
२. गदा— प्रसिद्ध आयुध।
३. पुण्ड्रेक्षु— एक प्रकार का गन्ना (पुण्ड्र-कमल, इक्षु-गन्ना) यह अर्थ भी है।
४. कार्मुक— धनुष।
५. शूल— प्रसिद्ध आयुध।
६. सुदर्शन— चक्र।
७. शङ्ख
८. पाश
९. उत्पल— कमल (संख्या तीन में कमल अर्थ गौण है)
१०. धान्य-मञ्जरी।
११. निजदन्ताञ्चल-रत्नकलश।
इन सभी से उनके हाथ शाश्वत परिष्कृत अर्थात् शोभायमान रहते हैं।
जहाँ तक स्वात्म शब्द का प्रश्न है, टीकाकार ने उसका अर्थ मन लगाया है
और मन तथा हृदय के ऐक्य का समर्थन किया है। तान्त्रिक दृष्टि इससे पृथक्
है। स्वात्म अपनी शैवसत्ता का केन्द्र होता है। मन को जीत कर हृदय केन्द्र
में ध्यान की विधि पूरी की जाती है॥४॥
एवं ध्यानान्तमुक्त्वा ततोऽर्घ्यस्थापनविधिं वक्तुमुपक्रमते
पुरतो मूलसप्ताभिमन्त्रितेन गन्धाक्षतपुष्पपूजितेन शुद्धेन वारिणा
त्रिकोण-षट्कोण-वृत्त-चतुरस्राणि विधाय तस्मिन् पुष्पाणि विकीर्य

५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
वह्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि विन्यस्य अग्निमण्डलाय
दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नमः, सूर्यमण्डलाय द्वादशकलात्मने
अर्घ्यपात्राय नमः, सोममण्डलाय षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय नम
इति शुद्धजलमापूर्य अस्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य धेनु-योनि-
मुद्रां प्रदर्शयेत् ॥५॥
पुरतः स्वस्येति शेषः। मूलेन सप्तत्वम् आवृत्त्या सम्पादनीयम्। तैः
अभिमन्त्रितेन गन्धपुष्पाक्षतैः पूजितेन शुद्धेन पवित्रेण पटपूतेन वारिणा
त्रिकोणषट्कोण-वृत्त-चतुरस्राणि विधाय निर्माय तस्मिन् सङ्घात्मके मण्डले
पुष्पाणि विकीर्य वह्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि मूलषडङ्गानि
विन्यस्य अग्निमण्डलाय नम इत्यारभ्य लिङ्गेन विभज्य मन्त्राणां त्रयाणाम्
‘आधाराय नमः’ ‘पात्राय नमः’ ‘अमृताय नमः’ इत्यन्तं शुद्धजलमापूर्य
अस्त्रमन्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य अन्यत्र गमनशक्तिरहितं कृत्वा
धेनुयोनिमुद्रां प्रदर्शयेत् ॥५॥
अपने समक्ष मूलमन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित गन्ध, अक्षत और पुष्पों
द्वारा पूजित शुद्ध जल से त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुष्कोणों का निर्माण
कर उन पर फूलों को बिखेर कर अग्नि और ईशान तथा नैऋत्य और वायव्य
कोणों में मध्य में और पूर्वादि दिशाओं में भी षडङ्गविन्यास करना चाहिये।
त्रिकोण आदि का निर्माण निर्धारित मुद्रा द्वारा ही करणीय है। सर्वप्रथम चतुरस्र
में, पुनः वृत्त में और इसके बाद त्रिकोण में अर्घ्यविधि सम्पन्न करनी चाहिये।
त्रिकोण, षट्कोण और चतुरस्र मण्डलों में तीन दिव्य मण्डलों की पूजा की
जाती है— १. अग्निमण्डल, २. सूर्यमण्डल और ३. सोममण्डल। अपने
स्वात्म रूप गणपति में त्रिनेत्र अग्निमण्डल, दक्षनेत्र सूर्यमण्डल और वाम नेत्र
सोममण्डल माना जाता है। अग्नि की दश कलायें होती हैं। इन दशों की पूजा
होती है। सम्प्रदायान्तर में इसे दशार रूप दश कला संयुक्त के स्थान पर
अष्टार चक्र कहते हैं। अग्निमण्डल में अर्घ्य पात्र का आधार स्थापित होता है।
अग्नि बीज के साथ और मूल मन्त्रों के साथ स्थापना की विधि पूरी होती है।
सूर्यमण्डल द्वादशार चक्र माना जाता है। सूर्य की द्वादश कलायें होती
हैं। इसमें मूल मन्त्र के साथ सविता का ‘आ सत्येन रजसा वर्त्तमानः’ इस मन्त्र