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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 320 में से

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पृष्ठ 87

दीक्षाविधिः ४५
शिष्यस्य अशेषमन्त्राधिकारित्वम्, शिष्यकर्त्तृकक्रिया च
शिष्योऽपि पूर्णतां भावयित्वा कृतार्थस्तं गुरुं यथाशक्तिवित्तै-
रुपचर्य विदितवेदितव्योऽशेषमन्त्राधिकारी भवेदिति शिवम् ॥४३॥
पूर्णता पूर्वमेव व्याख्याता। अत एव कृतोऽर्थो मोक्षसाधनं येन सः,
तादृशः। तं गुरुं यथाशक्तिवित्तैः 'लक्षं लक्षपतिर्दद्याद्दरिद्रस्तु वराटिकाम्' इति
रीत्या उपचर्य सन्तोष्य विदितं ज्ञातं वेदितव्यं ज्ञातुं योग्यं येन सः सर्वज्ञ
इत्यर्थः। अशेषमन्त्राणां सौरवैष्णवादिसप्तकोटिमन्त्रेषु अधिकारी भवेत्। एतेन
एतदुपदेशेन सर्वमन्त्रोपदेशो जातः। यच्चोपक्रान्तं दीक्षा-प्रकरणं तत्
समाप्तमिति ज्ञापकः शिवशब्दः ॥४३॥
।। इति श्रीरेणुकागर्भसम्भूत-श्रीभार्गवोपाध्यायजामदग्न्यमहादेवप्रधानशिष्य-महाकौलाचार्य-
श्रीमत्परशुरामकृतौ कल्पसूत्रे श्रीरामेश्वररचितायां सौभाग्योदयनाम्न्यां परशुरामकल्पसूत्र-
(मुख्यांश)वृत्तौ दीक्षाविधिर्नाम प्रथमः खण्डः सम्पूर्णः।।
इस दीक्षा से परिष्कृतचेतन शिष्य को दृढ़तापूर्वक यह भावन करना
चाहिये कि, अब मैं पूर्णपुरुष हो गया हूँ। मैंने मोक्ष साधन रूप सर्वोत्तम अर्थ
को दीक्षा द्वारा प्राप्त कर लिया है। मैं सचमुच कृतार्थ हो गया हूँ। पूर्ण भी
हूँ और पूर्ण क्रियावान् भी हो चुका हूँ। यदि तत्काल दीक्षा में अवस्थित हो,
तो उस समय तत्काल यथाशक्ति अर्थात् वित्तशाठ्य से बचते हुए गुरु के चरणों
में भूरि दक्षिणा उपस्थित करे। निर्धन व्यक्ति वराटिका, कौड़ी या बाटी ही दे।
इस विषय में एक उक्ति है—
'लखपति देवे लाख, निर्धन केवल बाटी'। इस उक्ति के अनुसार गुरुदेव
को सन्तुष्ट कर स्वयं प्रसन्नता का अनुभव करे।
इसी जीवन में सब कुछ जाना जा सकता है किन्तु वही जानना श्रेष्ठ
माना जाता है, जो सचमुच जानने योग्य हो, जानने योग्य ब्रह्म है, गुरुदेव हैं
और स्वात्म का अस्तित्व है। गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही सबसे अधिक उपयोगी
और जानने योग्य माना जाता है। जो ऐसा जानकार होता है उसे विदितवेदितव्य
कहते हैं। शिष्य अपने को ऐसा ही समझे।