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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 320 में से

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पृष्ठ 92

५० परशुरामकल्पसूत्रम्
३. अब अपने हृदय केन्द्र में हृत्पद्म का ध्यान करे। उस पद्मकोश में विराजमान
महागणपति का ध्यान में ही दर्शन करे। मानो भगवान् गणेश प्रकाश
परमोज्ज्वल उदीयमान अनन्त आदित्यों की पाटलिमा को भी अतिक्रान्त
करने वाले आरुण्य से अलङ्कृत हो रहे हैं।
४. दोष-राशि के वेष की कल्पना यदि की जाय और उसे साकार होने से पहले
ही प्रध्वस्त कर दिया जाय, उस स्थिति को निर्वेष कहते हैं। गणेश ऐसे
ही हैं। दोषों के अस्तित्व का उनमें सर्वथा अभाव है।
५. यह प्रसिद्ध है कि, उनका मुख अनेकप (द्विप अर्थात् गज) के समान है।
यह पौराणिक मान्यता है। तान्त्रिक प्रक्रिया प्राण को ही गणेश मनती है।
६. उपासक उस समय ब्रह्मवेला के वर्चस् की ऊर्जा से ओत-प्रोत हो रहा है।
उसने पवन अर्थात् प्राणापानवाह को नियन्त्रित कर लिया है। मन उसके
वशीभूत हो चुका है। वह भगवान् गणेश के उस दिव्यरूप में समाविष्ट
हो चुका है।
७. गणेश का वह प्रभाभास्वर स्वरूप और उससे सतत विनिःसृत रश्मिराशि
से स्वयं भासमान हो उठा है। उसकी व्यक्तिसत्ता में दिव्यता खिल उठी
है। लगता है, उसका शरीर भी गणेश की अरुण आभा से लाल-लाल
हो रहा है।
गणेश उपासक का यह दैनन्दिन उपक्रम उसे सतत आनन्दोल्लास से
उल्लसित करता है। इतनी प्रक्रिया अपनाने के बाद अब उपासक शयन-
कक्ष से बाहर निकलता है।
८. अब वहं दैनिक प्राकृतिक प्रक्रिया पूरी करता है। शौच आदि से निवृत्त होता
है। मुख प्रक्षालन, दन्तधावन, स्नान, वस्त्र, आभूषण एवं अन्य परिधानीय
धारण कर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता है।
९. अब अरुणोदय का समय हो गया है। नये निकलते लालिमा लिये उगते
आदित्य में अपने आराध्य एकदन्त का वह दर्शन करता है। उन्हें पवित्र
अर्घ्य अर्पित करता है। इसका एक मन्त्र है। उसे गणेश गायत्री कहते हैं।
उसे इस रूप से जानते हैं।