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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 320 में से

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पृष्ठ 93

महागणपतिक्रमः ५१
“तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्” इस मन्त्र
का अर्थ है, उदीयमान दिवाकर की दिव्य आभा से भासमान भगवान् गणेश
को हम उपासक लोग तात्त्विक रूप से जानते हैं। वे वक्रतुण्ड हैं। हम उनका
ध्यान करते हैं। वे एकदन्त द्वैमातुर हेरम्ब हमारी बुद्धि शक्ति के प्रेरक बनें।
इस मन्त्र से इस भावना के साथ गणेशार्घ्य प्रदान कर अवशिष्ट नित्यकृत्य
जैसे अग्निहोत्र आदि सम्पन्न करे। इसके बाद तर्पण करना चाहिये। तर्पण करने
से, 'आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, 'बल' पुष्टि, महती कीर्ति, कवित्व-शक्ति, भुक्ति
और मुक्ति अवश्य प्राप्त होती है। इसे चार बार करना चाहिये। सूत्र के साथ
इस अर्थवाद वाक्य को जोड़ दिया गया है। इससे उपासक के लिये इसको
प्रतिदिन सम्पन्न करना अनिवार्य कर दिया गया है।।२।।
तदेव स्पष्टं विशिनष्टि
प्रथमं द्वादशवारं मूलमन्त्रेण तर्पयित्वा मन्त्राष्टाविंशतिवर्णान्
स्वाहान्तानेकैकं चतुर्वारं मूलं च चतुर्वारं तर्पयित्वा पुनः श्री-
श्रीपति-गिरिजागिरिजापति-महीमहीपति-महालक्ष्मीमहालक्ष्मीपति-
ऋद्ध्यामोद-समृद्धिप्रमोद-कान्तिसुमुख-मदनावतीदुर्मुख-मदद्रवा-
विघ्न-द्राविणी-विघ्न-कर्तृ-वसु-धारा-शङ्खनिधि-वसुमतीपद्मनिधि-
त्रयोदशमिथुनेष्वेकैकां देवतां चतुर्वारं च तर्पयेत्। एवं चतुश्चत्वारिं-
शदधिकचतुःशततर्पणानि भवन्ति ।।३।।
मूलमुच्चार्य तर्पयामीति मन्त्रेण तर्पणम्। एवमेव अग्रे सर्वत्र मूलस्थले
संयोज्यम्। स्वाहान्त इत्यनेन प्रतिवर्णमन्त्रे स्वाहाकारघटकत्वं सूचितम्।
स्वाहान्ते तर्पयमि इत्यपि योज्यम्।
तथा च मूलस्यैकवर्णः, तत्र बिन्दुयोगोऽपि शिष्टसम्प्रदायात्, ततः
स्वाहाकारः, ततस्तर्पयामीति। एवं चतुर्वारं। ततो मूलेन चतुर्वारम्। एवं सर्वेषु
वर्णेषूह्यम्। पूर्वं द्वादशवारं तर्पयित्वेति एको गणः सूचितः। तदुत्तरं चतुर्वारं
तर्पयित्वेत्यन्ततर्पणम् एको गणः सूचितः। अस्मिन् सूत्रे पुनरित्यनेन
त्रयोदशमिथुनतर्पणम् अन्यो गणः सूचितः। गणत्रयसूचनाफलं च एकैकगणस्य