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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

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पृष्ठ 94

५२ परशुरामकल्पसूत्रम्
एकैकापूर्वजनकत्वात् तन्मध्ये एकस्य विस्मरणे पुनस्तद्गणमारभ्यैव अनुष्ठानं
न सकलादिमारभ्य।
श्रीश्रीपतीत्येकं, गिरिजागिरिजापतीत्येकं मिथुनम्। एवं रीत्या एकं
स्त्रीलिङ्गान्तमेकञ्च पुंलिङ्गान्तं मिथुनं ज्ञेयम्। एवं त्रयोदशमिथुनेषु एकैकां देवतां
द्वितीयान्तमुच्चार्य तर्पयामीति योजयेत्। इत्थं चोक्तरीत्या एकदेवतायाश्चतुर्वारं
तर्पणम्, ततो मूलेन चतुर्वारं कार्यं पूर्ववत्। तदित्थं मूलतर्पणानि २२८ वर्ण-
तर्पणानि ११२ मिथुनतर्पणानि १०४ आहत्य ४४४ तर्पणानि भवन्तीत्यर्थः॥३॥
मूलमन्त्र पहले उच्चारण कर उसके साथ 'तर्पयामि' क्रिया लगाकर तर्पण
का मन्त्र बनता है। इसी तरह सर्वत्र मूल के साथ 'तर्पयामि' क्रिया का संनियोजन
करना चाहिये। चार बार तर्पण में क्रिया की आवृत्ति आवश्यक नहीं होती। मन्त्र
की आवृत्ति नितान्त आवश्यक मानी जाती है। स्वाहान्त शब्द प्रयोग का तात्पर्य
प्रतिवर्ण मन्त्र में 'स्वाहा' का प्रयोग आवश्यक है, यही मानना चाहिये। स्वाहा
के अनन्तर 'तर्पयामि' क्रियायोग ही परम्परा में गृहीत है।
इस प्रकार मूल के एक वर्ण और इसके साथ बिन्दु के प्रयोग शिष्टस्वीकृत
माने जाते हैं। इसके बाद 'स्वाहा' का प्रयोग और तदनन्तर 'तर्पयामि' क्रिया
का प्रयोग कर तर्पण मन्त्र का निर्माण करते हैं। इस मन्त्र से चार बार तर्पण
कर पुनः मूलमन्त्र से ही चार बार तर्पण करना चाहिये, इस तरह ऊह द्वारा
वर्ण मन्त्रों का प्रयोग कर तर्पण का विधान पूरा करने का नियम है। गण के
अनुसार तर्पण का निर्देश सूत्रों से प्राप्त होता है। जैसे पहले १२ बारह बार
तर्पण करने की प्रक्रिया से प्रथम गण का सूचन हो रहा है। पुनः चतुर्वार तर्पण
की बात से यह स्पष्ट हो रहा है कि, यह एक पृथक् गण है। 'पुनः' के प्रयोग
के आधार पर इसके बाद तेरह मिथुनों का तर्पण सूचित हो रहा है। यह एक
तीसरा गण प्रतीत होता है। इन गणों के पृथक्-पृथक् तर्पण का फल भी बड़ा
अच्छा मिलता है। कभी बीच में विस्मृतिवश यदि प्रमाद घटित हो जाय तो,
उसी गण से पुनः प्रारम्भ किया जाता है। अन्यथा इसे प्रारम्भ से शुरू करना
पड़ता है।
श्री और श्रीपति का एक मिथुन, गिरिजा-गिरिजापति यह द्वितीय मिथुन,
इसी तरह एक स्त्रीलिङ्ग शब्द तथा साथ के पुल्लिङ्ग शब्द को मिलाकर तेरह