परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ परशुरामकल्पसूत्रम्
वह्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि विन्यस्य अग्निमण्डलाय
दशकलात्मने अर्घ्यपात्राधाराय नमः, सूर्यमण्डलाय द्वादशकलात्मने
अर्घ्यपात्राय नमः, सोममण्डलाय षोडशकलात्मने अर्घ्यामृताय नम
इति शुद्धजलमापूर्य अस्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य धेनु-योनि-
मुद्रां प्रदर्शयेत् ॥५॥
पुरतः स्वस्येति शेषः। मूलेन सप्तत्वम् आवृत्त्या सम्पादनीयम्। तैः
अभिमन्त्रितेन गन्धपुष्पाक्षतैः पूजितेन शुद्धेन पवित्रेण पटपूतेन वारिणा
त्रिकोणषट्कोण-वृत्त-चतुरस्राणि विधाय निर्माय तस्मिन् सङ्घात्मके मण्डले
पुष्पाणि विकीर्य वह्नीशासुरवायुषु मध्ये दिक्षु च षडङ्गानि मूलषडङ्गानि
विन्यस्य अग्निमण्डलाय नम इत्यारभ्य लिङ्गेन विभज्य मन्त्राणां त्रयाणाम्
‘आधाराय नमः’ ‘पात्राय नमः’ ‘अमृताय नमः’ इत्यन्तं शुद्धजलमापूर्य
अस्त्रमन्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावकुण्ठ्य अन्यत्र गमनशक्तिरहितं कृत्वा
धेनुयोनिमुद्रां प्रदर्शयेत् ॥५॥
अपने समक्ष मूलमन्त्र से सात बार अभिमन्त्रित गन्ध, अक्षत और पुष्पों
द्वारा पूजित शुद्ध जल से त्रिकोण, षट्कोण, वृत्त और चतुष्कोणों का निर्माण
कर उन पर फूलों को बिखेर कर अग्नि और ईशान तथा नैऋत्य और वायव्य
कोणों में मध्य में और पूर्वादि दिशाओं में भी षडङ्गविन्यास करना चाहिये।
त्रिकोण आदि का निर्माण निर्धारित मुद्रा द्वारा ही करणीय है। सर्वप्रथम चतुरस्र
में, पुनः वृत्त में और इसके बाद त्रिकोण में अर्घ्यविधि सम्पन्न करनी चाहिये।
त्रिकोण, षट्कोण और चतुरस्र मण्डलों में तीन दिव्य मण्डलों की पूजा की
जाती है— १. अग्निमण्डल, २. सूर्यमण्डल और ३. सोममण्डल। अपने
स्वात्म रूप गणपति में त्रिनेत्र अग्निमण्डल, दक्षनेत्र सूर्यमण्डल और वाम नेत्र
सोममण्डल माना जाता है। अग्नि की दश कलायें होती हैं। इन दशों की पूजा
होती है। सम्प्रदायान्तर में इसे दशार रूप दश कला संयुक्त के स्थान पर
अष्टार चक्र कहते हैं। अग्निमण्डल में अर्घ्य पात्र का आधार स्थापित होता है।
अग्नि बीज के साथ और मूल मन्त्रों के साथ स्थापना की विधि पूरी होती है।
सूर्यमण्डल द्वादशार चक्र माना जाता है। सूर्य की द्वादश कलायें होती
हैं। इसमें मूल मन्त्र के साथ सविता का ‘आ सत्येन रजसा वर्त्तमानः’ इस मन्त्र